Thursday, June 17, 2010

क्यों न निजी कंपनियों को सौंपी जाए जंगल की सुरक्षा

नीरज नैयर
एक लंबी खामोशी के बाद आखिरकार केंद्रीय नेतृत्व को अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे बाघो के बारे में सोचने का वक्त मिल ही गया। राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की बैठक में प्रधानमंत्री ने बाघ बचाओ मुहिम में रायों की कमजोर भागीदारी पर चिंता जाहिर की, उन्होंने इस संबंध में राय सरकारों को पत्र लिखने की भी बात कही। बैठक में अभयारण्योंके आस-पास बसे लोगों के पुर्नवास के लिए अधिक धन उपलब्ध कराने का फैसला लिया गया। पर्यावरण मंत्री की मानें तो पुर्नवास के लिए अगले सात सालों में 77 हजार परिवारों को बसाने के लिए आठ हजार करोड़ की जरूरत पड़ेगी। सोचने वाली बात ये है कि क्या अगले सात सालों तक बाघ बचे रहे पाएंगे। जिस रफ्तार से उनकी संख्या घटती जा रही है, उससे तो इस बात की संभावना कम ही दिखाई देती है।

बैठक में वन्य जीव सरंक्षण के प्रयासों को नए सिरे से संगठित करने के लिए केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय में वन और वन्यजीव मामलों के लिए अलग विभाग बनाने पर मुहर लगी। यानी इतने लंबे अंतराल और दर्जनों बाघों की मौत के बाद अब जाकर सरकार को लग रहा है कि मंत्रालय को बांटने से बाघों की मौत पर अंकुश लगाया जा सकता है। यदि बाघों को बचाने का यही एक तरीका है, जैसा की सरकार सोच रही है तो इस पर पहले काम क्यों नहीं किया गया। वर्तमान में देश में बाघों की संख्या 1000-1100 से यादा नहीं होगी, साल की शुरूआत के तीन महीनों में ही करीब 13 बाघ की मौत के मामले सामने आ चुके हैं। वन्यजीवों को लेकर केंद्र सरकार वास्तव में कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा तो बोर्ड की बैठक के डेढ़ साल बाद होने से लगाया जा सकता है। बाघों की सुरक्षा का मुद्दा, अन्य मामलों की तरह अगर प्राथमिकताओं की सूची में रखा गया होता तो डेढ़ साल में कई बैठकें हो चुकी होती और कई कदम उठाए जा चुके होते। इस राष्ट्रीय प्राणी को बचाने के लिए सरकार महज जब जागो, तब सवेरा वाली कहावत पर अमल करने की कोशिश करती आई है। उसकी इसी कोशिश में बाघों की संख्या आधे से भी कम होकर रह गई है। कुंभकरणी नींद से बीच में उठकर कुछ कदम बढ़ाने और वापस फिर सो जाने से स्थितियां नहीं बदला करतीं, लेकिन सरकार मुंगेरीलाल की तरह सपने पर सपने देखे जा रही है।

बाघों के सरंक्षण को केंद्र और रायों के बीच की फुटबॉल न बनाकर एक ऐसी नीति बनाए जाने की जरूरत है जो सीमाओं के बंधन से अछूती रहे। अब तक होता यही आ रहा है कि केंद्र फंड जारी करता है और राय सरकारें उसका उपयोग। मगर यह उपयोग उन मदो पर नहीं होता जहां इसकी सबसे यादा जरूरत है। राय सरकारें फंड की चाहत में कागजों पर सबकुछ ठीक बताती रहती हैं, और अंत में सरिस्का और पन्ना जैसे खुलासे स्तब्ध कर देते हैं। पन्ना पूरी तरह बाघ विहीन हो चुका है। मध्यप्रदेश का एक और अभयारण्य पेंच भी पन्ना के पदचिन्हों पर है। पेंच में पिछले छह माह में तकरीबन छह बाघ दम तोड़ चके हैं। राजस्थान के सरिस्का से पूरी तरह बाघों के सफाए की खबर के बाद भी यदि सार्थक परिणामों के लिए काम किया जाता तो बाघों की संख्या में गिरावट का क्रम बरकरार नहीं रहता। सही मायने में देखा जाए तो इस मुद्दे पर अब तक सिर्फ प्रयोग ही किए जा रहे हैं। केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय का बंटवारा भी प्रयोग का ही हिस्सा है।

अगर प्रयोग करना ही है तो फिर बड़े स्तर पर क्यों न किए जाएं, उसमें समाधान की संभावना भी कम से कम बड़ी तो रहेगी। पूर्व में लिखे अपने लेखों में मैं जंगलों की हिफाजत को निजी हाथों में सौंपे जाने की वकालत करता रहा हूं। इस संबंध में मुझे ढेरों प्रतिक्रियां भी मिलीं, जिनमें से अधिकतर आलोचना स्वरूप की गईं थी, मगर कुछ ऐसे भी मिले जिन्होंने इसके पीछे के तर्कों को गहराई से समझा। मध्यप्रदेश के एक आईएफएस अधिकारी ने ऐसे ही मेरे लेख पर चर्चा करते हुए बाघ सरंक्षण में प्रदेश के योगदान की बड़ी-बड़ी बातें कहीं, उन्होंने ये समझाने का प्रयास किया कि पूरे मुल्क में मध्यप्रदेश जैसा काम किसी ने नहीं किया। जाहिर है, जिस विभाग से वो जुड़े हैं उसकी बुराई वो नहीं सुन सकते, लेकिन यदि वास्तव में मध्यप्रदेश ने इतना कुछ किया होता तो यहां के अभयारण्य बाघ वहीन नहीं हो रहे होते।

बाघों को बचाने के मुद्दे पर हम पूरी तरह से बैकफुट पर हैं। या कह सकते हैं कि हमारे पास अब खोने के लिए कुछ नहीं। जितनी तेजी से बाघों का सफाया हो रहा है, उससे यह तय है कि जल्द ही बाघ किस्से-कहानियों की बात बनकर रह जाएंगे। यानी जो करना है, अभी करना है। यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि अगर सरकारी अमला स्थिति को नियंत्रित करने में सफल होता तो करोड़ों-अरबों बहाए जाने के बाद बाघ यूं एक-एक करके दम नहीं तोड़ रहे होते। कोई स्वीकार करे या न करे, मगर हकीकत यही है कि बाघ सरंक्षण में लगे 90 प्रतिशत सरकारी मुलाजिम सिर्फ और सिर्फ नौकरी बचाने के लिए काम करते हैं। उच्च पदों पर बैठे अफसर सच पर पर्दा डालने और शेखी बखारने में व्यस्त रहते हैं और निचले तबके के कर्मचारी आराम तलबी में। ये सही है कि बाघों की सुरक्षा में लगे अफसर-कर्मचारी अत्याधुनिक सुविधाओं से वंचित हैं मगर ये भी सही है कि जिन अफसरों और कर्मचारियों पर वन्यप्राणियाें के सरंक्षण का जिम्मा है वो ही उनके संहार की वजह बन रहे हैं। सरिस्का कांड की जांच में यह बात सामने आई थी कि वन विभाग के मुलाजिम भी बाघों की हत्या में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भागीदारी निभा रहे थे। ऐसे में कैसे उम्मीद की जा सकती है कि मंत्रालय का विभाजन करने, कमेटियां गठित करने और दर्जनों बैठकें आयोजित करने के बाद बाघों का कत्ल नहीं होगा। बाघों का कत्ल जरूर होगा क्योंकि सुधार की जरूरत नीचे से लेकर ऊपर तक है और इतने शॉर्ट नोटिस पर इसे सुधार पाना लगभग नामुमकिन है।

इसलिए किसी ऐसे विकल्प पर गौर किया जाना चाहिए जिससे वक्त और पैसे दोनों का सदुपयोग किया जा सके। मेरी समझ से जंगलों की हिफाजत का जिम्मा निजी हाथों में सौंपना बेहतर विकल्प हो सकता है। निजी क्षेत्र सरकारी क्षेत्र की अपेक्षा यादा रिजल्ट ओरियंटिड है, इस बात पर शायद ही किसी को शक-शुबहा हो। हम निजी बैंकों का उदाहरण ले सकते हैं, काम जल्दी होने के साथ-साथ वहां के कर्मचारियों में बात करने का जो सलीखा है वो सरकारी बैंकों के मुलाजिमों में नहीं। है। इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि जंगलों की हिफाजत का जो काम वन विभाग नहीं कर पा रहा है उसे निजी सुरक्षा कंपनियां यादा कारगर तरीके से अंजाम दे पाएंगी। सरकार को इसके लिए निविदाओं के माध्यम से संगठन का चुनाव करना चाहिए। विदेशियों के लिए भी इस प्रक्रिया में शामिल होने के रास्ते खुले रखे जाएं तो बेहतर होगा। विदेशों में ऐसे बहुत से संगठन हैं जो इस काम को बखूबी अंजाम दे सकते हैं।

इस मामले को केंद्र और राय सरकारों की दखलंदाजी से पूर्णता मुक्त रखा जाए, जिस कपंनी को ठेका दिया जाए उसे अपने तरीके से काम करने की आजादी भी मिले। सरकार यदि चाहे तो इसे शुरूआत में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर किसी एक टाइगर रिजर्व में शुरू किया जा सकता है। कांट्रेक्ट में कुछ सख्त शर्ते जोड़ी जानी चाहिए जिसके पूरा न होने की दशा में सुरक्षा एजेंसी को आर्थिक नुकसान का सामना तो करना ही पड़े, उसपर काम से बेदखल होने का खतरा भी मंडराता रहे। बेशक इस तरह के प्रस्ताव और उसपर अमल का रास्ता भारत जैसे देश में बहुत मुश्किल है। विपक्ष इसे सरकार की नाकामी बताते हुए देश के लिए शर्मिंदगी करार देगा और अन्य विरोधी पार्टियां हर गली-चौराहे पर सियापा करती नजर आएंगी। लेकिन जब सरकार परमाणु करार, महिला आरक्षण जैसे मुद्दे पर किसी की परवाह किए बगैर आगे बढ़ सकती है तो फिर बाघ सरंक्षण के लिए भी कड़ा फैसला लिया जा सकता है। जरूरत है तो बस सही समझ और दृढ संकल्प की। उन सभी पाठकों से जो मेरे इस विचार पर सहमति जताते हैं, विनम्र निवेदन है कि इस आश्य का एक पोस्टकार्ड प्रधानमंत्री को जरूर लिखें। आप जरूर सोचेंगे कि उससे कुछ नहीं होना, मैं भी ये अच्छी तरह जानता हूं मगर फिर भी पहल तो हम में से किसी एक को करनी ही पड़ेगी अगर हम अपनी आने वाली पीढियों को बाघ तस्वीरों के बजाए हकीकत में दिखाना चाहते हैं तो।

Saturday, June 12, 2010

बीसीसीआई के लिए देश से बड़ा पैसा

नीरज नैयर
ओलंपिक खेलों में भारत का लचर प्रदर्शन और पदक तालिका में सबसे नीचे रहने का दुख हर भारतवासी को होगा। अभिनव बिंद्रा, विजेंद्र और सुशील कुमार ने जो पदक जीते हैं वो सालों से सूखी जमीन पर पानी की चंद बूंदों की माफिक हैं। जो जमीन को कुछ देर के लिए गीला तो कर सकती हैं मगर उसकी प्यास नहीं बुझा सकतीं। ओलंपिक में भारत आबादी और क्षेत्रफल के लिहाज से अपने से कई गुना छोटे देशों से भी बहुत पीछे है। घरेलू मैदान पर बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले हमारे खिलाड़ी विदेशजमीं पर क्यों सहम जाते हैं, इसका जवाब हमें आजतक नहीं मिल सका है। जिन खिलाड़ियों से सबसे यादा उम्मीदें होती हैं, वही कुछ दूर चलने के बाद हाफंते नजर आते हैं। शायद यही वजह है कि इस तरह के खेलों को न तो मीडिया खास तवाो देता है और न ही लोग उनके परिणाम जानने के लिए उत्साहित दिखाई देते हैं। चंद रोज पहले अजलान शाह कप की संयुक्त विजेता बनकर लौटी भारतीय हॉकी टीम के स्वागत के लिए खुद हॉकी से जुड़े अधिकारियों का न पहुंचना इस बात का सुबूत है कि भारत में ऐसे खेल प्राथमिकता सूची में किस पायदान पर आते हैं।


णहॉकी भारत का राष्ट्रीय खेल है, बावजूद इसके वो बदहाली के दौर से गुजर रहा है तो इसका एक बड़ा कारण खिलाड़ियों का अच्छा परफार्म न कर पाना भी है। हॉकी का विश्व कप इस बार भारत में हुआ, स्टेडियम में भीड़ जुटाने के तमाम प्रयास किए गए जो काफी हद तक कारगर भी हुए लेकिन उसका नतीजा क्या निकला। भारतीय टीम सेमी फाइनल तक में नहीं पहुंच पाई। हॉकी को फिर दिल देने के लिए हॉकी के स्तर में सुधार की जरूरत है। और जब तक ये नहीं होता, हालात बदलने वाले नहीं हैं। हॉकी के अलावा दूसरे खेलों में बेडमिंटन और टेनिस में भारत की स्थिति थोड़ी बहुत ठीक है, लेकिन इतनी भी नहीं कि ओलंपिक में मैडल दिलवा सके। इसलिए लंबे समय से ओलंपिक जैसे आयोजनों में क्रिकेट की कमी खलती आई है। लोग मानते हैं कि बुरे दौर में भी टीम इंडिया गोल्ड मैडल जीतने का माद्दा रखती है। 2020 में होने वाले ओलंपिक खेलों में यदि क्रिकेट खेला गया तो सबसे यादा भारतीय अन्य खेलों की अपेक्षा क्रिकेट पर दांव लगाना पसंद करेंगे। वैसे अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक सीमति (आईओसी) ने आईसीसी को मान्यता देकर ओलंपिक में क्रिकेट का रास्ता साफ कर दिया है। लेकिन आईसीसी के अलावा भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) का भी ओलंपिक में टीम भेजने के लिए राजी होना जरूरी है। जिस तरह का अड़ियल रुख बोर्ड ने एशियन गेम्स को लेकर अपना रखा है अगर वैसा ही उसने ओलंपिक के वक्त अपनाया तो क्रिकेटरों को ओलंपिक में खेलते देखने का सपना सपना बनकर ही रह जाएगा। 12 से 27 नवंबर तक चीन में होने वाले एशियाई खेलों के लिए टीम भेजने से बीसीसीआई ने दो टूक इंकार कर दिया है। इसके पीछे उसने इंटरनेशनल कमिटमेंट का हवाला दिया है। उसका तर्क है कि जिस वक्त में एशियन गेम्स होने हैं, उसी वक्त न्यूजीलैंड को भारत आना है। बोर्ड ने महिला टीम को भी नहीं भेजने का फैसला लिया है।


वैसे ये कोई पहला मौका नहीं है जब बीसीसीआई ने देश से यादा अपने व्यक्तिगत हितों को महत्व दिया हो, इससे पहले 1998 क्वालालंपुर गेम्स में भी बोर्ड ने दूसरे दर्ज की टीम भेजी थी जबकि मुख्य टीम को टोरंटों में सीरीज खेलने भेज दिया था। दिल्ली कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजक भी ट्वेंटी-20 क्रिकेट को शामिल करना चाहते थे लेकिन बीसीसीआई ने ऐसा होने नहीं दिया। यह बेहद दुरर््भाग्यपूण हैं कि बोर्ड के लिए देश के मान-सम्मान से यादा आर्थिक सरोकार मायने रखते हैं। न्यूजीलैंड के साथ मैच खेलने से यादा जरूरी था कि क्रिकेटर एशियाई खेलों में देश का प्रतिनिधित्व करते। जो बीसीसीआई अति व्यस्त कार्यक्रम के बीच में भी आईपीएल का आयोजन कर सकता है, उसके लिए एशियन गेम्स के लिए महज 15 दिन जुटाना कोई बड़ी बात नहीं थी। पिछली दो बार से आईपीएल ट्वेंटी-20 वर्ल्ड कप से ठीक पहले हो रहा है, और इसबीच टीम इंडिया कई अन्य टूर्नामेंट भी खेल लेती है। लेकिन बोर्ड को इसमें कभी कोई परेशानी महसूस नहीं हुई। क्योंकि इन टूर्नामेंटों से उसकी आर्थिक सेहत अच्छी होती है। आईपीएल से उसे करोड़ों-अरबों का मुनाफा होता है, जबकि एशियन गेम्स जैसे आयोजनों में टीम भेजकर उसे सम्मान के अलावा कुछ भी हासिल नहीं होने वाला। बोर्ड भले ही इंटरनेशल कमिटमेंट का बहाना बनाए मगर सच सही है कि उसे न्यूजीलैंड सीरिज से होने वाली आय नजर आ रही है। उसे पता है कि टेलीकास्ट राइट्स और प्रायोजकों के जरिए जितनी कमाई उसे न्यूजीलैंड के साथ मैच खेलकर हो सकती है, उतनी एशियाई खेलों में टीम भेजकर नहीं।


णये बात सही है कि आर्थिक हितों का ध्यान हर कोई रखता है, और इसमें कोई बुराई भी नहीं है लेकिन जब बात देश की हो तो मुनाफा मायने नहीं रखना चाहिए। वैसे भी बोर्ड आजतक चैरिटेबल संस्था की आड़ में अरबों का मुनाफा कमाता आया है। दुनिया के सबसे अमीर बोर्ड का दर्जा पाने वाले बीसीसीआई का सामाजिक दायित्व से भी दूर-दूर का नाता नहीं है। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का सालाना कारोबार करोड़ों रुपए का है, महज टीवी करार से ही उसने करोड़ों-अरबों की कमाई कर लेता है। अभी हाल ही में संपन्न हुई इंडियन प्रीमियर लीग के दौरान भी उसने जमकर धन कूटा। मगर आज तक शायद ही कभी कोई ऐसी खबर सुनने में आई हो जब बोर्ड ने खुद आगे बढ़कर समाज के लिए कुछ किया हो। सिवाए बरसो-बरस आयोजित होने वाले एक-दो चैरिटी मैचों के। अक्सर सुनने में आता है कि फंला खिलाड़ी ने आर्थिक तंगी के चलते मौत को गले लगा लिया, इसका एक उदाहरण उत्तर प्रदेश का है, जहां कुछ वक्त पहले आर्थिक बदहाली ने एक होनहार रणजी खिलाड़ी को जान देने पर मजबूर कर दिया। क्या बीसीसीआई का ऐसे खिलाड़ियों के प्रति कोई दायित्व नहीं। बोर्ड कतई चैरिटी न करे मगर इतना तो कर सकता है कि क्रिकेट मैच के टिकट ब्रिकी से होने वाली आय में से एक रुपया ऐसे खिलाड़ियों के कल्याण में लगा दे। देश के लिए कुछ करना तो दूर की बात है अपनी खिलाड़ी बिरादरी बोर्ड कुछ करने को तैयार दिखाई नहीं देता। इतना बड़ा कारोबार और चमक-धमक महज मनोरंजन तक ही सीमित है।


आईपीएल के अलावा बोर्ड पिछले दिनों इंरट कॉर्पोरेट टूर्नामेंट भी शुरू करने का फैसला कर चुका है, भारी इनामी राशि वाला यह टूर्नामेंट 50-50 और 20-20 दोनों फॉर्मेट में खेला जाएगा। विजेता टीम को एक करोड़, उपविजेता को 50 लाख और सेमीफाइनल में हारने वाली टीमों को 25-25 लाख रुपए इनाम स्वरूप दिए जाएंगे। इन सबके लिए बोर्ड के पास भरपूर वक्त है, लेकिन एशियन गेम्स में टीम भेजने के लिए नहीं। आईओए के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी अगर बीसीसीआई को पैसे के पीछे भागने वाला कह रहे हैं तो इसमें कुछ गलत नहीं। बीसीसीआई आज पूरी तरह से कॉमर्शियल हो चुका है, और उसे जहां मुनाफा नजर आएगा वो वहीं टीम भेजेगा। यदि एशियाई खेलों से उसे मोटी कमाई हो रही होती तो इंटरनेशल कमिटमेंट के बहाने बनते ही नहीं। बोर्ड की इस बहानेबाजी से ओलंपिक में टीम इंडिया के खेलने के सपनों पर बादल मंडराने लगे हैं और उनके छटने की संभावना बहुत क्षीण नजर आ रही है।

Monday, May 24, 2010

तांगे-रिक्शे पर बैन लगाकर क्या होगाU

नीरज नैयर
आर्थिक प्रगति की दौड़ में भागे जा रही दिल्ली में अब तांगे दिखाई नहीं देंगे। नई दिल्ली के बाद पुरानी दिल्ली में भी घोड़ा गाडियों पर प्रतिबंध लगाया गया है। वैसे तांगे वालों के पुर्नवास के लिए कुछ कदम जरूर उठाए गए हैं लेकिन वो कितने कारगर साबित होंगे इसका इल्म सरकार को भी बखूबी होगा। तांगे शायद सरकार को संपन्नता की चादर में पैबंद की माफिक लग रहे होंगे, घोड़े के टापों की अवाज उसके लिए सिरदर्द बन रही होगी, इसलिए शीला सरकार को प्रतिबंध के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं सूझा। घोड़ा गाड़ी पर बैन लगाने से महज तांगा चलाने वाले ही प्रभावित नहीं होंगे बल्कि घोड़े के पैरों में नाल लगाने वाले, चाबुक बनाने वाले, गाड़ी बनाने वाले जैसे लोगों को भी रोजगार के दूसरे विकल्प तलाशने होंगे। इसका सीधा सा मतलब है कि बेराजगारों की फेहरिस्त में कुछ लोग और शामिल हो जाएंगे। आधुनिक जमाने में जहां मेट्रो ट्रेन और ट्रांसपोर्ट के कई अन्य अत्याधुनिक साधन मौजूद हैं, तांगों को पुराना जरूर कहा जा सकता है मगर इनकी उपयोगिता पर उंगली नहीं उठाई जा सकती। ये बेहद चिंतनीय विषय है कि एक तरफ तो हम जलवायु परिवर्तन के प्रति गंभीरता बरतने की बात करते हैं और दूसरी तरफ इको फ्रेंडली ट्रांसपोर्टेशन को हतोत्साहित करने में लगे हैं।

हो सकता है कि तंग गलियों में घोड़े गाड़ियों की आवाजाही से परेशानियां बढ़ जाती हों लेकिन इसका हल प्रतिबंध लगाकर तो नहीं निकाला जा सकता। तांगे या रिक्शे ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कोई योगदान नहीं देते बावजूद इसके भी हम महज आधुनिक दिखने की धुन में प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं। अत्याधुनिक तकनीक अपनाकर दुनिया के साथ कदम साथ कदम मिलना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है उन पारंगत साधनों को प्रोत्साहित करना जो हमारे भविष्य को प्रभावित करते हैं। दिल्ली की तरह ही कुछ वक्त पहले कोलकाता की शान कहे जाने वाले रिक्शों पर प्रतिबंध लगया गया था, वो रिक्शे जो हजारों लोगों की जीविका का एकमात्र साधन थे। इस तरह के फैसले न केवल समाज के निचले तबके के प्रति सरकारों की गैरजिम्मेदाराना सोच को उजागर करते हैं बल्कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने के हमारे दावों की हकीकत भी सामने लाते हैं। पर्यावरण मंत्रालय द्वारा हाल ही में पेश की गई रिपोर्ट के मुताबिक भारत में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 13 वर्ष की अवधि में करीब तीन फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। रिपोर्ट में पर्यावरण के लिए घातक कही जाने वाली गैसों के उत्सर्जन में 1994 की तुलना में 2007 तक आए परिवर्तन का आंकलन है। हालांकि ये रफ्तार अमेरिका और चीन के मुकाबले काफी कम है। अमेरिका 20 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन करता है। 2005 में दुनिया का प्रति व्यक्ति ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन 4.22 टन था जबकि भारत का औसत 1.2 टन है। पर फिर भी तीन फीसदी की बढ़ोत्तरी को कहीं न कहीं रणनीति पर पुनर्विचार के संकेत के रूप में देखा ही जाना चाहिए। ग्रीन हाउस गैसों को सीएफसी या क्लोरो फ्लोरो कार्बन भी कहते हैं। इनमें कार्बन डाई ऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और वाष्प मौजूद रहते है। ये गैसें खतरनाक स्तर से वातावरण में बढ़ती जा रही हैं और इसका नतीजा ये हो रहा है कि ओजोन परत के छेद का दायरा लगातार फैल रहा है। ओजोन की परत ही सूरज और पृथ्वी के बीच एक कवच की तरह काम करती है। इस कवच के कमजोर पड़ने का मतलब है, पृथ्वी का सूरज की तरह तप जाना। मौजूदा वक्त में ही हम काफी हद तक उस स्थिति को महसूस कर रहे हैं।


इस साल गर्मी ने अप्रैल-मई में ही सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले हैं। अब जरा सोचिए कि अगर तापमान बढ़ने की रफ्तार कुछ यही रही तो आने वाले कुछ सालों में क्या दिन में घर से बाहर निकलना मुमकिन हो पाएगा। हो सकता है कि दिन में लगने वाले बाजार रात में लगे, लोग रात को शॉपिंग पर जाएं, दफ्तरों में काम रात में हो। यानी दिन रात बन जाए और रात दिन। ये बातें अभी सुनने में जरूर अजीब लग रही होंगी, लेकिन जितनी तेजी से मौसम में परिवर्तन हो रहा है, उसमे कुछ भी मुमकिन है। इसलिए विश्व के हर मुल्क को अपनी सुख-सुविधाओं में कटौती करने जैसे कदम उठाने होंगे। छोटे-छोटे प्रयासों से ही बड़ी-बड़ी योजनाओं को मूर्तरूप दिया जा सकता है। अगर अब भी हम विकसित और विकासशील के झगड़े में उलझकर एक-दूसरे पर उंगली उठाते रहेंगे तो हमारा आने वाला कल निश्चित ही अंधकार मे होगा। जलवायु परिवर्तन के खतरे को टालने का सबसे कारगर तरीका यही हो सकता है कि प्रदूषण के बढ़ते स्तर को कम किया जाए, और उसके लिए यातायात के परंपरागत साधनों को अपनाने में शर्म हरगिज महसूस नहीं होनी चाहिए। फिलीपिंस की राजधानी मनीला ने इस दिशा में एक अच्छी पहल की है, जिसपर विचार किया जा सकता है। मनीला प्रशासन ने बैटरी चलित बसों को पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन के काम में लगाया है और इसमें यात्रा बिल्कुल मुफ्त रखी गई है। ऐसा निजी वाहनों के प्रयोग में कमी लाने के उद्देश्य से किया गया है। सारा खर्चा प्रशासन खुद वहन कर रहा है। इस योजना के शुरू होने के बाद से काफी तादाद में लोगों ने दफ्तर आदि जाने के लिए निजी वाहनों का प्रयोग बंद कर दिया है। जरा अंदाजा लगाइए कि प्रतिदिन यदि 100 वाहन भी सड़क पर नहीं दौड़े तो पर्यावरण को कितना फायदा पहुंचा होगा।


भारत में तांगे-रिक्शे के रूप में अच्छे-खासे विकल्प मौजूद हैं मगर स्थानीय प्रशासन और राय सरकार दोनों ही आधुनिकता का चोला ओढ़ने पर आमादा हैं। यूएन की एक स्टडी रिपोर्ट में कुछ समय पूर्व ये खुलासा किया गया था कि आने वाले 20 से 30 साल में भारत जलवायु परिवर्तन से सबसे यादा प्रभावित होने वाले देशों में शुमार होगा। यहां, सूखा और तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाएं बढ़ सकती हैं। रिपोर्ट के अनुसारएशिया में भारत के अलावा पाकिस्तान, अफगानिस्तान और इंडोनेशिया उन देशों में शामिल हैं, जो अपने यहां चल रही राजनैतिक, सामरिक, आर्थिक प्रक्रियाओं के कारण ग्लोबल वॉर्मिंग से सबसे यादा प्रभावित होंगे। ऐसे ही सांइस पत्रिका की प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत समेत तीसरी दुनिया के अधिकांश देशों को तेजी से बढ़ती जनसंख्या और उपज में कमी की वजह से खाद्य संकट का सामना करना पड़ेगा। तापमान में बढ़ोतरी से जमीन की नमी प्रभावित होगी, जिससे उपज में और यादा गिरावट आएगी। इस लिहाज से देखा जाए तो जलवायु परिवर्तन के खतरे को भारत सरकार जितना कम आंकती आई है, हालात उससे यादा खराब होने वाले हैं। जलवायु परिवर्तन को लेकर हमारी सरकार जितनी ढुलमुल है उतनी ही सुस्त यहां की जनता भी है।


अगर सरकार की तरफ से कोई पहल की भी जाती है तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि लोग उसका खुलेदिल से स्वागत करेंगे। अर्थ ऑवर इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। देश की आबादी का एक बड़ा तबका इसे महज चोचलेबाजी करार देकर अपना पल्ला झाड़ लेता है, जबकि ग्लोबल वॉर्मिंग के खतरों से वो खुद भी अच्छी तरह वाकिफ है। इसलिए पर्यावरण मंत्रालय को अब अपनी आराम तलबी की आदत से बाहर निकालकर कुछ कदम उठाने चाहिए, उसे महज अर्थ ऑवर जैसी अपील करने के बजाए दिशा निर्देश तय करने होंगे जिसका पालन करने के लिए हर कोई बाध्य हो। कुछ प्रमुख ऐतिहासिक स्थल जैसे ताजमहल आदि के आस-पास एक निर्धारित परिधि में वाहनों की आवाजाही पर प्रतिबंध है, केवल बैटरी चलित वाहन ही वहां जा सकते हैं। इस व्यवस्था का शुरूआत में जमकर विरोध हुआ लेकिन आज सब इसके आदि हो चुके हैं। इसी तरह वो प्रमुख शहर जो प्रदूषण फैलाने में सबसे आगे हैं, के कुछ इलाके चिन्हित करके वहां ऐसी व्यवस्था लागू करने पर विचार-विमर्श किए जाने की जरूरत है। णहम यादा कुछ नहीं कर सकते तो कम से कम वाहनों से होने वाले प्रदूषण पर तो लगाम लगा ही सकते हैं। सड़कों पर जितने यादा तांगे-रिक्शे और बैटरी चलित वाहन दौड़ेंगे हमारे भविष्य की संभावनाएं उतनी ही अल्हादित करने वाली होंगी। अगर पारंपरिक साधनों को अपनाकर हम अपना कल खुशहाल कर सकते हैं तो फिर आधुनिकता को एक दायरे में सीमित रखने में बुराई क्या है। कम से कम इससे कुछ घरों के चूल्हे तो जलते रहेंगे।

Tuesday, May 11, 2010

बेगानी शादी में अब्दुल्ला

दीवाना
नीरज नैयर
बीते दिनों मीडिया ने किसी खबर पर ध्यान केंद्रित किया तो वो थी सानिया-शोएब की शादी। पाकिस्तानी क्रिकेटर और भारतीय टेनिस सनसनी एक पखवाड़े तक मीडिया में सुखियां बटोरते रहे। सीमा के इस पार और उस पार दोनों तरफ सानिया और शोएब के बीच तीसरी कड़ी के रूप में सामने आईं आयशा के आरोपों का सच खंगालने में मीडिया ने कोई कसर नहीं छोड़ी। निकाहनामे की प्रति से लेकर उस पर अंकित दस्तखतों की बारीकी से जांच की गई, मुल्ला-मौलवियों के बयान लिए गए, यह बताने की कोशिश की गई कि कौन सही है और कौन गलत। कभी आयशा के आरोपों को उनके वजन के अनुरूप वजनी बताया गया तो कभी शोएब के बयानों में सच्चाई का अहसास कराया गया। खबरिया चैनलों ने तो इस खबर के एक-एक एंगेल को इतनी बार दिखाया कि इस लव कम मैरिज ट्रायंगल के हर पात्र का नाम लोगों को मुंह जुबानी याद हो गया। आयशा के मां-बाप से लेकर शोएब के जीजा तक को लोग ऐसे पहचानने लगे जैसे ये सब किसी सास-बहू टाइप हाईप्रोफाइल सीरियल के हाईप्रोफाइल किरदार हों। हर चैनल ने खुद को नंबर वन साबित करने की कवायद में पत्रकारों को मच्छरों की माफिक आयशा और सानिया के घरों के इर्द-गिर्द छोड़ दिया। दोनों परिवारों की हर हरकत पर निगाह रखी गई,

सानिया की बालकनी में लगे कैमरे की कहानी कैमरे की जुबानी बताने के लिए एक-दो घंटे के स्पेशल प्रोग्राम तक तैयार किए गए। रात-रात भर उल्लू की तरह जागकर मीडियावाले शोएब के सानिया के घर आने की राह तकते रहे। शोएब-आयशा के तलाक के बाद जब मामला सुलझ गया तो सानिया के होने वाले शौहर द्वारा बोले गए झूठों को एक-एक करके ऐसे दिखाया गया मानो इससे बड़ी कोई खबर ही न हो। और तो और मीडियावालों ने ये तक खुलासा कर दिया कि सुलह-समझौते के लिए शोएब को 15 करोड़ ढीले करने पड़े हैं। शादी में कौन आएगा, कौन नहीं, खाने का मीनू क्या होगा आदि..आदि पर भी विस्तार से चर्चा की गई। अब जब निकाह हो चुका है तो उसके जल्दी होने की वजह तलाशी जा रही हैं, योतिषियों से सानिया-शोएब के भविष्य का आकलन करवाया जा रहा है। उनके हनीमून के कयास लगाए जा रहे हैं। वैसे ये अकेले सानिया और शोएब की शादी की ही बात नहीं है। मीडिया हर हाईप्रोफाइल शादी में बिन बुलाए मेहमान की तरह शिरकत करने की आदत सी हो गई है, फिर चाहे इसके लिए लात-घूंसे ही क्यों न खाने पड़े। ऐश-अभिषेक, हर्ले-नायर की शादी के वक्त भी कुछ ऐसा ही माहौल तैयार किया गया था। देखा जाए तो नेता और पत्रकार बेशक अलग-अलग पेशे से जुड़े हों मगर दोनों में दो बातों बिल्कुल समान हैं। पहली सहनशीलता और दूसरी जल्द भूलने की आदत। जिस तरह नेता दुत्कारे जाने के बाद भी चुनाव के वक्त हाथ जोड़कर वोट मांगने पहुंच जाता है,


उसी तरह भी लात-घूसें खाने के बाद कैमरा और माइक लेकर फिर खड़ा हो जाता है। ऐश-अभिषेक की शादी के वक्त फोटो खींचने के चक्कर में कोई अस्पताल पहुंचा तो किसी को दिन में ही तारे नजर आ गए। तारे गिनते-गिनते जब लगा कि हमारी बेइाती हो गई है तो हल्ला शुरू कर दिया। लेकिन जैसे ही अमिताभ ने साफ कि मीडियाकर्मियों पर चली लात हमारी नहीं अमर सिंह की थी, फिर उधेड़बुन चालू हो गई कि ऐश ने जया को पहली बार सासू मां कहा होगा या कुछ और। अभि ने ऐश को झुमका दिया होगा या हीरों का हार आदि.. आदि। प्रतीक्षा और जलासा में जश् खत्म होने के लंब समय तक टीवी चैनलों पर यह दौर जारी रहा। कहीं उनके हनीमून को लेकर कयास लगाए गए तो कहीं सास-बहु के रिश्ते को लेकर। मौजूदा वक्त में भी बिग-बी के परिवार से जुड़ी हर खबर को स्पेशल ऐपीसोड़ बनाकर दिखाया जाता है। मीडिया पर जिस तरह का नशा सवार है, उसमें कोई तााुब नहीं होगा कि आने वाले दिनों में चैनल वाले इस बात भी मंथन शुरू कर दें कि ऐश-अभि के बच्चे का नाम क्या होगा। अगर नाम ये होगा तो शुभ होगा या अशुभ होगा। अगर नाम वो होगा तो ऐसा हो गया या वैसा होगा। इसके लिए नामी गिरामी योतिषियों की राय ली जाएगी और एक न झिलने वाले कार्यक्रम को चमका-दमकाकर हफ्ते भर का कोटा पूरा कर लिया जाएगा। जूनियर बच्चन की शादी की खबरों के सामने आने के साथ ही जैसे ये हर चैनल का धर्म बन गया था कि एक घंटा बच्चन परिवार को दिखाया ही जाएगा। अमिताभ ने भले ही कुंडलियां न मिलवाई हों मगर मीडिया ने कुंडलियां भी मिलवाईं,


गुण-दोष भी बताए और उपाए भी निकालकर भी सामने रख दिए। विशेषज्ञों को बिठाकर आकलन भी कर डाला कि ऐश का मंगल कहीं अमंगल न कर दे। शादी में कौन आएगा, कौन नहीं, कार्ड पर लिखने वाला पैन देशी है या विदेशी। लड्डू बूंदी के होंगे या बेसन के, दूध में चीनी कम होगी या यादा। ऐसी हर छोटी-छोटी बातों को मीडिया ने खूब तड़का लगाकर पेश किया। चैनल वालों ने बच्चन भक्ति में अपना आध समय भेंट किया तो अखबार वालों ने आधा पेपर। मगर अंत में दोनों को क्या मिला चंद लातें और घूंसे। बावजूद किसी के चेहरे पर कोई शिकन नहीं दिखी। गाहे-बगाहे अगर जहन में कभी लात का ख्याल आ भी जाता है तो ये सोचकर तसल्ली कर ली जाती है कि वो लात बिग-बी की नहीं अमर सिंह की थी। हां, नायर-हर्ले के मामले में कभी-कभी टीस जरूर उठ जाती है। ऐश-अभी, सानिया शोएब की शादी की तरह लिज हर्ले और अरुण नायर की शादी को भी ने दिल खोलकर कवरेज दिया। लिज के लहंगे से लेकर नायर की शेरवानी तक पर कितना खर्च किया गया, सब पर मीडिया की नजर थी। नायर को जिस तरह से तवाो दी जा रही थी, उसे देखकर लग रहा था जैसे मुल्क की सल्तनत के किसी राजकुमार की वतन वापसी हुई है। और वो किसी राजकुमारी से शादी रचाने जा रहा है। पर हकीकत में न तो नायर ने राजकुमार जैसे कुछ काम किए और न ही हर्ले राजकुमारी के फ्रेम में फिट बैठती थीं। मीडिया वाले शादी में घराती भी बने और बराती भी,


डोली भी सजाई और स्टेज भी। शादी के वक्त किले के बाहर पहरेदार की भूमिका भी निभाई तो विदाई के वक्त आंसू भी बहाए। मगर अंत यहां भी कुछ फिल्मी अंदाज में ही हुआ। चंद लात और घूंसों से नायर दंपत्ति ने बिन बुलाए मेहमानों का स्वागत किया बैग में पहले से तैयार तख्तियां काम आ गईं। जिन समाचार चैनलों के पत्रकार पिट रहे थे वो बार-बार इस नजारे को दिखाए जा रहे थे और जिन समाचार पत्रों के पत्रकार ठुक रहे थे वो कल के लिए मैटर जुटाए जा रहे थे, इस आस में कि हर्ले-नायर के सॉरी कहते ही गिले-शिकवे दूर कर दिए जाएंग। जैसे बच्चन परिवार के साथ कर दिए गए थे। मगर अफसोस कि ऐसा कुछ नहीं हुआ। नायर दंपत्ति ने उड़ान भरी और मीडियावालों को मुंह चिढ़ाते हुए निकल लिए। ऐसे ही करिश्मा कपूर की शादी के वक्त भी मीडियावालों को मुंह की खानी पड़ी थी। गनीमत रही कि सानिया-शोएब की शादी के वक्त ऐक्शन देखने को नहीं मिला। इसके पीछे जरूर दोनों परिवारों की नकरात्मक छवि रही। अगर प्यार में आयशा नाम का टि्वस्ट नहीं आता तो निश्वित ही मीडिया वाले लात-घूंसे खा रहे होते और प्रोग्राम दिखा रहे होते। बेगानी शादी में अब्दुल्ला की तरह दीवानगी दिखाने की मीडिया की आदत सी हो गई है और ये आदत हमें कभी कई और रोमांच महसूस करवाएगी।

Tuesday, April 6, 2010

जीडीपी में ही उलझी रही सरकार

नीरज नैयर
कांग्रेस ने जब सत्ता के लिए जनता से समर्थन मांगने का सिलसिला शुरू किया तो उसकी जुबां पर आम आदमी का जिक्र था। पार्टी ने 'कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ' जैसे प्रभावशील नारे दिए। अपने एजेंडे में आम आदमी को सबसे ऊपर रखा, उसकी जरूरतों का ख्याल रखने का भरोसा दिलाया, समृध्दि और खुशहाली का वादा किया। लेकिन सत्ता में आने के बाद सबकुछ एक ही झटके में भुलाकर रख दिया। कांग्रेस और यूपीए सरकार के चाहने वालों की लंबी चौड़ी लिस्ट है, अखबारात में आय दिन महंगाई पर उसका बचाव करने वाले लेख पढ़ने को मिल जाया करते हैं। अब जिनको कलम चलाने के ऐवज में अच्छी-खासी रकम मिल जाती है, उनके लिए क्या महंगाई और क्या वादा खिलाफी। विचारधारा, नैतिकता और सत्यता जैसे शब्दों का मिश्रण आजकल वैसे भी देखने को कहां मिलता है, हर कोई बाजारवाद का हिस्सा बनकर अपनी योगयता को कैश करवाने में लगा है। यदि फलां पार्टी की शान में दो-चार कसीदे पढ़कर जेब थोड़ी और भारी हो जाती है तो इसमें बुराई ही क्या है, यही मानसिकता मौजूदा वक्त में अधिकतर लेखों की जननी है। णएक सामान्य व्यक्ति जिसे महंगाई और सरकार के जिम्मेदार नेताओं के गैरजिम्मेदार बयानों का मतलब समझ में आता है, कांग्रेस को पासिंग मार्क्स भी नहीं दे सकता। पहले कार्यकाल के पांच साल और दूसरे कार्यकाल के इन 10 महीनों में सरकार ने सही मायनों में आम आदमी के लिए कुछ किया है तो बस उसकी मुश्किलों में इजाफा।


कोई कितना भी इनकार करे, मगर हकीकत यही है कि कांग्रेस के एजेंडे में अब आम आदमी के लिए कोई जगह नहीं, कम से कम चुनाव आने तक तो बिल्कुल नहीं। सरकार का पूर फोकस इस वक्त पूंजीपतियों को खुश करने और जीडीपी दर को गति देने पर है। जीडीपी यानी ग्रास डॉमेस्टिक प्रोडेक्ट (सकल घरेलू उत्पाद) को किसी भी देश की समृध्दि का प्रतीक माना जाता है, जिस देश की जीडीपी आगे की तरफ बढ़ रही होती है उसे विकास के पथ पर मजबूत खिलाड़ी के रूप में देखा जाता है. भारत के सकल घरेलू उत्पाद की रफ्तार भी पिछले कुछ समय से अच्छी खासी बनी हुई है, इसलिए माना जा रहा है कि देश का विकास बहुत तेजी से हो रहा है. सरकार इन आंकड़ों को देखकर प्रफुल्लित है और अर्थशास्त्री इसे विकासशील से विकसित बनने के फासले को कम होना बता रहे हैं. शायद इसलिए सरकार बढ़ती महंगाई को लेकर जरा भी फिक्रमंद नहीं है, उसे लग रहा है कि विकास दर में इजाफे का संबंध लोगों के जीवन स्तर में सुधार से है. आंकड़ों के नजरिए से देखा जाए तो उसकी यह सोच काफी हद तक सही है लेकिन वास्तविकता में इसके लिए कोई जगह नहीं. शुरूआती दौर में जीडीपी जैसे सूचकांक आर्थिक गतिविधियों को मापने का काम करते थे और आज भी कर रहे हैं मगर आज उन्हें समाज की सुख-शांति के प्रतीक के रूप में भी देखा जाने लगा है. जबकि हकीकत ये है कि इस तरह के आकलन मानव जीवन के उन पहलुओं से कोई सरोकार नहीं रखते जो उसे सुखी, संतुष्ट और संपन्न बनाने में सहायक हैं. यही वजह है कि कई विशेषज्ञ प्रगति मापने के इस तरीके पर सवाल उठाते रहे हैं. नोबल पुरस्कार विजेता आर्मत्य सेन ने तो इसके लिए एक वैकल्पिक मॉडल की विकसित किया था जिसमें उन तमाम बिंदुओं को शामिल किया गया जो वास्तव में विकास को परिभाषित कर सकें.



संयुक्त राष्ट्र महासंघ भी कुछ इसी आधार पर अपनी सालाना मानव विकास रिपोर्ट जारी करता है, मानव विकास इंडेक्स निकालने के लिए औसत उम्र, मातृ शिशु जीवन दर, शिक्षा, जीवन स्तर आदि को शामिल किया जाता है. संयुक्त राष्ट्र विकास संगठन द्वारा 2005 में जारी की गई ऐसी ही एक रिपोर्ट में भारत के आर्थिक विकास का असली चेहरा उजागर हुआ था, इस रिपोर्ट में कहा गया कि ऊंची आर्थिक वृध्दि दर के फायदे अभी भारत में गरीबों तक नहीं पहुंच पाए. भारत में प्रति व्यक्ति आय पिछड़े माने जाने वाले अफ्रीकी देश होंडूरास और वियतनाम के बराबर है, लेकिन नवजात शिशुओं की मत्यु दर उनसे कहीं यादा. यहा सिर्फ 42 प्रतिशत शिशुओं को टीका लग पाता है, इसलिए विश्व में मरने वाले हर पांच बच्चों में से एक भारतीय होता है. रिपोर्ट में दक्षिण एशिया में सबसे अच्छी स्थिति श्रीलंका की रही, भारत को मानव विकास सूचकांक में 127वें स्थान पर रखा गया. इस रिपोर्ट के बारे में कहा गया था कि यह संस्करण पिछले संस्करणों में यादा व्यापक है और इसमें जीवन के तमाम पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास किया गया है. श्रीलंका आर्थिक विकास दर के मामले में भारत के आसपास भी नहीं फटकता, इसका कारण वहां दशकों तक चला तमिल संघर्ष रहा. 2005 में जब यह रिपोर्ट जारी हुई तब भी वहां कोई अच्छी स्थिति नहीं थी, सरकार की कमाई का आधे से यादा हिस्सा लिट्टे के खिलाफ अभियान में ही चला जाता था बावजूद इसके मानव विकास के मामले में उसका भारत से श्रेष्ठ साबित होना दर्शाता है कि वहां महज आर्थिक स्तर को विकास का पैमाना नहीं माना जाता.




2005 से 2009 के बीच देश के आर्थिक आंकड़ों में जबरदस्त उछाल आया है, लेकिन इस दौरान जीवन स्तर में सुधार का प्रतिशत कुछ खास नहीं रहा. अगर लोगों की तनख्वाह बढी तो उससे यादा महंगाई बढ़ गई, महंगाई ने नए-नए कीर्तिमान स्थापति किए. कुछ पहले जब मुद्रास्फीति की दर बहुत नीचे चली गई थी, तब भी आम लोगों को उसका फायदा नहीं मिल। हालात ये हो चले हैं कि पहले किसी तरह गुजर बसर करने वालों के सामने अब दो वक्त की रोटी का भी संकट पैदा हो गया है। ऐसी स्थिति में आर्थिक विकास को आम जनता के जीवन स्तर में सुधार और खुशहाली का प्रतीक कैसे समझा जा सकता है। हमारे देश में जीडीपी दर को लेकर भविष्यवाणियां की जाती हैं और उनको सच करने की दिशा में पर्याप्त कदम भी उठाए जाते हैं, मौजूदा सरकार में अर्थशास्त्रियों की लंबी चौड़ी फौज महज इस काम में ही मशगूल रहती है। लेकिन महंगाई नियंत्रित करने को लेकर न तो कोई भविष्यवाणी की जाती है और न ही ठोस कदम उठाए जाते हैं। जबकि इसका सीधा संबंध आम जनता से है। इस मामले में शायद फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने देश की बागडोर संभालने के बाद जीडीपी से यादा मानव विकास पर जोर दिया। कुछ वक्त पहले उन्होंने दुनिया के दूसरे देशों से भी जीडीपी जैसे आंकड़ों से आगे बढ़कर देखने की अपील की थी। उन्होंने बेवाक अंदाज में कहा था कि काफी लंबे समय से किसी देश की प्रगति को उसके आर्थिक आंकड़ों से नापा जा रहा है, लेकिन इस तरह के आंकड़े जितना भला नहीं कर रहे, उससे यादा समाज का नुकसान कर रहे हैं।



सरकोजी ने महज बयानबाजी ही नहीं की बल्कि इस सोच के आधार पर अपनी घरेलू नीतियों में बदलाव के परिणामों का भी जिक्र किया। गौर करने वाली बात ये है कि पिछले कुछ सालों में फ्रांस की आर्थिक विकास दर में कुछ खास बढ़ोतरी नहीं आई है, लेकिन लोग वहां भारत के मुकाबले कहीं यादा खुश हैं। आर्थिक तरक्की खुशहाली का पैमाना नहीं होती ये तो निजी जीवन में भी साबित होता रहता है, जो परिवार आर्थिक रूप से संपन्न है जरूरी नहीं कि वो सुखी भी हो। सरकार को ये बात समझनी चाहिए, अगर सरकार ने जीडीपी की तरह महंगाई को रोकने के बारे में गंभीरता से सोच-विचार किया होता तो निश्चित ही आम आदमी के चेहरे पर खुशी के भाव झलक रहे होते। कहने वाले कह सकते हैं कि विकास और तरक्की की दिशा में यूपीए सरकार का योगदान कोई झुठला नहीं सकता। हमने चांद पर तिरंगा लहराया, परमाणु संपन्न देशों में जमात में अपना नाम दर्ज करवाया, जिसके लिए हम अब तक इंतजार कर रहे थे। पिछले 70 महीनों में मुल्क की इन ऐतिहासिक उपलब्धियों के लिए कांग्रेस नीत यूपीए सरकार को निश्चित ही सराहा जाना चाहिए, मगर आम जनमानस की उम्मीदों पर जो उसने तुषारापात किया उसका क्या? क्या चांद की उपलब्धि ने भूख से बिलकते बच्चों के मुंह में निवाला डाल दिया, विकास दर पर ध्यान केंद्रित करना जरूरी है लेकिन उससे भी यादा जरूरी है उस आम इंसान की जरूरतों पर गौर करना जो अपने बेहतर कल की उम्मीदे में वोट देता है।

Monday, March 15, 2010

हुसैन के साथ जो हुआ अच्छा हुआ

नीरज नैयर

हमेशा चर्चा में रहने वाले चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन एक बार फिर चर्चा में हैं। लेकिन इस बार चर्चा का मुद्दा थोड़ा अलग है। मकबूल साहब ने भारतीय का चोला उतारकर अब कतर की नागरिकता हासिल कर ली है। वो पिछले काफी समय से निर्वासित सा जीवन बिता रहे थे। भारत सरकार ने उन्हें सुरक्षा की गारंटी भी दी मगर हुसैन वापसी की हिम्मत नहीं जुटा पाए। देश के तमाम बुध्दिजीवी और चित्रकार हुसैन के इस कदम पर आहत और आक्रोशित हैं। आहत इसलिए की एक महान चित्रकार का साथ उनसे छूट गया और आक्रोशित इसलिए कि चंद हिंदुवादी संगठनों के अमानवीय कृत्यों ने मकबूल साहब को इतना बड़ा फैसला लेने के लिए मजबूर कर दिया। हुसैन के समर्थकों का मानना है कि वो रंगों और रेखाचित्रों के चित्रकार हैं। उनके यहां नख-शिख चित्रण नहीं होता, आमतौर पर वह चेहरा भी नहीं बनाते। जिस चित्र को लेकर इतना विवाद उठा वो भी एक रेखाचित्र था। साफ है कि नगनता हुसैन में नहीं बल्कि उसका विरोध करने वालों की आंखों में है। वो ये तर्क भी देते हैं कि जब मंदिरों की दीवारों पर मिथुन चित्रकारी मिलती हैं,

शिव-पार्वती के प्रेम संबंधों का बखान किया जाता है, श्रीकृष्ण की रास लीलाओं पर आनंदित हुआ जाता है तो फिर एक चित्रकार की भावनाओं पर इतना हंगामा क्यो मचाया गया। यह बात सही है कि हमारे देश में अभिव्यक्ति की स्वत्रंता है, लेकिन जब यह स्वतंत्रा किसी समुदाय विशेष की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का कारण बन जाए तो बवाल मचना लाजमी है। हुसैन का समर्थन करने वालों को जरा चित्रकारी का चश्मा उतारकर उनके द्वारा बनाई गईं कला-कतिृयों पर भी गौर फरमाना चाहिए। मकबूल फिदा हुसैन के निशाने पर हिंदू धर्म के अराध्य ही रहे, उन्होंने देवी-देवताओं के तमाम नगन चित्र बनाएं। भारतीयता की बात करने वाले हुसैन ने तो भारत माता को भी नहीं बख्शा, उनका भी बेहद आपत्तिजन चित्रण कर डाला। हुसैन साहब खुद को धर्मनिरपेक्ष कहते हैं, यदि वास्तव में ऐसा होता तो उनकी कूंची कभी इस्लाम या ईसायत के खिलाफ क्यों नहीं चली। सच यही है कि हुसैन ने अपनी चित्रकारी से लाखों-करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं को आहत किया। उन्होंने अपने फूहड़ चित्रों को लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचने का जरिया बनाया। लिहाजा हुसैन के कदम के लिए हिंदुवादी संगठनों को दोषी हरगिज नहीं ठहराया जा सकता। केवल भारत ही नहीं, जहां कहीं भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई गई, वहां दंगे भड़के,

विरोध-प्रदर्शन हुए। डेनमार्क में छपे हजरत मुहम्मद साहब के कार्टूनों को भला कौन भूल सकता है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर छापे गए इन काटूनों ने समूचे विश्व में मुस्लिम समुदाय को उद्देलित कर दिया। कार्टून बनाने वाले के खिलाफ फतवा जारी किया गया, उसके सिर पर ईनाम रखा गया। अभी हाल ही में जूता बनाने वाली कंपनी प्यूमा पर धार्मिक भावानाओं से खिलवाड़ का आरोप लगाते हुए मुस्लिम समुदाय ने उसके खिलाफ भी मोर्चा खोला। जब इस सब को जायज ठहराया जा सकता है तो, हुसैन के विरोध पर आपत्ति क्यों। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने तो यहां तक कहा कि उनका संगठन हुसैन के वापसी के खिलाफ नहीं, बस उन्हें लोगों की भावनाएं आहत करने के लिए माफी मांगनी होगी। हुसैन ने कतर की नागरिकता ग्रहण करने के बाद जो बयान दिया उसका जिक्र करना यहां जरूरी है। उन्होंने कहा,

'भारत ने मेरा बहिष्कार किया, मेरी कला और आत्म अभिव्यक्ति पर हमला किया गया। मुझे दुख है कि मैं भारत छोड़ रहा है, लेकिन जब संघ परिवार ने मुझ पर हमला किया तो सरकार चुप रही। ऐसे में मैं कैसे वहां रह सकता हूं। ' मकबूल साहब का यह कहना बिल्कुल सही है कि सरकार चुप रही, लेकिन हमले को लेकर नहीं बल्कि उनकी चित्रकारी को लेकर। अगर उनके आपत्तिजनक चित्रों पर सरकार की तरफ से सख्त रुख अपनाया जाता तो शायद बात इतनी बढ़ती ही नहीं। सरकार का भी फर्ज बनता है कि वो धार्मिक उन्माद फैलाने वाले कारकों को आकार न लेने दे। जहां तक बात हमले की है तो वो हुसैन साहब की कला पर नहीं वरन उनके ग़लत विचारों पर था। कलाकारों के प्रति हमारे देश में आदर और सम्मान का जो भाव है उस पर उंगली नहीं उठाई जा सकती। मकबूल फिदा हुसैन आज जिस मुकाम पर हैं वो उन्होंने भारत में ही हासिल किया है, इसलिए ये कहना कि भारत ने उनका बहिष्कार किया, किसी के लिए भी स्वीकार्य नहीं होगा। ऐसा नहीं है कि हुसैन ने महज एकाध बार विवादित चित्रों का चित्रण किया, वो बार-बार वहीं सब दोहराते रहे। 1990 में पहली बार धार्मिक भवनााओं को भड़काने वाले उनके चित्र आम जनता के सामने आए, हालांकि ये बात अलग है कि उन्होंने ये चित्र 1970 में बनाए थे। इसके बाद 6 जनवरी 2006 को एक पत्रिका में भारत माता को लेकर उनकी अभद्र पेंटिंग प्रकाशित हुई। हुसैन ने बवाल के बाद माफी मांगी और चित्र वापस लेने का वादा भी किया,

मगर वादा निभाया नहीं। थोड़े वक्त बाद ही उनकी आधिकारिक वेबसाइट पर यह तस्वीर चस्पा कर दी गई। इससे साफ है कि चित्रकार साहब स्वयं विवादों में घिरे रहना चाहते थे। भारत एक संस्कृति प्रधान देश हैं, हमारी कुछ मान्यताएं है, धार्मिक भावनाए हैं। उनके साथ खिलवाड़ की स्थिति में जनमानस के आक्रोश को अव्यवहारिक या अमर्यादित कतई नहीं ठहराया जा सकता। हो सकता है कि विश्व हिंदूं परिषद, आरएसएस या शिवसेना के विरोध का तरीका कुछ गलत रहा हो मगर विरोध के कारण को गलत नहीं कहा जा सकता। सिर्फ हिंदुवासी संगठन ही नहीं आम हिंदुओं में भी हुसैन के चित्रों को लेकर रोष है, बस फर्क केवल इतना है कि वो सार्वजनिक तौर पर इसका प्रदर्शन नहीं करते। मकबूल फिदा हुसैन अब कतर के नागरिक बन गए हैं, तो क्या वो अपनी भावनाओं को वैसी ही उड़ान दे पाएंगे जैसी भारत में दिया करते थे। क्या वो अपनी रचनात्मकता का प्रदर्शन इस्लामी नायकों के साथ करेंगे? अगर वो ऐसा करते हैं तो उनके विरोध की कोई गुंजाइश ही नहीं बचेगी, लेकिन ऐसा वो कर पाएंगे इस बात की संभावना दूर-दूर तक दिखलाई नहीं देती। केवल भारत ही ऐसा देश है जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इतनी स्वतंत्रता मिल सकती है। सलमाल रश्दी की सैटनिक वर्सिस और तस्लीमा नसरीन की लाा पर क्या बवाल नहीं हुआ, भले ही इन दोनों ने कितना भी सच लिखा हो मगर उससे भावनाएं तो आहत हुई ही। तस्लीमा लंबे समय से भारत में निर्वासित जीवन बिता रही हैं। अभी हाल ही में उनके एक लेख जिसमें उन्होंने मुहम्मद साहब को बुर्के के खिलाफ बताया था को लेकर कर्नाटक में मुस्लिम धर्मावलंबियों ने हिंसक प्रदर्शन किए,

स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कर्फ्यू तक लगाना पड़ा। हालांकि तस्लीमा इस लेख को अपना मामने से इंकार कर रही हैं। तस्लीमा नसरीन ने अपने लेखों में इस्लाम की कार्यपध्दति की आलोचना की, वो एक महिला की हैसीयत से उसमें बदलाव की पक्षधर हैं। लेकिन उन्होंने कभी इस्लामिक धर्म गुरुओं का अशील व्याख्यान नहीं किया। बावजूद इसके उन्हें अपना वतन छोड़ना पड़ा। मकबूल साहब ने तो धर्म पर ही अशीलता की कूंचियां चलाई तो फिर उनके प्रति प्रेमभाव और सम्मान कैसे कायम रह सकता है। मकबूल फिदा हुसैन अपनी आदत और कृत्यों से अच्छी तरह वाकिफ हैं, उन्हें इल्म है कि वो पुन: वही सब दोहराए बिना नहीं रह पाएंगे, इसलिए उन्होंने कतर में पनाह लेना बेहतर समझा। एक चित्रकार के तौर पर हुसैन का समर्थन करने में कोई बुराई नहीं, लेकिन जो कुछ उन्होेंने किया उसको सही करार देना सरासर गलत है।

Thursday, March 4, 2010

भारत-पाक संबंध: चेतन भगत के विचार व्यवहारिक नहीं

नीरज नैयर
चेतन भगत बहुत ही काबिल उपन्यासकार हैं। वन नाइट एट कॉल सेंटर में उन्होंने प्यार के उतार-चढ़ाव और पेशे की मजबूरी को बहुत अच्छे ढंग से रेखांकित किया था। टू स्टे्टस में भी उन्होंने लव और मैरिज के बीच के फासले को मिटाने की जद्दोजहद को बेहतरीन तरीके से पाठकों के सामने पेश किया। उनके दूसरे उपन्यास भी वाह-वाही लूटने में सफल रहे , फाइव पाइंट समवन का नाम थ्री इडियट्स से उठे विवाद के बाद हर किसी की जुबान पर चढ़ा हुआ है।

चेतन के लेख भी आजकल विभिन्न अखबारों में देखने को मिल जाया करते हैं, कुछ दिन पहले हिंदी-अंग्रेजी को लेकर उनका एक लेख पढ़ने को मिला। जिसमें उन्होंने खूबी के साथ अग्रेजी की महत्ता को सरल शब्दों में सबके सामने रखा। निश्चित तौर पर चेतन की लेखनी युवावर्ग के लिए प्रेरणास्त्रोत का काम कर सकती है, मगर भारत-पाकिस्तान संबंध जैसे गंभीर मुद्दों पर उनमें थोड़ी अपरिपक्वता नजर आ ही जाती है। हाल ही में एक प्रतिष्ठित अखबार ने चेतन भगत का भारत-पाक रिश्तों को लेकर लिखा लेख प्रकाशित किया, जिसका शीर्षक था 'शांति का मतलब प्रेम नहीं'। लेख के माध्यम से चेतन ने कहने का प्रयास किया कि भारत द्वारा पाकिस्तान को बातचीत के लिए आमंत्रित करने में कोई बुराई नहीं। वो मानते हैं कि दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने के लिए भारत को प्रयास करते रहने चाहिए।


इस बात में कोई दो राय नहीं कि अमन-शांति के माहौल में नफरत के बीज बोने वालों के लिए कोई जगह नहीं होगी, दोनों मुल्कों का आवाम वर्तमान की अपेक्षा यादा सुखी और खुशहाल नजर आएगा। विकास सिर्फ सैन्य ताकत बढ़ाने तक ही सीमित नहीं रहेगा, उसका असर छोटे से गांव से लेकर गगनचुंबी इमारतों वाले शहरों में भी दिखाई देगा। मगर ्सवाल ये यह उठता है कि क्या ऐसा संभव है? भारत के विभाजन से लेकर अब तक पाकिस्तान के साथ हम एकतरफा रिश्ते निभाते आए हैं। विदेश नीति में भी मोहब्बत की तरह एकतरफा रिश्ते कष्टदायक ही होते हैं और ये बात वक्त वक्त पर हमें महसूस भी होती रही है। जब एक तरफा मोहब्बत का अंत जुर्म की अंधेरी गालियों में जाकर होता है तो फिर कैसे उम्मीद लगाई जा सकती है कि पाकिस्तान हमारी अच्छाइयों का सिला अच्छाई के साथ देगा। चेतन मानते हैं कि जब तक पड़ोस में स्थिर लोकतंत्र नहीं आता, तब तक उससे शांति की आस नहीं लगाई जा सकती, इसलिए भारत को पाकिस्तान में लोकतंत्र के लिए अभियान चलाना चाहिए।


उनकी सोच है कि इससे हम उन पाकिस्तानियों का समर्थन हासिल कर सकेंगे जो लोकतांत्रिक सरकार चाहते हैं। लोकतंत्र के प्रति भारत का खुला समर्थन पाक सेना को कमजोर करेगा और पाकिस्तानियों में भारत की छवि सुधरेगी। चेतन की इस नसीहत का सीधा सा मतलब है कि नई दिल्ली इस्लामाबाद के अंदरूनी मामलों में अंदर तक दखल दे, लेकिन इसके परिणाम कितने भयानक हो सकते हैं चेतन ने शायद उनपर गौर करना मुनासिब नहीं समझा। कुछ साल पहले जब म्यांमार में पेट्रो मूल्य वृध्दि को लेकर बौध्द भिक्षुओं और जुंटा सरकार के बीच खूनी खेल शुरू हुआ था तब भीबुध्दिजीवियों द्वारा भारत को दखलंदाजी करने की नसीहतें दी गई थीं। उन दिनों शायद ही कोई ऐसा अखबार रहा होगा जिसमें बड़े-बड़े लेखकों के समझाइश भरे लेख न प्रकाशित हुए हों। लेकिन सरकार ने उस वक्त खामोशी अख्तियार करके बिल्कुल वाजिब निर्णय लिया। म्यांमार के साथ हमारी पूर्वात्तर की सीमा जुड़ती है, कई बार ऐसा देखने में आया कि भारत से नाराजगी प्रकट करने के लिए जुंटा सरकार ने नई दिल्ली विरोधियों को घुसपैठ करने के लिए आजाद छोड़ दिया।


ऐसी स्थिति में यदि भारत दखलंदाजी करने की कोशिश करता तो उसे देश हित में नुकसान उठाने पड़ते। पाकिस्तान में भी किसी तरह का अभियान चलाने का मतलब है कि उग्रवादी संगठनों को पूरी तरह से अपने खिलाफ कर लेना। वर्तमान में पाक में जो सरकार है वो लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुनकर ही आई है, जनता ने रिकॉर्ड मतों से पीपीपी के सिर जीत का सेहरा बांधा था। इस सरकार ने अपने शुरूआती दौर में जब थोड़ी बहुत स्थिरता दिखाई दे रही थी तब भी ऐसा कौनसा तीर मार लिया जो हमें लोकतंत्र का अलख जगाने के लिए प्रेरित करे। पाकिस्तान में लोकतंत्र के पैरोकार हों या उसकी मुखालफत करने वाले, हर किसी के लिए भारत दुश्मनों की फेहरिस्त में सबसे पहले आता है। वहां के नेता भारत विरोधी नारे लगा-लगाकर ही सड़क से संसद तक का सफर तय करते हैं। ऐसे में वहां अपने लिए समर्थन की बात सोचना भी बेमानी होगा। जहां तक बात रही पाक से रिश्ते रखने की तो इसकी पहल अब उसे ही करने देनी चाहिए, आखिर संबंधों में बेहतरी का फायदा दोनों देशों को ही मिलेगा।


आखिर ऐसा कब तक चलता रहेगा कि हम ही शांति का पैगाम भी लेकर जाएं और बदले में हमें ही जख्म भी खाएं। जिस तरह ताली एक हाथ से नहीं बजती, उसी तरह रिश्तों में घनिष्ठता भी एकतरफा पहल से नहीं आ सकती। पाक को भी आगे बढ़कर इस बात का सुबूत देना होगा कि वो शांति और अमन का पक्षधर है, यदि वो ऐसा नहीं करता तो फिर उसके आगे-पीछे घूमकर उसे मनाने का क्या मतलब। पुणे ब्लास्ट में पाकिस्तानी संलिप्त्तता सामने आ चुकी है, सरकार भी इस बात को मानती है कि हमले के तार सीमा पार से जुड़े हैं। इस सब के बाद भी क्या पाक को करीब लाने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए, इसका जवाब वो लोग शायद यादा अच्छे से दे सकते हैं जिनके अपने आतंकवादी हमलों में मारे गए। मुंबई हमले के दोषियों के खिलाफ उसने अब तक कोई कदम नहीं उठाया, उल्टा उनके सरंक्षण में जरूर लगा रहा।


मौजूदा दौर में पाक को करीब लाने के बजाए उससे दूरी बनाए रखना ही बेहतर है, और शायद आवाम का भी यही फैसला होगा। चेतन ने अपने लेख में आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया है कि शांति के प्रयास करना क्यों जरूरी है। उनके मुताबिक दोनों मुल्कों का संयुक्त रक्षा बजट करीब 40 अरब डॉलर है, जिसमें से तीन चौथाई से भी अधिक खर्च भारत करता है। यदि शांति के प्रयासों से सैन्य खर्चों में कटौती होती है तो क्या इससे शांति का आर्थिक महत्व साबित नहीं होता। एक बारगी मान भी लिया जाए कि पाकिस्तान से रिश्ते मधुर हो गए हैं तो भी यह सोचना गलत होगा कि रक्षा बजट की राशि को विकास में लगाया जाएगा। भारत के लिए सिर्फ पाक ही चुनौती नहीं है, चीन उसकी परेशानियों को हर रोज बढ़ा रहा है। चीन के मुकाबले में खड़े रहने के लिए रक्षा बजट में हर साल इजाफा ही किया जाएगा, कमी नहीं। चेतन भगत ने अपने लेख के दूसरे पैरा में कहा है कि अगर पाकिस्तान के साथ शांति बनाए रखने से भारतीयों को बेहतर जीवन मिलता है तो क्यों न इस विकल्प को आजमाया जाए। यहां चेतन को थोड़ा चिंतिन करने की जरूरत है कि हमारे अब तक के किए गए शांति के प्रयासों से भारतीयों का जीवन कितना बेहतर बना।


अगर 1993 के मुंबई ब्लास्ट के बाद ही भारत सरकार ने सख्त कदम उठाते हुए पाक से रिश्तों का इंतकाल कर दिया होता तो शायद उसके बाद हर थोड़े अंतराल में यूं धमाके नहीं होते। पाक को शह एक तरह से हमारी उदारवादी आदतों की वजह से ही मिलती रही। वह जानता है कि भारत लंबे समय तक उससे नाक-मुंह सिकोड़ कर नहीं बैठा रह सकता। एक बार फिर ये बात साबित हो ही गई। मुंबई हमले के बाद हमने जिस तरह का सख्त रवैया अपनाया उसमें वक्त के साथ-साथ नरमी इस हद तक आ गई कि खुद आगे बढ़कर पड़ोसी को बातचीत का न्यौता दे आए। भारत के इस फैसले को पाकिस्तान में घुटने टेकने के तौर पर लिया जा रहा है। प्रधानमंत्री गिलानी से लेकर राष्ट्रपति जरदारी तक सब इसे पाक की कूटनीतिक जीत मानकर चल रहे हैं। दोनों मुल्कों में दोस्ती होते देखने की हसरत शिवसेना जैसी कट्टरवादी पार्टी में भी होगी मगर इसके लिए आवाम की जिदंगी को दाव पर नहीं लगाया जा सकता।


चेतन भगत के विचार बहुत ही अच्छे हैं मगर उन्हें व्यवहारिक तौर पर नहीं अपनाया जा सकता, खासकर पाकिस्तान के साथ तो बिल्कुल नहीं। सरकार को चाहिए कि वो जनभावना का आदर करते हुए पाक से निश्चित दूरी बनाए रखे, क्योंकि उसका करीब आना हमारे लिए ही नुकसानदायक ही साबित होता है। दोनों मुल्कों के बीच रिश्तों की नींव पूरी तरह से खोकली पड़ चुकी है, जब तक पाक उसे विश्वास और भरोसे के मिश्रण से भरने के बारे में नहीं सोचता हमें भी खामोशी से खड़े रहना चाहिए। बात यहां अहम की नहीं, देश और जनता के हित ही है सरकार के साथ-साथ चेतन को भी इस बारे में सोचना चाहिए।