Sunday, August 2, 2009
हाशमी साहब मकान के लिए मुस्लिम कार्ड क्यों खेला
बॉलीवुड स्टार इमरान हाशमी आजकल सुर्खियों में हैं, वैसे तो अपनी सीरियल किसर की छवि के चलते वो हमेशा ही छाए रहते हैं लेकिन इस बार मामला थोड़ा पेचीदा है. जनाब आशियाना ढूंढ रहे हैं और जिस घर पर उनका दिल अटक गया है वो उन्हें मिल नहीं रहा. ऐसा तो अक्सर आम लोगों के साथ भी होता रहता पर इमरान का आरोप है कि चूंकि वो मुस्लिम हैं, इसलिए उन्हें वो घर नहीं दिया जा रहा है. हाशमी साहब राय के अल्पसंख्यक आयोग में भी शिकायत कर चुके हैं और उन्होंने सोसाइटी के पदाधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है.
हालांकि उनका ये आरोप शायद ही किसी के गले उतरे, इतना बड़ा स्टार, जिसे लाखों लोग पहचानते हों, उसके साथ फोटो खिंचवाना चाहते हों, हाथ मिलाना चाहते हों वो अगर किसी सोसाइटी में रहने की इच्छा जताता है तो ये मुश्किल ही है कोई इस पर आपत्ति करे. और गर कोई आपत्ति करता भी है तो इसके पीछे घर लेने वाले की व्यक्तिगत छवि उसका चालचलन आदि जैसी सामान्य वजह हो सकती हैं. अमूमन अच्छी सोसाइटी में किसी को घर देने से पहले ये सब देखा जाता है. और वैसे भी घर देना न देना सोसाइटी का अपना निजी फैसला है, अगर उन्हें नहीं लगता कि किसी बड़े स्टार का यहां रहना उनके लिए सुविधाजनक होगा तो उन्हें मना करने का पूरा अधिकार है. जिस तरह की भाषा इमरान हाशमी बोल रहे हैं वह अल्पसंख्यक समुदाय के आम लोगों के मुंह से अक्सर सुनते रहते हैं लेकिन बॉलीवुड अभिनेता के मुंह ये सब सुनना थोड़ा अजीब लगता है.
इमरान की तरह कुछ और स्टार भी हैं जो इस तरह के आरोप लगाते रहे हैं, सैफ अली खान ने भी कुछ वक्त पहले कहा था कि मुस्लिम होने की वजह से घर नहीं मिलता, इसीलिए किसी दिक्कत से बचने के लिए मैं सीधा एक मुस्लिम बिल्डर के पास चला गया. सैफ ये भी मानते हैं कि मुंबई में सांप्रदायिक अलगाव एक हकीकत है, और यह समस्या सिर्फ बिल्डिंग सोसायटीज तक ही सीमित नहीं है बल्कि यहां के पूरे समाज में है. यह सभी को पता है कि मुंबई के जुहू और बांद्रा के इलाकों में जमीन और मकान मुसलमानों को नहीं बेचे जाते. मुझे देखकर आश्चर्य होता है कि कुछ लोगों के लिए धर्म कितना मायने रखता है और धर्म को लेकर लोग कितने कट्टर हैं. सच्चाई यह है कि एक गंदी मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है और यही बात इस्लाम पर लागू होती है. सिने अदाकारा एवं समाज सेविका शबाना आजमी ने भी ऐसे ही आरोप लगाए थे, इसके अलावा कई अन्य स्टार भी हैं जो खुद को मुस्लिम होने की वजह से प्रताड़ित महसूस करते हैं. ये बात सही है कि मुंबई के अंधेरी और बांद्रा इलाकों में मुस्लिम कलाकारों को घर खरीदने में हमेशा से दिक्कतें आती रही हैं, कहा जाता है कि सोफी चौधरी को तो मकान खोजने में दो साल लग गए थे, इस दौरान कई बार ऐसा हुआ था कि डील तकरीबन फाइनल हो चुकी थी लेकिन डीलर को जैसे ही पता चला कि सोफी मुस्लिम हैं डील कैंसल हो गई. अरबाज अली खान को बांद्रा के पेरी क्रॉस रोड पर मकान देने से मना कर दिया गया था, इसी तरह से जीनत अमान को जुहू में मकान खरीदने के लिए तकरीबन तीन महीने तक जूझना पड़ा. लेकिन ये भी सही है कि शाहरुख, सलमान जैसे अल्पसंख्य समुदाय से जुड़े कई स्टार बड़े आराम से बिना किसी दिक्कत के साथ मुंबई में रह रहे हैं.
बात थोड़ी चुबने वाली जरूर है पर सच है कि मुस्लिम समुदाय खुद को अपने से अलग समझने की मानसिकता से ग्रस्त है. अगर उनके साथ कुछ गलत होता भी है तो उन्हें यही लगता है कि जाति-धर्म के आधार पर उनके साथ ऐसा हो रहा है, जबकि ऐसा नहीं है. जहां तक घर देने या न देने की बात है तो इस परेशानी से सबको एक न एक दिन दो चार होना पड़ता है, मैं यहां अपनी ही आपबीती का जिक्र करना चाहता हूं, भोपाल जब मैं नौकरी के सिलसिले में गया तो एक अदद कमरा ढूंढने में ही दिन में तारे नजर आ गए. अकेले लड़के को घर देने से यादातर ने साफ मना कर दिया. एक-दो जगह बात बनी भी तो मेरा प्रोफेशन आड़े आ गया. पत्रकारिता से ताल्लुक होने के चलते सबकुछ तय होने के बाद भी गोल-मटोल जवाब देकर चलता कर दिया गया. एक महाश्य से जब मैने फोन पर उनके फ्लैट के संबंध में बात की तो उन्होंने किराया वगैराह सब बता दिया पर जैसे ही उन्हें पता चला कि मैं पत्रकार हूं तो घर की कटी बिजली, टूट-फूट की दुहाई देकर कुछ महीने बाद के लिए मामला लटका दिया. बहरहाल किसी न किसी तरह बाद में घर मिल ही गया, पर सोचने वाली बात है कि मैं मुसलमान तो नहीं था फिर मेरे साथ भी ऐसा क्यों हुआ. जायज सी बात है ये एक आम समस्या है, सबकुछ मकान मालिक पर निर्भर करता है, यदि उसे लगता है कि फिल्म स्टार, पत्रकार आदि के साथ वो तालमेल बिठा लेगा तो कोई दिक्कत नहीं, यहां मुस्लिम होने या ना होने की बात कहां से आ गई. हाशमी साहब और उनके जैसे कलाकारों से मेरा यही निवेदन है कि हर इक बात को जाति-धर्म के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए. और भी लोग हैं, जिन्हें परेशानी होती है पर वो तो कभी इस आधार पर रोना नहीं रोया करते.
Tuesday, July 28, 2009
सिर्फ मुस्लिमों के साथ ही नहीं होती zयादती
बटला हाउस मुठभेड़ का सच सामने आने के बाद भी इस पर उंगली उठाने वालों की आवाज मंद नहीं पड़ी है, उन्हें लगता है कि सरकार और उसका सिस्टम हकीकत पर पर्दा डालने की कोशिश में लगा है. पुलिस मुठभेड़ पर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं और शायद आगे भी उठते रहेंगे क्योंकि उत्तराखंड फर्जी एनकाउंटर जैसी वारदातें उसकी व्यवस्था का अंग बन गई हैं. ऐसे मामलों की लंबी-चौड़ी फेहरिस्त है जिसमें पुलिसवालों ने पदोन्नती या आर्थिक स्वार्थों की पूर्ती के लिए बेगुनाह लोगों को अपराधी बताकर मौत की नींद सुला दिया. मगर इसका मतलब ये कतई नहीं निकाला जाना चाहिए उसकी हर कार्रवाई झूठ पर आधारित होती है. हमारे देश में खासकर मुस्लिम समुदाय को हमेशा से ही शिकायत रही है कि पुलिस उनका उत्पीड़न कर रही है, उसके लोगों को बेवजह आतंकवादी साबित करने में लगी है.
बटला हाउस मुठभेड़ पर हुए बवाल का कारण भी सिर्फ यही है कि वहां मारे गये आतंकी समुदाय विशेष से जुड़े थे, अगर मुठभेड़ में कोई किशोर, घनश्याम या सुधीर नाम वाले लोग मारे जाते तो शायद जांच के बाद भी जांच की मांग नहीं होती. भले ही देश में हिंदुओं की तादाद यादा है मगर मुस्लिम भी कम नहीं. राजनीति से लेकर हर बड़े तबके में उनक प्रतिनिधित्व करने वाले भरे पड़े हैं. इस देश का राष्ट्रपति एक मुस्लिम रह चुका है, उपराष्ट्रपति भी एक मुस्लिम ही हैं. फिर न जाने क्यों ये समुदाय वक्त दर वक्त नाइंसाफी और भेदभाव जैसे शब्द उछालता रहता है, अगर मुस्लिमों के साथ हिंदुस्तान में सौतेला व्यवहार किया जाता तो क्या मुल्क के सर्वोच्च पद पर किसी मुस्लिम का पहुंचना संभव था. भेदभाव-नाइंसाफी और बेफिजुल प्रताडित करने जैसे आरोप सरासर गलत हैं सच तो ये है कि इस समुदाय ने अपने आप को दूसरों के अलग रखने की मानसिकता धारण कर रखी है और वह उससे बाहर निकलना नहीं चाहता. इसलिए उसे अपने कौम वाले के देश विरोधी गतिविधियों में संलिप्त होने के पीछे भी षड़यंत्र दिखाई पड़ता है, उसे लगता है कि उन्हेंबदनाम करने के लिए साजिश रची जा रही है. उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में रहने वाले मुस्लिम तो अपने को सर्वाधिक प्रताड़ित बताते हैं, उन्हें लगता है कि अल्पसंख्यक होने की वजह से ही पुलिस की आतंकवाद से जुड़ी हर कार्रवाई यहीं से शुरू होती है. पर वो भूल जाते हैं कि आजमगढ़ का आतंकवादियों से रिश्ता नया नहीं है, यहां का सरायमीर हमेशा चर्चा में रहा हैं. हाजी मस्तान ने अपनी दो बेटियों की शादी यहां की. दाऊद इब्राहीम के भाई की ससुराल यहीं है और मुबंई के जेल में बंद अबू सलेम का पैतृक गांव भी सरायमीर है. प्रतिबंधित इस्लामी छात्र संगठन सिमी के संस्थापक अध्यक्ष शाहिद बद्र इसी आजमगढ़ जिले के रहने वाले हैं. जामियानगर में पुलिस की मुठभेड़ में मारे गए दोनों संदिग्ध मुस्लिम चरमपंथी सरायमीर के पास ही संजरपुर गांव के रहने वाले थे.
इस मुठभेड़ के बाद पकड़े गए कई और संदिग्ध चरमपंथी भी यहीं आसपास से ताल्लुक रहते हैं. अहमदाबाद और जयपुर बम धमाकों के मास्टर माइंड होने के आरोप में पिछले साल गिरफ्तार मुफ्ती अबुल बशर सरायमीर के करीब बीनापार का रहने वाला है. आजमगढ़ की कुल आबादी 32 लाख के करीब है जिसमें मुसलमानों की हिस्सेदारी सबसे यादा है. आजमगढ़ और इसके आस-पास के इलाके सिमी की कार्यस्थली और शरणस्थली रहे हैं, इस प्रतिबंधित संगठन के कार्यकर्ताओं को पनाह देने वालों की आज भी यहां कोई कमी नहीं है. आजमगढ़ को आतंकवाद की नर्सरी माना जाने लगा है, ऐसे में अगर पुलिस का शक और कार्रवाई यहीं पर केंद्रित होती है तो उसमें गलत क्या है. आमतौर पर भी हम उसी को शक के घेरे में लेकर आते हैं जिसका पिछला रिकॉर्ड सही नहीं रहा, मसलन अगर कोई बच्चा दो बार हमारे घर का शीशा तोड़ चुका है तो तीसरी बार भी हमारा शक उसी पर जाएगा फिर चाहे वह निर्दोष ही क्यों न हो. बटला हाउस मुठभेड़ की जांच में मानवाधिकार आयोग ने यह साफ कर दिया है कि फायरिंग की शुरूआत कमरे के भीतर से हुई और पुलिस दल को आत्मरक्षा में गोलियां चलानी पड़ीं. बटला हाउस के उस कमरे में आतंकी थे या नहीं, और मारे गए लोगों का दिल्ली में हुए बम विस्फोटों में कोई हाथ था या नहीं, इन सवालों पर आयोग ने कोई टिप्पणी नहीं की, उसने अपनी जांच का दायरा सिर्फ यहीं तक सीमित रखा कि पुलिस ने सीधे दरवाजा खुलवाकर बेकसूर लोगों को मार डाला या दोनों तरफ की गोलीबारी में दो युवक मारे गए. इस मुठभेड में दिल्ली पुलिस के इंस्पैक्टर शर्मा भी शहीद हुए थे. जिन लोगों को आयोग की जांच और उसकी विश्वसनीयता पर संदेह हैं उन्हें याद दिलाने की जरूरत है कि वो मानवाधिकार आयोग ही था जिसने गुजरात दंगों की रिपोर्ट में अल्पसंख्यकों के साथ हुई यादतियों को सामने रखा था.
अगर तब उन्हें आयोग, उसकी जांच सही लग रहे थे तो अब वो आयोग पर उंगली कैसे उठा सकते हैं. इसका मतलब तो यही हुआ कि यदि जांच उनकी सोच से इतर है तो उन्हें उसमें खामिया हीं नजर आएंगी. उत्पीड़न जैसे शब्द पुलिस के शब्दकोष में जरूर हैं मगर उनका इस्तेमाल किसी जाति-धर्म विशेष के आधार पर नहीं किया जाता, अमूमन हर समुदाय के लोग कभी न कभी पुलिस की यादतियों से दो-चार होते रहते हैं, देहरादून में फर्जी में मुठभेड़ में मारा गया युवक रणवीर शायद इसका जीता-जागता सुबूत है.
Sunday, July 26, 2009
जांच पर हंगामा कितना उचित
पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम को सुरक्षा जांच से क्या गुजरना पड़ा पूरे मुल्क में बवाल हो गया, धड़ाधड प्रतिक्रियाएं आनें लगी, अमेरिकी एयरलाइंस को दोषी करार दिया जाने लगा. संसद में तो तो कुछ माननीय सांसदों ने एयरलाइंस का लाइंसेंस रद्द करने और तलाशी लेने वाले अमेरिकी को देश से निकालने तक की मांग कर डाली. जबकि जिसकी तलाशी ली गई यानी कलाम साहब की वो पूरी तरह खामोश हैं, उन्होंने न तो जांच के वक्त वीवीआई होने का कोई रुबाव झाड़ा और न ही अब कुछ बोल रहे हैं. वो इस बात से सहमत हैं कि सुरक्षा से समझैता नहीं किया जाना चाहिए.कांटिनेंटल एयरलाइंस को अमेरिका के होमलैंड सिक्योरिटी डिमार्टमेंट के ट्रांसपोर्ट सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन यानी टीएस की तरफ से स्पष्ट निर्देश दिए गये हैं कि विमान में सवार होने वाले प्रत्येक व्यक्ति की जांच की जाए. उन्होंने अति विशिष्ट, विशिष्ट लोगों के लिए के लिए अलग से कोई दिशा निर्देश नहीं बनाए हैं. ऐसे में जांच करने वाले अधिकारी महज अपनी नौकरी कर रहे थे, उन्हें इस बात से कोई लेना-देना नहीं था कि कलाम साहब किस श्रेणी में आते हैं. रुतबे-रुबाब के आगे नियम-कायदे ताक पर रखने की परंपरा सिर्फ हमारे देश में है, दुबई जैसी खाड़ी मुल्क में भी अति विशिष्ट, विशिष्ट माननीयों को हवाई अड्डे पर सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ता है, बस फर्क सिर्फ इतना होता है कि उन्हें आम लोगों की तरह लाइन में नहीं लगना होता.
उनके लिए अलग से व्यवस्था की जाती है. यह बात सही है कि पूर्व राष्ट्रपति होने के नाते अब्दुल कलाम को जांच से छूट मिली है और उनकी जांच नागरिक उड्डयन ब्यूरों के सर्कुलर का सरासर उल्लघंन है. लेकिन कांटिनेंटल एयरलाइंस जिस मुल्क से ताल्लुक रखती है उसके भी अपने कुछ नियम हैं, कहने वाले बिल्कुल ये कह सकते हैं कि भारत में आने के बाद वह यहां के नियम-कानून मानने के लिए बाध्य है. पर जनाब गौर करने वाली बात ये है कि एयरलाइंस सुरक्षा के अपने मानकों के ऊपर किसी भी देश के नियमों को हावी नहीं होने देती. इतना सब हो जाने के बाद भी कांटिनेंटल की तरफ से हेद जताया गया है, उसने ये कतई नहीं कहा कि फिर ऐसा नहीं होगा, मतलब सुरक्षा सर्वोपरि है. 11 सितंबर 2001 के बाद अमेरिका ने सुरक्षा संबंधि बहुत से कदम उठाए हैं और इसतरह की जांच उसी का एक हिस्सा मात्र हैं, लिहाजा इस पर बेफिजुल का हो-हल्ला करना तर्कहीन ही लगता है. हमारे देश में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, रायपाल, पूर्व राष्ट्रपति, पूर्व उपराष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस, लोकसभा अध्यक्ष समेत 32 श्रेणियों में आने वाले अतिविशिष्ट लोगों को एयरपोर्ट पर सुरक्षा जांच में छूट मिली हुई है. छूट के दायरे में लोकसभा के स्पीकर, केंद्रीय कैबिनेट मंत्री, रायों के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, लोकसभा व रायसभा में विपक्ष के नेता, भारत रत्न से सम्मानित हस्तियां, सुप्रीम कोर्ट के जज, मुख्य निर्वाचन आयुक्चत और धर्मगुरु दलाई लामा भी आते हैं. कुछ वक्त पहले तीनों सेनाओं के प्रमुखों को भी इस श्रेणी में शामिल किया गया था, यानी उन्हें भी सुरक्षा जांच के लिए नहीं रोका जा सकता, सरकार ने ये फैसला उस वक्त लिया था जब प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वॉड्रा थलसेना अध्यक्ष के ऊपर रखने पर हंगामा मचा था. रॉबर्ट किसी संवैधानिक पद पर न होते हुए भी अति विशिष्टजनों को मिलने वाली छूट का लाभ इसलिए उठा रहे हैं क्योंकि वो कांग्रेसाध्यक्ष के दामाद हैं.
वीवीआईपी, वीआईपी तो दूर की बात हैं, हमारे देश में तो थोड़ी सी ऊंचाई पाने वाला हर व्यक्ति अपने आप को राजा समझने लगता है, मसलन प्रेस का तमगा लगने के बाद पत्रकार पुलिस वालों को कुछ नहीं समझते. सामान्य चेकिंग के दौरान अपने आप को रोका जाना उनकी शान में गुस्ताखी करने जैसा होता है. वो अपने आप को आमजन से ऊपर समझते हैं और चाहते हैं कि उनके साथ वैसा ही व्यवहार किया जाए. जो लोग वैश्ो देवी अक्सर जाते रहते हैं उन्होंने गौर किया होगा कि वहां आने वाले आर्मी के जवान सुरक्षा जांच चौकियों पर तैनात पुलिसकर्मियों से अमूमन उलझते रहते हैं, उन्हें यह गंवारा नहीं होता कि कोई पुलिसवाला उनकी तलाशी ले. पुलिसवाले खुद नियम-कायदों की धाियां उड़ाने से पीछे नहीं रहते, उन्हें लगता है कि उनका कोई क्या बिगाड़ सकता है. महज कुछ लोग नहीं बल्कि पूरे मुल्क की मानसिकता ही ऐसी हो गई है कि हम हमेशा अपने आप को निर्धारित नियमों से ऊपर रखना चाहते हैं. अब्दुल कलाम ने जांच में सहयोग करके और बेवजह मामले को तूल न देकर एक उदाहरण पेश किया है, उन्होंने इस संबंध में कोई शिकायत तक नहीं की. वह विदेश यात्रा के दौरान सुरक्षा घेरों का हमेशा पालन करते हैं, दरअसल इस मामले को इतना ऊछालने वाले इस बात को लेकर आशंकित हैं कि कहीं कल उनके साथ ऐसा कुछ हो गया तो सारा रुबाब घरा का घरा रह जाएगा, इसलिए वो चाहते हैं कि अमेरिकी एयरलाइंस को सुरक्षा से समझौता न करने का सबक सिखाए जाए. एयरलाइंस के खिलाफ जांच के आदेश दे दिए गये हैउसे ये सिखाने की पूरी कोशिश की जाएगी कि भारत में वीवीआईपी देश उसकी सुरक्षा और हर लिहाज से सबसे ऊपर होते हैं, इसलिए अगर उसे भारत में काम करना है तो अपनी प्राथमिकताओं की सूची में सुरक्षा को दूसरा स्थान देना होगा क्योंकि पहले स्थान पर सिर्फ और सिर्फ वीवीआईपी ही आ सकते हैं.
Wednesday, July 22, 2009
हिलेरी के दौरे से हमें क्या मिला
भारत की छवि विश्व में किस तरह की है यह ओबामा प्रशासन को बताने की जरूरत नहीं, अनाधिकृत और अनुचित जैसे शब्दों का प्रयोग करते वक्त हिलेरी शायद भूल गई कि वो इस्लामाबाद में नहीं नई दिल्ली में खड़ी हैं. हिलेरी क्लिंटन ने इस मुद्दे पर भारत की सलाह मांगकर उसे और उलझाने की कोशिश की है, विदेशमंत्री एमएम कृष्णा और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के एनपीटी व सीटीबीटी पर राजी न होने पर हिलेरी ने यह पत्ता फेंका. उन्हें पता है कि भारत की तरफ से दी जाने वाली कोई भी सलाह अमेरिकी प्रशासन के दिमाग में चढ़ने वाली नहीं है, और ये बात भारत भी बखूबी जानता है. अमेरिकी विदेश मंत्री के ताजा बयान से यह तय है कि आने वाले दिनों में अमेरिका इस बाबत दबाव बनाएगा कि या तो भारत परमाणु ऊर्जा के दुरुपयोग को रोकने के बारे में कोई सार्थक उपाए सुझाए या फिर उसके कहे रास्ते पर आगे बढ़े. हाल ही में जी-8 देशों के गैरएनपीटी मुल्कों को संवेदनशील तकनीक ईएनआर मुहैया नहीं करवाने के फैसले के पीछे अमेरिका का बहुत बड़ा हाथ है. ओबामा ये कतई नहीं चाहते कि भारत इन संधियों पर हस्ताक्षर किए बिना मिलने वाली छूट कालाभ उठाए. हिलेरी की भारत यात्रा में जिन समझौतों पर बात बनी उसमें रक्षा,परमाणु सहयोग और अंतरिक्ष कार्यक्रम शामिल हैं. एंड यूजर समझौते पर सहमति बनने के बाद अब अमेरिकी कंपनियां संवेदनशील सैन्य साजो सामान और तकनीक भारत को बेच सकेंगी, इस एग्रीमेंट में पहले जो पेंच फंसा था वो इस बात को लेकर था कि अमेरिकी खेमा सालाना निरीक्षण की जिद पर अड़ा था और भारत इसका विरोध कर रहा था. इस समझौत के अमल में आने के बाद अमेरिकी प्रतिरक्षा कंपनियों के लिए करोड़ों के कारोबार के दरवाजे खुल गए हैं. जाहिर है जिस काम में अमेरिका को दोनों हाथों से पैसे बटोरने का मौका मिला उसकी राह में आने वाली बाधाएं वो सबसे पहले हटाएगा. क्या इन चंद समझौतों को कामयाबी या ऐतिहासिक करार दिया जाता है.
जिस परमाणु समझौते की बात की जा रही है उसपर अमेरिका उस पर अमेरिका की तिरछी नजरें हमेशा कायम रहेंगी. परमाणु ऊर्जा सहयोग संधि के दुरुपयोग की बात करके वो कभी अपने हाथ खींच सकता है. रक्षा समझौता उसके फायदे के लिए है, अगर हिलेरी न भी आतीं तो भी उसपर सहमति बन ही जाती. आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान के खिलाफ ठोस रुख अख्तियार करने के बजाए हिलेरी ने गोल-मोल बयान देकर महज हमसे हमदर्दी जताने का ही प्रयास किया. भारत आने से पहले ही वो पाक को आश्वस्त कर आई थीं कि उसे चिंतित होने की जरूरत नहीं है. अमेरिका मौजूदा दौर में भारत के लिए अपने महत्वत्ता को भली-भांति समझता है, उसे पता है कि अगर भारत पर थोड़ा सा दबाव बनाए जाए तो वो उसके बताए मार्ग पर ही चलेगा. पाकिस्तान से वार्ता शुरू करने के मसले को इसके परिणाम के रूप में देखा जा सकता है. रूस में मनमोहन जरदारी मुलाकात भी अमेरिका के कहने पर ही हुई थी और शर्म अल शेख में मनमोहन सिंह और गिलानी का संयुक्त वक्तव्य भी वाशिंगटन की दखल का नतीजा था. जिसे प्रधानमंत्री को देश में बवाल मचने के बाद सुधारना पड़ा. अब भी भारत की तरफ से रह-रहकर पाकिस्तान से दोस्ती जैसे बयानात आते रहते हैं. बराक हुसैन ओबामा ने हिलेरी क्लिंटन को जिस उद्देश्य से भेजा था उसमें वो पूरी तरह सफल हुई हैं, भारत पर दबाव बनाने की दिशा में उन्होंने महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ाया है जिसे साल के अंत तक मनमोहन सिंह के अमेरिकी दौरे में अंतिम चरण में पहुंचा दिया जाएगा. लिहाजा हिलेरी की यात्रा और अमेरिका के साथ हुए समझौतों पर मुस्कुराने के बजाए बेहतर ये होगा कि इस बात आकलन किया जाए कि इस दौरे से हमें क्या हासिल हुआ.
Sunday, July 19, 2009
उन सवालों के जवाब आज भी मिलना बाकी हैं
ऐसे ही अखबार पढ़ते-पढ़ते एक बहुत पुराना किस्सा याद आ गया. जो दर्दनाक तो था ही, अपने पीछे कुछ ऐसे सवालातक भी छोड़ गया था जिनके जवाब मिलना अभी बाकी हैं. बात सर्दियों के दिनों की है, हाड़कंपा देने वाली ठंड में जब कोहरे की चादर शाम से ही छाने लगती थी तो लोग जल्द ही अपने घरों में कैद हो जाया करते थे, उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ, हमारे घर से तीन-चार घर छोड़कर एक परिवार रहा करता था, जिसमें तीन बच्चे भी थे, वो बच्चे कभी-कभीर हमारे साथ क्रिकेट खेलने आ जाया करते थे. हमारे देश में क्रिकेट और शराब दो ही ऐसी चीज हैं जो अंजानों को भी दोस्त बना देती हैं. इस संबंध में तो हरिवंश राय बच्चन ने लिखा भी है कि मंदिर-मस्जिद बैर कराते, मेल कराती मधुशाला.
कुछ दिनों से वो बच्चे न तो हमारे साथ खेलने आए और न ही दिखाई दिए, हमने सोचा कि शायद कहीं बाहर गये होंगे. उनके घर वालों से इतनी अच्छी जान पहचान थी नहीं सो जाकर पता करना मुनासिब नहीं समझा. इन दिनों कई बार उनके घर कुछ हट्टे-कट्टे लोगों को आते और उनके पिताजी को गिड़गिड़ाते देखा, एक-आद बार तो उनके आस-पड़ोसी भी बीच-बचाव करते दिखाई दिए. मामला पूरी तरह तो समझ में नहीं आया लेकिन इतना जरूर पता चल गया कि कुछ गड़बड़ तो जरूर है. कुछ दिन ऐसे ही निकल गये, पढ़ाई को लेकर घरवालों की डांट के चक्कर में क्रिकेट से भी थोड़े दिनों तक नाता तोड़ना पड़ा, उस वक्त हमें लगता था कि ऐसा हमारे साथ ही क्यों होता है, बाद में पता चला कि अमूमन हर बच्चे की यही कहानी है. पढ़ने-लिखने में शुरू से ही कुछ खास मन नहीं लगता था, हां इतना अवश्य पढ़ लिया करते थे कि फेल होने की नौबत न आए. फर्स्ट क्लास या टॉप मारने के सपने हमारे घर वालों ने भले ही देखें हो मगर हमने कभी उस ओर गौर भी नहीं किया. क्रिकेट खेलते-खेलते सुबह जल्दी उठने की आदत लग चुकी थी इसलिए घरवालों ने वो समय पढ़ाई के लिए निर्धारित कर दिया. उनका मानना था कि सुबह-सुबह का याद किया दिमाग से नहीं निकला. कुछ हद तक शायद वो सही भी थे, सुबह-सुबह जितना क्रिकेट खेला वो दिमाग में इस कदर रच-बस गया था कि पढ़ते-पढ़ते भी स्ट्रोक खेलने की प्रैक्टिस कर लिया करते थे. शाम को दोस्तों की चौपाल हुआ करती थी जिसमें सभी अपना-अपना दुखड़ा रोया करते थे, दरअसल सुबह-सुबह क्रिकेट खेलने का जो मजा था वो किसी और वक्त नहीं मिल सकता था, घूप खिलने के बाद रजाईयों में दुबके बैठे लोग पार्क में धूप सेंकने को आ जाया करते थे, जिनमें अधिकतर बुजुर्ग होते थे और उन्हें समझाना अपने आप में एक बहुत बड़ी बात होती है.
गेंद अगर पास से निकल भी जाए तो हंगामा खड़ा कर दिया करते हैं. और घर के बाहर यानी सड़क पर अंटियों का जमघट, स्वेटर बुनते-बुनते दूसरों की बुराई करना और हमें धमकाते रहना कि गेंद इधर आई तो खैर नहीं. इन सब के बीच क्रिकेट खेला भी जाता तो कैसे, हमारे ठीक पड़ोस में एक अम्मी जी रहा करती थीं जिनकी आदतों से उनके घर के बच्चे भी आजिज आ चुके थे, शायद इसीलिए बच्चा पार्टी ने उनका नाम छिपकली रखा था. उन्हें हमारा अपने ही घर में खेलना भी पसंद नहीं था, उनके विरोध को दरकिनार करके अगर हम खेलने की कोशिश भी करते तो उनकी रनिंग कमेंट्री शुरू हो जाया करती थी. हमारी बॉल के दिवार फंलागने का उन्हें बेसर्बी से इंतजार रहता था ताकिबॉल रखकर वो हमारा खेल बंद करवां सकतीं. उन दिनों जैसे-तैसे पैसे मिलाकर बॉल खरीदकर लाया करते थे और अम्मीजी थी उन्हें दबाकर हमें आर्थिक रूप से कंगाल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ती थीं. इतने सालों बाद आज भी वो बिल्कुल वैसी ही तंदरुस्त रखी हैं, उनकी जुबान की धार अब भी कायम है, हां ये बात अलग है कि अब उन्हें इतना चीखने और बॉल हथियाने का मौका नहीं मिलता क्योंकि बच्चे आजकल टीवी या इंटरनेट से ही चिपके रहते हैं. खैर हमारी चौपाल में यह फैसला हुआ कि सब अपने-अपने घरवालों को पढ़ाई का समय थोड़ा खिसकाने को कहेंगे और अगर बात नहीं बनी तो, अपने गुस्से का थोड़ा-थोड़ा इजहार करेंगे. अब पता नहीं हमारे फैसले की खबर घरवालों तक पहुंच गई या उन्हें हमारे हाल पर तरस आ गया कि उन्होंने हमें सुबह क्रिकेट खेलने की इजाजत दे दी. जिन एक-दो दोस्तों के घरवाले नहीं माने थे उन्हें हमने हाथ-पैर जोड़कर मना ही लिया.
हम अपने बच्चों को यूं दर-दर की ठोकरें खाने के लिए नहीं छोड़ सकते इसलिए उन्हें भी साथ ले जा रहे हैं. उस वक्त हमें लगा कि अगर हम कल थोड़ी हिम्मत दिखा देते तो शायद ये नौबत ही नहीं आती. उस दिन के बाद कुछ दिनों तक हमने क्रिकेट नहीं खेला, शायद हम सदमे में थे. फिर पता चला कि उन बच्चों के पिताजी जो जिंदा बच गये थे को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. उन पर मुकदमा चलाया जाएगा और हो सकता है कि उन्हें जेल भी जाना पड़ा. सुनकर बहुत ही अजीत लगा, जो व्यक्ति पहले से ही इतना दुखी हो उसको और दुख देना कहां का कानून है. उन्होंने जिस स्थिति में वो कदम उठाया वो सब जानते हैं, उन्होंने खुद भी जहर खाया था पर वो बच गये, उन्हें अपने आप में कैसे महसूस हो रहा होगा ये शायद कोई और नहीं समझ सकता.
मन में कई तरह के सवाल और गुस्सा लिए हम घर के सामने ही रहने वाले एक अंकल के पास गये, वो पहले पुलिस में ही थे. उन्होंने हमारे गुस्से को शांत करने की बहुत कोशिश की. उन्होंने बताया कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 309 के तहत आत्महत्या की कोशिश करने वाले व्यक्ति को दंडित करने का प्रावधान है. कानून में ऐसा करने वाले व्यक्ति को गुनाहगार माना जाता है, उसे अधिकतम एक साल तक की सजा भुगतनी पड़ सकती है और जुर्माना भी हो सकता है. हम उनके जवाबों से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं थे या कहें कि हम जानते-बूझते भी संतुष्ट होना नहीं चाहते थे क्योंकि हम ये स्वीकार नहीं पा रहे थे कि आखिर मौत की दहलीज पर जाकर लौटने वाले को हमारे देश का कानून सबकुछ जानते हुए भी कैसे सजा सुना सकता है. वो सवाल तो बचपन में उठे थे वो आज भी वैसे ही सामने खड़े हैं. आत्महत्या जैसा फैसला कोई भी इंसान अपनी खुशी से नहीं उठता, वो इस स्थिति तक तब पहुंचता है जब बाकी सारे दरवाजे उसके लिए बंद हो चुके होते हैं. वो इतना टूट चुका होता है कि जिंदा रहना उसके लिए मौत से भी बदतर बन जाता है. जीवन से पराजित ऐसे अभागे व्यक्ति को सहानुभूति सलाह मशविरे और उचित उपचार की जरूरत है या जेल की. कम से कम अब तो इस सवाल का जवाब खोजा जाना चाहिए. जो व्यक्ति आत्महत्या का प्रयासकरने के कारण पीड़ा और अपमान झेल चुका है उसे कानून के जरिए दंड़ित करना क्रूरता से यादा कुछ नहीं.
Monday, July 13, 2009
ऐसा गलत क्या कहा जयराम ने
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने प्लास्टिक पर प्रतिबंध के खिलाफ बयान देकर मधुमक्खी के छत्थे में हाथ डाल दिया है, उनके खिलाफ पर्यावरणविदों ने तो मोर्चा खोला ही है दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भी आवाज बुलंद कर दी है. जयराम रमेश की दलील है कि अगर निर्धारित मानदंडों और तरीकों से प्लास्टिक की रीसाइक्लिंग की जाए तो पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचेगा. लेकिन अगर उसकी जगह कागज की थैलियों के प्रचलन ने जोर पकड़ा तो इसके लिए बड़े पैमाने पर पेड़ काटे जाएंगे जो पर्यावरण के लिए कहीं यादा घातक होगा, उनका यह भी तर्क है कि पूरी दुनिया में केवल भारत और बांग्लादेश में ही इसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा हुआ है. जबकि उनका विरोध करने वालों की अपनी दलीलें हैं, उनका कहना है कि प्लास्टिक में मौजूद पीवीसी भारी नुकसानदेह होता है, देश में ऐसी उन्नत प्रणाली भी नहीं है जो बेकार प्लास्टिक थैलियों को नियंत्रित कर सके. बेकार थैलियों ने शहरी जीवन को कई स्तरों पर प्रभावित किया है. यही नहीं, इसी के कारण यमुना का बुरा हाल हो गया है. रीसाइक्लिंग के लिए भी जरूरी संसाधन की कमी है एवं पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित कर्मचारी भी नहीं हैं, आदि, आदि.
इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि प्लास्टिक के दुष्प्रभाव गंभीर रूप में सामने आ रहे हैं. हिमालय की बर्फ से ढकीं चोटियां पर्वतरोहियों द्वारा छोड़े गये मलबों से पट रही हैं, गंगा-यमुना की हालात हमारे सामने है, यमुना ने तो तकरीबन दमतोड़ ही दिया और बाकि कुछ-एक दम तोड़ने के कगार पर हैं. हर साल न जाने कितने जानवर पॉलिथिन खाने से मारे जाते हैं. लेकिन सवाल से उठता है कि क्या हर समस्या का समाधान महज प्रतिबंध लगाना ही है. गौर करने वाली बात ये है कि अगर तमाम कोशिशों के बाद भी इस पर पूर्ण रूप से रोक नहीं लगाई जा सकी है तो सिर्फ और सिर्फ इसलिए कि इसका संबंध लोगों की सुविधा से है और शायद वो अपनी सुविधाओं मे कटौती नहीं करना चाहते. बिना सोचे-विचारे किसी समस्या को यह कहकर की उसे खत्म नहीं किया जा सकता उसके कारक को ही खत्म कर देना कहां की बुध्दिमानी है. प्लास्टिक के अगर दुष्प्रभाव हैं तो उसके फायदे भी हैं, जिनको इसकी मुखालफत करने वाले भी झुठला नहीं सकते. सवाल प्लास्टिक या इसके इस्तेमाल को खत्म करने का नहीं बल्कि इसके वाजिब प्रयोग का है. अगर पर्यावरणमंत्री का तर्क लोगों को समझ नहीं आ रहा है तो यह तर्क कहां से समझने लायक है कि संसाधनों की कमी है इसलिए प्रतिबंध लगा दो. अगर संसाधन की कमी है तो उसे दूर करने के प्रयासों के बारे में आवाज बुलंद करने की जरूरत है ना कि प्लास्टिक पर रोक की.
कुछ साल पूर्व पर्यावरण मंत्रालय ने प्लास्टिक के कचरे को ठिकाने लगाने के उपाए सुझाने के लिए एक समिति घटित की थी जिसने अपने रिपोर्ट में इस बात पर बल दिया था कि प्लास्टिक की मोटाई 20 की जगह 100 माइक्रोन तय की जानी चाहिए, ताकि ज्यादा से ज्यादा प्लास्टिक को रीसाइकिल किया जा सके. मतलब समिति का भी यही मत था कि रीसाइक्लिंग पर जोर दिया जाए. रीसाइक्लिंग से समस्या काफी हद तक सुलझ सकती है इसमें कोई दोराए नहीं. प्लास्टिक का विरोध भले ही चरम पर क्यों न पहुंच गया हो मगर सही मायनाें में देखा जाए तो इसके बिना सुविधाजनक जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती. प्लास्टिक किसी भी अन्य विकल्प जैसे धातु, कांच या कागज आदि की तुलना में कहीं ज्यादा मुफीद है. आज साबुन, तेल,दूध आदि वस्तुओं की प्लास्टिज् पैकिंग की बदौलत ही इन्हें लाना-ले-जाना इतना आसान हो पाया है. प्लास्टिज् पैकिंग कार्बन डाई आक्साइड और ऑक्सीजन के अनुपात को संतुलित रखती है जिसकी वजह से लंबा सफर तय करने के बाद भी खाने-पीने की वस्तुएं ताजी और पौष्टिक बनी रहती हैं. किसी अन्य पैकिंग के साथ ऐसा मुमकिन नहीं हो सकता. इसके साथ ही वाहन उद्योग, हवाई जहाज, नौका, खेल, सिंचाई, खेती और चिकित्सा के उपकरण आदि जीवन के हर क्षेत्र में प्लास्टिकका ही बोलबाला है. भवन निर्माण से लेकर साज-साा तक प्लास्टिक का कोई सामी नहीं. प्लास्टिक के फायदों को नजरअंदाज कर इसके दुष्प्रभावों को सामने रखने वालों के लिए यहां इंडियन पेट्रोकेमिकल इंडस्ट्री के एक शोध का उल्लेख करना बेहद जरूरी है, बिजली की बचत में प्लास्टिक की भूमिका को दर्शाने के लिए किए गये इस शोध में कांच की बोतलोें के स्थान पर प्लास्टिक की बोतल के प्रयोग से 4 हजार मेगावाट बिजली की बचत हुई. जैसा की पर्यावरणवादी दलीलें देते रहे हैं, अगर प्लास्टिकपर पूर्णरूप प्रतिबंध लगा दिया जाए तो इसका सबसे विपरीत प्रभाव पर्यावरण पर ही पड़ेगा. पैकेजिंग उद्योग में लगभग 52 फीसदी इस्तेमाल प्लास्टिक का ही होता है. ऐसे में प्लास्टिकके बजाए अगर कागज का प्रयोग किया जाने लगे तो दस साल में बढ़े हुए तकरीबन 2 करोड़ पेड़ों को काटना होगा. वृक्षों की हमारे जीवन में क्या अहमियत है यह बताने की शायद जरूरत नहीं. वृक्ष न सिर्फ तापमान को नियंत्रित रखते हैं बल्कि वातावरण को स्वच्छ बनाने में भी अहम् किरदार निभाते हैं. पेड़ों द्वारा अधिक मात्रा में कार्बनडाई आक्साइड के अवशोषण और नमी बढ़ाने से वातावरण में शीतलता आती है. अब ऐसे में वृक्षों को काटने का परिणाम कितना भयानक होगा इसका अंदाजा खुद-ब-खुद लगाया जा सकता है. साथ ही कागज की पैकिंग प्लास्टिक के मुकाबले कई गुना महंगी साबित होगी और इसमें खाद्य पदार्थों के सड़ने आदि का खतरा भी बढ़ जाएगा. ऐसे ही लोगों तक पेयजल मुहैया कराने में प्लास्टिकका महत्वूर्ण योगदान है, जरा सोचें कि अगर पीवीसी पाइप ही न हो तो पानी कहां से आएगा. जूट की जगह प्लास्टिकके बोरों के उपयोग से 12000 करोड़ रुपए की बचत होती है. अब इतना जब जानने-समझने के बाद भी प्लास्टिक की उपयोगिता पर आंखें मूंदकर यह कहना कि यह कहना की यह जीवन के लिए घातक है तो, समझदारी नहीं नासमझी ही कहा जाएगा.
वैसे सही मायने में देखा जाए तो इस समस्या के विस्तार का सबसे प्रमुख और अहम् कारण हमारी सरकार का ढुलमुल रवैया है, पर्यावरणवादी भी मानते हैं कि सरकार को विदेशों से सबक लेना चाहिए, जहां निर्माता को ही उसके उत्पाद के तमाम पहलुओं केलिए जिम्मेदार माना जाता है. इसे निर्माता की जिम्मेदारी नाम दिया गया है. उत्पाद के कचरे को वापस लेकर रीसाइक्लिंग करने तक की पूरी जिम्मेदारी निर्माता की ही होती है. एकरिपोर्ट के मुताबिक कुल उत्पादित प्लास्टिक में से 45 फीसदी कचरा बन जाती है और महज 45 फीसदी ही रिसाइकिल हो पाती है. मतलब साफ है, हमारे देश में रीसाइक्लिंग का ग्राफ काफी नीचे है. प्लास्टिकको अगर अधिक से अधिक रीसाइक्लिंग योग्य बनाया जाए तो कचरे की समस्या अपने आप ही समाप्त हो जाएगी. लिहाजा जयराम रमेश ने जो कहा है उस पर हो-हल्ला करने के बजाए उसकी गहराई को समझने का प्रयास करना चाहिए.
Wednesday, July 8, 2009
फ्लॉप शो साबित हुआ आम बजट
इस आम बजट को आमजन की अपेक्षाओं के अनुरूप तो नहीं कहा जा सकता लेकिन सरकार की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के इसमे सारे गुण मौजूद हैं. वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने भविष्य में राजनीतिक लाभ से संबंधित योजनाओं को अत्याधिक प्रमुखता दी है. बजट में टैक्सों की हेराफेरी और थोड़ी बहुत छूट प्रदान करके लोकलुभावन बनाने की कोशिश की है लेकिन वो भी कारगर होती नजर नहीं आती. बजट में आयकर छूट सीमा जो पहले 1,50,000 तक थी उसे अब 1,60,000 कर दिया गया है, ऐसे ही महिलाओं के लिए इसे 1,80,000 से बढ़ाकर 1,90,000 किया गया है, हालांकि वरिष्ठ नागरिक इस मामले कुछ यादा फायदे में रहे हैं उनके लिए छूट सीमा पहले के 2,25,000 से बढ़ाकर 2,40,000 कर दी गई है. यानी वरिष्ठ नागरिकों को छोडक़र अधिकतम रियायत दी गई महज 10,000. बजट में जीवन रक्षक दवाएं, बड़ी कारें, एलसीडी, मोबाइल फोन, सीएफएल,वाटर प्यूरीफायर, खेल का सामान आदि सस्ता किया गया है. जबकि डॉक्टर-वकील की सलाह, सोना-चांदी, कपड़े आदि के लिए अब यादा दाम चुकाने होंगे.
नफे -नुकसान के गुणा-भाग में उतरने से पहले बजट के बाकी हिस्सा पर भी प्रकाश डालाना बेहतर रहेगा, प्रणव मुखर्जी ने किसानों का खास ख्याल रखने की बात कही है, उन्हें अब सस्ते दर से कर्ज दिया जाएगा. खाद सब्सिडी अब उनके हाथ तक पहुंचाई जाएगी. 2014-15 तक गरीबी उन्नमूलन की दिशा में उल्लेखनीय काम करने का प्रावधान बजट में है, इसके अलावा अल्पसंख्यकों पर दरियादिली की बरसात की गई है, एससी-एसटी और ओबीसी में आने वाले बच्चों की शिक्षा पर अत्याधिक ध्यान केंद्रित किया गया है. अब बात शुरू करते हैं आयकर छूट से जिसको सरकार की तरफ से बहुत बड़ा कदम बताया जा रहा है, अगर दो हफ्ते पहले ये बजट आता और ये प्रावधान किया गया होता तो कुछ हद तक इसे बड़ा कदम करार दिया जा सकता था लेकिन मौजूदा वक्त में ऐसी कोई गुंजाइश नहीं. बजट से ठीक पहले सरकार पेट्रोल पर चार और डीजल पर दो रुपए बढ़ा चुकी, उस लिहाज से इस छूट को ऊंट के मुंह में जीरा समान कहा जा सकता है. छूट की सच्चाई को विस्तार से समझने के लिए हम इसको ऐसे देख सकते हैं, अगर आपकी सालाना कमाई 500,000 से 9,90,000 के आसपास है तो आपकी सालाना बचत हुई करीब 1030, अगर 10,00,000 है तो 21530, 20,00,000 पर 51530, और 50,00,000 पर तकरीबन 1,41,530 के आसपास. पहले वाली श्रेणी यानी 500,000 से 9,90,000 को लेकर आगे चलते हैं, इतनी कमाई पर बचत का आंकड़ा सालाना हजार रुपए से थोड़ा सा यादा है और महीने की बात की जाए तो यह पहुंचता है करीब 85.83 के इर्द-गिर्द. अब जरा सोचें की मेट्रो सीटी में रहने वाला एक व्यक्ति जो प्रति माह 100 लीटर के आस-पास पेट्रोल खर्च करता है, उसे तेल की कीमत में मौजूदा वृध्दि के बाद चार रुपए यादा चुकाने होंगे यानी पहले अगर वो 42 रुपए देता था तो अब उसे 46 देने पड़ेंगे. इस हिसाब से 100 गुणा चार मतलब कुल भार बढ़ा 400 और बचत हुई महज 85.83. यानी अगर सही मायनों में देखा जाए तो सरकार ने जितना दिया नहीं उससे यादा वसूल कर लिया. छूट के रूप में सरकार ने केवल एक झुनझुना पकड़ाया है जिसे देखकर बच्चा तो मुस्कुरा सकता है लेकिन पेशेवर व्यक्ति नहीं. अब यह तो केवल प्रणव मुखर्जी और मनमोहन सिंह की आर्थिक विशेषज्ञों की टीम ही बता सकती है कि इस बजट में उदारता जैसे शब्द कहां हैं. बजट में राष्ट्रीय ग्रामीण जैसी योजनाओं पर पैसे की बरसात की गई है जबकि यह कई बार उजागर हो चुका है कि यह योजना भ्रष्टाचार की गिरफ्त में है.
कहीं-कहीं तो काम करने के बाद भी मजदूरों को उनका मेहनताना नहीं मिलता. ऐसे में यादा जरूरत इस तरह की योजनाओं के व्यापक क्रियान्वयन की थी ताकि जिनके लिए योजनाएं बनाई गई हैं उन तक लाभ पहुंच सके. जहां तक बात अल्पसंख्यकों और पिछड़ी जातियों को लुभाने की है तो ये पूरा वोट बैंक को रिझाने वाला स्टंट है. अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के बजट में 74 प्रतिशत का इजाफा किया गया है. इतना ही नहीं, अल्पसंख्यक बहुल जिलों में पानी, बिजली, सड़क, शिक्षा, बैंक आदि की व्यवस्था पर भी सरकार ने नजरें इनायत की हैं. यह धनराशि खास तौर से नौ योजनाओं पर खर्च की जाएगी. यादा ध्यान 20 प्रतिशत से अधिक अल्पसंख्यक आबादी वाले जिलों में मल्टी सेक्टोरल योजना के कार्यों पर दिया जाएगा. अल्पसंख्यक छात्रों की तालीम के मद्देनजर पूर्व मैट्रिक छात्रवृत्ति, मैट्रिकोत्तर छात्रवृत्ति के साथ ही उच्च स्तर पर व्यावसायिक व तकनीकी शिक्षा हासिल करने वाले छात्रों के लिए योग्यता सह-युक्ति छात्रवृत्ति को भी प्राथमिकता में शामिल किया गया है. इसके साथ ही पश्चिम बंगाल व केरल में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कैंपस खोले जाने के लिए 25-25 करोड़ की योजना अलग से है. बजट में अनुसूचित जाति के छात्रों को मैट्रिकोत्तर छात्रवृत्ति के मद में ही करीब 750 करोड़ खर्च करने का एलान किया गया है, इसके अतिरिक्त अनुसूचित जाति एवं पिछड़े वर्ग को विशेष केंद्रिय सहायता में 450 करोड़ अगल रखें गये हैं. पिछड़े वर्ग के छात्रों की मैट्रिकोत्तर छात्रवृत्ति योजना के लिए 135 करोड़ा का प्रावधान है, जबकि इस
समुदाय के मैट्रिक पूर्व छात्रवृत्ति के लिए 30 करोड़ और रखे गये हैं. सरकार का मानना है कि इससे करीब 11 लाख पिछड़े विधार्थियों का भला होगा. ठीक ही है, इतनी रकम से किसी का भी भला हो सकता है. यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि सामान्य वर्ग की झोली में क्या डाला गया. क्या सामान्य जाति के बच्चों को छात्रवृत्ति की खास जरूरत नहीं पड़ती, क्या गंदगी और अव्यवस्थाओं का आलम केवल अल्पसंख्यक बहुल जिलों में ही होता है.
बजट में सामान्य वर्ग की जरूरतों पर कोई ध्यान केंद्रित नहीं किया गया. माना जा रहा था कि सरकार बजट में महंगाई से राहत दिलाने के लिए कुछ कदम उठा सकती है, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. उल्टा तेल मूल्यों के लिए एक टास्क फोर्स यानी स्टडी ग्रुप बनाने की बात कही गई है. पिछले एक साल में देश में 65 फीसदी परिवारों का जीवन स्तर पहले के मुकाबले खराब हुआ है. इसकी वजह खाद्य और अन्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ना है. हालांकि यह बात अलग है कि मुद्रास्फीति की दर दिसंबर 2008 से ही 3 फीसदी से नीचे बनी हुई है. कुल मिलाकर कहा जाए तो यह आम बजट पूरी तरह फ्लॉप शो साबित हुआ है और इससे ये संकेत मिलते हैं कि आने वाले दिनों में आयकर में दी गई नाममात्र छूट के एवज में सरकार और कुछ और भार बढ़ा सकती है.