Thursday, July 29, 2010

हजरत ने तो नहीं कहा, मुझे कुर्बानी चाहिएU

नीरज नैयर
बीते दिनों ऐसे ही सड़क से गुजरते हुए कुछ लोग दिखाई दिए, उन्होंने अपनी बाइक के पिछले हिस्से में एक डंडा फंसाया हुआ था। जिसके दोनों तरफ मुर्गियों को बेतरतीबी से लटकाया गया था। मुर्गियां फड़फड़ा रही थीं, लटके-लटके उनकी आवाज ने भी शायद उनका साथ छोड़ दिया था। चंद पलों के लिए उनकी तड़पन दिखाई देती और फिर ऐसे खामोश हो जातीं जैसे कभी जान थी ही नहीं। थोड़ी ही देर में वो बाइक आंखों से ओझल हो गई, और एक आत्मग्लानी मन में लिए करोड़ों हिंदुस्तानियों की तरह मैं भी आगे बढ़ निकला। ऐसी दुर्दशा तो उस आलू-भिंडी-टमाटर की भी नहीं होती होगी जिसमें कोई जान नहीं होती। पर शायद मांस का व्यापार करने और खाने वालों की नजर में ये जीवित प्राणी निर्जीव वस्तु से भी गया गुजरा स्थान रखते हैं।

क्रूरता के कई मायने हैं और वो कई रूप में हमारे सामने आती है, लेकिन इस क्रूरता को क्या नाम दिया जाए। ये मैं आज तक समझ नहीं पाया हूं। इस वाकये ने कुछ साल पहले एक अखबार में छपी उन तस्वीरों की याद ताजा कर दी है, जिसकी भयावहता आज भी मेरे बदन में सिरहन पैदा कर देती है। वो तस्वीरें ईद के बाद प्रकाशित हुईं थीं। हाथों में धारधार हथियार लिए मुस्लिम समुदाय के लोग एक ऊंट पर प्रहार कर रहे थे, ऊंट के गले से खून की धारा बह रही थी और उसकी आंखों में दर्द का सैलाब उमड़ आया था। वो चीख रहा था मगर उसकी कद्रन कर देने वाली चीख उल्लास के शोर में दब गई थी। उन तस्वीरों को देखकर मेरे मुंह से सबसे पहले बस यही निकला था, आखिर ये कैसा त्योहार। कुर्बानी और बलि के नाम पर बेजुबानों को बेमौत मारा जाता है। मारने
वालों के पास अपने बचाव की तमाम दलीलें है, कोई इसे परवरदिगार का पैगाम कहता है तो कोई देवी का संदेश। लेकिन क्या इन दलीलों की प्रमाणिकता सिध्द की जा सकती है? जो मुस्लिम समुदाय कुर्बानी की बातें करता है वो हजरत मुहम्मद के जीवन से कुछ सीख क्यों नहीं लेता। हजरत साहब ने तो कभी किसी पशु-पक्षी को कष्ट पहुंचाने तक के बारे में भी नहीं सोचा।


बात करीब पंद्रह सौ साल पहले की है, अरब के रेगिस्तान से एक काफिला गुजर रहा था। कुछ दूर चलने के बाद काफिले के सरदार ने उचित स्थान का चुनाव कर रात में पड़ाव डालने का फैसला लिया। काफिले वालों ने ऊंटों पर लदा अपना-अपना सामान उतारा। कुछ देर के आराम के बाद उन्होंने नमाज अता की और खाना पकाने के लिए चूल्हे जलाना शुरू कर दिए। काफिले के सरदार एक चूल्हे के पास पड़े पत्थर पर बैठकर जलती हुई आग को निहारने लगे। अचानक ही उनकी निगाह चूल्हे के नजदीक बने चीटियों के बिल पर गई, जो आग की तपिश से व्याकुल होकर यहां यहां-वहां भागने के लिए रास्ता तलाश रहीं थीं। चीटियों की इस व्याकुलता ने सरदार को भी व्याकुल कर दिया। वो अपनी जगह से उठे और चीखकर बोले, आग बुझाओ, आग बुझाओ। उनके साथियों ने बिना कोई सवाल-जवाब किए तुरंत आग बुझा दी। सरदार ने पानी का छिड़काव कर चूल्हे को ठंडा किया ताकि चीटिंयों को राहत मिल सके। काफिले वालों ने अपना सामान उठाया और दूसरे स्थान की ओर चल निकले। उन चीटिंयों के लिए जिन्हें शायद हमनें कभी जीवित की श्रेणी में रखा ही नहीं होगा, चूल्हे बुझवाने वाले सरदार थे हजरत मुहम्मद। हजरत साहब ने हमेशा प्रेम और शांति का पाठ पढ़ाया। उन्होंने स्वयं कहा कि तुम समस्त जीव-जंतुओं पर दया करो, परमात्मा तुम पर दया करेगा।

सहाबी जाबिर बिन अब्दुल्ला को हजरत मोहम्मद का साथी माना जाता है। उन्होंने कहा है, एक बार हजरत साहब के पास से एक गधा गुजरा, जिसके चेहरे को बुरी तरह दागा गया था और उसके नथुनों से बह रहा खून उसके साथ हुई क्रूरता की कहानी बयां कर रहा था। गधे का दर्द देखकर हजरत साहब दुख और क्रोध में डूब गए, उन्होंने कहा, जिसने भी मूक जानवर को इस अवस्था में पहुंचाया है उसपर धिक्कार है। इस घटना के बाद हजरत मोहम्मद ने घोषणा की कि न तो पशुओं के चेहरे को दागा जाए और न ही उन्हें मारा जाए। याहया इब्ने ने भी हजरत मोहम्मद की करुणा और प्रेमभाव का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है कि एक दिन मैं मोहम्मद साहब के पास बैठा था, तभी एक ऊंट दौड़ता हुआ आया और साहब के सामने आकर बैठ गया। उसकी आंखों से अशु्रधारा बह रही थी। मोहम्मद साहब ने तुरंत मुझसे कहा, जाओ देखो ये किसका ऊंट है और इसके साथ क्या हुआ है। मैं किसी तरह ऊंट के मालिक को को खोजकर ले आया, मोहम्मद साहब ने उससे पूछा, क्या ये ऊंट तुम्हारा है? उसने इसपर अनभिग्ता जताई। उसने कहा, हम पहले इसे पानी ढोने के काम में इस्तेमाल किया करता था, पर अब ये बूढा हो चुका है और काम करने लायक नहीं है। इसलिए हमसब ने मिलकर फैसला लिया है कि इसे काटकर गोश्त बांट लेंगे।

हजरत साहब ने कहा, इसे मत काटो या तो इसे बेच दो या मुझे ऐसे ही दे दो। इसपर उस व्यक्ति ने कहा, जनाब आप इसे बगैर कीमत के ही रख लीजिए। मोहम्मद साहब ने उस ऊंट पर सरकारी निशान लगाया और उसे सरकारी जानवरों में शामिल कर लिया। हजरत ने उस व्यक्ति के लिए धिक्कार कहा है जो किसी जीव को निशाना बनाए। उन्होंने फरमाया है कि अगर कोई व्यक्ति गौंरेया को बेकार मारेगा तो कयामत के दिन वह अल्लाह को फरियाद करेगी कि इसने मुझे कत्ल किया था। हजरत मोहम्मद ने जानवरों से उनकी शक्ति से अधिक काम लेने को भी गलत बताया है। एक बार की बात है हजरत साहब ने देखा कि एक काफिला जाने की तैयारी कर रहा है। काफिले में शामिल एक ऊंट पर इतना बोझ लादा गया कि वो भार के बोझ तले दबा जा रहा था। हजरत साहब ने तुरंत उसका बोझ कम करने को कहा।

इस्लाम में एक चींटी की अकारण हत्या को भी पाप बताया गया है, बावजूद इसके कुर्बानी के नाम पर बेजुबानों को निर्दयीता से मौत के घाट उतार दिया जाता है। हजरत साहब ने कहा था, जिसके मन में दयाभाव नहीं, वह अच्छा मनुष्य नहीं हो सकता। इसलिए दया और सहानुभूति एक सच्चे मुसलमान के लिए जरूरी है। बात सिर्फ मुस्लिम समुदाय तक ही सीमित नहीं है, हिंदू धर्म में भी अंधी आस्था के नाम पर देवी-देवताओं को बलि चढ़ाई जाती है। आस्था और अंधविश्वास के बीच बहुत बड़ा फासला होता है, लेकिन अफसोस की लोग इसे समझना नहीं चाहते। आखिर खून का बोग लगाकर उसे कैसे प्रसन्न किया जा सकता है जो खुद दूसरों को जीवन देता है। जब तक ये बात लोगों को समझ में नही आती, खौफनाक वाकये यूं ही आखों के सामने से गुजरते रहेंगे और हम यूं ही आत्मग्लानी मन में लिए आगे बढ़ते चले जाएंगे।
(प्रदीप शर्मा के aर्तिक्ले के लिए सज्ञान के मुताबिक )

Wednesday, July 21, 2010

पवार की सियासी गुगली

नीरज नैयर
क्रिकेट की रियासत के सबसे ऊंचे सिहांसन पर बैठने के बाद शरद पवार को कृषि मंत्रालय भारी महसूस होने लगा है। उन्हें लगता है कि दो इतनी बड़ी जिम्मेदारियां वो एक साथ नहीं उठा पाएंगे। ये वो ही पवार हैं जो आईसीसी अध्यक्ष बनने से पहले कामकाज के प्रभावित होने की बातों को सिरे से खारिज कर रहे थे। लेकिन कुर्सी संभालते ही अचानक उन्हें आभास हो रहा है कि वो गलत थे। ये बात बिल्कुल सही है कि दो नावों पर सवार होकर नहीं चला जा सकता, मगर ऐसे वक्त में जब देश महंगाई की आग में जल रहा है पवार का क्रिकेट को तवाो देना क्या ये नहीं दर्शाता कि उनके लिए कृषि मंत्रालय पार्ट टाइम जॉब जैसा है। पवार का काम का भार कम करने का आग्रह करना ऐसा लगता जैसे एक कर्मचारी बॉस से अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं की पूर्ति के लिए ऑफिस टाइम में रियायत की मांग कर रहा हो।

पवार कृषि मंत्रालय में रहते हैं या नहीं, इससे आम जनता को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, लेकिन यूपीए सरकार की छवि को इससे बट्टा जरूर लग गया है। बतौर कृषिमंत्री पवार की नाकामयाबियों को लेकर जो बातें सालों से उठती आ रही हैं, उनपर इस पूरे मामले ने एक तरह से मुहर लगाई है। वैसे पवार के इस क्रिकेट प्रेम के हिलोरे मारने के पीछे राजनीतिक कारण भी हैं। वो अच्छे से जानते हैं कि सरकार के तमाम आश्वासनों के बावजूद महंगाई नीचे आने वाली नहीं है। डीजल के दामों में बढ़ोतरी ने सिंचाई का खर्च बढ़ा दिया है और खाद पर सब्सिडी घटाने का असर पहले से ही मौजूद है। साथ ही पेट्रोल-डीजल की कीमतों में इजाफे के बाद से ट्रांपोटर्ेशन चार्ज भी 10 प्रतिशत बढ़ चुका है, ऐसे में कोई महान आशावादी ही होगा जो महंगाई कम होने की आस लगा सकता है। शरद पवार सियासत की दुनिया के मंझे हुए खिलाड़ी हैं।

जिस तरह अपने भार तले दूसरों को कुचलकर वो आईसीसी अध्यक्ष के पद तक जा पहुंचे, वैसे ही महंगाई के जाल में वो किसी दूसरे को उलझाकर दूर से तमाशा देखना चाहते हैं। अब तक महंगाई को लेकर उठने वाली हर उंगली उन्हीं की तरफ होती थी, मगर अब के बाद लोग उन्हें सीधे तौर पर निशाना नहीं बनाएंगे। और इस तरह धीरे-धीरे वो महंगाई के कलंक को भी धो सकेंगे। पवार के कृषि मंत्रालय संभालने के बाद से ही महंगाई अनियंत्रित भागी जा रही है, पिछले कुछ वक्त में ही मुद्रास्फीति की दर ने नए-नए आयाम स्थापित किए हैं। बीते दिनों विपक्षी पार्टियों द्वारा किए गए भारत बंद की सफलता इस बात को दर्शाती है कि आम जनता में सरकार और उसके मंत्रियों के प्रति खासा गुस्सा है। और इस फेहरिस्त में कहीं न कहीं शरद पवार का नाम सबसे पहले है। बतौर कृषिमंत्री आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों को थामने के उपाए करना पवार साहब की जिम्मेदारी बनती थी लेकिन उस दौर में वो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई में अपने विरोधियों को निपटाने में व्यस्त रहे। आम जनता के साथ दिखने के बजाए वो स्टेडियमों में यादा देखे गए। उन्होंने महंगाई की मुश्किलों को जानते हुए भी बांगलादेश दौरे पर भेजी जाने वाली दोयम दर्जे की टीम का चुनाव किया। उनकी जुबान पर आटा-दाल, चावल के भाव से अधिक ललित मोदी जैसों के नाम अधिक रहे। णक्रिकेट से जुड़ा होने के बावजूद उन्होंने महंगाई के मुद्दे पर जनता के साथ जमकर फुटबॉल खेला। वो एक के बाद एक गोल दागते रहे और जनता असहायों की तरह खड़ी खामोशी से सबकुछ देखती रही। पवार को कृषि का एनसाइलोपीडिया कहा जाता है, उनके बारे में प्रसिध्द है कि वो आंखमूंदकर भी बीजों की पहचान बता सकते हैं।

उनकी खुद भी कई शुगर मिल्स हैं। इसलिए ये तो नहीं कहा जा सकता कि समझ के अभाव में वो गलतियों पर गलतियां करते गए। जब शरद पवार को देश के करोड़ों लोगों के पेट भरने की जिम्मेदारी सौंपी गई तब मानसून को लेकर स्थिति इतनी भी खराब नहीं थी कि खाद्य पदार्थों के दामों में आग लग जाए। उन्होंने यदि क्रिकेट के मुकाबले थोड़ा सा ध्यान यहां भी लगाया होता तो महंगाई के बेकाबू होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। अब जब एक गेंद में 20 रन वाली स्थिति पैदा हो गई है तो वो मैदान छोड़कर भागने की फिराक में हैं। बतौर आईसीसी अध्यक्ष उन्हें शोहरत भी मिलेगी और दौलत भी, मगर कृषि मंत्रालय में केवल महजमारी और ताने ही सुनने को मिलेंगे। बकौल शरद पवार वो पिछले कई महीनों से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भार कम करने का आग्रह कर रहे हैं। यानी उन्होंने प्लेटफार्म बनाने का काम बहुत पहले से ही आरंभ कर दिया था। उन्हें इसका इल्म था कि आईसीसी की कमान उनके अलावा किसी और को नहीं मिलने वाली, इसलिए वो सोच-समझकर पत्ते चलते गए और आज अपने हिसाब से वो खेल को आखिरी पड़ाव तक ले आए हैं।

उनकी गुगली ने मनमोहन सिंह को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। एक-दो बार सार्वजनिक मंचों से वो महंगाई के लिए शरद पवार को कुसूरवार ठहरा चुके हैं। मगर अब उनके पास अपना दामन बचाने का कोई मोहरा नहीं होगा। हां, ये हो सकता है कि वो शरद पवार की गुगली को खुद खेलने के बाद रामविलास पासवान को आगे कर दें। ऐसी स्थिति में पवार के माथे से धुला महंगाई का कलंक उनके ऊपर आने के बजाए लोकजनशक्ति पार्टी के खाते में चला जाएगा। मराठा नेता पवार ने महंगाई को अनियंत्रित स्थिति में छोड़कर भले ही जिम्मेदारी से मुहं छिपाकर भागने वाला काम किया है, लेकिन उनका ये फैसला उनके व्यक्तिगत हितों के लिए पूरी तरह अनुकूल है।

Tuesday, July 13, 2010

बाघ तभी बचेंगे, जब सरकार बचाना चाहेगी

नीरज नैयर
कहते हैं कोई मुद्दा अगर मीडिया में आ जाए तो उसे अंजाम तक पहुंचते देर नहीं लगती। लेकिन बाघ सरंक्षण का मुद्दा सुर्खियां बटोरने के बाद भी वहीं का वहीं है। अब तो इस बारे में कोई खबर भी सुनने को नहीं मिलती। सरकार के पास कश्मीर, महंगाई जैसे तमाम मुद्दे हैं जिन पर विचार करना शायद उसे बाघ बचाने से ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है। बाघों का क्या है, बचे तो ठीक नहीं तो एकाध बाघ स्मारक बनाकर काम चला लिया जाएगा। राजस्थान के सरिस्का से बाघों के गायब होने की खबर के बाद से अब तक एक कदम भी ऐसा नहीं बढ़ाया गया जिसके सार्थक परिणाम निकलते दिखाई दे रहे हों। सरकारी मशीनरी की चाल-ढाल देखकर तो यही कहा जा सकता है कि शायद उसने महंगाई की तरह बाघों को बचाने का जिम्मा भी भगवान पर छोड़ दिया है। गनीमत बस इतनी भर है कि जयराम रमेश कृषिमंत्री की तरह बयान नहीं दे रहे हैं।

शरद पवार ने तो महंगाई के लिए सीधे तौर पर मानसून को दोषी ठहराया था, यदि जयराम भी ऐसा कुछ कह देते तो तूफान में टिमटिमाते दीए माफिक जो उम्मीद बची है वो भी खत्म हो गई होती। बाघ सरंक्षण पर सरकार को अपनी कार्ययोजना पर फिर से विचार करना होगा, मौजूदा हालात में बर्षों पुरानी सोच के आधार पर कोई कारगर तरीका नहीं खोजा जा सकता। सरकार और इस मुद्दे से जुड़ी तमाम संस्थाएं इस बात पर जोर देती रही हैं कि टाइगर रिजर्व के आसपास स्थित गांववालों को इस मुहिम में शामिल किया जाए। उन्हें लगता है कि स्थानीय लोगों के समर्थन के साथ ही आगे बढ़ा जा सकता है। जबकि हकीकत शायद उतनी हसीन नहीं है, बाघ और मानव के बीच की दूरी जितनी कम होगी खतरा उतना ही अधिक रहेगा। बाघ या दूसरे वन्यजीवों के शिकार में सबसे बड़ा खेल पैसे का है, शिकारी एक शिकार से हजारों कमाते हैं और उनके ऊपर की एजेंसियां लाखों। एक अनुमान के मुताबिक चीन में बाघ की खाल की कीमत तकरीबन 12500 डॉलर है। भारतीय मुद्रा के हिसाब से संख्या पांच लाख से ज्यादा रुपए बैठती है। ऐसे में शिकारी बाघ तक पहुंच को आसान बनाने के लिए कुछ रुपए थमाकर क्या उन गांव वालों का साथ नहीं खरीद सकते जिन्हें सेव टाइगर मिशन से जोड़ा जा रहा है। अब तक ऐसा ही होता आया है, शिकारी स्थानीय निवासियों या वन्य विभाग के मुलाजिमों से बाघ की खोज खबर लेते हैं और उसके ऐवज उनकी जेब भारी की जाती है। सरिस्का के वक्त भी ये बात सामने आई थी कि बाघों के सफाए में उन लोगों का भी योगदान था जिन्हें इस खूबसूरत प्राणी की हिफाजत के लिए तैनात किया गया था। सबसे ज्यादा जरूरी बात ये जानना है कि अभ्यारणयों या जंगलों के आस-पास रहने वाले कितने लोग बाघ या दूसरे वन्यजीवों को बचाने के प्रति संजीदा हैं। ऐसे लोगों के लिए वन्यप्राणी मतलब खतरा होता है, और उनके लिए सबसे ज्यादा चिंता का विषय उनके पालतू जानवर होते हैं। यदि कोई जंगली जानवर उनके पालतू पशुओं को नुकसान पहुंचाता है तो क्या वो उसके सरंक्षण के विचार पैदा कर सकेंगे। बाघों को बचाने के लिए सबसे पहला कदम सरंक्षित क्षेत्रों से आबादी का विस्थापन होना चाहिए। इसके अलावा वन विभाग के अमले को भी चुस्त-दुरुस्त किए जाने की आवश्यकता है। इस विभाग में आधे से ज्यादा लोग महज अपनी नौकरी बचाने के लिए काम कर रहे हैं।

जंगलों में घूमने वालों से लेकर एसी केबिनों में बैठने वालों तक पूरा ढंाचा बदले जाने की जरूरत है। ये कोशिश की जानी चाहिए कि वन्यजीवों की सुरक्षा का जिम्मा युवा हाथों में दिया, इसके लिए सालों से रिक्त पड़े फॉरेस्ट गार्ड और रेंजरों के पदों को भरना होगा। इस मामले में सरकार बहुत सुस्त चाल से आगे चल रही है, जबकि ये सबसे बड़ी जरूरत है। इसके अतिरिक्त निचले स्तर पर तनख्वाह बढ़ाने पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। रणनीति बनाने वालों के साथ-साथ मोर्चा लेने वालों को भी तवज्जो दिया जाना चाहिए। जंगलों की खाक छानने वाले एक गार्ड को जितना वेतन मिलता है, उतने में आज के समय में घर चलाना बिल्कुल भी आसान नहीं। किसी भी इंसान का ईमान उसकी आर्थिक स्थिति और जरूरतों के बीच के फासले को देखकर ही ढोलता है। अगर इस फासले को कम किया जा सके तो शायद ईमान को कायम रखने में मदद मिल सकती है। फॉरेस्ट गार्ड-रेंजरों और दूसरे स्टाफ को उचित तनख्वाह मिले, उन्हें पर्याप्त प्रशिक्षण के साथ अत्याधुनिक तकनीकि मुहैया करवाई जाए तो बद से बदतर होती स्थिति को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन इतने सबके लिए सबसे पहले सरकार को बाघ सरंक्षण को पार्ट टाइम जॉब के रूप में लेना छोडऩा होगा।

दूसरे मुद्दों की तरह इस मुद्दे को भी प्राथमिताओं की सूची में शुमार किए बगैर बाघों के साथ न्याय नहीं हो सकता। कुछ वक्त पहले भारत सरकार ने 13 चिन्हित बाघ संरक्षित क्षेत्रों में विशेष बाघ सुरक्षा बल (एसटीपीएफ) तैनात करने का फैसला लिया था। लेकिन उनकी तैनाती कोई खास असर डाल पाएगी कहना मुश्किल है, क्योंकि साल 2008 के बजट भाषण में एसटीपीएफ के लिए 50 करोड़ रुपए के आवंटन की घोषणा की गई थी मगर अब तक इस बारे में सिर्फ बातें ही हो रही हैं। चंद महीनों पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी बाघों के संबंध में राज्यों के मुख्यमंत्रियों से चर्चा की इच्छा जाहिर की थी, पर शायद उस इच्छा को भी अमल में नहीं उतारा गया। कुछ एक मीडिया समूह इस मुद्दे को जरूर लगातार उठाए हुए हैं, लेकिन इसके पीछे उनके अपने स्वार्थ छिपे हैं। जनता के बीच खुद को संवेदनशील और सामाजिक सरोकार से मतलब रखने वाले की छवि बनाने के लिए सेव टाइगर जैसे कैंपेन चलाए जा रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक प्रतिष्ठित चैनल ने तो आमजन से बाघ बचाने के सुझाव सुझाने की अपील कर रहा है, लेकिन उसकी संजीदगी का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि मेरे द्वारा उनकी वेबसाइट/ब्लॉग पर तमाम संदेश छोडऩे के बाद भी आज तक उनका कोई जवाब नहीं आया। जबकि दूसरे मुद्दों पर वहीं हर रोज गर्मागर्म बहस चलती है। ये सच है कि इस तरह के कैंपेन थोड़ी बहुत जागरुकता फैलाने में मददगार साबित हो सकते हैं, मगर इन तरीकों से बाघों को नहीं बचाया जा सकता। बाघ केवल तब ही बचेंगे जब सरकार बचाना चाहेगी। और इसके लिए मनमोहन सिंह जैसे नेताओं का जागना बेहद जरूरी है।

Friday, July 2, 2010

कश्मीर विवाद:जवानों को नहीं आवाम को संयम बरतना होगा

नीरज नैयर
कल्पना कीजिए की कुछ लोग आपको मार रहे हैं और अपने बचाव में यदि आप उनपर हाथ उठाते हैं तो आपकी भर्त्सना की जाती है, आपको दंडित किया जाता है। कश्मीर में तैनात केंद्रीय अर्ध सैनिक बल आजकल कुछ ऐसी ही स्थिति से गुजर रहे हैं। सीआरपीएफ पर 11 नागरिकों को मारने का आरोप है, घाटी में फोर्स के खिलाफ जबरदस्त माहौल है। हर रोज प्रदर्शन हो रहे हैं, लाठी-डंड़ों से लैस प्रदर्शनकारी हालात काबू करने में लगे जवानों पर हमला बोल रहे हैं। सोपोर, बारामूला, श्रीनगर और अनंतनाग जैसे कुछ इलाकों की सड़कें ईंट-पत्थरों से पटी पड़ी हैं, कहीं टायर जल रहे हैं तो कहीं गाड़ियां। ये सारा फसाद कुछ दिनों पहले सीआरपीएफ की फायरिंग में एक युवक की मौत से शुरू हुआ। इस तरह के हालात घाटी में पहले भी बनते रहे हैं, लेकिन एक लंबी खामोशी के बाद अचानक इतना सब हो जाना किसी बड़ी साजिश की तरफ इशारा कर रहा है। बिल्कुल ऐसी ही स्थिति दो साल पहले इसी मौसम में बनी थी, जब अमरनाथ यात्रियों के लिए अस्थाई टैंट के नाम पर 25 एकड ज़मीन आवंटित की गई थी। इस बार भी अमरनाथ यात्रा के वक्त घाटी सुलग रही है।

दरअसल अलगाववादियों को अमरनाथ यात्रा के रूप में अपनी आवाज बुलंद करने और पाकिस्तान के पक्ष में माहौल बनाने का सुनहरा मौका मिल जाता है। पाकिस्तान सेना भी इस मौके की तलाश में रहती है ताकि दहशत फैलाने वालों को सीमा पार करवाई जा सके। पिछले साल अगर अमरनाथ यात्रा शांतिपूर्ण तरीके से हो गई तो इसके पीछे मुंबई हमला है। मुंबई हमले के बाद दोनों देशों के बीच पैदा हुए तनाव ने पाक हुक्मरानों को कश्मीर के बारे में सोचने का मौका ही नहीं दिया। अलगाववादी ताकतें भी समर्थन के अभाव में खामोश बैठी रहीं। लेकिन अब मुंबई हमले का मामला पूरी तरह से ठंडे बस्ते में जा चुका है। पाक पर अब न तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय का दबाव है और न ही भारत सरकार उसके प्रति कड़े रुख पर अडिग है। दोनों मुल्कों के बीच विश्वास बहाली के नाम पर लंबे समय से रुकी बातचीत का सिलसिला फिर से शुरू हो चुका है। ऐसे में सीमा पार से कश्मीर में बैठे अलगाववादियों को अपने हिसाब से नियंत्रित करने में पाकिस्तान को कोई नुकसान नहीं। पाक इस बात को अच्छे से समझता है कि कश्मीर जितना सुर्खियों में रहेगा, उतना ही भारत पर दबाव पड़ेगा। पिछले बीस-पच्चीस दिनों से जारी हिंसा की खबरें भारत और पाकिस्तान के साथ-साथ विदेशी मीडिया में भी प्रमुखता से आ रही हैं। सरकार सेना की सहायता लेने पर विचार कर रही है और संभव है कि एक-दो दिनों पर इस पर अमल भी कर दिया जाए। कश्मीर जैसी घाटी में जहां अशांति आग की तरह फैलती है, सेना दूसरे केंद्रीय बलों और राय पुलिस की अपेक्षा स्थिति से बेहतर तरीके से निपट सकती है। इसलिए यहां ये कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि केंद्र सरकार ने घाटी से सेना को हटाकर अशांति के प्रवेश के लिए खुद ही दरवाजे खोले थे। राय के मुख्यमंत्री उमर अब्दुला यूपीए सरकार के सहयोगी हैं और राय में नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन की सरकार है। संभवत: इस करके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सेना हटाने के उमर के प्रस्तावों पर सहमत होते गए। मौजूदा वक्त में भी उमर अबदुल्ला के सीआरपीएफ को बेकाबू बल कहने का केंद्र सरकार समर्थन कर रही है।

यदि उमर के इस कथन को मान भी लिया जाए तो फोर्स के बेकाबू होने का जिम्मेदार कोई और नहीं कश्मीर का आवाम है। कर्फ्यू तोड़कर कानून का उल्लंघन करने वाले, सुरक्षाबलों पर पथराव करने वाले क्या निर्दोषों की श्रेणी में आ सकते हैं। 25 जून से 30 जून तक सीआरपीएफ के दर्जनों जवान घायल हुए, क्या इसे जनता का बेकाबूपन नहीं कहा जाएगा। एक रोज पहले एक एजेंसी द्वारा जारी की गई तस्वीर में साफ नजर आ रहा था कि हिंसक और बेकाबू कौन हैं। कुछ लोग मिलकर लाठी-डंड़ों से एक जवान को पीटते हैं, अखबारों में प्रमुखता से उस दर्शय को प्रकाशित किया जाता है लेकिन राय के मुख्यमंत्री को कुछ नजर नहीं आता। उमर अबदुल्ला महज वोट बैंक को बचाने की खातिर आंख पर पट्टी बांधे बैठें और वो ही बोल रहे हैं जो अलगवावादी उनसे बुलवाना चाहते हैं। पीडीपी इस मुद्दे को उमर सरकार की असफलता के तौर पर भुनाने की कोशिश में लगी है और उमर इस प्रयास से भटकने वाले वोटों को सुरक्षाबलों के खिलाफ बयान देकर पुन: अपने करीब लाने की सोच रहे हैं। जो लोग गोलीबारी में मारे गए हैं उनमें छह साल का एक बच्चा भी शामिल है। अलगाववादी इस बात को भी मुद्दा बना रहे हैं कि सुरक्षा बल बच्चों तक को नहीं छोड़ रहे। मौत चाहे बच्चे की हो या बड़े की किसी का भी जाना मातम और रोष लेकर आता है। लेकिन सवाल यहां ये है कि आखिर एक छह साल का बच्चे को उस भीड़ का हिस्सा किसने बनने दिया। बच्चे के मां-बाप को भी इस बात का इल्म होगा कि कर्फ्यू तोड़कर आगे बढ़ने वाली भीड़ का सुरक्षाबल फूलों से स्वागत नहीं करेंगे बावजूद इसके जाने दिया गया। कहा जाता है कि भीड़ की कोई शक्ल नहीं होती, तो फिर कैसे उम्मीद की जा सकती है कि उसे नियंत्रित करने वाले चेहरा और उम्र देख-देखकर कार्रवाई करेंगे। अलगाववादी और आतंकवादी अपने हितों की पूर्ति के लिए बच्चों का इस्तेमाल कर रहे हैं और अगर उनके मां-बाप इसको जायज मानते हैं तो फिर विलाप किस बात का। केंद्र सरकार को सीआरपीएफ को संयम बरतने के निर्देश देने से पहले जरा हालातों पर बारीकी से गौर करना चाहिए। हजारों की संख्या में मरने-मारने पर उतारू लोगों को महज लाठी के बल पर काबू में नहीं लाया जा सकता। अपने ऊपर हमला होने के बाद भी सामने वाले को जिंदा जाने देने से बड़ा संयम और क्या हो सकता है। यदि जवानों ने संयम नहीं बरता होता तो मरने वालो ंकी तादाद कई गुना यादा पहुंच गई होती। संयम बरतने की जरूरत सीआरपीएफ को नहीं बल्कि उन कश्मीरियों को है जो अलगाववाद की धारा में बेफिजूल बहे जा रहे हैं।

Thursday, June 24, 2010

काश मैं गैस पीड़ित होता

नीरज नैयर
कुछ दिनों के शोर के बाद भोपाल में खामोशी है। गैस त्रासदी पर अदालत के फैसले से उठा तूफान मुआवजे के मरहम के बाद अब थम गया है। मंत्री समूह (जीओएम) ने पीड़ितों के लिए 1332 करोड़ रुपए राहत की सिफारिश की है। इनमें मृतकों के लिए मुआवजा राशि बढ़ाकर दस लाख की गई है, इसका भुगतान पूर्व में दिए जा चुके दो लाख साठ हजार रुपए काट कर किया जाएगा। साथ ही स्थाई रूप से विकलांगों के लिए पांच लाख, आंशिक विकलांगों के लिए एक लाख और कैंसर आदि गंभीर बीमारियों से पीड़ितों के लिए दो लाख मुआवजे का प्रस्ताव रखा गया है।

जीओएम द्वारा प्रधानमंत्री को सौंपी गई रिपोर्ट में कुछ और भी सिफारिशें की गई हैं लेकिन हर किसी का ध्यान केवल मुआवजे पर है। इंसाफ की लड़ाई का दंभ करने वाले मुआवजे को ही इंसाफ मानकर चल रहे हैं। स्थानीय अखबारात धन्यवाद संदेश प्रकाशित कर इसे अपनी जीत बताने में लगे हैं। हर कोई खुश है, 25 साल पहले मिले जख्मों की शिकन तक किसी के चेहरे पर दिखाई नहीं देती। कोई घर खरीदने के सपने बुन रहा है तो कोई चमचमाती गाड़ी का शौक पाले हुए है। महंगाई के इस दौर में मुआवजे की घोषणा उन लोगों के लिए संजीवनी साबित हुई है जिनका नाम हताहतों की सूची में शामिल है। लेकिन जो लोग छूट गए हैं उनके चेहरे पर मायूसी साफ देखी जा सकती है। उन्हें इस बात का मलाल है कि वो गैस पीड़ित क्यों नहीं हैं।

2-3 दिसंबर 1984 की रात जो कुछ भी हुआ उसका हिस्सा कोई नहीं बनना चाहेगा, ये बात बिल्कुल सही है मगर उसके नाम पर जो कुछ लोगों को मिला है वो दूसरों के लिए मलाल की वजह जरूर बन रहा है। पीड़ितों की आड़ में उन लोगों की भी जेबें भरी गईं जिनका गैस त्रासदी से दूर-दूर का नाता नही रहा। क्या नेता, क्या अफसर और क्या आंदोलनकारी हर किसी ने विश्व की इस भीषणम घटना से पैसा बनाया। शहर के लोग भी इस बात को मानते हैं कि राहत की खुराक से उन लोगों तक के पेट भरे गए जो कभी प्रभावित हुए ही नहीं। उस दौर के एक वकील जो अब पेशे से पत्रकार हैं, बताते हैं कि 3-3 हजार में एफीडेविट बनवाकर फर्जी लोगों को पीड़ित बनवाने का गोरखधंधा खूब फला-फूला। वकीलों ने भी दोनों हाथों से बटोरा और नेताओं एवं अफसरों ने भी। वो कहते हैं कि मेरे पास भी कई ऐसे लोग आए जो खुद को पीड़ितों की सूची में शामिल करवाने के ऐवज में मुआवजे की आधी रकम तक देने को तैयार थे। नए भोपाल में नाई का काम करने वाले शकील भी बखूबी बयां करते हैं कि कैसे उनके आस-पड़ोसियों ने खुद को गैस पीड़ित बनाया। ऐसे तमाम मामले होंगे जिनमें शर्तों के आधार पर मुआवजे की बंदरबांट हुई हो। सही मायनों में देखा जाए तो इस पूरे मामले में लड़ाई केवल मुआवजे को लेकर ही चली आ रही है। पीड़ितों के हितैषी मानेजाने वाले संगठन सालों से मुआवजे का रोना रोते रहे हैं।

गैस त्रासदी की बरसी पर हर साल दिल्ली में होने वाले प्रदर्शन सरकार को ये याद दिलाने के लिए किए जाते रहे कि यूनियन कार्बाइड द्वारा तय किए गए मुआवजे की रकम अभी बाकी है। अगर सच में गुनाहगारों को सजा देना यादा अहम होता तो महज मुआवजे की राशि बढ़ाए जाने पर यूं खुशी भरी खामोशी नहीं छाई होती। 25 साल कोई छोटी अवधि नहीं होती, इतने लंबे वक्त में यादे तक धुंधली पड़ जाती हैं लेकिन गैस पीड़ितों के जख्म अब तक नहीं भरे हैं और शायद कभी भरने वाले भी नहीं हैं। इस मुआवजे की रकम के खत्म होते ही इंसाफ की लड़ाई के नारे फिर बुलंद हो जाएंगे। ये लड़ाई कुछ लोगों के लिए कमाई का जरिया बन गई है, इसलिए वो कभी इसे खत्म नहीं होने देंगे। सबको पता है कि न एंडरसन कभी भारत आ पाएगा और न ही दोषियों को सजा सुनाई जा सकेगी।

अगर अदालत भारतीय आरोपियों को 2-2 की जगह 10-10 साल की सजा भी सुनाती तो भी आंदोलन होना तय था। 1996 में ही ये बात साफ हो गई थी कि जिन धाराओं में आरोप तय किए गए हैं उनके मुताबिक मामूली सजा ही होगी। तो फिर इतना हो-हल्ला क्याें मचाया गया। दरअसल इस फैसले ने मुआवजे की चाह रखने वालों के लिए आंदोलन की एक नई जमीन तैयार की, सहानभूति की ऐसी लहर चली कि देशभर में पीड़ितों के हक में आवाजें उठने लगीं। कहीं कैंडल मार्च हुए तो कहीं हस्ताक्षर अभियान चलाए गए। मीडिया ने भी प्रदर्शनकारियों का पूरा साथ दिया। घंटों-घंटों तक स्पेशल एपीसोड दिखाए गए, पुरानी कतरनों को फिर से प्रकाशित किया गया। और अंत में सबकुछ मुआवजे पर जाकर खत्म हो गया। लेकिन किसी ने भी तस्वीर का दूसरा पहलू प्रस्तुत करने की जहमत नहीं उठाई। अगर भोपालवासियों का दिल ही टटोला जाता तो बंदरबांट के कई किस्से सामने आ गए होते।

ये हकीकत है कि जो वास्तव में गैस का शिकार बने वो सरकारी निकम्मेपन के चलते तिल-तिलकर मरते रहे, न तो उन्हें आर्थिक सहायता मिली और न ही उचित इलाज। जिस भोपाल मैमोरियल अस्पताल को गैस पीड़ितों के लिए खड़ा किया गया वहां उन्हें चूहे-बिल्लियों की तरह इस्तेमाल किया गया। तत्कालीन राय और केंद्र सरकारें अमेरिकी रुतबे के आगे एंडरसन के गुनाह को कम करती रहीं। जिसे जेल की सलाखों के पीछे होना चाहिए थे, उसे इात के साथ सरकारी उड़न खटोले में देश से विदा किया गया। लेकिन इतने सालों के बाद गड़े मुर्दे उखाड़कर इंसाफ-इंसाफ चिल्लाने को क्या सही कहा जा सकता है। जो राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन और मीडिया आज पीड़ितों की आवाज बनने का दावा कर रहे हैं वो कल तक चुपचाप सबकुछ क्यों देखते रहे। जायज सी बात उनके लिए स्वयं के हित यादा मायने रखते हैं, कल तक ये मुद्दा निर्जीव था मगर आज सबको इसमें फायदा ही फायदा नजर आ रहा है।

इसलिए हर कोई पीड़ितों को इंसाफ दिलाना चाहता है। मैं निजी तौर पर पीड़ितों को मुआवजा दिए जाने के विरोध में बिल्कुल नहीं हू, जिन लोगों ने उस भयानक त्रासदी को करीब से देखा है, उसकी भयावहता को महसूस किया है उन्हें सहायता मिलनी ही चाहिए। लेकिन केवल उन्हीं को जो वास्तव में इसके हकदार हैं। ऐसी त्रासदी को कुछ लोगों के लिए धन उगाही का माध्यम बनने देना उस वक्त बरती गईं लापरवाहियों जितना बड़ा ही अपराध है। मौजूदा वक्त में जरूरत है एक ऐसी व्यवस्था कायम करने की जहां भोपाल गैस कांड की पुनर्रावृत्ति रोकने के तमाम उपाए मौजूद हों, अगर ऐसा हो सका तो शायद फिर किसी को इस बात का मलाल नहीं होगा कि वो पीड़ित क्यों नहीं है। है।

Monday, June 21, 2010

भोपाल गैस त्रासदी: इंसाफ पर भारी राजनीति

नीरज नैयर
25 बरस के बाद भोपाल गैस त्रासदी फिर सुर्खियों में है। यूं तो हर बर्सी पर न्याय और इंसाफ के नारे सुनने में आ जाया करते थे लेकिन इस बार की गूंज ने पूरे मुल्क को हिलाकर रख दिया है। गुनाहगारों को सजा की रस्म अदायगी के बाद सवाल उठ खड़े हुए हैं कि क्या हमारे देश में मानव जिंदगियों का कोई मोल नहीं। 20,000 मौतों और लाखों जिंदगियों में ताउम्र के लिए अंधेरा करने वाले आज भी खुली हवा में सांस लेने के लिए स्वतंत्र हैं। राजनीति पार्टियां एक दूसरे पर आरोप लगाकर महज अपने हितों को साधने में लगी हैं। इतिहास के पन्ने पलटकर ये पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि असल कातिल वॉरेन एंडरसन के प्रति हमदर्दी दिखाने वाला चेहरा कौन सा था। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की संलिप्त्तता को पर्दे की ओढ़ से छिपाने की जद्दोजहद में खुद कांग्रेस वाले ही तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के अक्स को एंडरसन की तस्वीर से मिलाने में लगे हैं। और अर्जुन सिंह महाभारत के अर्जुन के इतर खामोशी से सबकुछ देख रहे हैं।

उम्र के इस पड़ाव में अपनों की घेरेबंदी की चुभन शायद इससे पहले उन्होंने कभी महसूस नहीं की होगी। राजनीति में हमेशा से मोहरों की अपेक्षा चाल को तवाो दी जाती है, इसलिए कांग्रेस णणभी पीड़ितों के गुस्से के सैलाब में अर्जुन को बहाकर दो दशकों से दहक रहे अंगारों को शांत करना चाहती है। मुख्यमंत्री होने के नाते एंडरसन की रिहाई से लेकर भोपाल से विदाई के लिए के लिए अर्जुन सिंह को दोषी ठहराया जा सकता है लेकिन इससे उस वक्त की राजीव गांधी सरकार को नहीं बचाया जा सकता। आखिर यूनियन कार्बाइड प्रमुख वॉरेन एंडसरन को बा इात अमेरिका भेजने की व्यवस्था को केंद्रीय स्तर पर की गई थी। मौजूदा वक्त में सबसे बड़ा सवाल ये नहीं है कि एंडरसन को किसने भगाया, बल्कि सवाल ये है कि इतने लंबे वक्त तक इस मुद्दे पर खामोशी क्यों छाई रही। जो लोग आज हो-हल्ला मचा रहे हैं क्या उन्हें ये नहीं पता था कि एंडरसन कैसे भागा। क्या वो नहीं जानते थे कि जिन गुनाहगारों पर मुकदमा चल रहा है उन्हें किसी भी सूरत में सड़क हादसे में मिलने वाली सजा से यादा सजा नहीं मिल सकती। इस केस को कमजोर करने की शुरूआत तो त्रासदी के बाद से ही शुरू हो गई थी और इसके लिए केंद्र एवं राय सरकार दोनों सीधे तौर पर दोषी हैं। लेकिन 1996 में जब सुप्रीम कोर्ट ने यूनियन कार्बाइड से जुड़े लोगों पर 304 की जगह 304 ए की धाराई लगाई तभी साफ हो गया था कि यह मामला दम तोड़ चुका है।

304 गैरइदाइतन हत्या और 304ए लापरवाही के लिए लगाई जाती हैं। ये बेहद तााुब की बात है कि देश की सर्वोच्च अदालत को सबसे बड़ी गैस त्रासदी में महज लापरवाही दिखाई दी। जिस वक्त धाराओं का ये खेल हुआ उस वक्त केंद्र में एचडी देवगौड़ा की सरकार थी लेकिन उन्होंने इस फैसले के खिलाफ आवाज उठाना मुनासिब नहीं समझा। और न ही गैर राजनीतिक दलों से लेकर उन नेताओं ने जो आज अदालत के फैसले को न्याय की हत्या करार देने में लगे हैं। इस फैसले के खिलाफ महज दो याचिकाएं दायर हुईं थी, जिन्हें बाद में खारिज कर दिया गया। क्यों भोपाल गैस कांड पर रोटियां संकेने वालों ने इस मुद्दे को उतनी बुलंदी से नहीं उठाया जितनी बुलंदी से वो मुआवजे की मांग करते हैं। ये हकीकत है कि इस गैस कांड ने मुफलिसी में दिन गुजार रहे बहुतों की जिंदगी गुलजार की है। मुआवजे के नाम पर मिलने वाली रकम ने उन्हें वो सबकुछ दिया है जिसके शायद वो हकदार नहीं थे। पीड़ितों की फेहरिस्त में एक-दो नहीं बल्कि हजारों ऐसे नाम होंगे जो सिर्फ आर्थिक फायदे के लिए इस फेहरिस्त में शामिल हुए। इसलिए उनके लिए न्याय-अन्याय जैसे शब्द कोई अहमीयत नहीं रखते। यदि 1996 में मुआवजे से जुड़ा कोई फैसला आया होता तो निश्चित तौर पर पूरा देश सिर पर उठा लिया गया होता।

हजारों-लाखों जिंदगियों को दर्द की आग में झोंकने वाली यह त्रासदी कुछ लोगों के लिए फायदा का सौदा साबित होती रही है। और आज भी इसकी आड़ में फायदे खोजे जा रहे हैं। जो वास्तव में दो-तीन दिसंबर की दरमियान यूनियन कार्बाइड से रिसी विषैली गैस मिथाइल आइसोसायनट का शिकार बने थे उनके लिए इंसाफ सफेद हाथी जैसा बनकर रह गया है, मगर इंसाफ दिलाने का जिम्मा उठाने वालों के घर की रौनक बढ़ती जा रही है। गैस पीड़ित महिला मोर्चा अब पूर्व मुख्य न्यायाधीश एएच अहमदी को भोपाल मेमोरियल अस्पताल के अध्यक्ष पद से हटाने की मांग कर रहा है, उस दौर में पुलिस अधीक्षक रहे स्वराज पुरी को मध्यप्रदेश सरकार नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के अधयक्ष पद से पहले ही हटा चुकी है। अहमदी सुप्रीम कोर्ट की उस बेंच के अध्यक्ष थे जिसने आरोपियों को सस्ते में छूटने का मौका दिया था। हो सकता है कि पुरी की तरह अहमदी को भी दरकिनार कर दिया जाए। लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या वास्तव में इस सबसे पीड़ितों को न्याय और दोषियों को सजा के सिध्दांत को पूरा किया जा सकता है। स्वराज पुरी पर आरोप है कि उन्होंने तत्कालीन डीएम मोती सिंह के साथ एंडरसन को एयरपोर्ट छोड़ा था। एक पुलिस अधीक्षक के तौर पर पुरी चाहते भी तो एंडरसन को हिरासत में नहीं रख सकते थे, उस दौरान उन्होंने जो कुछ भी किया उसे आदेशों का पालन करना कहा जा सकता है।

राय सरकार ने केंद्र सरकार के आदेशों का पालन किया और स्थानीय प्रशासन ने राय सरकार के। इसलिए किसी एक को बलि का बकरा नहीं बनाया जाना चाहिए। इतने सालों बाद गुनाहगार की पहचान करने से अच्छा होता अगर उन हालातों को बदलने की कोशिश की जाती जिसमें इस त्रासदी ने जन्म लिया। क्या एंडरसन अमेरिका या दूसरे किसी पश्चिमी मुल्क में हजारों लोगों की मौत की जवाबदेही से महज कुछ हजार डॉलर देकर बच सकते थे। क्या इंसाफ की आस में 25 बरस इंतजार के बाद भी दोषियों को छूटते देखने का दर्द अमेरकिी महसूस कर सकते हैं, निश्चित तौर पर नहीं। दुर्घटनाएं किसी से पूछकर नहीं होती, इस बात की क्या गारंटी है कि आने वाले कल में कोई दूसरा शहर भोपाल नहीं बनेगा। जो गलतियां 1984 और उसके बाद से होती आ रही हैं उनको सुधारना इस वक्त बलि के बकरा खोजने से यादा जरूरी होना चाहिए। पर अफसोस की किसी को इस बात का ख्याल नहीं।

Thursday, June 17, 2010

क्यों न निजी कंपनियों को सौंपी जाए जंगल की सुरक्षा

नीरज नैयर
एक लंबी खामोशी के बाद आखिरकार केंद्रीय नेतृत्व को अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे बाघो के बारे में सोचने का वक्त मिल ही गया। राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की बैठक में प्रधानमंत्री ने बाघ बचाओ मुहिम में रायों की कमजोर भागीदारी पर चिंता जाहिर की, उन्होंने इस संबंध में राय सरकारों को पत्र लिखने की भी बात कही। बैठक में अभयारण्योंके आस-पास बसे लोगों के पुर्नवास के लिए अधिक धन उपलब्ध कराने का फैसला लिया गया। पर्यावरण मंत्री की मानें तो पुर्नवास के लिए अगले सात सालों में 77 हजार परिवारों को बसाने के लिए आठ हजार करोड़ की जरूरत पड़ेगी। सोचने वाली बात ये है कि क्या अगले सात सालों तक बाघ बचे रहे पाएंगे। जिस रफ्तार से उनकी संख्या घटती जा रही है, उससे तो इस बात की संभावना कम ही दिखाई देती है।

बैठक में वन्य जीव सरंक्षण के प्रयासों को नए सिरे से संगठित करने के लिए केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय में वन और वन्यजीव मामलों के लिए अलग विभाग बनाने पर मुहर लगी। यानी इतने लंबे अंतराल और दर्जनों बाघों की मौत के बाद अब जाकर सरकार को लग रहा है कि मंत्रालय को बांटने से बाघों की मौत पर अंकुश लगाया जा सकता है। यदि बाघों को बचाने का यही एक तरीका है, जैसा की सरकार सोच रही है तो इस पर पहले काम क्यों नहीं किया गया। वर्तमान में देश में बाघों की संख्या 1000-1100 से यादा नहीं होगी, साल की शुरूआत के तीन महीनों में ही करीब 13 बाघ की मौत के मामले सामने आ चुके हैं। वन्यजीवों को लेकर केंद्र सरकार वास्तव में कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा तो बोर्ड की बैठक के डेढ़ साल बाद होने से लगाया जा सकता है। बाघों की सुरक्षा का मुद्दा, अन्य मामलों की तरह अगर प्राथमिकताओं की सूची में रखा गया होता तो डेढ़ साल में कई बैठकें हो चुकी होती और कई कदम उठाए जा चुके होते। इस राष्ट्रीय प्राणी को बचाने के लिए सरकार महज जब जागो, तब सवेरा वाली कहावत पर अमल करने की कोशिश करती आई है। उसकी इसी कोशिश में बाघों की संख्या आधे से भी कम होकर रह गई है। कुंभकरणी नींद से बीच में उठकर कुछ कदम बढ़ाने और वापस फिर सो जाने से स्थितियां नहीं बदला करतीं, लेकिन सरकार मुंगेरीलाल की तरह सपने पर सपने देखे जा रही है।

बाघों के सरंक्षण को केंद्र और रायों के बीच की फुटबॉल न बनाकर एक ऐसी नीति बनाए जाने की जरूरत है जो सीमाओं के बंधन से अछूती रहे। अब तक होता यही आ रहा है कि केंद्र फंड जारी करता है और राय सरकारें उसका उपयोग। मगर यह उपयोग उन मदो पर नहीं होता जहां इसकी सबसे यादा जरूरत है। राय सरकारें फंड की चाहत में कागजों पर सबकुछ ठीक बताती रहती हैं, और अंत में सरिस्का और पन्ना जैसे खुलासे स्तब्ध कर देते हैं। पन्ना पूरी तरह बाघ विहीन हो चुका है। मध्यप्रदेश का एक और अभयारण्य पेंच भी पन्ना के पदचिन्हों पर है। पेंच में पिछले छह माह में तकरीबन छह बाघ दम तोड़ चके हैं। राजस्थान के सरिस्का से पूरी तरह बाघों के सफाए की खबर के बाद भी यदि सार्थक परिणामों के लिए काम किया जाता तो बाघों की संख्या में गिरावट का क्रम बरकरार नहीं रहता। सही मायने में देखा जाए तो इस मुद्दे पर अब तक सिर्फ प्रयोग ही किए जा रहे हैं। केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय का बंटवारा भी प्रयोग का ही हिस्सा है।

अगर प्रयोग करना ही है तो फिर बड़े स्तर पर क्यों न किए जाएं, उसमें समाधान की संभावना भी कम से कम बड़ी तो रहेगी। पूर्व में लिखे अपने लेखों में मैं जंगलों की हिफाजत को निजी हाथों में सौंपे जाने की वकालत करता रहा हूं। इस संबंध में मुझे ढेरों प्रतिक्रियां भी मिलीं, जिनमें से अधिकतर आलोचना स्वरूप की गईं थी, मगर कुछ ऐसे भी मिले जिन्होंने इसके पीछे के तर्कों को गहराई से समझा। मध्यप्रदेश के एक आईएफएस अधिकारी ने ऐसे ही मेरे लेख पर चर्चा करते हुए बाघ सरंक्षण में प्रदेश के योगदान की बड़ी-बड़ी बातें कहीं, उन्होंने ये समझाने का प्रयास किया कि पूरे मुल्क में मध्यप्रदेश जैसा काम किसी ने नहीं किया। जाहिर है, जिस विभाग से वो जुड़े हैं उसकी बुराई वो नहीं सुन सकते, लेकिन यदि वास्तव में मध्यप्रदेश ने इतना कुछ किया होता तो यहां के अभयारण्य बाघ वहीन नहीं हो रहे होते।

बाघों को बचाने के मुद्दे पर हम पूरी तरह से बैकफुट पर हैं। या कह सकते हैं कि हमारे पास अब खोने के लिए कुछ नहीं। जितनी तेजी से बाघों का सफाया हो रहा है, उससे यह तय है कि जल्द ही बाघ किस्से-कहानियों की बात बनकर रह जाएंगे। यानी जो करना है, अभी करना है। यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि अगर सरकारी अमला स्थिति को नियंत्रित करने में सफल होता तो करोड़ों-अरबों बहाए जाने के बाद बाघ यूं एक-एक करके दम नहीं तोड़ रहे होते। कोई स्वीकार करे या न करे, मगर हकीकत यही है कि बाघ सरंक्षण में लगे 90 प्रतिशत सरकारी मुलाजिम सिर्फ और सिर्फ नौकरी बचाने के लिए काम करते हैं। उच्च पदों पर बैठे अफसर सच पर पर्दा डालने और शेखी बखारने में व्यस्त रहते हैं और निचले तबके के कर्मचारी आराम तलबी में। ये सही है कि बाघों की सुरक्षा में लगे अफसर-कर्मचारी अत्याधुनिक सुविधाओं से वंचित हैं मगर ये भी सही है कि जिन अफसरों और कर्मचारियों पर वन्यप्राणियाें के सरंक्षण का जिम्मा है वो ही उनके संहार की वजह बन रहे हैं। सरिस्का कांड की जांच में यह बात सामने आई थी कि वन विभाग के मुलाजिम भी बाघों की हत्या में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भागीदारी निभा रहे थे। ऐसे में कैसे उम्मीद की जा सकती है कि मंत्रालय का विभाजन करने, कमेटियां गठित करने और दर्जनों बैठकें आयोजित करने के बाद बाघों का कत्ल नहीं होगा। बाघों का कत्ल जरूर होगा क्योंकि सुधार की जरूरत नीचे से लेकर ऊपर तक है और इतने शॉर्ट नोटिस पर इसे सुधार पाना लगभग नामुमकिन है।

इसलिए किसी ऐसे विकल्प पर गौर किया जाना चाहिए जिससे वक्त और पैसे दोनों का सदुपयोग किया जा सके। मेरी समझ से जंगलों की हिफाजत का जिम्मा निजी हाथों में सौंपना बेहतर विकल्प हो सकता है। निजी क्षेत्र सरकारी क्षेत्र की अपेक्षा यादा रिजल्ट ओरियंटिड है, इस बात पर शायद ही किसी को शक-शुबहा हो। हम निजी बैंकों का उदाहरण ले सकते हैं, काम जल्दी होने के साथ-साथ वहां के कर्मचारियों में बात करने का जो सलीखा है वो सरकारी बैंकों के मुलाजिमों में नहीं। है। इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि जंगलों की हिफाजत का जो काम वन विभाग नहीं कर पा रहा है उसे निजी सुरक्षा कंपनियां यादा कारगर तरीके से अंजाम दे पाएंगी। सरकार को इसके लिए निविदाओं के माध्यम से संगठन का चुनाव करना चाहिए। विदेशियों के लिए भी इस प्रक्रिया में शामिल होने के रास्ते खुले रखे जाएं तो बेहतर होगा। विदेशों में ऐसे बहुत से संगठन हैं जो इस काम को बखूबी अंजाम दे सकते हैं।

इस मामले को केंद्र और राय सरकारों की दखलंदाजी से पूर्णता मुक्त रखा जाए, जिस कपंनी को ठेका दिया जाए उसे अपने तरीके से काम करने की आजादी भी मिले। सरकार यदि चाहे तो इसे शुरूआत में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर किसी एक टाइगर रिजर्व में शुरू किया जा सकता है। कांट्रेक्ट में कुछ सख्त शर्ते जोड़ी जानी चाहिए जिसके पूरा न होने की दशा में सुरक्षा एजेंसी को आर्थिक नुकसान का सामना तो करना ही पड़े, उसपर काम से बेदखल होने का खतरा भी मंडराता रहे। बेशक इस तरह के प्रस्ताव और उसपर अमल का रास्ता भारत जैसे देश में बहुत मुश्किल है। विपक्ष इसे सरकार की नाकामी बताते हुए देश के लिए शर्मिंदगी करार देगा और अन्य विरोधी पार्टियां हर गली-चौराहे पर सियापा करती नजर आएंगी। लेकिन जब सरकार परमाणु करार, महिला आरक्षण जैसे मुद्दे पर किसी की परवाह किए बगैर आगे बढ़ सकती है तो फिर बाघ सरंक्षण के लिए भी कड़ा फैसला लिया जा सकता है। जरूरत है तो बस सही समझ और दृढ संकल्प की। उन सभी पाठकों से जो मेरे इस विचार पर सहमति जताते हैं, विनम्र निवेदन है कि इस आश्य का एक पोस्टकार्ड प्रधानमंत्री को जरूर लिखें। आप जरूर सोचेंगे कि उससे कुछ नहीं होना, मैं भी ये अच्छी तरह जानता हूं मगर फिर भी पहल तो हम में से किसी एक को करनी ही पड़ेगी अगर हम अपनी आने वाली पीढियों को बाघ तस्वीरों के बजाए हकीकत में दिखाना चाहते हैं तो।