Thursday, May 23, 2013

वेश्यावृत्ति को क्यों न दी जाए कानूनी मान्यता?

 सट्टेबाजी का खेल राजा-महाराजाओं के जमाने से चला आ रहा है। पहले बेजुबानों की लड़ाई पर बाजी लगाकर लोग खुश हो जाया करते थे, लेकिन अब इसका स्वरूप काफी वृह्द हो गया है। नेताओं की जीतने, सरकार बनाने से लेकर लगभग हर खेल पर सट्टेबाजों की नजर रहती है। यहां तक की विदेशी खेलों पर भी हमारे देश के सट्टेबाज अपनी किस्मत आजमाना से नहीं चूकते। सट्टेबाजी भारत में कानूनन अपराध है, इसलिए ये खेल चोरी-छिपे खेला जाता है। एक छोटी सी दुकान चलाने वाला पनवारी भी इसका खिलाड़ी हो सकता है और किसी होटल का मालिक भी। इसके लिए ज्यादा तामझाम की जरूरत नहीं पड़ती, बस एक कम्प्यूटर और फोन से सबकुछ हो जाता है। खासकर क्रिकेट मैचों के दौरान सबसे ज्यादा सट्टेबाज पकड़े जाते हैं। पेशेवरों के साथ-साथ उन लोगों को भी पुलिसिया कोपभाजन का शिकार बनना पड़ता है जो शौकिया हाथ आजमा रहे थे। अब तक एक बात को साफ हो गई है कि तमाम सख्ती के बाद भी ये खेल रुकने वाला नहीं है, तो क्यों न इसे कानून मान्यता दे दी जाए। अगर ऐसा किया जाता है तो इसके तीन फायदे होंगे। पहला, सरकार की आय बढ़ेगी, दूसरा कालेधन को सफेद बनाने की प्रक्रिया पर लगाम लग सकेगी और तीसरा कानून का भय दिखाकर बेगुनाहों को परेशान करने की पुलिसिया मानसिकता में बदलाव आएगा। जो खेल गुपचुप तौर पर पर्दे के पीछे खेला जा रहा है वो सबके सामने होगा तो शायद इसमें शामिल होने वालों की संख्या अपने आप कम हो जाए। वैसे भी हमारे देश में जिसकी मनाही होती है वही काम सबसे ज्यादा किया जाता है। जैसे, अगर किसी दीवार पर लिखा है, यहां थूकना मना है तो सबसे ज्यादा पान की पीकें वहीं दिखाई देंगी।  यहां सोचने वाली बात ये भी है कि कोई अगर अपनी मनमर्जी से कहीं पैसा लगाता है तो इसमें अपराध जैसा क्या हो गया। बात केवल सट्टेबाजी की नहीं है, हमारे देश में ऐसा बहुत कुछ है जिसे बेवजाह कानूनी फंदे में उलझाकर रखा गया है। वेश्यावृति को ही लीजिए, दुनिया के कई देश जहां इसे कानूनी जामा पहना चुके हैं वहीं हम अब भी अपराध की श्रेणी में रखे हुए हैं। जोर-जबरदस्ती से तो बात समझ आती है, लेकिन अपनी मनमर्जी से जिस्म का सौदा करने वाली महिलाओं को भी गुनाहगार समझा जाता है। दरअसल, 21वीं सदी में भी रूढिवादी मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाए हैं।

हम सेक्स करना तो चाहते हैं, लेकिन उसके सार्वजनिक उच्चारण में शर्म महसूस होती है।  हर इंसान इस बात को अच्छे से जानता है कि वो किसी क्षेत्र में अच्छा कर सकता है फिर यदि वेश्यावृति में किसी को अपना करियर नजर आता है तो हम-आप उस पर उंगली उठाने वाले कौन होते हैं। यहां मैं एक घटना का जिक्र करना चाहूुगा जिसका हाल ही में मैं गवाह बना। पत्रकार होने के नाते मुझे खबर मिली कि पुलिस ने पॉश इलाके में चल रहे एक सेक्स रैकेट का पर्दाफाश किया है। कुछ युवतियों को पकड़कर पुलिस थाने ले आई। तमाम मीडियाकर्मियों के साथ मैं भी थाने पहुंच गया। अपने चेहरे को दुपट्टे से ढंके एक युवती से जब सवाल किया गया कि तुम ये क्यों करती हो तो उसके जवाब ने कुछ देर के लिए सोच में डाल दिया। वो बोली, मेरा शरीर है, मैं इसके साथ चाहे जो करूं आपको परेशानी नहीं होनी चाहिए। इस जवाब को हम बेशर्मी कह सकते हैं, लेकिन उस सच्चाई को नहीं झुठला सकते जो इसमें नजर आती है। वेश्यावृति एक ऐसा व्यवसाय है जो लगातार फल-फूल रहा है। इसमें कोई दोराय नहीं कि यहां जोर-जबरदस्ती भी की जाती है, लेकिन अपनी मर्जी से इसका हिस्सा बनने वालों की संख्य़ा भी कम नहीं है। कम मेहनत में ज्यादा कमाई के चलते कई युवतियां सहर्ष इसमें शामिल हो जाती हैं। ऐसे अनगिनत मामले पुलिस और समाज के सामने आ चुके हैं, जिसमें उच्च शिक्षित परिवार की लड़कियों ने बगैर किसी दबाब के ये राह चुनी। लोगों को लगता है कि अगर वेश्यावृति को कानूनी मान्यता मिल गई तो 18 की दहलीज पार करते-करते ज्यादातर युवा कोठे की सीढिय़ां चढ़े लेंगे, लड़कियों का शोषण किया जाएगा। संभव है ऐसा हो, लेकिन ये लंबे वक्त तक कायम नहीं रहेगा। ऐसा इसलिए कि जब हम बहुतायत में कुछ प्राप्त कर लेते हैं तो उसकी अहमियत कम हो जाती है। विदेशों में सेक्स एक आम बात है, स्कूल से कॉलेज तक का सफर तय करते-करते युवा न जाने कितनी बार अपनी कामेच्क्ष का पूर्ति कर लेते हैं।

यहां तक कि उनके परिवार वालों को भी इसमें ज्यादा कुछ बुरा नजर नहीं आता। अगर वहां भी सेक्स को लेकर भारत जैसा माहौल होता तो उनके लिए भी ये किसी पाप से कम नहीं था। कहने का मतलब है कि अगर लोगों के पास अपनी सेक्स की पूर्ति के लिए आसान साधन उपलब्ध होंगे तो सेक्स को लेकर उनकी उत्तेजना और दिलचस्पी में निश्चित तौर पर कमी देखने को मिलेगी। इसके अलावा संभव है कि बलात्कार जैसे मामलों में भी कमी आए। हमारे देश में अगर अभिव्यिक्त की स्वतंत्रता है तो इस बात की आजादी भी मिलनी चाहिए कि हम अपने हिसाब जिंदगी गुजार सकें। अगर कोई सट्टा लगाकर या जिस्म का सौदा करके खुश है तो इसमें दूसरों को बुराई नजर नहीं आनी चाहिए। बेवजह के प्रतिबंध अपराध कम करने के बजाए उसमें इजाफा ही करते हैं। कहने को तो गुजरात में शराब पर प्रतिबंध है, बावजूद इसके वहां सबसे ज्यादा शराब पी जाती है। चोरी-छिपे अवैध तरीके से सारा खेल चलता है। इस बैन से केवल इतना हुआ है कि पीने वालों को ज्यादा दाम चुकाने पड़ रहे हैं और पुलिस को इस बिनाह पर उगाही का लाइसेंस मिल गया है। जिन देशों में वेश्यावृति को कानूनन मान्यता प्राप्त है, वहां बाकायदा इसका रिकॉर्ड रखा जाता है। इसकी भी व्यवस्था की गई है कि जबरन किसी को वेश्यावृति के लिए मजबूर न किया जाए। ये व्यवस्था हमारे देश में भी हो सकती है, बशर्ते हम अपनी सोच में बदलाव लाने के लिए तैयार हों।


Sunday, February 12, 2012

अनिवार्य वोटिंग से पहले सुधार जरूरी



अनिवार्य वोटिंग पर एक बार फिर से बहस छिड़ गई है, इस बार बहस की शुरूआत की है वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने। मतदाता दिवस के मौके पर आडवाणी ने गिरते वोटिंग प्रतिशत का हवाला देकर वोटिंग को अनिवार्य बनाने की बात कही। इस तरह की बहस पहली बार कई बार छिड़ चुकी हैं मगर सबका नतीजा एक ही रहा, ये बहस भी ज्यादा देर तलक नहीं चल पाएगी। लेकिन फिर भी सवाल तो है कि क्या वोटिंग को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए?

अगर पिछले कुछ सालों के आंकड़े निकाले जाएं तो इस सवाल का जवाब हां में देने की जरूरत खुद ब खुद महसूस होगी। वार्ड स्तर पर होने वाले चुनाव ही नहीं, देश और राज्यों की दिशा तय करने वाले महाचुनावों में भी जनता की भागीदारी नाम मात्र की है। वोटिंग का प्रतिशत 40-50 के आसपास ही सिमटकर रह गया है। इसके पीछे कई कारण हैं, सबसे पहला तो यही कि हमारे देश के नेताओं से लोगों का विश्वास उठ गया है। उन्हें लगता है कि पूरी की पूरी सियासी जमात एक जैसी है, चाहे किसी को भी वोट दो तस्वीर बदलने वाली नहीं है। इसलिए वो लोकतंत्र का हिस्सा बनने के बजाए घर की चारदीवारी के भीतर रहना ज्यादा पसंद करता है। ज्यादातर राजनीतिज्ञों का खुद का चरित्र इस काबिल नहीं है कि जनता को वोट डालने के लिए प्रेरित कर सकें। आलम ये है कि विधानसभाओं से लेकर संसद तक में अपराधिक छवि वाले नेताओं का बोलबाला है। अफसोस की बात कि घटने के बजाए ये प्रतिशत दिन ब दिन बढ़ता जा रहा है। उत्तर प्रदेश में जारी सियासी द्वंद्व का ही उदाहरण लें, यहां हर पार्टी को दागियों से प्यार है। भ्रष्टाचार और साफ-सुथरी राजनीति की बात करने वाली पार्टियां भी दागियों को टिकट थमाए बैठी हैं। कांग्रेस के खाते में 26 दागी हैं, इतने ही भाजपा के साथ हैं। वहीं सपा ने महज दो कम यानी 24 दागियों को टिकट दिया है। भ्रष्टाचार के आरोप में मंत्रियों को सत्ता से बेदखल करने वाली मायावती की पार्टी बसपा भी इस मामले में दूसरों से पीछे नहीं है। दरअसल, सियासी दलों के लिए महज जीत मायने रखती है और इसके लिए वो किसी को भी उम्मीदरवार बना सकते हैं। बड़े-बड़े दावे करने वाले दल सिस्टम के हिसाब से अपनी नीतियों में बदलाव कर लेते हैं। यानी यूपी जैसे राज्य जहां जाति और दबंगई के गणित के आधार पर वोट पड़ते हैं वहां, व्यक्तिगत योगयता भी जाति और दबंगई होती है। ऐसे में वोटिंग का प्रतिशत बढ़े भी तो कैसे? दागियों को सियासत में आने से रोकने के लिए अब तक कुछ खास नहीं किया गया है। मौजूदा नियमों के मुताबिक अपराध सिद्ध होने पर ही किसी को चुनाव लडऩे से रोका जा सकता है। हमारी न्याय व्यवस्था की रफ्तार से सब वाकिफ हैं। मामूली मामलों के निपटारे में ही सालों लग जाते हैं। जब तक किसी नेता के खिलाफ फैसला आने का आधार तय हो, तब तक वो इस स्थिति में आ जाता है कि फैसले को प्रभावित कर सके। गंभीर आरोपों का सामना कर रहे ऐसे इतने नेता हैं जिन्हें सजा हुई। राजा, कलमाड़ी जैसे मामले बिरले ही सुनने में आते हैं। इन दोनों को भी तिहाड़ की यात्रा कोर्ट की सख्ती की वजह से करनी पड़ी, वरना मामला कब का रफा-दफा हो गया होता। राजा और कलमाड़ी ने सीधे देश के खजाने और उसकी छवि को नुकसान पहुंचाया था, इसलिए कॉमनवेल्थ और स्पेक्ट्रम घोटाले की गूंज सुनाई देती रही। अगर बलात्कार, हत्या जैसे खलिस अपराधी मामले होते तो न इतना शोर होता और न इतनी बड़ी कार्रवाई।



हर राजनीतिक पार्टी इस नियम की कमजोरी का फायदा उठाकर दागियों को जनता के प्रतिनिधि की कुर्सी तक पहुंचाती है। कायदे में होना तो ये चाहिए कि दागियों को चुनाव लडऩे की इजाजत ही न मिले। और यदि ऐसा नहीं हो पाता तो राजनीतिज्ञों से संबंधित मामलों के निपटारे की समय सीमा निधार्रित की जानी चाहिए। महज छह महीने के भीतर ऐसे मामले निपटाए जाएं। जनता को पोलिंग बूथ तक खींचने के लिए ये सबसे पहला कदम है। अनिवार्य वोटिंग की मांग केवल भारत में ही नहीं उठी है, कई देशों में इसे लेकर बहस चल रही है और कई देश इसपर अमल भी कर चुके हैं। गुजरात में ही निचले स्तर के चुनावों में वोटग को अनिवार्य किया गया है। निश्चित तौर पर वोटिंग को अनिवार्य बनाने से मतदान का प्रतिशत बढ़ेगा, लोग कार्रवाई के डर से पोलिंग बूथ तक पहुंचेंगे ही। मैं व्यक्तिगत तौर पर वोटिंग को अनिवार्य बनाए जाने का पक्षधर हूं, लेकिन इससे पहले व्यवस्था में सुधार बेहद जरूरी है। बगैर सुधार के ये फैसला भी बोझ बन जाएगा। मजबूरी में किया गया काम, परिणाम के लिहाज से अच्छा नहीं होता। लोग वोट देने इसलिए नहीं जाएंगे कि उन्हें देश का भविष्य निधार्रित करने में भागीदारी निभानी है, बल्कि इसलिए जाएंगे कि जुर्माना न भरना पड़े। सुधार के साथ-साथ वोटिंग प्रक्रिया को आसान बनाने की भी जरूरत है। आज के वक्त में जब हर काम ऑनलाइन होता है तो वोटिंग क्यों नहीं? अमूमन नौकरीपेशा लोग एक राज्य से दूसरे राज्य में जाते रहते हैं, ऐसे में उनके पास मताधिकार का प्रयोग न करने के अलावा कोई और चारा नहीं रह जाता। अगर ऑनलाइन वोटिंग की सुविधा हो तो ऐसे लोगों को भी मताधिकार का प्रयोग करने का अवसर मिल जाएगा। आजकल का युवा जागरुक है, इसमें कोई दोराय नहीं लेकिन जागरुक होने के साथ-साथ वो अत्याधिक टेक-सेवी भी है। उसे हर काम एक क्लिक पर करने की आदत है, जब रेलवे से लेकर सड़क परिवहन तक तकनीक के हिसाब से अपने को परिवर्तित कर रहे हैं तो चुनाव आयोग को भी आगे आना चाहिए। चुनाव के दौरान अव्यवस्था का आलम, लंबी कतारें, निजी, सार्वजनिक परिवहन पर पाबंदी जैसी बातें वोटरों को पोलिंग बूथ से दूर रहने के लिए मजबूतर करती हैं। ऑनलाइन वोटिंग की सुविधा होगी तो वो घर से बैठे-बैठे ही अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकेगा। ये सिर्फ कहने की बातें हैं कि इतनी बड़ी जनसंख्या वाले देश में इतना बड़ा बदलाव आसान नहीं होगा। बदलाव कभी भी आसान नहीं होता, पुरानी व्यवस्था को बदलने में परेशानियों का सामना करना ही पड़ता है, लेकिन क्या परेशानियों से डरकर आगे बढऩा छोड़ देना चाहिए? जिस तरह से ऑनलाइन टिकट बुक कराई जा सकती है, पासपोर्ट के लिए आवेदन किया जा सकता है वैसे वोट क्यों नहीं डाला जा सकता? चुनाव आयोग को इस बारे में भी ध्यान देने की जरूरत है कि वोटर बनाने की प्रक्रिया आसान होने के साथ व्यवस्थित भी हो। कहने को तो घर-घर जाकर वोटर बनाए जाते हैं, लेकिन इसकी पेचीदगियों से जिसका सामना होता है वही समझ सकता है कि आसान दिखने वाली इस प्रक्रिया में कितने पेंच हैं। मैं अपनी ही बात करूं तो, 30 साल के जीवन में मुझे सिर्फ वो बार वोटिंग का सौभागय प्राप्त हुआ है। वो भी विधानसभा चुनावों में। कई वोटर लिस्ट में नाम लिखवाने के बाद भी पोलिंग बूथ पर नाम नदारद मिला। जब मतदाता फोटो परिचय पत्र बने तो फोटो भी खिंचवाई लेकिन अगले चुनाव में फिर नाम नदारद मिला। राज्य बदलने के बाद भी हालात नहीं बदले, यहां भी अनुभव पुराने जैसा रहा। मध्यप्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर काफी वक्त पहले ऑनलाइन आवेदन भी किया लेकिन आज तक कोई हलचल नहीं हुई। निर्वाचन अधिकारी को व्यक्तिगत तौर पर समस्या से अवगत कराया लेकिन इस कवायद का भी कोई परिणाम नहीं आया।

ऐसी लचर प्रक्रिया से लोगों को वोटिंग के प्रति प्रोत्साहित कैसे किया जा सकता है। व्यवस्था में सुधार सबसे जरूरी है, अगर इसके बाद भी वोटिंग का प्रतिशत नहीं बढ़ता तब वोटिंग को अनिवार्य किया जाना चाहिए।

Monday, December 26, 2011

असहमति का ये अंदाज कितना जायज



नीरज नैयर
मानसिक दीवालियापन क्या होता है, ये कांंग्रेसी नेता बहुत अच्छे से समझते हैं। यूं तो लगभग हर राजनीतिज्ञ कभी न कभी इस स्थिति से गुजरता है लेकिन जिस तरह से कांग्रेसी अन्ना हजारे के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं उससे कांग्रेस के बिगड़ते मानसिक संतुलन का आभास स्वत: ही हो जाता है। पहले दिग्विजय सिंह अन्ना के खिलाफ आगे आए, फिर कमान मनीष तिवारी ने संभाली अब केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद जहर उगल रहे हैं। बीते कुछ दिनों में ही बेनी प्रसाद कई बार अन्ना पर हमला बोल चुके हैं, इन हमलों के लिए उन्होंने जिन शब्दों का इस्तेमाल किया वो गंदी राजनीति के परिचायक हैं। बेनी ने अन्ना को पागल बूढ़े से लेकर भगोड़ा फौजी तक कह डाला, अफसोस की बात तो ये है कि उन्हें इसका कोई पछतावा भी नहीं है। उल्टा दिन ब दिन उनके शब्दों का स्तर और गिरता जा रहा है। बेनी का निजी जीवन कैसा रहा ये अलग बात है, लेकिन एक केंद्रीय मंत्री के तौर पर इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल कहां तक जायज है ये सवाल कांग्रेस से पूछा जाना चाहिए। बेहद अफसोस की बात है कि हमारे देश में सरकार या सांसदों के खिलाफ आम आदमी के शब्दों को विशेषाधिकार हनन मान लिया जाता है, लेकिन सांसद या सरकार में बैठे नेताओं को कुछ भी बोलने की आजादी है। क्या आम आदमी का कोई विशेषाधिकार नहीं है, क्या इज्जत और सम्मान पर महज माननीयों का कॉपीराइट है? मतभिन्नता अलग बात है, किसी की बातों-विचारों से असहमत हुआ जा सकता है। लेकिन इस असहमति को अपशब्दों में बयां करना कितना उचित है।

गली-मोहल्ले के मवाली से तो उम्मीद नहीं की जा सकती कि वो सभ्य व्यक्ति की तरह पेश आए। महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोग एवं बुद्धिजीवियों से ही ऐसी अपेक्षा होती है, लेकिन इनका नैतिक और वैचारिक पतन निश्चित तौर पर चिंता का विषय है। बेनी प्रसाद की बदजुबानी की असल वजह, अन्ना द्वारा राहुल का विरोध है। लोकपाल बिल पर अन्ना ने राहुल को सीधे तौर पर टारगेट किया, इसे लेकर ही बेनी सरीखे कांग्रेसी मर्यादाओं को तार-तार करने पर तुले हैं। अन्ना ने साफ, सरल , स्पष्ट और सभ्य शब्दों में राहुल को कमजोर लोकपाल के लिए जिम्मेदार ठहराया, लेकिन वो अपनी मर्यादा नहीं भूले। उन्होंने मनमोहन सिंह या किसी दूसरे मंत्री को भी कठघरे में खड़ा किया तो शब्दों के इस्तेमाल में सतर्कता बरती, मगर कांग्रेस नेता शुरूआत से ही बदजुबानी और बेहयाई की हदें पार करते आ रहे हैं। सबसे ज्यादा ताज्जुब की बात तो ये है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी अपने नेताओं के इस आचरण को उनकी निजी राय बताकर पल्ला झाड़ लेती है। क्या बेनी, दिग्गी और तिवारी का विषवैमन उनकी निजी राय है, अगर है, तो क्या कांग्रेस को उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं करनी चाहिए। जुबान कभी-कभी फिसलती है, पर जिस तरह से दिग्गी, बेनी बोलते आए हैं उसे जुबान फिसलना नहीं जुबान की खाज मिटाना कहा जाएगा। कांग्रेस अलाकमान की खामोशी से साफ जाहिर होता है कि असहमति के इस अंदाज को उसका समर्थन है। बेनी अन्ना को फौज का भगोड़ा बताते हैं, लेकिन अपनी पृष्ठिभूमि में झांकने की हिम्मत नहीं करते। बेनी और उनके बेटे पर हत्या के प्रयास का मामला चल रहा है, तो क्या उन्हें अपराधी कहकर संबोधित नहीं किया जाना चाहिए।

बेनी और दिग्गी अन्ना को संघ का एजेंट बताने पर तुले हैं, दिग्गी ने तो एक समाचार पत्र में छपी खबर का हवाला देते हुए अपने आरोपों को सच साबित करने की कोशिश की है। इस तस्वीर में अन्ना संघ पदाधिकारी नानाजी के साथ नजर आ रहे हैं, लेकिन एक तस्वीर ऐसी भी है जिसमें दिग्विजय खुद नानाजी के साथ हैं। मगर उनके और कांग्रेस के लिए दोनों के मायने बिल्कुल अलग हैं। यदि वो तस्वीर अन्ना और संघ के रिश्तों को उजागर करती है तो फिर दिग्गी खुद भी संघ के एजेंट हुए। दरअसल, कांग्रेस ये साबित करना चाहती है कि अन्ना भाजपा और संघ के इशारे पर उसे निशाना बना रहे हैं। इस कोशिश में वो इतना रम गई है कि सही- गलत में अंतर भी नजर नहीं आ रहा है। अलबत्ता तो किसी के साथ खड़े होने या मुलाकात करने से उनके बीच में संबंध स्थापित नहीं हो जाता और यदि अन्ना का संघ से जुड़ाव रहा भी है तो इसमें हो-हल्ले वाली बात क्या है। संघ को तो कांग्रेसी ऐसे प्रचारित करते हैं जैसे वो कोई आतंकवादी संगठन हो। गनीमत है कि सरकार या कांग्रेसियों को अन्ना के किसी पाकिस्तानी से बातचीत/ मुलाकात के सबूत नहीं मिले, वरना उन्हें देशद्रोही भी करार दे दिया जाता। अलग-अलग विचारधाराओं के राजनेता खुद भी जब किसी समारोह में मिलते हैं तो खिलखिलाकर बातें करते हैं, तो क्या वो एक-दूसरे के एजेंट हो गए। तमाम मंत्री, नेता नरेंद्र मोदी के गले लगते हैं, ऐसे में तो उन्हें भी गुजरात दंगों का गुनाहगार ठहराया जाना चाहिए। पीडीपी प्रमुख मेहबूबा मु$फ्ती ने सरकारी बैठक में मोदी की तारीफों के पुल बांधें थे, सरकार के पास इसके रिकॉर्ड भी मौजूद हैं। फिर क्यों नहीं उनके खिलाफ जांच शुरू कराई जाती।

इस बात को कांग्रेस भी अच्छे से जानती है कि उसके नेता जिन तथ्यों को आधार बनाकर अन्ना संघ में तार जोडऩे में लगे हैं, उनमें कोई दम नहीं। लेकिन चूंकि अन्ना को बदनाम करना है, इसलिए कोशिशों को परवान चढ़ाया जा रहा है। अन्ना के पहले आंदोलन के वक्त भी सरकार ने उन्हें गलत साबित करने के लिए सारे रिकॉर्ड खंगाल डाले, मगर उसे ऐसा कुछ भी नहीं मिला जिसे अन्ना के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सके। तब भी अन्ना के लिए भगोड़ा जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया, मगर सेना ने ऐसे आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। बावजूद इसके बेनी प्रसाद फिर से अन्ना पर उंगली उठा रहे हैं, कांग्रेस अगर समझती है कि इस तरह की ओछी राजनीति से वो जनता का समर्थन प्राप्त कर लेगी तो ये उसकी भूल है। जनता इस बात को बखूबी जानती है कि सरकार की स्थिति खिसयानी बिल्ली जैसी है, वो खंबा नोचेगी ही। इसलिए बेहतर होगा कि कांग्रेस अन्ना पर कीचछ उछालने के बजाए सहमति का रास्ता खोजे। बड़ी से बड़ी मुश्किल संवाद के रास्ते हल की जा सकती है। टीम अन्ना बातचीत की मेज पर आने को तैयार है, सरकार को भी अपना अहंकार छोड़कर आगे बढऩा चाहिए।

Sunday, November 6, 2011

बेहयाई न पालो मनमोहनजी जनता भी ऐसे ही पेश आएगी



नीरज नैयर
सरकार के मुखिया कहते हैं कि महंगाई बढऩे की वजह आम आदमी है, यानी वो आम आदमी जिसके वोटों के बल पर कांग्रेस सत्ता में आई और मनमोहन पीएम बने खुद ही महंगाई बढ़ा रहा है और खुद ही आंसू बहा रहा है। बकौल मनमोहन, लोग पहले के मुकाबले ज्यादा कमाने लगे हैं, ज्यादा कमा रहे हैं इसलिए ज्यादा खा रहे हैं नतीजतन महंगाई बढ़ रही है। कल तक सीधे साधे अर्थशास्त्री के तौर पर पहचाने जाने वाले मनमोहन इतने बेहया हो गए हैं कि इसे भी सरकार की उपलब्धि बता रहे हैं। उनको लगता है कि सरकार की सामाजिक सुधारों वाली योजनाओं के बल पर ही गरीबों के हाथ में पैसा आने लगा है। इस बयान के बाद तो गुस्से से ज्यादा सरकार के इस मुखिया की अक्ल पर तरस आती है, कमाई बढ़ी है और निश्चित तौर पर बढ़ी है, लेकिन किसकी। हर आदमी को तो महंगाई भत्ता नहीं मिलता, सरकारी मुलाजिमों को वोट की चाह में सरकार महंगाई से मुकाबले के लिए कुछ ताकत दे देती है मगर बाकी का क्या। उन बेचारों को तो जितनी कमाई है उसी में काम चलाना है, और वैसे भी एक औसत आम आदमी की तनख्वाह में सालाना कितना इजाफा होता है, ये बात अब अच्छे से जानते हैं।

दरअसल बेशर्मी की चादर ओढ़ चुके मनमोहन और उनके मंत्रियों के लिए महंगाई डायन अब भी फिल्मों तक ही सीमित है, गाड़ी पर लाल बत्ती लगने के बाद से उन्होंने बाजार का हाल जानना ही बंद कर दिया होगा। फिर उन्हें चढ़ती कीमतों से मायूस होते आम आदमी की मुझाई सूरत भला क्या नजर आएगी। मनमोहन खुद किसी प्राइवेट नौकरी से घर की गाड़ी चला रहे होते तो उन्हें आटे-दाल के भाव पता चलते, लेकिन अफसोस कि ऐसी स्थिति कभी आने वाली नहीं है। दूसरी बार सत्ता संभालने के बाद यूपीए सरकार का पूरा कुनबा लगता है अपने घर भरने में ही लगा हुआ है, यदि ऐसा न होता तो पूरी सरकार में कोई एक तो अपनी गलतियों को स्वीकारता। सोनिया गांधी, राहुल गांधी से लेकर शरद पवार, प्रणब मुखर्जी और मनमोहन सिंह तक सब अपनी नाकामयाबियों के लिए कभी मौसम तो कभी आम आदमी की संपन्नता को दोष देते रहे हैं। पिछले मौसम में कहा गया, बादलों की बेरुखी ने महंगाई को आग लगाई और अब जनता की आमदनी पर नजरें गढ़ाई जा रही हैं। चंद रोज पहले कांग्रेस के भावी प्रधानमंत्री ने महंगाई के लिए गठबंधन की मजबूरी का रोना रोया था, रोना रोते-रोते अपनी बात साबित करने के लिए वो इंदिरा गांधी के कार्यकाल तक पहुंच गए थे। वो ये बताना चाहते थे कि उस वक्त एक पार्टी का राज होने के चलते कीमतें आसमान नहीं जमीं पर थीं, लेकिन बेचारे राहुल शायद भूल गए हैं कि उनकी दादी के शासनकाल में महंगाई और भ्रष्टाचार का आलम मौजूदा सरकार जैसा ही था। तभी तो 'देखो इंदिरा का खेल, खा गई राशन, पी गई तेलÓ जैसे नारों की गूंज कांग्रेस नेतृत्व की परेशानी बन गई थी। महंगाई और भ्रष्टाचार रोकने के लिए यूपीए सरकार ने सिर्फ और सिर्फ वादे किए, ठीक ऐसे ही वादे उसके नेताओं ने चुनावी संग्राम के वक्त जनता के आगे हाथ जोड़कर किए थे।

कांग्रेस नीत गठबंधन ने जब सत्ता संभाली महंगाई का मिजाज इतना तल्ख नहीं था, हालांकि राजग के कार्यकाल में भी प्याज ने आंसू निकाले मगर हालत बेकाबू जैसे फिर भी नहीं थे। आटे-दाल से लेकर फल-सब्जियों तक आज सबकुछ आम आदमी की पहुंच से दूर होता जा रहा है। दूध जैसे पद्धार्थ की कीमत ही चार सालों में सौ प्रतिशत बढ़ी है, जबकि इन्हीं चार सालों में इसके उत्पादन में चार प्रतिशत का इजाफा हुआ है। चार साल पहले जो घी 150-160 के आसपास था, आज 300 रुपए प्रति किलो के करीब बिक रहा है। आमतौर पर माना जाता है कि सर्दियों के वक्त सब्जियों के दाम नीचे आ जाते हैं, लेकिन इस बार पूरी सर्दियां प्याज और टमाटर के दाम सुनते-सुनते ही निकल गईं, प्याज की कीमतों के लिए सरकार ने नासिक में होने वाली बरसात को दोषी बताया। जबकि वहां के किसानों तक ने बारिश के नुकसान को इतना बड़ा मानने से मना कर दिया था। जब भी महंगाई की बात आती है सरकार उत्पादकता और मांग के अंतर का रोना रोने लगती है, पर हकीकत में उचित भंडारण के अभाव में हर साल लाखों टन अनाज, फल-सब्जियां सड़ जाती हैं।

सरकार खुद भी सालाना 58 हजार करोड़ रुपए का अनाज बर्बाद होने की बात स्वीकार चुकी है। ऐसे में कम उत्पादन का सवाल ही ऐसे उठता है, साफ है कि सरकार के मुखिया और उनके मंत्रियों की दिलचस्पी वातानुकूलित कमरों से बाहर निकलकर हालात का पता लगाने में बिल्कुल भी नहीं है। जिसके जैसे मन में आ रहा है, वो वैसे ही नीतियों-नियमों को तोड़मरोड़कर अपनी सेहत सुधारने में लगा है। पिछले साल जब चीनी की कीमतें सारे रिकॉर्ड तोडऩे पर अमादा थीं, तब ही सरकार की धन्ना सेठों का फायदा पहुंचाने वाली नीति उजागर हो गई थी। गन्ने की उपज सामान्य होने के बावजूद 12 रुपए की दर से तकरीबन 48000 टन चीनी का निर्यात किया गया। जब बाजार में चीनी की किल्लत से दाम आसमान पर पहुंचने लगे और विपक्ष हो-हल्ला करने लगा तब सरकार ने चीनी के आयात का फैसला लिया। ये आयात 27 रुपय प्रति किलो के हिसाब से किया गया। यानी जो चीनी हम सस्ते में दूसरे मुल्कों को दे रहे थे उसकी ही हमने दोगुने से ज्यादा कीमत चुकाई। प्याज के मामले में भी सरकार ने ऐसा ही किया, पहले पाकिस्तान आदि को भर-भर के प्याज पहुंचाई गई और बाद में उन्हीं से आयात करनी पड़ी। सरकार में बैठने वालों से ज्यादा अक्ल तो एक गृहणी में होती है, उसे पता होता है कि कौन सा सामान कब तक खत्म हो सकता है। बिन बुलाए मेहमानों की आवभगत के बावजूद वो घर की गाड़ी पटरी से उतरने नहीं देती, लेकिन अर्थशास्त्री कहलाने वाले मनमोहन और उनके दूसरे साथी इतना भी हिसाब नहीं रख सके कि अपना हिस्सा दूसरों को देने से कहीं हम खुद ही भूखे न रह जाएं। आयात-निर्यात के खेल में सरकार उन सालों की कसर पूरी कर रही है जो उसने सत्ता में आने के इंतजार में गुजारे। किसी भूखे को अगर खाना मिल जाए तो वो पेट भरने के बाद भी उसे तब तक खाता रहता है जब तक कि खाना खत्म न हो जाए, मनमोहन सरकार का हाल भी कुछ ऐसा ही लग रहा है। शायद उसे लगने लगा है कि भ्रष्टाचार और महंगाई के विस्फोटों के बाद उसका पुन: सत्ता में लौटना मुमकिन नहीं इसलिए जितना बटोर सकते हो बटोर लो। जिस सरकार को आम आदमी के लिए दी जाने वाली सब्सिडी ही बोझ लग रही हो, उसके खुद के मंत्री करोड़ों के घोटाले कर रहे हैं। यह मानना बहुत मुश्किल है कि इन घोटालों में वो बड़े-बड़े नाम शामिल नहीं होंगे जो कार्रवाई का ढोंग रच रहे हैं। कॉमनवेल्थ के करप्शन किंग कलमाड़ी और स्पेक्ट्रम के करप्ट राजा क्या अकेले बिना ऊपर वालों को विश्वास में लिए इतना बड़ा खेल कर सकते हैं, सोचने में ही अटपटा लगता है। कलमाड़ी तो साफ-साफ कह चुके हैं कि उन्होंने जो कुछ भी किया अकेले नहीं किया, फैसले सब मिल बैठकर लिया करते थे। सरदारजी और सोनिया गांधी जनता को बेवकूफ समझ रहे हैं, एक घोटालों और महंगाई पर बेहयाई वाले बयानों का समर्थन करता है तो दूसरा चिंता जताकर गंभीर होने का ढोंग। मगर दोनों शायद भूल गए हैं कि जल्द ही उन्हें फिर से हाथ जोड़कर वोट के लिए दर-दर भटकना पड़ेगा, और तब शायद जनता भी उनसे ऐसे ही पेश आए जैसा कि वो सत्ता में आने के बाद आते रहे हैं।

Saturday, September 24, 2011

मोंटेकजी आप कर सकते हैं 32 रुपए में गुजारा



नीरज नैयर
इंदिरा गांधी के जमाने में एक नारा दिया गया था, 'गरीबी उन्नमूलनÓ, लेकिन आज लगता है ये बदलकर 'गरीब उन्नमूलनÓ हो गया है। सरकार आज गरीबी नहीं हटाना चाहती बल्कि अपना बोझ हल्का करने के लिए गरीबों को ही कम करने पर तुली है। योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा दिया है, उससे सरकार और स्वयं आयोग की नीयत पर सवाल खड़े हो गए हैं। यहां, ये कहना कि आयोग की इस राय में सरकार शरीक नहीं है, सरासर गलत होगा। योजना आयोग का अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है, इस नाते मनमोहन सिंह अच्छे से जानते होंगे कि अहलूवालिया क्या गुल खिलाने वाले हैं। योजना आयोग कहता है कि शहरों में 32 रुपए और गांवों में 26 रुपए प्रति दिन खर्च करने वाला गरीबी रेखा के नीचे नहीं आ सकता। इतना खर्च उसे संपन्नता की निशानी दिखता है। इन 32 और 26 रुपए में महज खाना ही नहीं, किराया, कपड़ा, स्वास्थ्य और शिक्षा का खर्च भी शामिल है। यानी एक आम आदमी इन रुपयों में पेट भरने से लेकर बच्चों के स्कूल की फीस और उनके इलाज तक सबकुछ कर सकता है। आयोग तो यहां तक मानता है कि अगर एक आदमी रोजाना 5.50 रुपए दाल पर, 1.02 चावल-रोटी पर, 2.33 दूध, 1.55 तेल, 1.95 सब्जी, 44 पैसे फल, 70 पैसे चीनी, 78 पैसे नमक, 1.51 पैसे अन्य खाद्यय पदार्थों पर और 3.75 ईंधन पर खर्च करने की हैसीयत रखता है तो वो स्वस्थ्य जीवन यापन कर सकता है। आराम से जीवन बिताने के मामले में आयोग कहता है कि 49.10 रुपए मासिक किराया देने वाला व्यक्ति भी इस श्रेणी में आता है। योजना आयोग के हलफनामे में और गहराई में चलें तो पता चलता है कि शिक्षा पर 99 पैसे प्रतिदिन खर्च करने वाला अच्छी तालीम पाने की हैसीयत रखता है। इसके अलावा अगर कोई व्यक्ति चप्पल आदि पर 9.6 रुपए खर्च करता है तो वो आयोग की नजर में गरीब नहीं है। गरीबी का ये पैमाना कौनसे गणित से तैयार किया गया, इसका जवाब अहलूवालिया और स्वयं प्रधानमंत्री के अलावा कोई नहीं दे सकता। ऐसे वक्त में जब महंगाई सिर पर पैर रखकर भागे जा रही है, ये कहना कि 32 रुपए पाने वाला गरीब नहीं, गरीबों का मजाक नहीं तो और क्या है। अहलूवालिया साहब को यदि 32 रुपए संपन्नता की निशानी लगते हैं तो इस लिहाज से भारत दुनिया का सबसे संपन्न देश कहा जाना चाहिए। आयोग 99 पैसे हर रोज में बेहतर शिक्षा की बात करता है, 99 पैसे के हिसाब से महीने के हुए 29.7 रुपए। महज 29 रुपए में कौनसा स्कूल बच्चों को दाखिला देगा, सरकारी स्कूल भी इतने में कम में दूर से हाथ जोड़ देंगे।

एक बारगी मान भी लिया जाए कि 29 रुपए मासिक फीस पर कोई स्कूल तालीम दे रहा है तो भी आयोग को समझना चाहिए कि शिक्षा महज स्कूल में दाखिला लेने भर से नहीं आ जाती, कॉपी-किताब, रबड-पैंसिल पर भी खर्चा करना पड़ता है। आयोग 49.10 रुपए प्रति माह में आराम से किराए पर मकान की बात भी कहता है, मगर हकीकत ये है कि अहलूवालिया ऐड़ी-चोटी का जोर भी लगा लेंगे तो भी इतने कम में कोई उन्हें घर के सामने खड़ा तक नहीं होने देगा। आज से 10 साल पीछे भी जाएं तो भी 49 रुपए में किराए पर मकान नहीं मिल सकता। जहां तक बात पेट भरने की है तो सरकार के सरदार और उनके जूनियर यानी अहलूवालिया आम जनता के पेट को चिडिय़ा का पेट समझते हैं। उन्हें लगता है कि दो दाने उसे जिंदा रखने के लिए काफी है। दो दानों को काफी मान भी लिया जाए तो भी सवाल ये उठता है कि चंद पैसों में ये दो दाने किस दुकान से मिलेंगे। मनमोहन सिंह या अहूलवालिया इसका इंतजाम कर दें तो बात अलग है। वैसे ऐसा पहली बार नहीं है जब अहलूवालिया ने गरीबों का मजाक उड़ाया हो, इससे पहले भी कई बार तो महंगाई को लेकर बेहयाई वाली बयान देते रहे हैं। फर्क बस इतना है कि इस बार उनकी बेहयाई कागजों पर सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुंची है। इसे जमीनी अनुभव की कमी कह सकते हैं, अहलूवालिया या दूसरे वीवीआईपी को थैला उठाकर बाजार में मोल-भाव नहीं करना पड़ता, उन्हें ये हिसाब भी नहीं लगाना पड़ता कि महंगाई में खुद को जिंदा रखने के लिए उन्हें किन-किन जरूरतों में कटौती करनी होगी। लालबत्ती में घूमने वाले अहलूवालिया जैसे लोगों को सबकुछ थाली में सजा-सजाया मिल जाता है, इसलिए इन्हें अहसास ही नहीं होता कि किस चीज के कितने दाम चुकाने होते हैं। सबसे ज्यादा अफसोस की बता तो ये है कि योजना आयोग के इस तर्क को आम आदमी की बात करने वाली कांग्रेस ने भी खारिज नहीं किया है। कांग्रेस इसके ऐवज में पुराने आंकड़े याद दिलाने में लगी है।

कांग्रेस का कहना है कि 2004-2005 में गरीबी की जो रेखा खींची गई थी, उसके हिसाब से 32 रुपए काफी ज्यादा हैं। पर शायद वो ये भूल गई कि इन छ सालों में खाद्य वस्तुओं के दाम कितने ऊपर पहुंच गए हैं। जितनी रकम की बात उस वक्त की गई थी वो भी नाकाफी थी और आज जिस 32 या 26 रुपए की बात की जा रही है वो भी नाकाफी है। कांग्रेस और अहलूवालिया जैसे लोग संसाधनों का भी रोना रोते हैं, उनके मुताबिक सरकार के पास सीमित संसाधन हैं, ऐसे में वो सबसे पहले उसकी मदद करना चाहेगी जिसका पेट बिल्कुल खाली है। जरूरतमंद को सबसे पहले मदद मिले इससे इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन अगर संसाधनों की वास्तव में इतनी कमी है तो फिर कटौती का प्रतिशत सबके लिए बराबर क्यों नहीं रखा जाता। सरकार ऐसा नहीं कर सकती की आम आदमी को मिलने वाली सब्सिडी खत्म करती जाए और कॉरपोरेट सेक्टर को टैक्स छूट और प्रोत्साहन पैकेज जारी करने में जरा भी देर न लगाई जाए। एक अनुमान के तौर पर 2004 से अब तक सरकार ने कॉरपोरेट सेक्टर को22 लाख करोड़ रुपए की टैक्स छूट दी है। अगर सरकार समझती है कि उद्योग घरानों को खड़े रहने के लिए मदद की जरूरत है तो वो ये कैसे सोच सकती है कि आम आदमी उसके द्वारा पैदा की गई महंगाई में बिना किसी सहारे के मजबूती से खड़ा रहेगा। उद्योग घराने सरकार के आर्थिक विकास के लक्ष्य को पूरा करने में मदद करते हैं इसलिए उन्हें देते वक्त सरकार के हाथ नहीं दुखते, लेकिन जब बात उसे सत्ता में पहुंचाने वाले आम आदमी की आती है तो वो तानाशाह बन जाती है। कांग्रेस भले ही कितनी भी आम आदमी की बात करे, लेकिन ये अब साफ हो चला है कि उसकी सरकार की नजर में आम आदमी की कोई अहमियत नहीं। योजना आयोग का काम देश के संसाधनों का प्रभावी और संतुलित ढंग से उपयोग करने के लिए योजनाएं बनाना है, लेकिन यूपीए सरकार के कार्यकाल में उसका मकसद उद्योग घराने का विकास करना ज्यादा दिखाई दे रहा है। योजना आयोग का गठन 15 मार्च 1950 को पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में किया गया था। पहली पंचवर्षीय योजना 1951 से शुरू हुई, इसमें कृषि पर खासा जोर दिया गया। इसके बाद भी बनने वाली योजनाओं में कृषि को प्रमुखता से स्थान दिया गया।

1997 से नौवीं पंचवर्षीय योजना से उद्योगों के आधुनिकीकरण की शुरूआत हुई, लेकिन फिर भी उसमें मानवीय विकास पर जोर दिया गया। मगर यूपीए के सत्ता संभालने के बाद इस पंचवर्षीय योजना का मुख्य उद्देश्य महज आर्थिक विकास पर ही केंद्रित हो गया। 11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-2012) में 8.2 फीसदी आर्थिक वृद्धि अनुमान लगाया गया, इसके अलावा हाल में 12वीं (2012-2017) पंचवर्षीय योजना के जिस दृष्टिकोण पत्र को सरकार ने मंजूरी दी है, उसमें भी 9 फीसदी विकास दर का लक्ष्य रखा गया है। यानी सरकार के एजेंडें से कृषि पूरी तरह बाहर हो चुकी है। जबकि यही सरकार कम उत्पादकता का रोना रोती रहती है। आर्थिक विकास जितनी जरूरी है उतनी ही जरूरत कृषि में सुधार की भी है। ये बात केवल वही समझ सकता है जो जिसने कभी एसी कमरों से बाहर निकलकर हकीकत जानने का प्रयास किया हो, अहलूवालिया जैसे लोग अर्थ का अनर्थ ही कर सकते हैं इससे ज्यादा कुछ नहीं। अहलूवालिया के इस मजाक के लिए एक महीने उन्हें उसी गणित के हिसाब से तनख्वाह दी जाए जिसके इस्तेमाल से उन्होंने आम आदमी को करोड़पति बना दिया है। इन 30 दिनों में सरकार के सरदार के इस जूनियर को आटे-दाल के भाव अच्छे से पता चल जाएंगे, तब शायद उनकी गणित की समझ में कुछ वृद्धि हो सके।

Thursday, September 8, 2011

यूं ही मरते रहेंगे हम



नीरज नैयर
दिल्ली में आतंकी हमले के बाद फिर वही पुराने सवाल सामने आ गए हैं। ये सवाल हर हमले के बाद उठते हैं, शोर मचाते हैं और थोड़े वक्त बाद फिर गुमनामी में चले जाते हैं। विपक्ष को नया मुद्दा मिल जाता है, सरकार नाकामी छिपाने का नया बहाना ढूंढ लेती है और जनता दो जून की रोटी की जुगाड़ में लग जाती है। ये हमला भी चंद आंसू बहाने के बाद कुछ रोज में भुला दिया जाएगा। भुला दिया जाएगा कि कुछ घरों के चिराग बुझ गए, कुछ महिलाओं के माथे का सिंदूर उजड़ गया, कुछ बच्चे हमेशा के लिए अनाथ हो गए। सड़क पर चलते वक्त गिरने का खतरा हमेशा रहता है, लेकिन जब हम बार-बार गिरने लगे तो हमें अपनी कमजोरियों का आभास हो जाना चाहिए। अफसोस कि हमारी सरकार अब तक अपनी कमजोरी को पहचान नहीं पाई है, या कह सकते हैं कि पहचानना ही नहीं चाहती। मुंबई हमले के बाद जरूरत व्यवस्था बदलने की थी मगर चेहरे बदले गए, शिवराज पाटिल को गृहमंत्री की कुर्सी से हटाकर चिदंबरम को बैठाया गया। साबित करने की कोशिश की गई कि सफेदी की चमकार में डूबे रहने वाले पाटिल से धोती पहनने वाले चिदंबरम ज्यादा सख्त होंगे। लेकिन ये सख्ती आतंकियों के दिल में खौफ पैदा करने में नाकम रही। गंभीर चेहरे देखाकर खून की होली खेलने वालों को अगर रोका जा सकता तो आतंक का ये दौर कब का खत्म हो गया होता। पाटिल के कार्यकाल में अगर आतंकी बेखौफ थे तो चिदंबरम के कार्यकाल में उनके हौसले और भी ज्यादा बुलंद हो गए हैं। इस बुलंदी की जिम्मेदार कोई और नहीं सरकार है, मुंबई के दहलने के बाद यदि सख्त कदम उठाए गए होते तो दिल्ली के दहलने की नौबत ही नहीं आती। ऐसा लगता है जैसे ये देश बहुत सहनशील हो गया है, और इसकी सरकार की सहनशीलता कर्ण को भी मात देने लगी है। कर्ण ने तो फिर भी बिच्छु के डंक की पीड़ा को एक बार सहन किया था, लेकिन सरकार बार-बार मिलने वाले जख्मों को अपनी नियती मान बैठी है।

दुस्साहस की ताकत प्रतिक्रियाओं के अभाव में पनपती है। आतंकी भी इस बात को जान गए हैं कि भारत की सहनशीलता बहुत गहरी है। चाहे देश के दिल को दहलाओ या उसकी आर्थिक नब्ज दबाओ कोई प्रतिक्रिया नहीं होगी, गर होगी भी तो महज बयान मात्र की। बीते दिनों मुंबई में सीरीयल धमाकों के बाद गृहमंत्रालय लेकर प्रधानमंत्री तक ने बड़ी दृढ़ता के साथ कहा था कि अब ऐसी घटनाएं नहीं होंगी, वो अब फिर इसी दृढ़ता के साथ कह रहे हैं कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। पीएम कहते हैं कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई एक युद्ध है और हम इसमें जरूर जीतेंगे। लेकिन कब जीतेंगे ये शायद वो खुद नहीं जानते। 12 मार्च 1993 को मुंबई में 13 श्रृखलांबद्ध धमाके हुए थे, उस वक्त को 18 साल गुजर चुके हैं, 18 साल में एक बच्चा बालिग हो जाता है। अपना बुरा-भला, दोस्त दुश्मन की पहचान करने लगता है। इतना ताकतवर भी हो जाता है कि दुश्मन का मुकाबला कर सके। लेकिन इन 18 सालों में हमारा देश कहां है, ये बताने की जरूरत नहीं। उस वक्त हम जिस स्थिति में आज भी वहीं हैं, फर्क बस इतना है कि तब जख्मों पर आंसू बहाने वाले हम अकेले थे और अब अमेरिका जैसे ताकतवर मुल्क का हमें कंधा मिल गया है। लेकिन इससे ज्यादा नाकारापन और क्या हो सकता है कि अमेरिका के कंधे पर टिकने के बाद भी हम उससे दृढ़ता और इच्छाशक्ति का पाठ नहीं सीख पाए हैं। अमेरिका में आखिरी आतंकवादी हमला 2009 में हुआ था, इसके बाद आतंकी उसकी तरफ नजर उठाकर देखने का साहस भी नहीं जुटा पाए। अमेरिका छोटे-छोटे राज्यों का देश है, बावजूद इसके वहां आतंकवाद के मुद्दों पर राजनीति नहीं होती। वहां, सद्दाम या लादेन को बचाने के लिए विधानसभाओं में प्रस्ताव पारित नहीं होते। लादेन तो फिर भी एक मिशन में मारा गया, लेकिन सद्दाम को बाकायदा फांसी पर चढ़ाया गया था। 9/11 के बाद लादेन की तलाश में इराक से पाकिस्तान तक सैन्य कार्रवाई के बुश के फैसले जैसा अगर कुछ भारत में होता पूरे देश को सिर पर उठा लिया गया होता।

राजनीति का इससे विकृत रूप कहीं और देखने को नहीं मिल सकता, अफजल गुरु ने देश की संसद पर हमला किया लेकिन वो आज भी जिंदा है। पूर्व प्रधानमंत्री को मारने वाले जेल में आराम फरमा रहे हैं, कांग्रेस नेता पर हमला करने वाला भुल्लर दया की आस पाले बैठा है। अफजल मुस्लिम है, उसे फांसी मिली तो अल्पसंख्यक वोट बिदक जाएंगे, राजीव के हत्यारे तमिल हैं, उन्हें सजा हुई तो तमिल भड़क जाएंगे, भुल्लर पंजाबी है उसकी मौत से सिख समुदाय आहत होगा, आतंकवादियों को इस रूप में केवल भारत में ही देखा जा सकता है। कसाब का गुनाह हजारों लोगों ने देखा, इसके बाद भी उसके खिलाफ सुबूत जुटाए, अदालत में दोषी को दोषी साबित करने की प्रक्रिया अपनाई गई। आज भी ये साफ नहीं है कि वो कभी फांसी के फंदे पर लटकेगा भी या नहीं, हो सकता है कल कसाब पर भी सियासत शुरू हो जाए। मुस्लिम वोट बैंक बताकर उसे अफजल की तरह जिंदा रखा जाए। वोट बैंक के नाम पर आतंकवादियों से सहानभूति रखने वाले सियासतदा शायद ये भूल जाते हैं कि बंदूक से निकली गोली और बारूद से निकले शोले जाति-धर्म देखकर तबाही नहीं मचाते। आतंकी हमलों में हिंदू भी मरते हैं और मुस्लिम भी, सिख भी मरते हैं और ईसाई भी तो क्या इन लोगों के दिल में अपनों के हत्यारों के प्रति कोई लगाव हो सकता है? ये कुछ और नहीं सिर्फ डर है, जब आपको अपनी काबलियत पर भरोसा न हो तो आप हर चीज से डरने लगते हैं। पांच साल तक जनता के पैसों पर रोटिया तोडऩे वाले, सिर्फ और सिर्फ अपना भले सोचने वाले नेताओं के दिल में यही खौफ घर कर गया है। इसलिए उन्हें आतंकियों में भी मजहबी वोट बैंक नजर आने लगता है। जो नेता और सरकार महंगाई की रफ्तार को नियंत्रित नहीं पाए हों उनसे भला आतंकवादियों पर काबू पाने की उम्मीद कैसे की जा सकती है। आतंकवादियों के पास विनाश के हथियार होते हैं, लेकिन महंगाई निहत्थे। बावजूद इसके महंगाई सरकार को परास्त करे हुई है।

देश में होने वाली हर छोटी-बड़ी आतंकवादी घटनाओं के लिए पाकिस्तान को कुसूरवार ठहराया जाता है, ढेरों सुबूत जुटाए जाते हैं, और अंत में उसी पाकिस्तान के साथ रिश्तों की मजबूती का हवाला देकर सारे जख्म भुला दिए जाते हैं। अगर पाकिस्तान कुसूरवार है तो फिर उससे रिश्ते कैसे? देश की जनता आज तक ये समझ नहीं पाई है कि आखिर आतंकवाद के जनक पाकिस्तान के आगे भारत सरकार इतनी बेबस क्यों हो जाती है। एक अदना का जानवर भी अपनों की जान बचाने के लिए जान की बाजी लगा देता है, वो ये नहीं देखता उसका दुश्मन कितना ताकतवर है, मगर इस देश की सरकार अपने दुश्मन से कई गुना ज्यादा ताकतवर होने के बाद भी खामोशी ओढ़े बैठी है, ये कायरपन नहीं तो और क्या है? जब तक इस कायरपन से बाहर आने के प्रयास नहीं होते हम भारतीय हूं ही मरते रहेंगे, यूं ही सुबोध कांत जैसे लोग हमारे दर्द पर अट्टहास लगाते रहेंगे और यूं ही सरकार आश्वासन देती रहेगी। अगले धमाके के बाद यही सब सवाल एक बार फिर सामने आ जाएंगे।

Sunday, September 4, 2011

टीम अन्ना पर कार्रवाई के मायने



चीन के बारे में कहा जाता है कि वो दुश्मन को कमजोर करने के लिए कभी सीधे तौर पर हमला नहीं करता, वो ऐसे रास्तों से वार करता है जहां से चोट भी पहुंचे और उसे नुकसान भी न हो। यही वजह है कि चीन की पहचान एक कुटिल मुल्क के रूप में बन गई है। 1963 में भारत-चीन की लड़ाई के बाद उसने तमाम मतभेदों के बावजूद कभी इतिहास दोहराने का प्रयास नहीं किया। लेकिन खामोशी से शनै: शनै: अपने भारत विरोधी अभियान को आगे बढ़ाता रहा। कुछ यही तरीका आजकल सरकार अपना रही है। अपने विरोधियों पर सीधे हमला करने के बजाए सरकार दूसरे रास्तों से उनपर घेरा कसने में लगी है। बाबा रामदेव ने कालेधन को लेकर सरकार के खिलाफ आवाज उठाई तो बदले में उन्हें जांच एजेंसियों के फेर में उलझा दिया गया। उनके सहयोगी बालकृष्ण की नागरिकता पर सवाल उठाए गए। उनके पासपोर्ट को फर्जी बताया गया और बाद में उनके प्रमाणपत्रों को अवैध बताकर उन्हें पुलिस थाने के दर्जनों चक्कर लगवाए गए। अन्ना के आंदोलन के माध्यम से बाबा ने जब फिर आवाज बुलंद करने की कोशिश की तो उन्हें प्रवर्तन निदेशालय का डर दिखाया गया। विदेशों के लेन-देन के नाम पर उनके खिलाफ मामले दर्ज किए गए। इसके अलावा ये भी बताया गया कि निदेशालय बाबा की विदेशों में संचित संपत्ति की खोज-खबर में जुट गया है। अब इसी तरीके से अन्ना के सदस्यों से निपटा जा रहा है। पहले किरण बेदी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस भेजा गया, फिर प्रशांत भूषण और इसके बाद अरविंद केजरीवाल को।

केजरीवाल को इस नोटिस के अलावा आयकर विभाग से भी नोटिस थमाए गए। सबसे अजीब रहा कुमार विश्वास को नाटिस भेजना। विश्वास से एडवांस में टैक्स डिक्लियर करने को कहा गया है। इससे पहले कभी उन्हें इस तरह का नोटिस नहीं मिला। जो इंसान समय पर टैक्स का भुगतान करता हो, अचानक से उसे एडवांस में टैक्स डिक्लियर करने को कहना क्या सामान्य प्रक्रिया कही जा सकती है? एकबारगी टीम अन्ना के प्रमुख सदस्यों की बात छोड़ दें तो भी विश्वास को नोटिस गले उतरने वाली बात नहीं है। इससे साफ होता है कि सरकार हर उस शख्स को सबक सिखाना चाहती है, जिसने अन्ना का साथ देने का साहस दिखाया। जाहिर है, ऐसे में अभी कई और लोग निशाना बन सकते हैं। अन्ना के अनशन को जितना जनसमर्थन मिला, उसकी उम्मीद सरकार ने नहीं की थी। सरकार और उसके रणनीतिकार मान बैठे थे कि थोड़ी बहुत सख्ती से आंदोलन को कुचल दिया जाएगा। पहले सरकार अन्ना के सदस्यों को अनशन की इजाजत के लिए यहां-वहां दौड़ाती रही, और जब इजाजत दी तो तमाम शर्तें लगा दी गईं। जब इससे भी बात नहीं बनी तो अनशन वाले दिन अन्ना को गिरफ्तार कर लिया गया। इस गिरफ्तारी और इसके बाद रामलीला मैदान में जो कुछ भी हुआ उससे सरकार का खीजना लाजमी था। सिंहासन पर बैठने वाले को कभी वो चेहरे नहीं सुहाते जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर उसके उपहास में शामिल हों। अन्ना के मंच से स्वयं अन्ना और उनके सहयोगियों ने सरकार पर कई बार हमले बोले, शब्दबाणों के इन हमलों में कई शब्द तीखे भी थे। लेकिन इनके तीखे होने की वजह खुद सरकार ने पैदा की थी। वैसे शब्दों के तीखेपन का अहसास संसद में बैठने वालों को बिल्कुल भी नहीं होता अगर ये हजारों लोगों की मौजूदगी में नहीं बोले गए होते।

अरविंद, किरन, प्रशांत और ओमपुरी को भेजे गए विशेषाधिकार हनन के नोटिस के बाद ये बात भी विचारणीय हो गई है कि क्या विशेषाधिकार सिर्फ माननीयों के होते हैं। कांग्रेस प्रवक्ता और सांसद मनीष तिवारी ने अन्ना हजारे के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल किया उसे क्या कहा जाए। हाल ही में जेडीयू अध्यक्ष शरद यादव ने राष्ट्रपति और राज्यपाल के बारे में जो कुछ कहा, क्या उसे लेकर उन्हें नोटिस नहीं भेजा जाना चाहिए। इसका मतलब तो ये हुआ कि माननीय एक दूसरे पर चाहे जितनी कीचड़ ऊछालें, जितने चाहे अपशब्द कहें, किसी को कोई परेशानी नहीं होती। लेकिन अगर सांसदों-नेताओं के आचरण से त्रस्त जनता कुछ बोल दे तो वो उनकी शान के खिलाफ हो जाता है। टीम अन्ना ने नेताओं के खिलाफ जो कुछ भी कहा, आम जनता को उससे कोई ऐतराज नहीं होगा, ऐसा इसलिए नहीं कि लोगों को माननीयों का उपहास उड़ाने की आदत है बल्कि इसलिए कि उनका आचरण उपहास उड़ाने लायक बन गया है। सरकार अब भले ही कितनी भी सफाई दे मगर टीम अन्ना और बाबा के खिलाफ उठाए गए कमद बदले की कार्रवाई ही माने जाएंगे। इन दोनों मामलों में ये बात काबिले गौर है कि जिन बातों को कार्रवाई का आधार बनाया गया, उसके तहत पहले भी कार्रवाई की जा सकती थी। मसलन, बाबा पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि उनकी कंपनियों में वित्तीय अनियमित्तांए, हैं, उन्होंने गुपचुप तरीके से विदेशों में संपत्ति जुटा रखी है आदि. आदि। बाबा रामदेव सालों से देश को योग का पाठ पढ़ा रहे हैं, देश के बाहर भी उनके अनुयायियों की लंबी-चौड़ी तादाद है। बाबा की कई कंपनियां आयुर्वेद उत्पादों को लोगों को बीच पहुंचा रही हैं। यानी सरकारी जुबान में अगर बाबा कुछ गलत कर रहे हैं तो ये सिलसिला काफी पहले से चल रहा होगा।

ऐसा तो हो नहीं सकता कि कालेधन पर सत्याग्रह पर बैठने के तुरंत बाद उनकी कंपनियां गोरखधंधों में लिप्त हो गईं। इसी तरह अरविंद केजरीवाल को नौकरी का हवाला जिस मामले में उलझाया जा रहा है, वो भी काफी पुराना है। अरविंद ने 2006 में ज्वाइंट इनकम टैक्स कमिश्रर का पद छोड़ा था। लेकिन सरकार को अब याद आ रहा है कि उन्होंने सेवा शर्तों का उल्लंघन किया। उनपर 9 लाख की देनदारी भी निकाली जा रही है। यदि सरकार की मंशा बदले की नहीं होती तो इन कार्रवाईयों को गलती सामने आने के बाद ही अंजाम दिया जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, इसका क्या मतलब निकाला जाए। निश्चित तौर पर यही कि सरकार अपने खिलाफ उठती आवाजों को बर्दाश्त नहीं कर पाई। बेहतर होता अगर सरकार इन आवाजों के साथ गूंज रहे जनता के स्वरों को भी पहचान लेती। पिछले कुछ दिनों में सरकार की छवि पर जितना बट्टा लगा है, उसमें इन कार्रवाईयों ने थोड़ा और इजाफा करने का काम किया है। गनीमत है कि हाल-फिलहाल चुनाव नहीं हैं, अन्यथा अहंकार चूर होते देर नहीं लगती। वैसे भी अहंकार का पेड़ कितना भी ऊंचा क्यों न हो जाए ज्यादा देर मजबूती के साथ खड़ा नहीं रह सकता। एक न एक दिन उसे जमीन पर आना ही पड़ता है। सरकार ये अहंकार कितने दिनों तक टिकता ये देखने वाली बात होगी।