बाबा रामदेव के खिलाफ कार्रवाई को लेकर अब ये सवाल उठने लगे हैं कि क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में लोगों को अपनी बात कहने का भी हक नहीं है। बाबा अपनी मांगों के साथ शांतिपूर्ण तरीके से अनशन कर रहे थे, उनके मंच से न भड़काऊ भाषण दिए गए और न ही सरकार के खिलाफ किसी युध्द का शंखनाद किया गया। फिर भी उनके समर्थकों पर लाठियां बरसाईं गईं, ऐसा बर्ताव किया गया जैसे वो देश के दुश्मन हों। दिल्ली के रामलीला मैदान पर शनिवार की रात जो कुछ भी हुआ, वैसा अक्सर चीन या म्यांमार जैसे मुल्कों में देखने को मिलता है, जहां लोकतंत्र नाम की कोई चीज नहीं। इस कार्रवाई के बाद अब तमाम तर्क दिए जा रहे हैं, पुलिस बाबा की जान को खतरा बताते हुए अपनी बर्बरता को जायज ठहरा रही है और कल तक बाबा के सामने शीर्षासन करने वाले मंत्री ये बताने में लगे हैं कि अनुमति योग शिविर की ली गई थी अनशन की नहीं। इन तर्कों को स्वीकार भी लिया जाए तो भी जो किया गया क्या वो जायज है? सरकार के इस दमनकारी कदम ने उसकी दोहरी मानसिकता को भी उजागर किया है।
कुछ वक्त पहले हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता सैयद अली शाह गिलानी ने दिल्ली में खड़े होकर देश के खिलाफ आग उगली, उनके साथ अरुंधति राय भी मौजूद थी। लेकिन सरकार ने उन पर कोई कार्रवाई नहीं की। अगर बाबा को बगैर अनुमति के अनशन करने पर लाठियां मिल सकती हैं तो गिलानी-अरुंधति पर विषवैमन करने के लिए देशद्रोह का मुकदमा क्यों नहीं चल सकता। जिस कानून का हवाला देकर बाबा के आंदोलन का दमन किया गया, उसी में भड़काऊ भाषणों की सजा का भी उल्लेख है। यदि कानून सबके लिए बराबर है तो ऐसा होते दिखना भी चाहिए। सरकार अब बाबा में खामियां ढू्रढने में लगी है, उनसे आय के स्रोत पूछे जा रहे हैं, आयकर का हिसाब मांगा जा रहा है। ये साबित किया जा रहा है कि बाबा जैसे दिखते हैं, वैसे हैं नहीं। संभव है कि आने वाले दिनों में रामदेव पर कई मामलों में जांच कराई जाए, उन्हें अदालतों के चक्कर लगाने पड़े। लेकिन फिर भी सरकार ये सिद्द नहीं कर पाएगी कि उसने रात के अंधेरे में जो किया सही किया। बाबा की मांगे जायज-नाजायज हो सकती हैं, मगर उनके अनशन पर बैठने को नाजायज कैसे ठहराया जा सकता है। बाबा ने कालेधन के अलावा जो मांगे सरकार के सामने रखीं, उनमें से यादातर शायद आम जनता के भी गले नहीं उतर रही हों पर फिर भी वो ऐसी किसी कार्रवाई का समर्थन हरगिज नहीं करेगी। सबसे पहले तो लोग यही नहीं समझ पा रहे हैं कि सरकार पहले बाबा के कदमों में क्यों बिछ गई, और बिछ गई तो फिर एकाएक ऐसा क्या हुआ की बाबा उसे दुश्मन लगने लगे। सरकार का कहना है कि बाबा रामदेव ने समझौते के तहत अनशन समाप्ति की घोषणा नहीं की, इसलिए उसे कार्रवाई करनी पड़ी। अगर ऐसा था तब भी सरकार को लोगों को भरोसे में लेकर कार्रवाई को अंजाम देना चाहिए था।
सरकार के इस कदम का सीधा सा यही मतलब निकलता है कि वो अपने खिलाफ आवाज उठने वाली हर आवाज को कुचलना जानती है। कुछ ऐसा ही 1976 में संपूर्ण क्रांति के वक्त हुआ था, जब जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से घबराई इंदिरा गांधी सरकार ने आंदोलन कुचलने के लिए बर्बर तरीका अपनाया था। उस वक्त शायद इंदिरा गांधी ने नहीं सोचा होगा कि इसकी कीमत उन्हें सत्ता खोकर चुकानी होगी, लेकिन ऐसा हुआ। आपातकाल की मार ने इंदिरा गांधी को घर बैठने को मजबूर कर दिया। ये बात बिल्कुल सही है कि बाबा के आंदोलन की तुलना जेपी आंदोलन से नहीं की जा सकती, मगर बर्बरता की सजा देना जनता के हाथ में है और वो कब इतिहास दोहरा दे नहीं कहा जा सकता। अनशन से पहले केंद्र सरकार और बाबा के रिश्तों में मधुरता का दौर भी था। बाबा को आश्रम के लिए जमीन उपलब्ध कराने में सरकार की अहम भूमिका रही, लेकिन जब बाबा कालेधन जैसे मुद्दों पर प्रखर हुए तो वो सरकार की आंखों में चुभने लगे। सरकार को अब याद आ रहा है कि स्वामी रामदेव कितनी कंपनियों के मालिक हैं, उनकी अथाह संपत्ति का राज क्या है। उनकी दवाओं पर लगे आरोपों में कितनी सच्चाई आदि.. आदि..। राजनीतिज्ञों को जनता जितनी भोली लगती है, वो उतनी है नहीं। लोगों अच्छे से जानते हैं कि सरकार जो कुछ भी कर रही है वो बदले की भावना से कर रही है। ऐसे में अगर बाबा पर लगे आरोपों में रत्ती भर भी हकीकत सामने आती है तो भी सहानभूति की लहर बाबा के पक्ष में ही होगी। ये बात वास्तव में सोचने वाली है कि आखिर छोटी सी अवधि में रामदेव ने इतना बडा साम्राय कैसे खड़ा कर लिया। मौजूदा वक्त में बाबा 34 कंपनियों के मालिक हैं, वो चाटर्ड प्लेन से नीचे कदम नहीं रखते। अपनी स्वाभिमान यात्रा के बाद मध्यप्रदेश से दिल्ली की यात्रा उन्होंने अपने विशेष विमान से ही की थी। विदेशों में बाबा की संपत्ति है, उनका कारोबार अरबों में हैं। जिस मुकाम पर पहुंचने में लोगों की पूरी जिंदगी निकल जाती है, बाबा वहां तक पलक-झपकते ही पहुंच गए। लेकिन ये सबकुछ जितना चौंकाने वाला लगता है, उससे काफी यादा चौंकाने वाला है सरकार का रवैया।
सीबीआई, आयकर विभाग या प्रवर्तन निदेशालय जैसी एजेंसियां ऐसे मामलों पर बारीकि से नजर रखती हैं तो फिर उन्हें बाबा की शौहरत-दौलत के बढ़ते ग्राफ पर कभी संशय क्यों नहीं हुआ। इसका सीधा सा जवाब है कि सरकार को उस वक्त बाबा खतरे के रूप में नहीं दिखते होंगे। मगर अब अन्ना हजारे द्वारा जलाई गई भ्रष्टाचार की अलख से बाबा भी प्रभावित हो चुके हैं। लिहाजा उनके विरोधी तेवर सत्ता की चूलें हिलाने का आभास दिलाने लगे हैं। इसलिए अब सरकार को वो दुश्मन नजर आते हैं। मुमकिन है थोड़े वक्त के बाद देश को हिलाने वाला ये मुद्दा ठंडा पड़ जाए, ये भी मुमकिन है कानूनी कार्रवाई के भय से बाबा समझौते की राह पर लौट आएं, लेकिन सरकार के इस दोहरे चरित्र का खामियाजा उसे नहीं उठाना पड़ेगा इसे विश्वास के साथ मुमकिन है नहीं कहा जा सकता।
अगर सरकार बाबा की चिट्टी सार्वजनिक करने के बाद चुपचाप बैठकर तमाशा देखती तो बिना कुछ किए ही उसका काम हो जाता। चिट्ठी सामने आने के बाद लोगों को लगने लगा था कि अनशन महज दिखावा है, ये खुद बाबा की छवि के लिए ही नुकसानदायक होता, लेकिन पुलिसिया अत्याचार का हुक्म देकर सरकार ने एक तरह से अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम किया है। और इस बर्बर कृत्य के लिए उसे कभी माफ नहीं किया जा सकता।
Saturday, June 11, 2011
Saturday, May 28, 2011
सरकारी तंत्र की लापरवाही का खामियाजा जनता क्यों भुगते
बीते दिनों मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में अब तक की सबसे बड़ी अतिक्रमण हटाओ मुहिम चलाई गई। इसे सबसे बड़ी इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि ये कार्रवाई रसूखदार लोगों के खिलाफ की गई। सीएम हाउस से इस अभियान की रूपरेखा तैयार की गई और सीएम के शहर से जाते ही उसे अंजाम दे दिया गया। यह पूरी कवायद इतनी गुपचुप रही कि सुबह जब लोगों ने पुलिस फोर्स और बुल्डोजर देखे तो उन्हें माजरा समझ ही नहीं आया, लेकिन सूरज चढ़ते-चढ़ते स्थिति पूरी तरह साफ हो गई। एक रिहाइशी कालोनी में करोड़ों की लागत से बने मॉल को डायनामाइट के सहारे जमींदोज किया गया। दुकानदारों को सामान बटोरने के लिए महज आधे धंटे का वक्त मिला, सालों की मेहनत से तिनका-तिनका जोड़कर उन्होंने जो सपने संजोए थे वो पलक झपकते ही धूल में मिल गए। ये खबर राष्ट्रीय स्तर पर छाई रही, हर खबरीया चैनल ने इसे प्रमुखता से दिखाया। मॉल तोड़ने के अलावा कुछ मकानों को भी अवैध करार दिया गया, हालांकि उन्हें तोड़ने के बजाए प्रशासन ने बीच का रास्ता अपनाया। लेकिन इस बीच के रास्ते से भी लोगों के दिलों की धड़कनें और आशियाना बिखरने का खौफ खत्म नहीं हुआ है। कार्रवाई के पीछे प्रशासन का तर्क है कि मॉल और उसके आसपास का कुछ हिस्सा सरकारी जमीन पर है, इसलिए इसे ध्वस्त करने के अलावा कोई विकल्प नहीं। निश्चित तौर पर प्रशासन का तर्क दस्तावेजों पर आधारित होगा, इतनी बड़ी कार्रवाई बिना पर्याप्त आधार के नहीं हो सकती, लेकिन इन पर्याप्त आधारों का अहसास उसे 10 साल बाद क्यों हुआ ये अपने आप में सोचने वाली बात है।
जिस जगह कार्रवाई की गई, वो कोई नई बसावट नहीं है, सालों से लोग वहां रह रहे हैं। इस कॉलोनी को आईएसओ प्रमाण पत्र भी मिला है, तमाम बैंकों के एटीएम भी मौजूद हैं। मॉल के जिस हिस्से को तोड़ा गया वहां भी कुछ एटीएम लगे थे। इसके अलावा सबसे बड़ी बात जिन लोगों के घरों को अवैध करार दिया गया उनमें से कई ने लोन लेकर इसे खरीदा था। आमतौर पर बैंक लोन देने से पहले गहरी जांच पड़ताल करती हैं, तो फिर उसने ऐसे मकानों के लिए कर्ज कैसे दे दिया जो सरकारी जमीन कब्जा कर बने थे। बैंक की बातों को नजरअंदाज कर भी दिया जाए तो सबसे बड़ा सवाल सरकारी उदासीनता और लापरवाही का है। आखिर कैसे प्रशासन सालों तक अवैध निर्माण होते देखता रहा। थोड़े-मोटे अतिक्रमण का मामला होता तो फिर भी समझा जा सकता था,
लेकिन यह 140 एकड़ भूमि का मामला है। अगर सरकारी दावे सही हैं तो इस मामले में जितना बिल्डर दोषी है उससे कहीं यादा प्रशासन। अमूमन ऐसे मामलों में गलती चाहे किसी की भी हो उसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ता है। जिन लोगों के रोजी-रोटी का साधन मॉल के अवैध हिस्से के साथ जमींदोज हो गया, उनका इसमें क्या कसूर था। कहने को ये बात जरूर कही जा सकती है कि संपत्ति क्रय-विक्रय से पहले पूरी पड़ताल कर लेनी चाहिए, लेकिन जहां बैंक कर्ज देने को तैयार हों वहां शंकी की गुंजाइश ही क्या रह जाती है। हैरानी की बात है कि अदालतें भी ऐसे मामलों में तोड़फोड़ की कार्रवाई पर यकीन रखती हैं। जबकि तोड़फोड़ से सबसे यादा नुकसान उसी आम आदमी का होना है जो इस पूरे मामले से अंजान था। अदालतों को सबसे पहले संबंधित सरकारी तंत्र से सवाल करना चाहिए कि इतने सालों तक वो क्यों सोता रहा। तोड़फोड़ की कार्रवाई तो काफी हद तक वैसी है जैसे पहले खून होते देखा जाए और जब खून हो जाए तो आरोपी को जाकर पकड़ लिया जाए। वैस ये व्यथा अकेले भोपाल की नहीं है, देशभर में ऐसा ही होता है। आदर्श का उदाहरण हमारे सामने है। दोनों ही मामलों में पहले आंखें मूंद ली गईं और जब विवाद बढ़ा तो कार्रवाई की याद आई। आदर्श को ढहाने तक का फरमान सुनाया गया है,
इस फरामन का आधार कई कारणों को बनाया गया, मसलन, आदर्श सोसाइटी ने महाराष्ट्र सरकार से सीजारजेड अधिसूचना के तहत जरूरी मंजूरी हासिल नहीं की। इमारत के लिए मूल रूप से छह मंजिलों का निर्माण होना था, लेकिन बगैर मंजूरी 31 मंजिलें बना दी गईं। अगर सरकार कह रही है तो हो सकता है इस इमारत को खड़ा करने में कानून को ताक पर रखा गया हो, लेकिन बात फिर वही आ जाती है कि आखिर पर्यावरण मंत्रालय की नींद इतनी देर बाद क्यों खुली। मुंबई कोई गांव तो है नहीं कि इतनी बड़ी इमारत के बनने की खबर शहर से बाहर तक नहीं निकल पाई। 31 मंजिलों का पर्यावरण क्लीयरेंस के बगैर खड़ा होना पर्यावरण मंत्रालय की भूमिका पर भी सवालात खड़े करता है। पर्यावरण मंत्रालय के साथ-साथ रक्षा मंत्रालय की भूमिका भी शक के घेरे में होनी चाहिए। इमारत के तैयार होने के बाद अब उसे अहसास हो रहा है कि यह महत्वपूर्ण रक्षा ठिकाने की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है। इस अवैध इमारत के निर्माण में उन लोगों को सजा क्यों दी जाए जिन्होंने वैध तरीके से अपना आशियाना बनाने का ख्वाब पाला। यदि इमारत ढहाई जाती है तो क्या यह ऐसे लोगों के साथ नाइंसाफी नहीं कहलाएगी। यह वेदांता मामले का उल्लेख करना भी जरूरी है, हालांकि वो तोड़फोड़ से संबंधित नहीं है लेकिन देर से जागने की आदत को बखूबी बयां करता है। वेदांता मामले में भी तब कदम उठाया गया जब काम काफी आगे बढ़ गया था। पूर्व में वेदांता को नियामगिरी से बॉक्साइट निकालने की इजाजत देने के बाद अचानक पर्यावरण मंत्रालय को पर्यावरण को नुकसान का आभास हुआ। 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने भी परियोजना की गहरी छानबीन के बाद वेदांता को आगे बढ़ने की अनुमति दी थी। इसके बाद कंपनी ने अरबों रुपए का निवेश कर डाला। वेदांता की भारतीय सहायक वेदांता एल्युमीनियम लिमिटेड ने तो लांजीगंज में करीब एक अरब डॉलर की पूंजी लगाकर एक बड़ा एल्युमीनियम शोधन संयंत्र तक खड़ा कर डाला, यह स्थान नियामगिरी की तराई में करीब छह वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में स्थित है। यदि वेदांता का प्रोजेक्ट पर्यावरण के लिए वास्तव में घातक था तो शुरूआत में ही उसपर रोक क्यों नहीं लगा दी गई। ऐसा तो हो नहीं सकता कि वेदांता ने क्लीयरेंस मिलने के बाद प्रोजेक्ट में ऐसे बड़े बदलाव कर दिए जिससे पर्यावरण को सौ गुना खतरा बढ़ गया। ऐसे मामले जहां सरकारी तंत्र के नाकारेपन का खामियाजा दूसराें को उठाना पड़ता हैं, वहां अदालतों को यादा सक्रीय होने की जरूरत है। खासकर सालों पुरानी बसावटों पर बुल्डोजर चलाने जैसी कार्रवाई की इजाजत तो मिलनी ही नही चाहिए। अगर अदालत एक-दो मामलों में ऐसी नजीर पेश कर दे तो शायद कुंभकरणी नींद में सोने वाले सरकारी तंत्र को अपनी जिम्मेदारी का अहसास हो सके।
जिस जगह कार्रवाई की गई, वो कोई नई बसावट नहीं है, सालों से लोग वहां रह रहे हैं। इस कॉलोनी को आईएसओ प्रमाण पत्र भी मिला है, तमाम बैंकों के एटीएम भी मौजूद हैं। मॉल के जिस हिस्से को तोड़ा गया वहां भी कुछ एटीएम लगे थे। इसके अलावा सबसे बड़ी बात जिन लोगों के घरों को अवैध करार दिया गया उनमें से कई ने लोन लेकर इसे खरीदा था। आमतौर पर बैंक लोन देने से पहले गहरी जांच पड़ताल करती हैं, तो फिर उसने ऐसे मकानों के लिए कर्ज कैसे दे दिया जो सरकारी जमीन कब्जा कर बने थे। बैंक की बातों को नजरअंदाज कर भी दिया जाए तो सबसे बड़ा सवाल सरकारी उदासीनता और लापरवाही का है। आखिर कैसे प्रशासन सालों तक अवैध निर्माण होते देखता रहा। थोड़े-मोटे अतिक्रमण का मामला होता तो फिर भी समझा जा सकता था,
लेकिन यह 140 एकड़ भूमि का मामला है। अगर सरकारी दावे सही हैं तो इस मामले में जितना बिल्डर दोषी है उससे कहीं यादा प्रशासन। अमूमन ऐसे मामलों में गलती चाहे किसी की भी हो उसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ता है। जिन लोगों के रोजी-रोटी का साधन मॉल के अवैध हिस्से के साथ जमींदोज हो गया, उनका इसमें क्या कसूर था। कहने को ये बात जरूर कही जा सकती है कि संपत्ति क्रय-विक्रय से पहले पूरी पड़ताल कर लेनी चाहिए, लेकिन जहां बैंक कर्ज देने को तैयार हों वहां शंकी की गुंजाइश ही क्या रह जाती है। हैरानी की बात है कि अदालतें भी ऐसे मामलों में तोड़फोड़ की कार्रवाई पर यकीन रखती हैं। जबकि तोड़फोड़ से सबसे यादा नुकसान उसी आम आदमी का होना है जो इस पूरे मामले से अंजान था। अदालतों को सबसे पहले संबंधित सरकारी तंत्र से सवाल करना चाहिए कि इतने सालों तक वो क्यों सोता रहा। तोड़फोड़ की कार्रवाई तो काफी हद तक वैसी है जैसे पहले खून होते देखा जाए और जब खून हो जाए तो आरोपी को जाकर पकड़ लिया जाए। वैस ये व्यथा अकेले भोपाल की नहीं है, देशभर में ऐसा ही होता है। आदर्श का उदाहरण हमारे सामने है। दोनों ही मामलों में पहले आंखें मूंद ली गईं और जब विवाद बढ़ा तो कार्रवाई की याद आई। आदर्श को ढहाने तक का फरमान सुनाया गया है,
इस फरामन का आधार कई कारणों को बनाया गया, मसलन, आदर्श सोसाइटी ने महाराष्ट्र सरकार से सीजारजेड अधिसूचना के तहत जरूरी मंजूरी हासिल नहीं की। इमारत के लिए मूल रूप से छह मंजिलों का निर्माण होना था, लेकिन बगैर मंजूरी 31 मंजिलें बना दी गईं। अगर सरकार कह रही है तो हो सकता है इस इमारत को खड़ा करने में कानून को ताक पर रखा गया हो, लेकिन बात फिर वही आ जाती है कि आखिर पर्यावरण मंत्रालय की नींद इतनी देर बाद क्यों खुली। मुंबई कोई गांव तो है नहीं कि इतनी बड़ी इमारत के बनने की खबर शहर से बाहर तक नहीं निकल पाई। 31 मंजिलों का पर्यावरण क्लीयरेंस के बगैर खड़ा होना पर्यावरण मंत्रालय की भूमिका पर भी सवालात खड़े करता है। पर्यावरण मंत्रालय के साथ-साथ रक्षा मंत्रालय की भूमिका भी शक के घेरे में होनी चाहिए। इमारत के तैयार होने के बाद अब उसे अहसास हो रहा है कि यह महत्वपूर्ण रक्षा ठिकाने की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है। इस अवैध इमारत के निर्माण में उन लोगों को सजा क्यों दी जाए जिन्होंने वैध तरीके से अपना आशियाना बनाने का ख्वाब पाला। यदि इमारत ढहाई जाती है तो क्या यह ऐसे लोगों के साथ नाइंसाफी नहीं कहलाएगी। यह वेदांता मामले का उल्लेख करना भी जरूरी है, हालांकि वो तोड़फोड़ से संबंधित नहीं है लेकिन देर से जागने की आदत को बखूबी बयां करता है। वेदांता मामले में भी तब कदम उठाया गया जब काम काफी आगे बढ़ गया था। पूर्व में वेदांता को नियामगिरी से बॉक्साइट निकालने की इजाजत देने के बाद अचानक पर्यावरण मंत्रालय को पर्यावरण को नुकसान का आभास हुआ। 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने भी परियोजना की गहरी छानबीन के बाद वेदांता को आगे बढ़ने की अनुमति दी थी। इसके बाद कंपनी ने अरबों रुपए का निवेश कर डाला। वेदांता की भारतीय सहायक वेदांता एल्युमीनियम लिमिटेड ने तो लांजीगंज में करीब एक अरब डॉलर की पूंजी लगाकर एक बड़ा एल्युमीनियम शोधन संयंत्र तक खड़ा कर डाला, यह स्थान नियामगिरी की तराई में करीब छह वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में स्थित है। यदि वेदांता का प्रोजेक्ट पर्यावरण के लिए वास्तव में घातक था तो शुरूआत में ही उसपर रोक क्यों नहीं लगा दी गई। ऐसा तो हो नहीं सकता कि वेदांता ने क्लीयरेंस मिलने के बाद प्रोजेक्ट में ऐसे बड़े बदलाव कर दिए जिससे पर्यावरण को सौ गुना खतरा बढ़ गया। ऐसे मामले जहां सरकारी तंत्र के नाकारेपन का खामियाजा दूसराें को उठाना पड़ता हैं, वहां अदालतों को यादा सक्रीय होने की जरूरत है। खासकर सालों पुरानी बसावटों पर बुल्डोजर चलाने जैसी कार्रवाई की इजाजत तो मिलनी ही नही चाहिए। अगर अदालत एक-दो मामलों में ऐसी नजीर पेश कर दे तो शायद कुंभकरणी नींद में सोने वाले सरकारी तंत्र को अपनी जिम्मेदारी का अहसास हो सके।
Friday, May 20, 2011
सच, कमजोर ही है जनता की याददाश्त
नीरज नैयर
राजनीतिज्ञ अगर ये सोचते हैं कि जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है तो इसमें कुछ गलत नहीं है। कुछ एक ही ऐसे मौके आए होंगे जब जनता ने इस सोच को गलत साबित किया हो, वरना अक्सर वो अपनी कमजोर याददाश्त का परिचय देती रहती है। हालिया संपन्न हुए पांच रायों के विधानसभा में भी उसने वही किया। कुछ दिन पहले तक बढ़ती महंगाई को लेकर यूपीए सरकार को कोसने वाली जनता उसे ही दिल खोलकर वोट दे आई। जबकि माना जा रहा था कि जिस तरह से थोड़े से वक्त में महंगाई ने आसमान छुआ उससे कांग्रेस के वोट प्रतिशत का ग्राफ जरूर नीचे आएगा। वोट देते वक्त जनता ये भी भूल गई कि इसी सरकार के मंत्री उसकी भावनाओं से खिलवाड़ करते रहे, अपनी जिम्मेदारियों से मुंह चुराते रहे और महंगाई के लिए उसी को दोषी ठहराते रहे। क्या शरद पवार और क्या मनमोहन सिंह सबने महंगाई पर जनता के दर्द का उपहास उड़ाया। ऐसा हरगिज नहीं है कि महंगाई ने किसी दूसरी पार्टी के कार्यकाल में सिर नहीं उठाया, जरूर उठाया लेकिन यहां उसके सिर को कुचलने के नाम पर जनता को बार-बार छला गया।
कभी सरकार मानूसन का रोना रोते रही तो कभी कम उत्पादन का बहाना बनाया, जबकि सैकड़ों टन अन्न खुले में यूं ही सड़ता रहा। जनता की कमजोर याददश्त ही सरकार को बेरहम और अपने फायदे के हिसाब से नीतियां मोड़ने पर उत्साहित करती है। इधर जनता ने सबकुछ भुलाकर उसे चार रायों में जीत का तोहफा दिया तो उधर इसके बदले में सरकार ने पेट्रोल के दामों में आग लगा दी। चुनावी नतीजों के महज 24 घंटों के भीतर सरकार ने जनता को ये रिटर्न गिफ्ट दिया। दाम तो जनवरी में ही बढ़ने वाले थे, लेकिन संभावित खतरे की आशंका के चलते सरकार ने उस लगाम लगाए रखी। और जैसे ही खतरे का संकट टला जनता को उसकी कमजोर याददाश्त का ईनाम मिल गया। अगर इन चुनावों में कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ता तो निश्चित तौर पर ये मूल्यवृध्दि नहीं होती। सरकार ने बड़ी चतुराई से माहौल को भांपा और जनविरोधी चाल चल दी। कहने वाले यहां कह सकते हैं कि जनता के पास विकल्प नहीं था, वो मजबूर थी। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है, उसके पास विकल्प था मगर वो अपनी बीमारी से उबर नहीं पाई। भाजपा को अगर बहुत अच्छा विकल्प नहीं माना जा सकता तो वो कोई इतना बुरा विकल्प भी नहीं है कि जिसे मौका दिया ही न जाए। जब कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार एक के बाद एक जनविरोधी फैसले ले रही है तो फिर सत्ता में रखना कहां तक जायज है।
यदि एक राजा अपनी प्रजा के साथ निरंकुशता पर उतर आए तो फिर उसके रहने न रहने से क्या फर्क पड़ता है। जितने बुरे हालात अभी हैं इससे बुरे और क्या हो सकते हैं, सरकार अपनी विलासता में कमी नहीं करना चाहती वो सारा का सारा बोझ जनता से उठवाने वाले अड़िग है। इन पांच रायों के बाद अगला चुनाव अब सीधे अगले साल है। 2012 में उत्तर प्रदेश में चुनाव होने हैं, इस बीच के वक्त में सरकार दिल खोलकर आर्थिक सुधाराें के नाम पर जनता का बैंड बजाएगी। इस बार पेट्रोल के दाम सीधे पांच रुपए बढाए गए, अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि एक बार में इतनी बड़ी वृध्दि की गई हो। यूं तो पेट्रोल के दाम निधार्रित करने का जिम्मा तेल कंपनियों के पास है, सरकार ने पिछले साल ही पेट्रोल को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया था। लेकिन सरकारी तेल कंपनियां सरकार की अनुमति के बगैर एक कदम भी नहीं उठा सकतीं। यदि ऐसा न होता तो जनवरी में ही कंपनियों ने दाम बढ़ा दिए होते। दाम बढ़ाने के हर दो-तीन हफ्ते बाद कंपनियों के घाटे का रोना शुरू हो जाता है, अभी भी कहा जा रहा है कि कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल के चलते तेल कंपनियों को तकरीन साढ़े पांच रुपए का नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसका सीधा सा मतलब है कि जल्द ही जनता पर कमर पर एक और प्रहार किया जा सकता है। मौजूदा दौर में महंगाई की मार ने आम आदमी का जीना पहले से ही मुहाल किया हुआ है, ऐसे में ये बढ़ोतरी उसके लिए दोहरी मार की तरह है। जिस देश में लोगों की तनख्वाह सालों तक नहीं बढ़ती, वहां हर छोटे अंतराल में तेल के दाम बढ़ाना क्या जायज है? सरकार का जनता के प्रति भी कुछ दायित्व बनता है, मनमोहन सिंह ने कुछ वक्त पहले कहा था कि वो भार मुक्त होना चाहते हैं। उनका इशारा सब्सिडी के रूप में जनता को मिलने वाली राहत की ओर था। उनका कहना था कि सब्सिडी से बचने वाले धन का उपयोग शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए किया जाएगा। मगर उन्होंने ये नहीं सोचा कि जिन पेटों के दाना नहीं जाएगा क्या वो शिक्षा पर ध्यान केंद्रित कर पाएंगे?
देश के विकास की असल पहचान आर्थिक मुद्दों पर आत्मनिर्भरता से यादा वहां रहने वाले लोगों के चेहरे की मुस्कान से होती है। सरकार ने महंगाई बढ़ाने के तमाम रास्ते खोले लेकिन उसे कम करने के बारे में एक बार भी नहीं सोचा। पेट्रोल के दाम नियंत्रण मुक्त करते समय कहा गया था कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के रुख के आधार पर देश में तेल की कीमतों में बदलाव होगा। यानी अगर कच्चा तेल ऊपर जाता है तो पेट्रोल महंगा होगा और यदि कच्चे तेल में नरमी का रुख हुआ तो सस्ते पेट्रोल के रूप में जनता इसका लाभ उठा सकेगी। आज भले ही लीबिया संकट के चलते कच्चे तेल के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊंचाई पर हैं, मगर कुछ वक्त पहले जब ये ढलान पर थे तब भी इसका फायदा जनता को नहीं दिया गया। जबकि वो उसका वाजिब हक था। अगर तेल कंपनिया कच्चे तेल में तेजी का हवाला देकर दाम बढ़ाना जानती हैं तो उन्हें इसके उलट करने का आदी भी बनाया जाना चाहिए था। लेकिन सरकार ऐसा कुछ भी करने की जरूरत नहीं समझी। इसका सीधा सा मतलब है कि उसे जनता से कोई सरोकार नहीं, सरोकार का भाव मन में तभी जागता है जब चुनाव की दस्तक सुनाई देती है। दुनिया का हर देश समय के हिसाब से मूल्यवृध्दि करता है, मगर वहां जनता के हितों को ध्यान रखने वाली नीतियां भी बनाई जाती हैं। पिछले साल चीन में भी क्रूड आयॅल की कीमतों में तेजी के चलते तेल के दाम बढ़ाए गए, पर जैसे ही कच्चा तेल नीचे आया सरकार ने रोल बैक करने में जरा भी देर नहीं लगाई।
वहां की सरकार यदि जनता पर बोझ बढ़ाना जानती है तो उसे कम करना भी उसकी प्राथमिकता में शुमार है। सरकार तेल कंपनियाें के कथित घाटे की भरपाई का थोड़ा बोझ खुद वहन लेती तो उसका खजाना खत्म नहीं हो जाता। एक लीटर पेट्रोल पर 14.35 रुपए एक्साइट डयूटी, 2.65 रुपए कस्टम, 7.05 रुपए वैट, 1 रुपए एजुकेशन सेस और करीब 3.08 रुपए अन्य कर लगाती है, इस तरह एक लीटर पेट्रोल पर तकरीबन 28.13 रुपए टैक्स के होते हैं। क्या करों का फंदा ढीला करके आम जनता को राहत पहुंचाने के बारे में नहीं सोचा जा सकता था? होने को तो बहुत कुछ हो सकता था, लेकिन सरकार कुछ करना ही नहीं चाहती। मगर इसमें गलती सरकार की नहीं, जनता की है जो अपने ऊपर जुल्म करने वालों को बार-बार ऐसा करने की ताकत देती है। मौजूदा मूल्यवृध्दि पर जितना गुस्सा और आक्रोश है वो थोड़े वक्त बाद काफुर हो जाएगा। कुछ देर बाद जनता बढ़ी कीमतों में खुद को ढाल लेगी और सरकार को एक बार फिर मार करने का अवसर मिल जाएगा। अब बस दुआ ही की जा सकती है कि जनता की याददाश्ता इस बार दुरुस्त रहे, अगर ऐसा हुआ तो जनता के साथ छल करने वालों को उनकी असल जगह पहुंचने में देर नहीं लगेगी। अन्यथा जैसा चल रहा है, वैसा ही चलता रहेगा।
राजनीतिज्ञ अगर ये सोचते हैं कि जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है तो इसमें कुछ गलत नहीं है। कुछ एक ही ऐसे मौके आए होंगे जब जनता ने इस सोच को गलत साबित किया हो, वरना अक्सर वो अपनी कमजोर याददाश्त का परिचय देती रहती है। हालिया संपन्न हुए पांच रायों के विधानसभा में भी उसने वही किया। कुछ दिन पहले तक बढ़ती महंगाई को लेकर यूपीए सरकार को कोसने वाली जनता उसे ही दिल खोलकर वोट दे आई। जबकि माना जा रहा था कि जिस तरह से थोड़े से वक्त में महंगाई ने आसमान छुआ उससे कांग्रेस के वोट प्रतिशत का ग्राफ जरूर नीचे आएगा। वोट देते वक्त जनता ये भी भूल गई कि इसी सरकार के मंत्री उसकी भावनाओं से खिलवाड़ करते रहे, अपनी जिम्मेदारियों से मुंह चुराते रहे और महंगाई के लिए उसी को दोषी ठहराते रहे। क्या शरद पवार और क्या मनमोहन सिंह सबने महंगाई पर जनता के दर्द का उपहास उड़ाया। ऐसा हरगिज नहीं है कि महंगाई ने किसी दूसरी पार्टी के कार्यकाल में सिर नहीं उठाया, जरूर उठाया लेकिन यहां उसके सिर को कुचलने के नाम पर जनता को बार-बार छला गया।
कभी सरकार मानूसन का रोना रोते रही तो कभी कम उत्पादन का बहाना बनाया, जबकि सैकड़ों टन अन्न खुले में यूं ही सड़ता रहा। जनता की कमजोर याददश्त ही सरकार को बेरहम और अपने फायदे के हिसाब से नीतियां मोड़ने पर उत्साहित करती है। इधर जनता ने सबकुछ भुलाकर उसे चार रायों में जीत का तोहफा दिया तो उधर इसके बदले में सरकार ने पेट्रोल के दामों में आग लगा दी। चुनावी नतीजों के महज 24 घंटों के भीतर सरकार ने जनता को ये रिटर्न गिफ्ट दिया। दाम तो जनवरी में ही बढ़ने वाले थे, लेकिन संभावित खतरे की आशंका के चलते सरकार ने उस लगाम लगाए रखी। और जैसे ही खतरे का संकट टला जनता को उसकी कमजोर याददाश्त का ईनाम मिल गया। अगर इन चुनावों में कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ता तो निश्चित तौर पर ये मूल्यवृध्दि नहीं होती। सरकार ने बड़ी चतुराई से माहौल को भांपा और जनविरोधी चाल चल दी। कहने वाले यहां कह सकते हैं कि जनता के पास विकल्प नहीं था, वो मजबूर थी। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है, उसके पास विकल्प था मगर वो अपनी बीमारी से उबर नहीं पाई। भाजपा को अगर बहुत अच्छा विकल्प नहीं माना जा सकता तो वो कोई इतना बुरा विकल्प भी नहीं है कि जिसे मौका दिया ही न जाए। जब कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार एक के बाद एक जनविरोधी फैसले ले रही है तो फिर सत्ता में रखना कहां तक जायज है।
यदि एक राजा अपनी प्रजा के साथ निरंकुशता पर उतर आए तो फिर उसके रहने न रहने से क्या फर्क पड़ता है। जितने बुरे हालात अभी हैं इससे बुरे और क्या हो सकते हैं, सरकार अपनी विलासता में कमी नहीं करना चाहती वो सारा का सारा बोझ जनता से उठवाने वाले अड़िग है। इन पांच रायों के बाद अगला चुनाव अब सीधे अगले साल है। 2012 में उत्तर प्रदेश में चुनाव होने हैं, इस बीच के वक्त में सरकार दिल खोलकर आर्थिक सुधाराें के नाम पर जनता का बैंड बजाएगी। इस बार पेट्रोल के दाम सीधे पांच रुपए बढाए गए, अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि एक बार में इतनी बड़ी वृध्दि की गई हो। यूं तो पेट्रोल के दाम निधार्रित करने का जिम्मा तेल कंपनियों के पास है, सरकार ने पिछले साल ही पेट्रोल को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया था। लेकिन सरकारी तेल कंपनियां सरकार की अनुमति के बगैर एक कदम भी नहीं उठा सकतीं। यदि ऐसा न होता तो जनवरी में ही कंपनियों ने दाम बढ़ा दिए होते। दाम बढ़ाने के हर दो-तीन हफ्ते बाद कंपनियों के घाटे का रोना शुरू हो जाता है, अभी भी कहा जा रहा है कि कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल के चलते तेल कंपनियों को तकरीन साढ़े पांच रुपए का नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसका सीधा सा मतलब है कि जल्द ही जनता पर कमर पर एक और प्रहार किया जा सकता है। मौजूदा दौर में महंगाई की मार ने आम आदमी का जीना पहले से ही मुहाल किया हुआ है, ऐसे में ये बढ़ोतरी उसके लिए दोहरी मार की तरह है। जिस देश में लोगों की तनख्वाह सालों तक नहीं बढ़ती, वहां हर छोटे अंतराल में तेल के दाम बढ़ाना क्या जायज है? सरकार का जनता के प्रति भी कुछ दायित्व बनता है, मनमोहन सिंह ने कुछ वक्त पहले कहा था कि वो भार मुक्त होना चाहते हैं। उनका इशारा सब्सिडी के रूप में जनता को मिलने वाली राहत की ओर था। उनका कहना था कि सब्सिडी से बचने वाले धन का उपयोग शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए किया जाएगा। मगर उन्होंने ये नहीं सोचा कि जिन पेटों के दाना नहीं जाएगा क्या वो शिक्षा पर ध्यान केंद्रित कर पाएंगे?
देश के विकास की असल पहचान आर्थिक मुद्दों पर आत्मनिर्भरता से यादा वहां रहने वाले लोगों के चेहरे की मुस्कान से होती है। सरकार ने महंगाई बढ़ाने के तमाम रास्ते खोले लेकिन उसे कम करने के बारे में एक बार भी नहीं सोचा। पेट्रोल के दाम नियंत्रण मुक्त करते समय कहा गया था कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के रुख के आधार पर देश में तेल की कीमतों में बदलाव होगा। यानी अगर कच्चा तेल ऊपर जाता है तो पेट्रोल महंगा होगा और यदि कच्चे तेल में नरमी का रुख हुआ तो सस्ते पेट्रोल के रूप में जनता इसका लाभ उठा सकेगी। आज भले ही लीबिया संकट के चलते कच्चे तेल के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊंचाई पर हैं, मगर कुछ वक्त पहले जब ये ढलान पर थे तब भी इसका फायदा जनता को नहीं दिया गया। जबकि वो उसका वाजिब हक था। अगर तेल कंपनिया कच्चे तेल में तेजी का हवाला देकर दाम बढ़ाना जानती हैं तो उन्हें इसके उलट करने का आदी भी बनाया जाना चाहिए था। लेकिन सरकार ऐसा कुछ भी करने की जरूरत नहीं समझी। इसका सीधा सा मतलब है कि उसे जनता से कोई सरोकार नहीं, सरोकार का भाव मन में तभी जागता है जब चुनाव की दस्तक सुनाई देती है। दुनिया का हर देश समय के हिसाब से मूल्यवृध्दि करता है, मगर वहां जनता के हितों को ध्यान रखने वाली नीतियां भी बनाई जाती हैं। पिछले साल चीन में भी क्रूड आयॅल की कीमतों में तेजी के चलते तेल के दाम बढ़ाए गए, पर जैसे ही कच्चा तेल नीचे आया सरकार ने रोल बैक करने में जरा भी देर नहीं लगाई।
वहां की सरकार यदि जनता पर बोझ बढ़ाना जानती है तो उसे कम करना भी उसकी प्राथमिकता में शुमार है। सरकार तेल कंपनियाें के कथित घाटे की भरपाई का थोड़ा बोझ खुद वहन लेती तो उसका खजाना खत्म नहीं हो जाता। एक लीटर पेट्रोल पर 14.35 रुपए एक्साइट डयूटी, 2.65 रुपए कस्टम, 7.05 रुपए वैट, 1 रुपए एजुकेशन सेस और करीब 3.08 रुपए अन्य कर लगाती है, इस तरह एक लीटर पेट्रोल पर तकरीबन 28.13 रुपए टैक्स के होते हैं। क्या करों का फंदा ढीला करके आम जनता को राहत पहुंचाने के बारे में नहीं सोचा जा सकता था? होने को तो बहुत कुछ हो सकता था, लेकिन सरकार कुछ करना ही नहीं चाहती। मगर इसमें गलती सरकार की नहीं, जनता की है जो अपने ऊपर जुल्म करने वालों को बार-बार ऐसा करने की ताकत देती है। मौजूदा मूल्यवृध्दि पर जितना गुस्सा और आक्रोश है वो थोड़े वक्त बाद काफुर हो जाएगा। कुछ देर बाद जनता बढ़ी कीमतों में खुद को ढाल लेगी और सरकार को एक बार फिर मार करने का अवसर मिल जाएगा। अब बस दुआ ही की जा सकती है कि जनता की याददाश्ता इस बार दुरुस्त रहे, अगर ऐसा हुआ तो जनता के साथ छल करने वालों को उनकी असल जगह पहुंचने में देर नहीं लगेगी। अन्यथा जैसा चल रहा है, वैसा ही चलता रहेगा।
Friday, April 8, 2011
बाघ गणना महज अंकों का खेल
नीरज नैयर
बाघों को लेकर काफी दिनों बाद एक अच्छी खबर सुनने को मिली। ताजा गणना के मुताबिक देश में बाघों का कुनबा बढ़ा है। ऐसे वक्त में जब शिकारियों के हौसले बुलंद है, ये खबर बाघ सरंक्षण से जुड़े लोगों और वन्यप्रेमियों के लिए किसी सौगात से कम नहीं। इस खबर ने बाघ बचाने को लेकर अपनाए जा रहे तौर-तरीकों पर उठ रहे सवालों को भी काफी हद तक गलत करार दिया है। हालांकि टाइगर स्टेट के नाम से मशहूर मध्यप्रदेश के लिए यह गणना निराशाजनक साबित हुई है। यहां होशंगाबाद, बैतूल, नर्मदा नदी के उत्तरी घाट और कान्हा किसली में बाघ घटे हैं। वैसे ये तब ही साफ हो गया था जब पन्ना के बाघ विहीन होने की खबर सामने आई थी। विशेषज्ञ इस बात का अंदेशा पहले ही जत चुके थे, लेकिन राय सरकार गौर करने के बजाए इसे लगातार झुठलाती रही और बाद में जब हकीकत सामने आई तो उसने होंठ सिल लिए। बाघों की ताजा गणना में पारंपरिक तरीकों के बजाए आधुनिक तकनीक को अपनाया गया। इसे विश्व की सबसे आधुनिक बाघ गणना भी कहा जा रहा है। इसके तहत अहम स्थानों पर कैमरे लगाए गए, रेडियो कॉलर, पैरों के निशान, डीएनए और मैपिंग प्रणाली का इस्तेमाल किया गया। गणना के लिए 45 हजार वर्ग किमी वन क्षेत्र में चार लाख 70 हजार अधिकारियों को करीब 6,25,000 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा।
पिछली गणना में बाघों की संख्या 1411 थी, जो इस बार बढ़कर 1700 तक पहुंच गई है। लेकिन ये आंकड़े खुशी के साथ-साथ थोड़े चौंकाने वाले भी हैं। ये बात हजम करना मुश्किल है कि बाघ सरंक्षण को लेकर जो काम कई सालों तक नहीं हुआ, उनमें महज चार साल में इतना सुधार आ गया कि बाघों की संख्या 289 बढ़ गई। 2006 से लेकर 2010 तक जिन चार सालों में बाघ बढ़ने की बातें कही गई हैं, उन चार सालों में ही उनका अंधाधुन शिकार हुआ। वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया के मुताबिक 2006 में 37, 2007 में 27, 2008 में 29, 2009 में 32 और 2010 में 30 बाघ मारे गए। इसमें उन मौतों को शामिल नहीं किया है जिनके शिकार के संबंध में पुख्ता सुबूत नहीं मिल सके। इसके अलावा एक और बात जो बाघों की ताजा संख्या पर संदेह पैदा करती है वो ये कि पिछली गणना में 16 टाइगर स्टेट को शामिल किया गया, जबकि इसबार 19 रायों में गणना को अंजाम दिया गया है। 2006 की गणना में पश्चिम बंगाल के सुंदरवन और झारखंड में गिनती नहीं हुई थी, पर 2010 में सुंदरवन में 70 बाघ होने की बात कही गई है। इस लिहाज से देखा जाए तो ताजा गणना महज आंकड़ों का उलटफेर यादा नजर आती है। एक बारगी मान भी लिया जाए कि बाघ बढ़े हैं तो भी आंकड़ा इतना बडा कतई नहीं होगा जितना दर्शाया जा रहा है। 1700 में से यदि सुंरदवन के 70 बाघ ही घटा दिए जाएं तो संख्या 1630 रह जाती है और अगर मारे गए बाघों को भी इसमें जोड़ दिया जाए तो यह आंकड़ा 1400 के आसपास रह जाएगा। वैसे भी मौजूदा वक्त में जिस तरह से आए दिन शिकार की खबरें आ रही हैं, उनमें ये सहज ही स्वीकार करना मुश्किल है कि इस खूबरसूरत प्राणी की संख्या में इजाफा हुआ होगा। खैर आंकड़ों का सच-झूठ अलग बात है, सबसे अहम है बाघों की सुरक्षा और इस दिशा में अब तक जो कदम उठाए गए हैं उससे शायद संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता। बाघ संरक्षण के प्रति सरकार की गंभीरता का पता इस बात से लगाया जा सकता है कि आज भी फॉरेस्ट गार्ड के हजारों पद खाली पड़े हैं। सच तो यह है कि वन एंव पर्यावरण मंत्रालय इस चुनौती से निपटने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं।
कर्मचारियों को न तो पर्याप्त ट्रेनिंग दी जाती है और न ही पर्याप्त सुविधाएं। हालात ये हो चले हैं कि अधिकतर अधिकारी महज अपनी नौकरी बचाने के लिए काम कर रहे हैं। उनमें न तो वन्यजीवों के प्रति कोई संवेदना है और न ही काम के प्रति कोई लगाव। यही कारण है कि रोक के बावजूद बाघों का शिकार बदस्तूर जारी है। संगठित आपराधिक गिरोह वन्यजीवों की खालों की तस्करी में लगे हुए हैं। इसके लिए वह जंगलों में रहने वाले चरवाहों और कहीं-कहीं वन विभाग के लोगों से मदद लेते हैं, क्योंकि इन्हें जानवरों के बारे में काफी जानकारी होती है। बाघों को जाल बिछाकर फंसाया जाता है, सिर्फ आधे घंटे में ही खाल निकालकर अपराधी फरार हो जाते हैं। 1994 से लेकर 2010 के बीच तकरीबन 1000 बाघों का शिकार किया जा चुका है। 2005 में राजस्थान के सरिस्का के बाघ विहीन होने के बाद बाघों के सरंक्षण को लेकर बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाई गईं, रणनीति तैयार की गईं मगर हालात सुधरने के बजाए बद से बदतर होते चले गए। 2005 से 2010 के मध्य ही 201 बाघों को शिकारियों ने अपना निशाना बनाया। वैसे बाघों की घटती संख्या के लिए राय सरकारें भी कम कसूरवार नहीं हैं, कुछ साल पहले रायों से बाघों की सुरक्षा के लिए निगरानी समिति बनाने का कहा गया था मगर अब तक अधिकतर रायों ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है। 2006 में संशोधित वन्यजीव सुरक्षा कानून 1972 के तहत निगरानी समिति का गठन जरूरी है, रायों को इस बाबत कई बार स्मरण पत्र भी भेजे जा चुके हैं मगर कोई भी अपनी जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं। बाघ सरंक्षण के लिए आज से करीब चार दशक पहले प्रोजेक्ट टाइगर शुरू किया गया था, उस दौर में बाघ सरंक्षण के इसे लिए दुनिया भर में सबसे महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट माना गया।
इसके तहत कई सराहनीय काम भी किए गए, शायद इसी वजह से जंगली बाघ आज भी हमारे जंगलों में मौजूद हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश पिछले कुछ दशकों में तेजी से बदलते परिदृश्य ने इस महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट महज नाम तक ही सीमित करके रख दिया है। वन्यप्रणियों के खिलाफ बढ़ते अपराध और शिकारियों के बुलंद हौसलों को पस्त करने के लिए कुछ खास नहीं किया गया। सरकार सिर्फ कागजों पर लकीरें खींचती रही और जंगल से बाघों का सफाया होता रहा। वैसे अभी भी इतनी देर नहीं हुई है कि आंकड़ेबाजी को हकीकत में न बदला जाए, अगर सही दिशा में दिल से आगे बढ़ा जाए तो आने वाले सालों में बाघों की संख्या हमारी उम्मीद से भी यादा हो सकती है। बहरहाल, खुद को खुश रखने के लिए 2010 की गणना के आंकड़े अच्छे हैं।
बाघों को लेकर काफी दिनों बाद एक अच्छी खबर सुनने को मिली। ताजा गणना के मुताबिक देश में बाघों का कुनबा बढ़ा है। ऐसे वक्त में जब शिकारियों के हौसले बुलंद है, ये खबर बाघ सरंक्षण से जुड़े लोगों और वन्यप्रेमियों के लिए किसी सौगात से कम नहीं। इस खबर ने बाघ बचाने को लेकर अपनाए जा रहे तौर-तरीकों पर उठ रहे सवालों को भी काफी हद तक गलत करार दिया है। हालांकि टाइगर स्टेट के नाम से मशहूर मध्यप्रदेश के लिए यह गणना निराशाजनक साबित हुई है। यहां होशंगाबाद, बैतूल, नर्मदा नदी के उत्तरी घाट और कान्हा किसली में बाघ घटे हैं। वैसे ये तब ही साफ हो गया था जब पन्ना के बाघ विहीन होने की खबर सामने आई थी। विशेषज्ञ इस बात का अंदेशा पहले ही जत चुके थे, लेकिन राय सरकार गौर करने के बजाए इसे लगातार झुठलाती रही और बाद में जब हकीकत सामने आई तो उसने होंठ सिल लिए। बाघों की ताजा गणना में पारंपरिक तरीकों के बजाए आधुनिक तकनीक को अपनाया गया। इसे विश्व की सबसे आधुनिक बाघ गणना भी कहा जा रहा है। इसके तहत अहम स्थानों पर कैमरे लगाए गए, रेडियो कॉलर, पैरों के निशान, डीएनए और मैपिंग प्रणाली का इस्तेमाल किया गया। गणना के लिए 45 हजार वर्ग किमी वन क्षेत्र में चार लाख 70 हजार अधिकारियों को करीब 6,25,000 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा।
पिछली गणना में बाघों की संख्या 1411 थी, जो इस बार बढ़कर 1700 तक पहुंच गई है। लेकिन ये आंकड़े खुशी के साथ-साथ थोड़े चौंकाने वाले भी हैं। ये बात हजम करना मुश्किल है कि बाघ सरंक्षण को लेकर जो काम कई सालों तक नहीं हुआ, उनमें महज चार साल में इतना सुधार आ गया कि बाघों की संख्या 289 बढ़ गई। 2006 से लेकर 2010 तक जिन चार सालों में बाघ बढ़ने की बातें कही गई हैं, उन चार सालों में ही उनका अंधाधुन शिकार हुआ। वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया के मुताबिक 2006 में 37, 2007 में 27, 2008 में 29, 2009 में 32 और 2010 में 30 बाघ मारे गए। इसमें उन मौतों को शामिल नहीं किया है जिनके शिकार के संबंध में पुख्ता सुबूत नहीं मिल सके। इसके अलावा एक और बात जो बाघों की ताजा संख्या पर संदेह पैदा करती है वो ये कि पिछली गणना में 16 टाइगर स्टेट को शामिल किया गया, जबकि इसबार 19 रायों में गणना को अंजाम दिया गया है। 2006 की गणना में पश्चिम बंगाल के सुंदरवन और झारखंड में गिनती नहीं हुई थी, पर 2010 में सुंदरवन में 70 बाघ होने की बात कही गई है। इस लिहाज से देखा जाए तो ताजा गणना महज आंकड़ों का उलटफेर यादा नजर आती है। एक बारगी मान भी लिया जाए कि बाघ बढ़े हैं तो भी आंकड़ा इतना बडा कतई नहीं होगा जितना दर्शाया जा रहा है। 1700 में से यदि सुंरदवन के 70 बाघ ही घटा दिए जाएं तो संख्या 1630 रह जाती है और अगर मारे गए बाघों को भी इसमें जोड़ दिया जाए तो यह आंकड़ा 1400 के आसपास रह जाएगा। वैसे भी मौजूदा वक्त में जिस तरह से आए दिन शिकार की खबरें आ रही हैं, उनमें ये सहज ही स्वीकार करना मुश्किल है कि इस खूबरसूरत प्राणी की संख्या में इजाफा हुआ होगा। खैर आंकड़ों का सच-झूठ अलग बात है, सबसे अहम है बाघों की सुरक्षा और इस दिशा में अब तक जो कदम उठाए गए हैं उससे शायद संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता। बाघ संरक्षण के प्रति सरकार की गंभीरता का पता इस बात से लगाया जा सकता है कि आज भी फॉरेस्ट गार्ड के हजारों पद खाली पड़े हैं। सच तो यह है कि वन एंव पर्यावरण मंत्रालय इस चुनौती से निपटने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं।
कर्मचारियों को न तो पर्याप्त ट्रेनिंग दी जाती है और न ही पर्याप्त सुविधाएं। हालात ये हो चले हैं कि अधिकतर अधिकारी महज अपनी नौकरी बचाने के लिए काम कर रहे हैं। उनमें न तो वन्यजीवों के प्रति कोई संवेदना है और न ही काम के प्रति कोई लगाव। यही कारण है कि रोक के बावजूद बाघों का शिकार बदस्तूर जारी है। संगठित आपराधिक गिरोह वन्यजीवों की खालों की तस्करी में लगे हुए हैं। इसके लिए वह जंगलों में रहने वाले चरवाहों और कहीं-कहीं वन विभाग के लोगों से मदद लेते हैं, क्योंकि इन्हें जानवरों के बारे में काफी जानकारी होती है। बाघों को जाल बिछाकर फंसाया जाता है, सिर्फ आधे घंटे में ही खाल निकालकर अपराधी फरार हो जाते हैं। 1994 से लेकर 2010 के बीच तकरीबन 1000 बाघों का शिकार किया जा चुका है। 2005 में राजस्थान के सरिस्का के बाघ विहीन होने के बाद बाघों के सरंक्षण को लेकर बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाई गईं, रणनीति तैयार की गईं मगर हालात सुधरने के बजाए बद से बदतर होते चले गए। 2005 से 2010 के मध्य ही 201 बाघों को शिकारियों ने अपना निशाना बनाया। वैसे बाघों की घटती संख्या के लिए राय सरकारें भी कम कसूरवार नहीं हैं, कुछ साल पहले रायों से बाघों की सुरक्षा के लिए निगरानी समिति बनाने का कहा गया था मगर अब तक अधिकतर रायों ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है। 2006 में संशोधित वन्यजीव सुरक्षा कानून 1972 के तहत निगरानी समिति का गठन जरूरी है, रायों को इस बाबत कई बार स्मरण पत्र भी भेजे जा चुके हैं मगर कोई भी अपनी जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं। बाघ सरंक्षण के लिए आज से करीब चार दशक पहले प्रोजेक्ट टाइगर शुरू किया गया था, उस दौर में बाघ सरंक्षण के इसे लिए दुनिया भर में सबसे महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट माना गया।
इसके तहत कई सराहनीय काम भी किए गए, शायद इसी वजह से जंगली बाघ आज भी हमारे जंगलों में मौजूद हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश पिछले कुछ दशकों में तेजी से बदलते परिदृश्य ने इस महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट महज नाम तक ही सीमित करके रख दिया है। वन्यप्रणियों के खिलाफ बढ़ते अपराध और शिकारियों के बुलंद हौसलों को पस्त करने के लिए कुछ खास नहीं किया गया। सरकार सिर्फ कागजों पर लकीरें खींचती रही और जंगल से बाघों का सफाया होता रहा। वैसे अभी भी इतनी देर नहीं हुई है कि आंकड़ेबाजी को हकीकत में न बदला जाए, अगर सही दिशा में दिल से आगे बढ़ा जाए तो आने वाले सालों में बाघों की संख्या हमारी उम्मीद से भी यादा हो सकती है। बहरहाल, खुद को खुश रखने के लिए 2010 की गणना के आंकड़े अच्छे हैं।
Sunday, March 20, 2011
कहां गई वो पहले वाली होली
मुझसे अगर कोई पूछे कि सबसे अच्छा त्यौहार कौनसा सा है तो मैं कहूंगा होली। इस त्यौहार की सबसे अच्छी बात ये है कि इसमें अमीर-गरीब का कोई भेद नजर नहीं आता। गरीब भी रंग में रंगा होता है और अमीर भी, न अमीर का रंग यादा चमक मारता है और न गरीब को इसे खरीदने के लिए किसी का मुंह तकना पड़ता है। निसंदेह दिपावली की जगमग हर त्यौहार पर भारी पड़ती है, मगर वो जगमग कहीं न कहीं अमीर-गरीब के बीच की खाई को उजागर करती है। गरीब के बच्चे दूसरों की आतिशबाजी को निहार-निहार कर मन ही मन में अपनी गरीबी पर अफसोस जताते हैं। आतिशबाजी की दुकानों के आसपास खरीददारी करते लोगों को कौतूहल भरी निगाहों से देखना और दूसरी सुबह इस उम्मीद में कि कोई बम जलने से रह गया होगा सड़कों की खाक छानना गरीब बच्चों की दिवाली का हिस्सा है। इसलिए मुझे होली यादा पसंद आती है। खासकर बचपन के दिनों में, वो महीनों पहले से तैयारी में मशगूल हो जाना, हर आने-जाने वाले पर रंगों के गुब्बारे फेंकना मैं कभी नहीं भूल सकता। हमारी होली होली आने से पहले ही शुरू हो जाया करती थी, दोस्त-यार बैठकर बाकायदा योजना बनाया करते थे कि इस बार क्या खास करना है। गुलाल हमें बड़े-बुजुर्गों के खेलने की चीज लगता था इसलिए हमारे हाथ होली के कई दिनों बाद तक रंग-बिरंगे दिखाई देते। वैसे भी होली का क्या मतलब अगर एक ही दिन में रंग निकल जाए। होली पर बच्चों के लिए सबसे अच्छा अगर कुछ होता है तो वो है गुब्बारे। रंग भरों, निशाना लगाओ और छुप जाओ। गुब्बारे से मुझे एक किस्सा याद आ रहा है, बात शायद होली से दो-तीन दिन पहले की रही होगी। हम सब दोस्त हथगोलों (गुब्बारे)को लेकर अपनी-अपनी पोजीशन (छतों) पर तैनात थे। हर आने-जाने वाला हमारे टारगेट पर होता। कुछ लोग हंस के निकल जाते तो कुछ होली के उल्लास में दो-चार गालियों के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करा जाते। यूं ही निशाना लगाते-लगाते एक गुब्बारा घर के नीचे से गुजरते मुल्ला जी के लग गया। हमारे लिए गनीमत ये रही कि वो गुब्बारा रंग का नहीं बल्कि पानी का था। बावजूद इसके मुल्ला जी ने अपनी साईकिल स्टैंड पर टिकाकर आसमान सर पे उठा लिया। तकरीबन 30 मिनट तक वो उस एक गुब्बारे का बदला हमसे लेते रहे। बाद में लोगों के समझाने-बुझाने के बाद किसी तरह जब उन्होंने अपनी साईकिल स्टैंड से उतारी तब जाकर जान में जान आई। कुछ देर तक हम लोग खामोश रहे मगर खामोशी यादा देर तक टिक नहीं सकी, फिर वो ही निशाने लगाने का खेल शुरू हो गया। ऐन होली वाले दिन गुब्बारे भरने के लिए हम अलसुबल उठ जाते थे, दो बाल्टी भर के गुब्बारे तो मेरे अकेले के ही होते। उस वक्त जल्दी उठने की वजह होली के उत्साह के साथ-साथ मजबूरी भी थी। मजबूरी इसलिए क्योंकि आठ-नौ बजे तक नल सो जाया करते थे। वैसे ये केवल उस दौर की समस्या नहीं थी, आज भी है। अक्सर होली पर वॉटर सप्लाई बाधित हो जाती है, जिसकी की सबसे यादा जरूरत होती है। इसी तरह दिपावली पर बिजली की आंख मिचोली होती रहती है। लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े हर त्यौहार पर ये दोनों ही विभाग दरियादिल बन जाते हैं, फिर भी भेदभाव का रोना रोया जाता है। खैर ये एक अलग मुद्दा है। एक-दो बजे के आसपास जब लोग रंग छुटाने के लिए घरो में कैद हो जाया करते तो हम बचे हुए गुब्बारों का इस्तेमाल उन घर की दीवारों को रंगीन करने में करते जिन्हें हमारे क्रिकेट प्रेम से सबसे यादा चिढ़ था। बचपन में क्रिेकेट खेलने के लिए क्या कुछ नहीं सुनना पढ़ता इस पीढ़ा को यादातर भारतीय समझते होंगे। कभी-कभी जब पकड़े जाते तो इसके लिए हमारे गालों पर थप्पड़ भी रसीद हो जाया करते। पर आज के दौर में होली पूरी तरह से बदल गई है। अब न तो उल्लास का वो मदमस्त करने वाला शोर सुनाई देता है और न लोग घर से बाहर आने में दिलचस्पी दिखाते हैं। मुझे इसबार की होली पर ऐसा लगा जैसे त्यौहार न हो कोई मातम हो। 10-11 बजे तक हो-हल्ले की एक अवाज तक कानो में नहीं पड़ी, उसके बाद होली मिलन की महज एक रस्मअदायगी के साथ होली खत्म हो गई। तेजी से भागती दुनिया में जहां 50-50 से यादा 20-20 ओवर का मैच पसंद किया जाता है वहां होली भी बहुत शॉर्ट होकर रह गई है। ये बदलाव सिर्फ शहर तक ही सीमित नहीं है, गांवों में भी बरबक्स ऐसा ही हाल है। गांवों में होली की शुरूआत सवा महीने पहले बसंत पंचमी के दिन से हो जाया करती थी। इस दिन गांव के लोग होलिका दहन वाले स्थान पर एक डंडा गाड़ दिया करते। फिर पूजा के बाद यहां लकड़ियां इकट्ठी की जाती और धमाल शुरू हो जाता। गांव के हुरियारे चौपाल पर मिलजुलकर होली के गीत गाते। पर अब गांवों में होली वाले दिन तक शहर जैसी खामोशी छाई रहती है। दरअसल, इस बदलाव के पीछे लोगों का बदलता रूप भी जिम्मेदार है। होली का पवित्र त्यौहार अब दुश्मनी निकालने के काम आता है। मनचलों के लिए तो ये दिन पूरी आजादी का दिन बन गया है। रंगे-पुते चेहरों के बीच कौन क्या करके निकल जाए पता ही नहीं चल सकता।और तो और कपड़े फाडने का आजकल एक नया ही ट्रेंड चल गया है, जब तक एक-दूसरे के कपड़े नहीं फाड़े जाते तबतक लोगों को लगता ही नहीं कि उन्होंने होली खेली है। मथुरा-वृंदावन जहां की होली भारत ही नहीं दुनिया भर में मशहूर है, वहां भी होली के हुड़दंग में क्या कुछ नहीं किया जाता। जिस रफ्तार से होली खेलने वालों की तादाद और उसके प्रति लोगों का उत्साह घट रहा है उससे आने वाले कुछ सालों में होली महज नाम की होली बनकर रह जाएगी। एक ऐसा त्यौहार जो कुछ देर के लिए ही सही मगर सारे भेदभाव मिटाकर सबको एक जैसा बना देता है, होली के अलावा कोई दूसरा नहीं हो सकता। होली रंगाें का त्यौहार है और रंगों के बगैर हम अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते तो फिर कैसे हम होली को दम तोड़ने दे सकते हैं।
Friday, March 18, 2011
...तो क्या रन बनाना छोड़ दें सचिन
नीरज नैयर
आलोचना करने वाले भी कुत्ते की पूंछ की तरह होते हैं, कितना भी समझाओ, हकीकत से रूबरू कराओ मगर समझने को तैयार ही नहीं होते। क्रिकेट खासकर सचिन तेंदुलकर के मामले में तो इन अलोचकों के मुंह इतने चौड़े हैं कि पूरी की पूरी फुटबॉल भी अंदर चली जाए। सचिन ने विश्वकप के दौ मैंचों में शानदार सैंकड़ा जड़ा, मगर आलोचकों ने उसमें भी आलोचना की वजह ढूंढ ली। 27 फरवरी को इंग्लैंड के खिलाफ मास्टर ब्लास्टर ने 104.34 की औसत से 115 गेंदों में 120 रन बनाए, जिसमें 10 चौके और पांच छक्के शामिल थे। इसके बाद 12 मार्च को दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ तेंदुलकर ने 109.90 की औसत से 101 गेंदों में 111 रन ठोंके, जिसमें 8 चौके और 3 छक्के शामिल हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश इन दोनों ही मैचों में खेल खत्म होते-होते भारत बहुत दयनीय स्थिति में पहुंच गया। इंग्लैंड के साथ तो किसी तरह टाई करवाकर उसने लाज बचा ली, मगर दक्षिण अफ्रीका ने ये मौका भी नहीं दिया। नागपुर में अफ्रीकी खिलाड़ियों ने टीम इंडिया की नाक काटके ही दम लिया। भारत ये मैच 3 विकेट से हारा। इन दोनों हार का ठीकरा वैसे तो फूटना चाहिए था कप्तान बने बैठे महेंद्र सिंह धोनी पर मगर आलोचकों ने सचिन को शिकस्त का सेहरा पहना दिया। इसके पीछे तर्क दिए गए कि सचिन ने जब-जब शतक ठोंके टीम मैच हार गई। अब भला कोई इन आलोचकों से पूछे कि क्या सचिन रन बनाना छोड़ दें, चलिए छोड़ भी दें तो क्या गधे सरीखी बेसुरी तान छेड़ने वाले ये आलोचक खामोशी अख्तियार कर सकेंगे? निश्चित तौर पर नहीं, तेंदुलकर का बल्ला थमते ही ये चीखने लगेगे कि सचिन टीम पर बोझ हैं, उन्हें निकाल देना चाहिए आदि, आदि। सचिन की आलोचना करने वाले कहते हैं कि मास्टर महज अपने लिए खेलते हैं, अर्धशतक या शतक तक पहुंचते-पहुंचते वो संभलकर खेलना शुरू कर देते हैं ताकि रिकॉर्ड बन सके। अव्वल तो इसमें कोई सच्चाई नहीं है और अगर वो ऐसा करते भी हैं तो इसमें बुराई क्या है। नए-नए रिकॉर्ड गढ़ने की महत्वकांक्षा ही इंसान को ऊंचाईयों तक पहुंचाती है, और वैसे भी ये तो इंसानी फितरत है कि सफलता के शिखर तक पहुंचते-पहुंचते वो कदम थोड़ा संभलक रखना शुरू कर देता है। आलोचना करने वाले अगर सचिन की जगह होते तो क्या वो खुद ऐसा नहीं करते। ऐसा कौनसा खिलाड़ी है जो 49 को 50 और 99 को 100 बनते नहीं देखना चाहेगा। चलिए एक बागरी मान भी लिया जाए कि सचिन अपने रिकॉर्ड की लिए खेलते हैं, पर फिर भी खेलते तो हैं। टीम इंडिया का हर खिलाड़ी यदि अपने लिए ही खेलना सीख जाए तो हार-जीत का प्रतिशत आधे से भी कम रह जाएगा। इंसान अपने लिए सबसे अच्छा करने की कोशिश करता है, अगर खिलाड़ियों में एक दूसरे से यादा अच्छी परफॉर्म करने की होड़ हो जाए तो टीम का भला तो अपने आप ही हो जाएगा। सचिन अगर बुरा खेलें तो बुरा कहने में कोई बुराई नहीं, लेकिन अच्छा खेलने के बाद भी उनपर उंगलियां उठाना बीमार मानसिकता का ही उदाहरण है। जिन दोनों मैचों में सचिन ने सेंचुरी लगाई उसमें टीम के बाकी खिलाड़ियों का प्रदर्शन क्या रहा, ये भी गौर करने वाली बात है। इंग्लैंड के साथ मैच में प्रमुख 6 बल्लेबाजों के रनों का कुल योग रहा 197 और दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ यह घटकर रह गया 167। अब जरा इस योग में खिलाड़ियों के योगदान पर नजर डाल लेते हैं, इंग्लैंड के खिलाफ सहवाग ने 35, गंभीर ने 51, युवराज ने 58 पठान ने 14, कोहली ने 8 और धोनी ने 31 रन मारे। जबकि अफ्रीका के खिलाफ सहवाग 73, गंभीर 69, पठान 0, युवराज 12, कोहली 1 और खुद धोनी महज 12 रन बना पाए। यानी दोनों मैचों में सचिन ने मैच विनिंग पारियां खेली, बावजूद इसके टीम अगर नहीं जीत पाई तो इसके गुनाहगार बाकी के खिलाड़ी हैं न कि सचिन। ऐसा सिर्फ हमारे यहां ही हो सकता है कि रन बनाने वाले को अलोचना मिले और वो जो बस अपनी किस्मत का खा रहे हैं, उनको सर-आंखों पर बैठाया जाए। मेरा इशारा यहां महेंद्र सिंह धोनी की तरफ है, कप्तान के तौर पर धोनी ने आखिरी बार यादगार पारी कब खेली, शायद ही किसी को याद होगा। विश्वकप के अब तक के मैचों में उनका प्रदर्शन एक दोयम दर्जे के बल्लेबाज जैसा ही रहा है। दक्षिण अफ्रीका के विरुध्द उनके गलत फैसलों ने सचिन और सहवाग की मेहनत को मटियामेट कर दिया। टीम इंडिया का पहला विकेट 142 पर सहवाग के रूप में गिरा, उसके बाद जब सचिन पवेलियन लौटे तो स्कोर था 267। यानी बाकी के बल्लेबाज सिर्फ 29 रन ही जोड़ पाए। कागजों पर धुरंधर कहे जाने वाले बल्लेबाज इतनी अच्छी स्थिति में भी यदि घुटने टेक दें तो इसमें भी सचिन का दोष है। जैसे सचिन ने सबको कहा हो कि यादा मत खेलना। सचिन की आलोचना नहीं बल्कि उनकाउदाहरण पेश करने चाहिए, 35 की उम्र में भी यह बल्लेबाज टीम के युवाओं पर भारी पड़ रहा है। सचिन तेंदुलकर महज क्रिकेट खेलते नहीं बल्कि उसे जीते हैं। खेल के प्रति उनका कमिटमेंट उनके हर शॉट में नजर आता है। मास्टर ब्लास्टर ने वनड़े में 48 और टेस्ट मैचों में 51 शतक जमाए हैं। अब तक कुल 13 बार ऐसा हुआ है जब सचिन ने शतक बनाया और टीम मैच हार गई। ये भी एक तरह से रिकॉर्ड है, सचिन के अलावा वेस्टइंडीज के क्रिस गेल भी ऐसे दूसरे नंबर के बल्लेबाज हैं जिनके 9 शतक टीम के काम नहीं आए। 48 में से अगर 13 घटा भी दिए जाएं तो भी 35 बचते हैं, क्या ये आंकड़ा सचिन की तारीफ करने के लिए काफी नहीं। तेंदुलकर की आलोचना करने वालों को इस बात पर भी ऐतराज है कि उन्हें क्रिकेट का भगवान क्यों कहा जाता है, और यदि कहा जाता है तो वो हर मैच क्यों नहीं जिता पाते। विरोध करने का ये बहुत ही बेतुका सा तर्क है, सचिन को भगवान की उपाध्दि उनके खेल के प्रति समपर्ण और अतुल्य प्रदर्शन की बदौलत मिली है। लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि पौराणिक कथाओं की तरह वो कोई दैव्य रूप हैं जो हाथ घुमाएंगे और हर बॉल बाउंड्री पार कर जाएगी। वो भी हाड़-मांस का इंसान है, दर्द और थकान उसे भी होती है। सचिन मैदान पर अपना सौ प्रतिशत देने में विश्वास रखते हैं, लेकिन कभी-कभी उनका बल्ला भी साथ नहीं देता और ऐसा हर इंसान के साथ होता है। खैर आलोचना करने वालों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, उनका काम तो हर अच्छी चीज में बुराई ढूंढना है। सचिन चाहे कितना भी अच्छा क्यों न खेल लें उनकी आलोचना करने वाले अपना मुंह खोलते रहेंगे। जिस तरह कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं हो सकती, उसी तरह सचिन की आलोचना करने वाले भी नहीं सुधर सकते।
आलोचना करने वाले भी कुत्ते की पूंछ की तरह होते हैं, कितना भी समझाओ, हकीकत से रूबरू कराओ मगर समझने को तैयार ही नहीं होते। क्रिकेट खासकर सचिन तेंदुलकर के मामले में तो इन अलोचकों के मुंह इतने चौड़े हैं कि पूरी की पूरी फुटबॉल भी अंदर चली जाए। सचिन ने विश्वकप के दौ मैंचों में शानदार सैंकड़ा जड़ा, मगर आलोचकों ने उसमें भी आलोचना की वजह ढूंढ ली। 27 फरवरी को इंग्लैंड के खिलाफ मास्टर ब्लास्टर ने 104.34 की औसत से 115 गेंदों में 120 रन बनाए, जिसमें 10 चौके और पांच छक्के शामिल थे। इसके बाद 12 मार्च को दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ तेंदुलकर ने 109.90 की औसत से 101 गेंदों में 111 रन ठोंके, जिसमें 8 चौके और 3 छक्के शामिल हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश इन दोनों ही मैचों में खेल खत्म होते-होते भारत बहुत दयनीय स्थिति में पहुंच गया। इंग्लैंड के साथ तो किसी तरह टाई करवाकर उसने लाज बचा ली, मगर दक्षिण अफ्रीका ने ये मौका भी नहीं दिया। नागपुर में अफ्रीकी खिलाड़ियों ने टीम इंडिया की नाक काटके ही दम लिया। भारत ये मैच 3 विकेट से हारा। इन दोनों हार का ठीकरा वैसे तो फूटना चाहिए था कप्तान बने बैठे महेंद्र सिंह धोनी पर मगर आलोचकों ने सचिन को शिकस्त का सेहरा पहना दिया। इसके पीछे तर्क दिए गए कि सचिन ने जब-जब शतक ठोंके टीम मैच हार गई। अब भला कोई इन आलोचकों से पूछे कि क्या सचिन रन बनाना छोड़ दें, चलिए छोड़ भी दें तो क्या गधे सरीखी बेसुरी तान छेड़ने वाले ये आलोचक खामोशी अख्तियार कर सकेंगे? निश्चित तौर पर नहीं, तेंदुलकर का बल्ला थमते ही ये चीखने लगेगे कि सचिन टीम पर बोझ हैं, उन्हें निकाल देना चाहिए आदि, आदि। सचिन की आलोचना करने वाले कहते हैं कि मास्टर महज अपने लिए खेलते हैं, अर्धशतक या शतक तक पहुंचते-पहुंचते वो संभलकर खेलना शुरू कर देते हैं ताकि रिकॉर्ड बन सके। अव्वल तो इसमें कोई सच्चाई नहीं है और अगर वो ऐसा करते भी हैं तो इसमें बुराई क्या है। नए-नए रिकॉर्ड गढ़ने की महत्वकांक्षा ही इंसान को ऊंचाईयों तक पहुंचाती है, और वैसे भी ये तो इंसानी फितरत है कि सफलता के शिखर तक पहुंचते-पहुंचते वो कदम थोड़ा संभलक रखना शुरू कर देता है। आलोचना करने वाले अगर सचिन की जगह होते तो क्या वो खुद ऐसा नहीं करते। ऐसा कौनसा खिलाड़ी है जो 49 को 50 और 99 को 100 बनते नहीं देखना चाहेगा। चलिए एक बागरी मान भी लिया जाए कि सचिन अपने रिकॉर्ड की लिए खेलते हैं, पर फिर भी खेलते तो हैं। टीम इंडिया का हर खिलाड़ी यदि अपने लिए ही खेलना सीख जाए तो हार-जीत का प्रतिशत आधे से भी कम रह जाएगा। इंसान अपने लिए सबसे अच्छा करने की कोशिश करता है, अगर खिलाड़ियों में एक दूसरे से यादा अच्छी परफॉर्म करने की होड़ हो जाए तो टीम का भला तो अपने आप ही हो जाएगा। सचिन अगर बुरा खेलें तो बुरा कहने में कोई बुराई नहीं, लेकिन अच्छा खेलने के बाद भी उनपर उंगलियां उठाना बीमार मानसिकता का ही उदाहरण है। जिन दोनों मैचों में सचिन ने सेंचुरी लगाई उसमें टीम के बाकी खिलाड़ियों का प्रदर्शन क्या रहा, ये भी गौर करने वाली बात है। इंग्लैंड के साथ मैच में प्रमुख 6 बल्लेबाजों के रनों का कुल योग रहा 197 और दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ यह घटकर रह गया 167। अब जरा इस योग में खिलाड़ियों के योगदान पर नजर डाल लेते हैं, इंग्लैंड के खिलाफ सहवाग ने 35, गंभीर ने 51, युवराज ने 58 पठान ने 14, कोहली ने 8 और धोनी ने 31 रन मारे। जबकि अफ्रीका के खिलाफ सहवाग 73, गंभीर 69, पठान 0, युवराज 12, कोहली 1 और खुद धोनी महज 12 रन बना पाए। यानी दोनों मैचों में सचिन ने मैच विनिंग पारियां खेली, बावजूद इसके टीम अगर नहीं जीत पाई तो इसके गुनाहगार बाकी के खिलाड़ी हैं न कि सचिन। ऐसा सिर्फ हमारे यहां ही हो सकता है कि रन बनाने वाले को अलोचना मिले और वो जो बस अपनी किस्मत का खा रहे हैं, उनको सर-आंखों पर बैठाया जाए। मेरा इशारा यहां महेंद्र सिंह धोनी की तरफ है, कप्तान के तौर पर धोनी ने आखिरी बार यादगार पारी कब खेली, शायद ही किसी को याद होगा। विश्वकप के अब तक के मैचों में उनका प्रदर्शन एक दोयम दर्जे के बल्लेबाज जैसा ही रहा है। दक्षिण अफ्रीका के विरुध्द उनके गलत फैसलों ने सचिन और सहवाग की मेहनत को मटियामेट कर दिया। टीम इंडिया का पहला विकेट 142 पर सहवाग के रूप में गिरा, उसके बाद जब सचिन पवेलियन लौटे तो स्कोर था 267। यानी बाकी के बल्लेबाज सिर्फ 29 रन ही जोड़ पाए। कागजों पर धुरंधर कहे जाने वाले बल्लेबाज इतनी अच्छी स्थिति में भी यदि घुटने टेक दें तो इसमें भी सचिन का दोष है। जैसे सचिन ने सबको कहा हो कि यादा मत खेलना। सचिन की आलोचना नहीं बल्कि उनकाउदाहरण पेश करने चाहिए, 35 की उम्र में भी यह बल्लेबाज टीम के युवाओं पर भारी पड़ रहा है। सचिन तेंदुलकर महज क्रिकेट खेलते नहीं बल्कि उसे जीते हैं। खेल के प्रति उनका कमिटमेंट उनके हर शॉट में नजर आता है। मास्टर ब्लास्टर ने वनड़े में 48 और टेस्ट मैचों में 51 शतक जमाए हैं। अब तक कुल 13 बार ऐसा हुआ है जब सचिन ने शतक बनाया और टीम मैच हार गई। ये भी एक तरह से रिकॉर्ड है, सचिन के अलावा वेस्टइंडीज के क्रिस गेल भी ऐसे दूसरे नंबर के बल्लेबाज हैं जिनके 9 शतक टीम के काम नहीं आए। 48 में से अगर 13 घटा भी दिए जाएं तो भी 35 बचते हैं, क्या ये आंकड़ा सचिन की तारीफ करने के लिए काफी नहीं। तेंदुलकर की आलोचना करने वालों को इस बात पर भी ऐतराज है कि उन्हें क्रिकेट का भगवान क्यों कहा जाता है, और यदि कहा जाता है तो वो हर मैच क्यों नहीं जिता पाते। विरोध करने का ये बहुत ही बेतुका सा तर्क है, सचिन को भगवान की उपाध्दि उनके खेल के प्रति समपर्ण और अतुल्य प्रदर्शन की बदौलत मिली है। लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि पौराणिक कथाओं की तरह वो कोई दैव्य रूप हैं जो हाथ घुमाएंगे और हर बॉल बाउंड्री पार कर जाएगी। वो भी हाड़-मांस का इंसान है, दर्द और थकान उसे भी होती है। सचिन मैदान पर अपना सौ प्रतिशत देने में विश्वास रखते हैं, लेकिन कभी-कभी उनका बल्ला भी साथ नहीं देता और ऐसा हर इंसान के साथ होता है। खैर आलोचना करने वालों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, उनका काम तो हर अच्छी चीज में बुराई ढूंढना है। सचिन चाहे कितना भी अच्छा क्यों न खेल लें उनकी आलोचना करने वाले अपना मुंह खोलते रहेंगे। जिस तरह कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं हो सकती, उसी तरह सचिन की आलोचना करने वाले भी नहीं सुधर सकते।
Monday, February 28, 2011
बाबा रामदेव की संपत्ति पर संशय लाजमी है
घपले-घोटालों की चर्चां के बीच आजकल एक और खबर सुर्खियों में है, वो है बाबा रामदेव और कांग्रेस की जुबानी जंग। इस जंग की सही मायनों में शुरूआत हुई कांग्रेस सांसद निनोंग एरिंग णके बयान से। अरुणाचल के सांसद साहब बाबा की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम से इस कदर आहत हुए कि उन्होंने अपशब्द तक कह डाले। बाबा की मानें तो एरिंग ने एंग्री यंगमैन की भूमिका उन्हें ब्लडी इंडियन और न जाने क्या-क्या कहा। सांसद महोदय ने बाबा को धमकी भी दी कि अगर उन्होंने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान बंद नहीं किया तो गंभीर नतीजे भुगतने होंगे। गंभीर नतीजों से उनका इशारा किस तरफ था ये तो वही बता सकते हैं, लेकिन इस तरह की भाषा एक सांसद के मुंह से अच्छी नहीं लगती। जिम्मेदार पद पर काबिज होने के बाद अपनी जिम्मेदारी समझना हमारे नेता पता नहीं कब सीखेंगे। वैसे देखा जाए तो राजनीति में सफलता के लिए बदजुबानी और दबंगई आजकल मूलमंत्र बन गए हैं। जो जितना बड़ा दबंग, वो उतना ही बड़ा नेता। यही वजह है कि संसद तक पहुंचने वाले माननीयों में आपराधिक छवि वालों की भी अच्छी-खासी तादाद होती है। खैर ये एक अगल मामला है, हम अपने मूल मुद्दे पर लौटते हैं। एरिंग द्वारा शुरू की गई जुबानी जंग को और तीखा बनाया शब्दबाणों के लिए मशहूर हो चुके दिग्विजय सिंह ने। दिग्गी राजा ने रामदेव को संपत्ति के खुलासे की चुनौती दी, इसके जवाब में बाबा ने भी गांधी-नेहरू परिवार को निशाना बनाया।
कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की दूसरों पर कटाक्ष करना आदत सी बन चुकी है। कुछ दिनों पहले तक वो भगवा आतंकवाद के नाम पर भाजपा और संघ को घेरे हुए थे, और अब योगगुरु को उनका नया टारगेट हैं। ऐसा लगता है जैसे कांग्रेस ने उन्हें इसी काम के लिए रखा हुआ है कि जब भी कोई सरकार की तरफ ढ़ेढी निगाह करे बस बरस पड़ो। रामदेव कुछ समय से कालेधन और भ्रष्टाचार को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। उन्होंने तो संकेत दिए हैं कि उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव से वो अपनी राजनीतिक पारी शुरू कर सकते हैं। संभव है कि इसी के चलते वो दिग्गी की आंखों की किरकिरी बने हुए हों। दिग्गी राजा का सवाल है कि आखिर बाबा के पास इतने दौलत आई कहां से? भले ही कांग्रेस महासचिव की ये सवाल विशुध्द राजनीति से प्रेरित हों, पर सवाल तो हैं। बाबा के बारे में कहा जाता है कि वो एक जमाने में साइकिल से चलते थे और ये जमाना यादा पुराना भी नहीं है। अखाड़ा परिषद के बाबा हठ योगी ने हाल ही में कहा था कि रामदेव के पास साइकिल का पंचर बनवाने के पैसे नहीं थे। पर योगगुरु आज हेलीकॉप्टर से सफर करते हैं। उनका खुद का आइलैंड भी है, जिसकी कीमत 20 लाख स्टर्लिंग पाउंड है। बाबा के आश्रमों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। हरिद्वार से लेकर अरावली की पहाड़ियों और स्कॉटलैंड तक में बाबा के आश्रम हैं। उनका ट्रस्ट दुनिया भर में अपने उत्पाद बेचता है। णखबरों की अगर मानें तो करीब तीन साल पहले रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव ने खुद स्वीकारा था कि उनका सालाना करोबार एक लाख करोड़ का होने वाला है। कहा तो ये भी जाता है कि पंताजलि योग की शाखाएं ब्रिटेन, अमेरिका, थाइलैंड, नेपाल, दक्षिण अफ्रीका और दुबई तक में खुल गई हैं। आठ सौ बीघा में बने पंतजलि योग ग्राम में फाइव स्टार संस्कृति वाला पंचकर्म सेंटर है। इसके साथ ही पंतजलि में गोशाला की स्थापना की गई है, बाबा के पास करीब 500 गाये हैं, जिनमें विदेशी नस्लों की तादाद सबसे यादा है। बाबा ने 2009 में हरिद्वार में 125 एकड़ खेती की जमीन पर एक कंपनी की शुरूआत की थी।
रामदेव के इस मेगा फूड पार्क की कुल लागत 500 करोड़ रुपए आने का अनुमान है। पहले चरण में 250 करोड़ रुपए की लागत आई जबकि दूसरे चरण ढाई सौ करोड़ की लागत का अनुमान है। बाबा आज के वक्त में किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं, देश से लेकर विदेशों तक में उनके सैकड़ों भक्त हैं। इस बात में कोई दोराय नहीं कि उन्होंने फिर से योग को जीवित किया है, लेकिन सिर्फ योग के सहारे इतनी तेजी से संपत्ति अर्जित करना संदेह तो पैदा करता ही है। बाबा की संपत्ति को लेकर सवाल सिर्फ दिग्विजय सिंह ने ही नहीं किया है कुछ दूसरे संगठन भी इसका खुलासा चाहते हैं। दरअसल बाबा राजनीतिज्ञों के साथ-साथ कई संगठनों के निशाने पर हैं, इसकी मूल वजह है उनका योग के अलावा दूसरे क्षेत्रों में हस्तक्षेप। एक जमाने में लालू प्रसाद यादव रामदेव के मुरीद थे, मगर आज वो उनकी मुखालफत करने से पीछे नहीं हटते। कुछ वक्त पहले लालू ने कहा था, रामदेव खुद को अच्छा साबित करने के लिए देश के हर नेता की आलोचना करते हैं, वो बौरा गए हैं। राजद प्रमुख तो यहां तक कह गए थे कि अगर हमने बाबा को नहीं बचाया होता तो वो बहुत पिटे होते। लालू जैसी खीज दूसरे नेताओं की भी है। पूर्व स्वास्थ्यमंत्री अंबूमणि रामदेव से लेकर सीपीएम नेता वृंदा करात तक बाबा से खार खाए बैठे हैं। वृंदा करात ने आरोप लगाया था कि रामदेव आयुर्वेद दवाओं में हड्डियों का प्रयोग करते हैं। योग से कैंसर मिटाने के दावे को लेकर बाबा का अंबूमणि से विवाद खूब चर्चा में रहा था। हाल ही में समलैंगिकता के मुद्दे पर उनका बॉलिवुड अभिनेत्री सेलीना जेटली से टकराव हुआ, ये बात सही है कि दूसरे नागरिकों की तरह बाबा को भी अपना मत रखने का हक है। लेकिन उन्हें संवेदनशील मुद्दों को छेड़ते वक्त थोड़ा सावधानी से काम लेना चाहिए। वैसे ये सोचने वाली बात है कि एक जमाने में कांग्रेस के करीबी कहे जाने वाले बाबा अचानक से कांग्रेस विरोधी कैसे हो गए। 2009 में जब बाबा ने अपना फूड पार्क बनाया था तो उसके लिए सरकार से ही सहायता मिली थी।
खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय ने बाबा को 50 करोड़ रुपए का अनुदान दिया था। और तो और केंद्रीय रायमंत्री सुबोधकांत सहाय के गृहक्षेत्र रांची में भी एक फूड पार्क की आधारशिला रखी गई थी, जिसमें बाबा सरकार के सहयोगी थे। उस दौरान बाबा की संघ और विहिप से दूरी भी साफ तौर पर देखी जा सकती थी। रामदेव ने संघ समर्थित बैठकों तक में जाना बंद कर दिया था। बहरहाल अब दोनों एक दूसरे पर तीर ताने खड़े हैं, बाबा की संपत्ति को लेकर जो संशय है उसका समाधान होना चाहिए। लेकिन इसके पीछे राजनीति उचित नहीं। जिस तरह से कांग्रेस सांसद बाबा के खिलाफ लामबंद हैं, उसमें साफ तौर पर सियासत नजर आ रही है। रामदेव यदि कालेधन का मुद्दा उठा रहे हैं तो उससे कांग्रेसियों को मिर्ची नहीं लगनी चाहिए। जिस तरह का रवैया दिग्विजय सिंह और निनोंग एरिंग ने अपनाया है उससे उनका खुद का और कांग्रेस का ही नुकसान है।
कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की दूसरों पर कटाक्ष करना आदत सी बन चुकी है। कुछ दिनों पहले तक वो भगवा आतंकवाद के नाम पर भाजपा और संघ को घेरे हुए थे, और अब योगगुरु को उनका नया टारगेट हैं। ऐसा लगता है जैसे कांग्रेस ने उन्हें इसी काम के लिए रखा हुआ है कि जब भी कोई सरकार की तरफ ढ़ेढी निगाह करे बस बरस पड़ो। रामदेव कुछ समय से कालेधन और भ्रष्टाचार को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। उन्होंने तो संकेत दिए हैं कि उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव से वो अपनी राजनीतिक पारी शुरू कर सकते हैं। संभव है कि इसी के चलते वो दिग्गी की आंखों की किरकिरी बने हुए हों। दिग्गी राजा का सवाल है कि आखिर बाबा के पास इतने दौलत आई कहां से? भले ही कांग्रेस महासचिव की ये सवाल विशुध्द राजनीति से प्रेरित हों, पर सवाल तो हैं। बाबा के बारे में कहा जाता है कि वो एक जमाने में साइकिल से चलते थे और ये जमाना यादा पुराना भी नहीं है। अखाड़ा परिषद के बाबा हठ योगी ने हाल ही में कहा था कि रामदेव के पास साइकिल का पंचर बनवाने के पैसे नहीं थे। पर योगगुरु आज हेलीकॉप्टर से सफर करते हैं। उनका खुद का आइलैंड भी है, जिसकी कीमत 20 लाख स्टर्लिंग पाउंड है। बाबा के आश्रमों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। हरिद्वार से लेकर अरावली की पहाड़ियों और स्कॉटलैंड तक में बाबा के आश्रम हैं। उनका ट्रस्ट दुनिया भर में अपने उत्पाद बेचता है। णखबरों की अगर मानें तो करीब तीन साल पहले रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव ने खुद स्वीकारा था कि उनका सालाना करोबार एक लाख करोड़ का होने वाला है। कहा तो ये भी जाता है कि पंताजलि योग की शाखाएं ब्रिटेन, अमेरिका, थाइलैंड, नेपाल, दक्षिण अफ्रीका और दुबई तक में खुल गई हैं। आठ सौ बीघा में बने पंतजलि योग ग्राम में फाइव स्टार संस्कृति वाला पंचकर्म सेंटर है। इसके साथ ही पंतजलि में गोशाला की स्थापना की गई है, बाबा के पास करीब 500 गाये हैं, जिनमें विदेशी नस्लों की तादाद सबसे यादा है। बाबा ने 2009 में हरिद्वार में 125 एकड़ खेती की जमीन पर एक कंपनी की शुरूआत की थी।
रामदेव के इस मेगा फूड पार्क की कुल लागत 500 करोड़ रुपए आने का अनुमान है। पहले चरण में 250 करोड़ रुपए की लागत आई जबकि दूसरे चरण ढाई सौ करोड़ की लागत का अनुमान है। बाबा आज के वक्त में किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं, देश से लेकर विदेशों तक में उनके सैकड़ों भक्त हैं। इस बात में कोई दोराय नहीं कि उन्होंने फिर से योग को जीवित किया है, लेकिन सिर्फ योग के सहारे इतनी तेजी से संपत्ति अर्जित करना संदेह तो पैदा करता ही है। बाबा की संपत्ति को लेकर सवाल सिर्फ दिग्विजय सिंह ने ही नहीं किया है कुछ दूसरे संगठन भी इसका खुलासा चाहते हैं। दरअसल बाबा राजनीतिज्ञों के साथ-साथ कई संगठनों के निशाने पर हैं, इसकी मूल वजह है उनका योग के अलावा दूसरे क्षेत्रों में हस्तक्षेप। एक जमाने में लालू प्रसाद यादव रामदेव के मुरीद थे, मगर आज वो उनकी मुखालफत करने से पीछे नहीं हटते। कुछ वक्त पहले लालू ने कहा था, रामदेव खुद को अच्छा साबित करने के लिए देश के हर नेता की आलोचना करते हैं, वो बौरा गए हैं। राजद प्रमुख तो यहां तक कह गए थे कि अगर हमने बाबा को नहीं बचाया होता तो वो बहुत पिटे होते। लालू जैसी खीज दूसरे नेताओं की भी है। पूर्व स्वास्थ्यमंत्री अंबूमणि रामदेव से लेकर सीपीएम नेता वृंदा करात तक बाबा से खार खाए बैठे हैं। वृंदा करात ने आरोप लगाया था कि रामदेव आयुर्वेद दवाओं में हड्डियों का प्रयोग करते हैं। योग से कैंसर मिटाने के दावे को लेकर बाबा का अंबूमणि से विवाद खूब चर्चा में रहा था। हाल ही में समलैंगिकता के मुद्दे पर उनका बॉलिवुड अभिनेत्री सेलीना जेटली से टकराव हुआ, ये बात सही है कि दूसरे नागरिकों की तरह बाबा को भी अपना मत रखने का हक है। लेकिन उन्हें संवेदनशील मुद्दों को छेड़ते वक्त थोड़ा सावधानी से काम लेना चाहिए। वैसे ये सोचने वाली बात है कि एक जमाने में कांग्रेस के करीबी कहे जाने वाले बाबा अचानक से कांग्रेस विरोधी कैसे हो गए। 2009 में जब बाबा ने अपना फूड पार्क बनाया था तो उसके लिए सरकार से ही सहायता मिली थी।
खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय ने बाबा को 50 करोड़ रुपए का अनुदान दिया था। और तो और केंद्रीय रायमंत्री सुबोधकांत सहाय के गृहक्षेत्र रांची में भी एक फूड पार्क की आधारशिला रखी गई थी, जिसमें बाबा सरकार के सहयोगी थे। उस दौरान बाबा की संघ और विहिप से दूरी भी साफ तौर पर देखी जा सकती थी। रामदेव ने संघ समर्थित बैठकों तक में जाना बंद कर दिया था। बहरहाल अब दोनों एक दूसरे पर तीर ताने खड़े हैं, बाबा की संपत्ति को लेकर जो संशय है उसका समाधान होना चाहिए। लेकिन इसके पीछे राजनीति उचित नहीं। जिस तरह से कांग्रेस सांसद बाबा के खिलाफ लामबंद हैं, उसमें साफ तौर पर सियासत नजर आ रही है। रामदेव यदि कालेधन का मुद्दा उठा रहे हैं तो उससे कांग्रेसियों को मिर्ची नहीं लगनी चाहिए। जिस तरह का रवैया दिग्विजय सिंह और निनोंग एरिंग ने अपनाया है उससे उनका खुद का और कांग्रेस का ही नुकसान है।
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