Monday, March 15, 2010

हुसैन के साथ जो हुआ अच्छा हुआ

नीरज नैयर

हमेशा चर्चा में रहने वाले चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन एक बार फिर चर्चा में हैं। लेकिन इस बार चर्चा का मुद्दा थोड़ा अलग है। मकबूल साहब ने भारतीय का चोला उतारकर अब कतर की नागरिकता हासिल कर ली है। वो पिछले काफी समय से निर्वासित सा जीवन बिता रहे थे। भारत सरकार ने उन्हें सुरक्षा की गारंटी भी दी मगर हुसैन वापसी की हिम्मत नहीं जुटा पाए। देश के तमाम बुध्दिजीवी और चित्रकार हुसैन के इस कदम पर आहत और आक्रोशित हैं। आहत इसलिए की एक महान चित्रकार का साथ उनसे छूट गया और आक्रोशित इसलिए कि चंद हिंदुवादी संगठनों के अमानवीय कृत्यों ने मकबूल साहब को इतना बड़ा फैसला लेने के लिए मजबूर कर दिया। हुसैन के समर्थकों का मानना है कि वो रंगों और रेखाचित्रों के चित्रकार हैं। उनके यहां नख-शिख चित्रण नहीं होता, आमतौर पर वह चेहरा भी नहीं बनाते। जिस चित्र को लेकर इतना विवाद उठा वो भी एक रेखाचित्र था। साफ है कि नगनता हुसैन में नहीं बल्कि उसका विरोध करने वालों की आंखों में है। वो ये तर्क भी देते हैं कि जब मंदिरों की दीवारों पर मिथुन चित्रकारी मिलती हैं,

शिव-पार्वती के प्रेम संबंधों का बखान किया जाता है, श्रीकृष्ण की रास लीलाओं पर आनंदित हुआ जाता है तो फिर एक चित्रकार की भावनाओं पर इतना हंगामा क्यो मचाया गया। यह बात सही है कि हमारे देश में अभिव्यक्ति की स्वत्रंता है, लेकिन जब यह स्वतंत्रा किसी समुदाय विशेष की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का कारण बन जाए तो बवाल मचना लाजमी है। हुसैन का समर्थन करने वालों को जरा चित्रकारी का चश्मा उतारकर उनके द्वारा बनाई गईं कला-कतिृयों पर भी गौर फरमाना चाहिए। मकबूल फिदा हुसैन के निशाने पर हिंदू धर्म के अराध्य ही रहे, उन्होंने देवी-देवताओं के तमाम नगन चित्र बनाएं। भारतीयता की बात करने वाले हुसैन ने तो भारत माता को भी नहीं बख्शा, उनका भी बेहद आपत्तिजन चित्रण कर डाला। हुसैन साहब खुद को धर्मनिरपेक्ष कहते हैं, यदि वास्तव में ऐसा होता तो उनकी कूंची कभी इस्लाम या ईसायत के खिलाफ क्यों नहीं चली। सच यही है कि हुसैन ने अपनी चित्रकारी से लाखों-करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं को आहत किया। उन्होंने अपने फूहड़ चित्रों को लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचने का जरिया बनाया। लिहाजा हुसैन के कदम के लिए हिंदुवादी संगठनों को दोषी हरगिज नहीं ठहराया जा सकता। केवल भारत ही नहीं, जहां कहीं भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई गई, वहां दंगे भड़के,

विरोध-प्रदर्शन हुए। डेनमार्क में छपे हजरत मुहम्मद साहब के कार्टूनों को भला कौन भूल सकता है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर छापे गए इन काटूनों ने समूचे विश्व में मुस्लिम समुदाय को उद्देलित कर दिया। कार्टून बनाने वाले के खिलाफ फतवा जारी किया गया, उसके सिर पर ईनाम रखा गया। अभी हाल ही में जूता बनाने वाली कंपनी प्यूमा पर धार्मिक भावानाओं से खिलवाड़ का आरोप लगाते हुए मुस्लिम समुदाय ने उसके खिलाफ भी मोर्चा खोला। जब इस सब को जायज ठहराया जा सकता है तो, हुसैन के विरोध पर आपत्ति क्यों। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने तो यहां तक कहा कि उनका संगठन हुसैन के वापसी के खिलाफ नहीं, बस उन्हें लोगों की भावनाएं आहत करने के लिए माफी मांगनी होगी। हुसैन ने कतर की नागरिकता ग्रहण करने के बाद जो बयान दिया उसका जिक्र करना यहां जरूरी है। उन्होंने कहा,

'भारत ने मेरा बहिष्कार किया, मेरी कला और आत्म अभिव्यक्ति पर हमला किया गया। मुझे दुख है कि मैं भारत छोड़ रहा है, लेकिन जब संघ परिवार ने मुझ पर हमला किया तो सरकार चुप रही। ऐसे में मैं कैसे वहां रह सकता हूं। ' मकबूल साहब का यह कहना बिल्कुल सही है कि सरकार चुप रही, लेकिन हमले को लेकर नहीं बल्कि उनकी चित्रकारी को लेकर। अगर उनके आपत्तिजनक चित्रों पर सरकार की तरफ से सख्त रुख अपनाया जाता तो शायद बात इतनी बढ़ती ही नहीं। सरकार का भी फर्ज बनता है कि वो धार्मिक उन्माद फैलाने वाले कारकों को आकार न लेने दे। जहां तक बात हमले की है तो वो हुसैन साहब की कला पर नहीं वरन उनके ग़लत विचारों पर था। कलाकारों के प्रति हमारे देश में आदर और सम्मान का जो भाव है उस पर उंगली नहीं उठाई जा सकती। मकबूल फिदा हुसैन आज जिस मुकाम पर हैं वो उन्होंने भारत में ही हासिल किया है, इसलिए ये कहना कि भारत ने उनका बहिष्कार किया, किसी के लिए भी स्वीकार्य नहीं होगा। ऐसा नहीं है कि हुसैन ने महज एकाध बार विवादित चित्रों का चित्रण किया, वो बार-बार वहीं सब दोहराते रहे। 1990 में पहली बार धार्मिक भवनााओं को भड़काने वाले उनके चित्र आम जनता के सामने आए, हालांकि ये बात अलग है कि उन्होंने ये चित्र 1970 में बनाए थे। इसके बाद 6 जनवरी 2006 को एक पत्रिका में भारत माता को लेकर उनकी अभद्र पेंटिंग प्रकाशित हुई। हुसैन ने बवाल के बाद माफी मांगी और चित्र वापस लेने का वादा भी किया,

मगर वादा निभाया नहीं। थोड़े वक्त बाद ही उनकी आधिकारिक वेबसाइट पर यह तस्वीर चस्पा कर दी गई। इससे साफ है कि चित्रकार साहब स्वयं विवादों में घिरे रहना चाहते थे। भारत एक संस्कृति प्रधान देश हैं, हमारी कुछ मान्यताएं है, धार्मिक भावनाए हैं। उनके साथ खिलवाड़ की स्थिति में जनमानस के आक्रोश को अव्यवहारिक या अमर्यादित कतई नहीं ठहराया जा सकता। हो सकता है कि विश्व हिंदूं परिषद, आरएसएस या शिवसेना के विरोध का तरीका कुछ गलत रहा हो मगर विरोध के कारण को गलत नहीं कहा जा सकता। सिर्फ हिंदुवासी संगठन ही नहीं आम हिंदुओं में भी हुसैन के चित्रों को लेकर रोष है, बस फर्क केवल इतना है कि वो सार्वजनिक तौर पर इसका प्रदर्शन नहीं करते। मकबूल फिदा हुसैन अब कतर के नागरिक बन गए हैं, तो क्या वो अपनी भावनाओं को वैसी ही उड़ान दे पाएंगे जैसी भारत में दिया करते थे। क्या वो अपनी रचनात्मकता का प्रदर्शन इस्लामी नायकों के साथ करेंगे? अगर वो ऐसा करते हैं तो उनके विरोध की कोई गुंजाइश ही नहीं बचेगी, लेकिन ऐसा वो कर पाएंगे इस बात की संभावना दूर-दूर तक दिखलाई नहीं देती। केवल भारत ही ऐसा देश है जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इतनी स्वतंत्रता मिल सकती है। सलमाल रश्दी की सैटनिक वर्सिस और तस्लीमा नसरीन की लाा पर क्या बवाल नहीं हुआ, भले ही इन दोनों ने कितना भी सच लिखा हो मगर उससे भावनाएं तो आहत हुई ही। तस्लीमा लंबे समय से भारत में निर्वासित जीवन बिता रही हैं। अभी हाल ही में उनके एक लेख जिसमें उन्होंने मुहम्मद साहब को बुर्के के खिलाफ बताया था को लेकर कर्नाटक में मुस्लिम धर्मावलंबियों ने हिंसक प्रदर्शन किए,

स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कर्फ्यू तक लगाना पड़ा। हालांकि तस्लीमा इस लेख को अपना मामने से इंकार कर रही हैं। तस्लीमा नसरीन ने अपने लेखों में इस्लाम की कार्यपध्दति की आलोचना की, वो एक महिला की हैसीयत से उसमें बदलाव की पक्षधर हैं। लेकिन उन्होंने कभी इस्लामिक धर्म गुरुओं का अशील व्याख्यान नहीं किया। बावजूद इसके उन्हें अपना वतन छोड़ना पड़ा। मकबूल साहब ने तो धर्म पर ही अशीलता की कूंचियां चलाई तो फिर उनके प्रति प्रेमभाव और सम्मान कैसे कायम रह सकता है। मकबूल फिदा हुसैन अपनी आदत और कृत्यों से अच्छी तरह वाकिफ हैं, उन्हें इल्म है कि वो पुन: वही सब दोहराए बिना नहीं रह पाएंगे, इसलिए उन्होंने कतर में पनाह लेना बेहतर समझा। एक चित्रकार के तौर पर हुसैन का समर्थन करने में कोई बुराई नहीं, लेकिन जो कुछ उन्होेंने किया उसको सही करार देना सरासर गलत है।

Thursday, March 4, 2010

भारत-पाक संबंध: चेतन भगत के विचार व्यवहारिक नहीं

नीरज नैयर
चेतन भगत बहुत ही काबिल उपन्यासकार हैं। वन नाइट एट कॉल सेंटर में उन्होंने प्यार के उतार-चढ़ाव और पेशे की मजबूरी को बहुत अच्छे ढंग से रेखांकित किया था। टू स्टे्टस में भी उन्होंने लव और मैरिज के बीच के फासले को मिटाने की जद्दोजहद को बेहतरीन तरीके से पाठकों के सामने पेश किया। उनके दूसरे उपन्यास भी वाह-वाही लूटने में सफल रहे , फाइव पाइंट समवन का नाम थ्री इडियट्स से उठे विवाद के बाद हर किसी की जुबान पर चढ़ा हुआ है।

चेतन के लेख भी आजकल विभिन्न अखबारों में देखने को मिल जाया करते हैं, कुछ दिन पहले हिंदी-अंग्रेजी को लेकर उनका एक लेख पढ़ने को मिला। जिसमें उन्होंने खूबी के साथ अग्रेजी की महत्ता को सरल शब्दों में सबके सामने रखा। निश्चित तौर पर चेतन की लेखनी युवावर्ग के लिए प्रेरणास्त्रोत का काम कर सकती है, मगर भारत-पाकिस्तान संबंध जैसे गंभीर मुद्दों पर उनमें थोड़ी अपरिपक्वता नजर आ ही जाती है। हाल ही में एक प्रतिष्ठित अखबार ने चेतन भगत का भारत-पाक रिश्तों को लेकर लिखा लेख प्रकाशित किया, जिसका शीर्षक था 'शांति का मतलब प्रेम नहीं'। लेख के माध्यम से चेतन ने कहने का प्रयास किया कि भारत द्वारा पाकिस्तान को बातचीत के लिए आमंत्रित करने में कोई बुराई नहीं। वो मानते हैं कि दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने के लिए भारत को प्रयास करते रहने चाहिए।


इस बात में कोई दो राय नहीं कि अमन-शांति के माहौल में नफरत के बीज बोने वालों के लिए कोई जगह नहीं होगी, दोनों मुल्कों का आवाम वर्तमान की अपेक्षा यादा सुखी और खुशहाल नजर आएगा। विकास सिर्फ सैन्य ताकत बढ़ाने तक ही सीमित नहीं रहेगा, उसका असर छोटे से गांव से लेकर गगनचुंबी इमारतों वाले शहरों में भी दिखाई देगा। मगर ्सवाल ये यह उठता है कि क्या ऐसा संभव है? भारत के विभाजन से लेकर अब तक पाकिस्तान के साथ हम एकतरफा रिश्ते निभाते आए हैं। विदेश नीति में भी मोहब्बत की तरह एकतरफा रिश्ते कष्टदायक ही होते हैं और ये बात वक्त वक्त पर हमें महसूस भी होती रही है। जब एक तरफा मोहब्बत का अंत जुर्म की अंधेरी गालियों में जाकर होता है तो फिर कैसे उम्मीद लगाई जा सकती है कि पाकिस्तान हमारी अच्छाइयों का सिला अच्छाई के साथ देगा। चेतन मानते हैं कि जब तक पड़ोस में स्थिर लोकतंत्र नहीं आता, तब तक उससे शांति की आस नहीं लगाई जा सकती, इसलिए भारत को पाकिस्तान में लोकतंत्र के लिए अभियान चलाना चाहिए।


उनकी सोच है कि इससे हम उन पाकिस्तानियों का समर्थन हासिल कर सकेंगे जो लोकतांत्रिक सरकार चाहते हैं। लोकतंत्र के प्रति भारत का खुला समर्थन पाक सेना को कमजोर करेगा और पाकिस्तानियों में भारत की छवि सुधरेगी। चेतन की इस नसीहत का सीधा सा मतलब है कि नई दिल्ली इस्लामाबाद के अंदरूनी मामलों में अंदर तक दखल दे, लेकिन इसके परिणाम कितने भयानक हो सकते हैं चेतन ने शायद उनपर गौर करना मुनासिब नहीं समझा। कुछ साल पहले जब म्यांमार में पेट्रो मूल्य वृध्दि को लेकर बौध्द भिक्षुओं और जुंटा सरकार के बीच खूनी खेल शुरू हुआ था तब भीबुध्दिजीवियों द्वारा भारत को दखलंदाजी करने की नसीहतें दी गई थीं। उन दिनों शायद ही कोई ऐसा अखबार रहा होगा जिसमें बड़े-बड़े लेखकों के समझाइश भरे लेख न प्रकाशित हुए हों। लेकिन सरकार ने उस वक्त खामोशी अख्तियार करके बिल्कुल वाजिब निर्णय लिया। म्यांमार के साथ हमारी पूर्वात्तर की सीमा जुड़ती है, कई बार ऐसा देखने में आया कि भारत से नाराजगी प्रकट करने के लिए जुंटा सरकार ने नई दिल्ली विरोधियों को घुसपैठ करने के लिए आजाद छोड़ दिया।


ऐसी स्थिति में यदि भारत दखलंदाजी करने की कोशिश करता तो उसे देश हित में नुकसान उठाने पड़ते। पाकिस्तान में भी किसी तरह का अभियान चलाने का मतलब है कि उग्रवादी संगठनों को पूरी तरह से अपने खिलाफ कर लेना। वर्तमान में पाक में जो सरकार है वो लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुनकर ही आई है, जनता ने रिकॉर्ड मतों से पीपीपी के सिर जीत का सेहरा बांधा था। इस सरकार ने अपने शुरूआती दौर में जब थोड़ी बहुत स्थिरता दिखाई दे रही थी तब भी ऐसा कौनसा तीर मार लिया जो हमें लोकतंत्र का अलख जगाने के लिए प्रेरित करे। पाकिस्तान में लोकतंत्र के पैरोकार हों या उसकी मुखालफत करने वाले, हर किसी के लिए भारत दुश्मनों की फेहरिस्त में सबसे पहले आता है। वहां के नेता भारत विरोधी नारे लगा-लगाकर ही सड़क से संसद तक का सफर तय करते हैं। ऐसे में वहां अपने लिए समर्थन की बात सोचना भी बेमानी होगा। जहां तक बात रही पाक से रिश्ते रखने की तो इसकी पहल अब उसे ही करने देनी चाहिए, आखिर संबंधों में बेहतरी का फायदा दोनों देशों को ही मिलेगा।


आखिर ऐसा कब तक चलता रहेगा कि हम ही शांति का पैगाम भी लेकर जाएं और बदले में हमें ही जख्म भी खाएं। जिस तरह ताली एक हाथ से नहीं बजती, उसी तरह रिश्तों में घनिष्ठता भी एकतरफा पहल से नहीं आ सकती। पाक को भी आगे बढ़कर इस बात का सुबूत देना होगा कि वो शांति और अमन का पक्षधर है, यदि वो ऐसा नहीं करता तो फिर उसके आगे-पीछे घूमकर उसे मनाने का क्या मतलब। पुणे ब्लास्ट में पाकिस्तानी संलिप्त्तता सामने आ चुकी है, सरकार भी इस बात को मानती है कि हमले के तार सीमा पार से जुड़े हैं। इस सब के बाद भी क्या पाक को करीब लाने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए, इसका जवाब वो लोग शायद यादा अच्छे से दे सकते हैं जिनके अपने आतंकवादी हमलों में मारे गए। मुंबई हमले के दोषियों के खिलाफ उसने अब तक कोई कदम नहीं उठाया, उल्टा उनके सरंक्षण में जरूर लगा रहा।


मौजूदा दौर में पाक को करीब लाने के बजाए उससे दूरी बनाए रखना ही बेहतर है, और शायद आवाम का भी यही फैसला होगा। चेतन ने अपने लेख में आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया है कि शांति के प्रयास करना क्यों जरूरी है। उनके मुताबिक दोनों मुल्कों का संयुक्त रक्षा बजट करीब 40 अरब डॉलर है, जिसमें से तीन चौथाई से भी अधिक खर्च भारत करता है। यदि शांति के प्रयासों से सैन्य खर्चों में कटौती होती है तो क्या इससे शांति का आर्थिक महत्व साबित नहीं होता। एक बारगी मान भी लिया जाए कि पाकिस्तान से रिश्ते मधुर हो गए हैं तो भी यह सोचना गलत होगा कि रक्षा बजट की राशि को विकास में लगाया जाएगा। भारत के लिए सिर्फ पाक ही चुनौती नहीं है, चीन उसकी परेशानियों को हर रोज बढ़ा रहा है। चीन के मुकाबले में खड़े रहने के लिए रक्षा बजट में हर साल इजाफा ही किया जाएगा, कमी नहीं। चेतन भगत ने अपने लेख के दूसरे पैरा में कहा है कि अगर पाकिस्तान के साथ शांति बनाए रखने से भारतीयों को बेहतर जीवन मिलता है तो क्यों न इस विकल्प को आजमाया जाए। यहां चेतन को थोड़ा चिंतिन करने की जरूरत है कि हमारे अब तक के किए गए शांति के प्रयासों से भारतीयों का जीवन कितना बेहतर बना।


अगर 1993 के मुंबई ब्लास्ट के बाद ही भारत सरकार ने सख्त कदम उठाते हुए पाक से रिश्तों का इंतकाल कर दिया होता तो शायद उसके बाद हर थोड़े अंतराल में यूं धमाके नहीं होते। पाक को शह एक तरह से हमारी उदारवादी आदतों की वजह से ही मिलती रही। वह जानता है कि भारत लंबे समय तक उससे नाक-मुंह सिकोड़ कर नहीं बैठा रह सकता। एक बार फिर ये बात साबित हो ही गई। मुंबई हमले के बाद हमने जिस तरह का सख्त रवैया अपनाया उसमें वक्त के साथ-साथ नरमी इस हद तक आ गई कि खुद आगे बढ़कर पड़ोसी को बातचीत का न्यौता दे आए। भारत के इस फैसले को पाकिस्तान में घुटने टेकने के तौर पर लिया जा रहा है। प्रधानमंत्री गिलानी से लेकर राष्ट्रपति जरदारी तक सब इसे पाक की कूटनीतिक जीत मानकर चल रहे हैं। दोनों मुल्कों में दोस्ती होते देखने की हसरत शिवसेना जैसी कट्टरवादी पार्टी में भी होगी मगर इसके लिए आवाम की जिदंगी को दाव पर नहीं लगाया जा सकता।


चेतन भगत के विचार बहुत ही अच्छे हैं मगर उन्हें व्यवहारिक तौर पर नहीं अपनाया जा सकता, खासकर पाकिस्तान के साथ तो बिल्कुल नहीं। सरकार को चाहिए कि वो जनभावना का आदर करते हुए पाक से निश्चित दूरी बनाए रखे, क्योंकि उसका करीब आना हमारे लिए ही नुकसानदायक ही साबित होता है। दोनों मुल्कों के बीच रिश्तों की नींव पूरी तरह से खोकली पड़ चुकी है, जब तक पाक उसे विश्वास और भरोसे के मिश्रण से भरने के बारे में नहीं सोचता हमें भी खामोशी से खड़े रहना चाहिए। बात यहां अहम की नहीं, देश और जनता के हित ही है सरकार के साथ-साथ चेतन को भी इस बारे में सोचना चाहिए।