Saturday, May 16, 2009
अब इन नतीजों को क्या कहें
नीरज नैयर
हम हिंदुस्तानियों की आदत कोठे पर बैठी उस तवायफ की माफिक है जो अपने पेशे को रोज गालियां देती है, मार खाती है, जिल्लत सहती है लेकिन कभी उसे छोड़ने का साहस नहीं दिखा पाती. तवायफ की मजबूरी तो फिर भी एक बारगी समझी जा सकती है कि उसके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है मगर इस देश की जनता के बारे में क्या कहें. जिस तरह से महंगाई का चक्का घूम रहा था, जिस तेजी से देश में धमाके हो रहे थे और जिस तरह के विरोधी स्वर लोगों के मुंह से फूट रहे थे उससे तो यही प्रतीत हो रहा था कि इस बार जनता बदलाव चाहती है. लेकिन लोकसभा चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया है कि हमारे देश की जनता भी उस तवायफ की ही तरह है. जब हर छोटी अवधि के बाद पेट्रो पदार्थों के मूल्यों में आग लगाई जा रही थी तो 2004 में हाथ का साथ देने वाले भी अपनी गलती पर पछता रहे थे बावजूद इसके कांग्रेस को जनादेश मिल गया. अब इसे क्या कहें, जनता की लाचारी, मजबूरी या बेवकूफी. लाचारी या मजबूरी तो इसलिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि उसके पास विकल्प मौजूद था. उसके पास कांग्रेस या बसपा में से किसी एक को चुनने की मजबूरी नहीं थी. भाजपा एक मजबूत
विकल्प के रूप में मैदान में थी, भाजपा देश के लिए कोई नई नहीं है, 14वीं लोकसभा में उसने जो शासन चलाया था उसे कांग्रेस के शासन से हर मायने में बेहतर कहा जा सकता है. यूपीए सरकार ने जिन उपलब्धियों को अपना बताकर जनता से वोट मांगे उनकी नीव अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में ही रखी गई थी. फिर चाहे वह परमाणु करार, सेतु समुद्रम योजना हो या फिर राष्ट्रीय राजमार्ग योजना.
इस बार भी भाजपा ने जिन मुद्दों को सामने रखा वो हर लिहाज से कांग्रेस की अपेक्षा मजबूत थे. विदेशों में काले धन की बात पहले भाजपा ने उठाई और जब मामला रंग पकड़ता गया तो कांग्रेस भी इसके प्रति प्रतिबध्दता जताने लगी. ये बात सही है कि भाजपा ने कुछ ऐसे मुद्दे भी छेड़े जिनको पचाना मुमकिन नहीं थे जैसे राम मंदिर मुद्दा. इसके साथ ही कंधमाल और मंगलूरु में जो कुछ हुआ उससे भी भाजपा की छवि खासी प्रभावित हुई. अगर भाजपा चुनाव से पूर्व पुन: राम मंदिर निर्माण की बात नहीं करती और कंधमाल, मंगलूरु जैसी घटनाएं नहीं होती तो शायद उसके लिए स्थिति इतनी बुरी नहीं होती. मगर फिर भी बीते कुछ सालों में जिस तरह से आम आदमी के मुंह से निवाला छिना है उसके आगे ऐसी घटनाएं कहीं नहीं ठहरती. भले ही कांग्रेस ने चुनाव से पहले महंगाई की रफ्तार को आंकड़ों के जाल में उलझाकर गिराने में कामयाबी हासिल की लेकिन हकीकत यही है कि आवश्यक वस्तुओं के दाम अब भी आसमान छू रहे हैं, और उनके नीचे उतरने की कोई संभावना दिखलाई नहीं देती. कांग्रेस खुद को आम आदमी के हितैषी के रूप में पेश करती आयी है मगर उसकी नीतियां हमेशा से आम आदमी विरोधी रहीं. देश की आंतरिक सुरक्षा की अगर बात की जाए तो कांग्रेस नीत सरकार इस मोर्चे पर पूरी तरह विफल रही थी, 2004 में उसके सत्ता संभालने के बाद से 2009 में लोकसभा चुनाव तक करीब 3000 आतंकवादी घटनाएं हुई जिनमें तकरीबन 4000 निदोर्षों को जान गंवानी पड़ी. मुंबई हमले के बाद तो यह साफ हो गया था कि सुरक्षा के मानदंडों को लेकर सरकार की नीतियां कितनी लचर हैं. भाजपा से कुछ लोग इसलिए नाता नहीं जोड़ना चाहते कि वो सेकुलर नहीं है, पर कांग्रेस ने जिस तरह के फैसले लिए क्या उसे सेकुलर सोच का परिणाम कहा जा सकता है. कांग्रेस सरकार ने वोट बैंक की खातिर मदरसों को सीबीएसई बोर्ड के बराबर खड़ा करने का दांव चला, मतलब मदरसे में पढ़ने वाले उसी जमात में खड़े हो सकेंगे जिसमें उच्च तालीम हासिल करने वाले खड़े होते हैं. उन्हें नौकरी पाने के लिए किसी दूसरी डिग्री की जरूरत नहीं पड़ेगी. कांग्रेस सरकार ने धर्म विशेष के छात्रों को करीब 25 लाख की छात्रवृत्ति प्रदान की, क्या इसे सेकुलरवाद कहा जा सकता है, क्या दूसरे धर्मो के गरीब बच्चों को इसकी जरूरत नहीं होती. और वो भी तब जब गरीबी रेख से नीचे जीवन यापन करने वालों की तादाद में कांग्रेस के कार्यकाल में 20 प्रतिशत की वृध्दि हुई हो. कांग्रेस नीत यूपीए के सत्ता में आने से पूर्व यानी 2004-2005 में यह आंकड़ा 270 मिलियन था लेकिन अब 55 मिलियन के आस-पास है. पिछले पांच सालों के दरम्यां आंध्र प्रदेश के 36000 हिंदू मंदिरों में से 28000 को बंद कराया जा चुका है, क्या ये सेकुलरवार है. जब दूसरे धर्मो के लोगों को धर्म प्रचार की पूरी आजादी दी जाती है तो फिर हिंदुओं के साथ ऐसा बर्ताव क्यों, शायद इसलिए कि कांग्रेस उसे भाजपा का वोट बैंक समझती है. यहां बात सिर्फ हिंदू, मुस्लिम, सिख या ईसाई की नहीं है. यहां बात है इक्विलिटी यानी समानता की. सभी धर्मों के लोगों को समान नजरीए से क्यों नहीं देखा जाता. शायद इन सब सवालातों और सोच को घर रखकर जनता ने इस बार वोट दिया और इसका पछतावा भी उन्हें जल्द ही महसूस होगा, क्योंकि जो पार्टी समानता के सिध्दातों के विपरीत अपनों को लाभान्वित करने की नीतियों पर अमल करती है उसके साथ सफर करना हमेशा ही कष्टदायी रहता है, इसका मुजायरा अब तक हो ही चुका है. किसी भी देश की प्रगति आतंरिक मामलों के साथ-साथ इस बात पर भी निर्भर करती है कि उसकी विदेश नीति कैसी है,
इस मोर्चो पर भी कांग्रेस नीत सरकार पूरी तरह विफल रही. पड़ोसी मुल्कों से हमारे रिश्ते मधुर बनने के बजाए और तल्ख होते गये, चीन, म्यांमार, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल हर तरफ से हमारे खिलाफ आवाजें उठती रहीं. अब श्रीलंका भी तमिल संघर्ष में बार-बार भारत के हस्तक्षेप से हमारे विरोधियों की तरफ खिंचता दिखाई दे रहा है. कहते हैं लोकसभा चुनाव स्थानीय नहीं राष्ट्रीय मुद्दों पर लड़ा जाता है, पर अगर ऐसा होतो तो शायद इन सब मुद्दों पर गौर किया जाता. चुनाव के नतीजों से तो यही लग रहा है कि महंगाई, आतंकवाद जैसे मुद्दों से देश की जनता को कोई सरोकार नहीं. उसने पहले से ही तय किया हुआ था कि किसे वोट करना है फिर चाहे एक-एक निवाले के लिए उसे जंग ही क्यों न लड़नी पड़े. जिस तरह के हालात कांग्रेस नीत सरकार ने अब तक पैदा किए थे, उससे तो यही लगता है कि उसके पुन: सत्ता में लौटने से खाने के भी लाले पड़ने वाले हैं. सरकार बनने के थोड़े दिनों बाद फिर पेट्रोल के दाम बढ़ेंगे, फिर महंगाई सातवें आसमान पहुंचेगी और फिर जनता अपनी बेबकूफी पर आंसू बहाएगी. लेकिन पांच साल गुजरते-गुजरते वो फिर वही तवायफ बन जाएगी, जो रो सकती है, गालियां दे सकती है मगर अपना पेश नहीं छोड़ सकती.
Tuesday, April 14, 2009
वोट नहीं देते तो आप सो रहे हैं
नीरज नैयर
टीवी पर आजकल एक चाय कंपनी लोगों को वोट देने के लिए प्रेरित करने में लगी है. कंपनी कहती है, अगर आप वोट नहीं देते तो आप सो रहे हो. काफी हद तक ये सही भी है. देश का भविष्य चुनाव और उसमें चुनकर आने वाले प्रतिनिधियों पर निर्भर करता है. अगर इस प्रक्रिया का हिस्सा होते हुए भी हम इसमें भागीदार नहीं बनते तो फिर हम सो ही रहे हैं. लेकिन सवाल ये उठता है कि आखिर वोट दें तो किसे? यहीं आकर लोगों की सोच बंट जाती है.
अभी हाल ही में मैंने एक वरिष्ठ पत्रकार का लेख पढ़ा जिसमें उन्होंने एक छोटी सी कहानी के जरिए बहुत कुछ बताने का प्रयास किया. कहानी कुछ यूं है, राजा का दरबार खचाखच भरा हुआ था क्योंकि एक अपराधी को सजा सुनाई जाने वाली थी. राजा ने कार्रवाई आरंभ करते हुए अपराधी से कहा, हम तुम पर रहम करते हैं आज हमारी बेटी का जन्मदिन है. लेकिन चूंकि तुमने अपराध किया है तो इसकी सजा तो तुम्हें मिलनी ही है पर हम तुम्हें अपनी सजा खुद चुनने का मौका देते हैं. ये जो तीन तख्तियां तुम्हारे सामने रखी हैं. इनमें तुम्हारे लिए सजाएं लिखी हैं. जो चाहे चुन लो. अपराधी को लगा कि राजा जब इतनी दरियादिली दिखा रहे हैं तो सजा भी मामूली सी होगी, ये सोचकर उसने झट से एक तख्ती उठाई पर उसपर लिखा था मौत. झुंझलाकर उसने दूसरी तख्ती देखी तो उसपर भी लिखा था मौत, तीसरी देखी तो उसपर भी मौत ही लिखा था. राजा ने जोर का ठहाका लगाया. यानी कहने को तो अपराधी के पास तीन विकल्प मौजूद थे लेकिन नतीजा सबका एक ही था. ऐसे ही जनता के पास भी कहने को तो बहुत सारे विकल्प मौजूद हैं, विभिन्न राजनीतिक दलों के ढेर सारे प्रत्याशी चुनावी मैदान में खम ठोंक रहे हैं मगर सबका लक्ष्य, सबका उद्देश्य एक ही है.
चुनाव से पूर्व लोकलुभावन वादे करो, हाथ-पांव जोड़ो और स?ाा में आने के बाद सबकुछ भूलकर दोनों हाथों से जेबें भरने में लग जाओ. शायद यही कारण है कि आज शिक्षित वर्ग का एक बहुत बड़ा हिस्सा वोट देने नहीं जाता. मतदान वाले दिन को लोग गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस की तरह महज राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मनाते हैं. पर क्या केवल इसलिए कि अधिकतर राजनीतिक दल और राजनीतिज्ञों का नजरीया और आदत एक जैसी होती है, हम वोट देने की अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ सकते हैं. मेरी समझ से तो शायद नहीं. हममें से ही कुछ लोग ऐसे हैं जो पहले तो वोट नहीं देते फिर बाद में स?ाा में आई पार्टी और प्रतिनिधियों पर अफसोस जताने लगते हैं. मुझे अब भी याद है उ?ार प्रदेश के विधानसभा चुनाव में जब भाजपा-बसपा गठजोड़ की सरकार बनी थी तो शिक्षित वर्ग के एक खास तबके ने इस बात पर बहुत अफसोस जाहिर किया था कि बसपा को भी स?ाा में भागीदारी मिल गई. उस वक्त इस तबके के अधिकतर लोगों ने यह कहकर वोट डालने से मना कर दिया था कि इतनी धूप में इतनी दूर कौन जाए, और वैसे भी स?ाा में कोई भी आए हमें क्या फर्क पड़ने वाला है.
हमें क्या फर्क पड़ने वाला है ये जुमला वोट न देने वालों की जुबान पर अक्सर सुनने को मिल जाया करता है. ढेरो तर्क वितर्क के साथ वो इस बात को साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते कि वोट देना महज समय की बर्बादी से ज्यादा कुछ नहीं. इससे तो बेतहर है घर में आराम से सुकून के कुछ पल बिताए जाएं. अगर हम बीते कुछ वर्षों के आंकड़ों पर गौर फरमाएं तो खुद ब खुद ये सच्चाई सामने आ जाएगी कि पढ़े-लिखे लोग वोट देने से कतराने लगे हैं. ये वोट न देने का ही नतीजा है कि आज आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग बेखौफ होकर न सिर्फ चुनावी मैदान में उतरते हैं बल्कि जीतकर संसद और विधानसभाओं की रौनक भी बढ़ाते हैं. वो इस बात को भली भांति जनते हैं कि जो वर्ग उनकी उम्मीदवारी का सबसे ज्यादा विरोध कर सकता है उसे वोटिंग के वक्त सोने से फुर्सत नहीं. जितनी तेजी से लोगों की वोट डालने की आदत छूटती जा रही है उतनी तेजी से राजनीति में दागियों की संख्या बढ़ती जा रही है. शांतप्रिय कहे जाने वाले मध्यप्रदेश की ही अगर बात करें तो 2003 के विधानसभा चुनाव में 36 ऐसे उम्मीदवार विधानसभा पहुंचे जिनपर आपराधिक मामले लंबित थे. ये दागी विधायक जीते हुए विधायकों का 16 फीसदी थे. ऐसे ही 2004 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में करीब 30 प्रतिशत दागी उम्मीदवारों ने जीत का स्वाद चखा. गलियों में दादागिरी करने वालों को संसद-विधानसभा भेजने के मामले में बिहार का कोई सानी नहीं है.
फरवरी 2005 के विधानसभा चुनाव में कुल जीते 243 उम्मीदवारों में से 102 पर आपराधिक मामले दर्ज थे और छह माह बाद यानी नवंबर में पुन: हुए चुनाव में यह आंकड़ा 119 तक पहुंच गया. दिल्ली की स?ाा की चाबी अपने पास रखने वाले उ?ार प्र्रदेश का भी इस मामले में बिहार से चोली-दामन का साथ हैं. 2007 के विधानसभा चुनाव में जीतकर आए 403 उम्मीदवारों में से 160 के ऊपर आपराधिक मामले दर्ज थे. यानी कुल विधायकों में से 40 फीसदी दागदार. इस मामले में उ?ार पूर्व के राज्यों की जनता की पसंद वाकई काबिले तारीफ है. 2008 में हुए नागालैंड विधानसभा चुनाव में महज दो दागी उम्मीदवार चुनावी मैदान में थे और मजे की बात ये रही कि उन्हें भी जीत नसीब नहीं हुई. ऐसे ही मेघालय के विधानसभा चुनाव में एक भी ही उम्मीदवार ऐसा नहीं था जिसके दामन पर दाग हो. ये तो बात हुई विधानसभा चुनावों की पिछले लोकसभा चुनाव की अगर बात की जाए तो वहां भी दागियों की भरमार रही. देश के सबसे बड़ी चुनावी महापर्व में बहुतरे दागियों ने हिस्सा लिया और जीतकर संसद को भी अखाड़ा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. 14वीं लोकसभा में 120 सांसद आपराधिक पृष्ठभूमि से है. अब ऐसे में देश की बागडोर कितने सुरक्षित हाथों में है इसका अंदाजा खुद ब खुद लगाया जा सकता है. मगर इसके लिए किसी और को दोष नहीं दिया जा सकता हम खुद ही दोषी है.
टीवी पर आजकल एक चाय कंपनी लोगों को वोट देने के लिए प्रेरित करने में लगी है. कंपनी कहती है, अगर आप वोट नहीं देते तो आप सो रहे हो. काफी हद तक ये सही भी है. देश का भविष्य चुनाव और उसमें चुनकर आने वाले प्रतिनिधियों पर निर्भर करता है. अगर इस प्रक्रिया का हिस्सा होते हुए भी हम इसमें भागीदार नहीं बनते तो फिर हम सो ही रहे हैं. लेकिन सवाल ये उठता है कि आखिर वोट दें तो किसे? यहीं आकर लोगों की सोच बंट जाती है.
अभी हाल ही में मैंने एक वरिष्ठ पत्रकार का लेख पढ़ा जिसमें उन्होंने एक छोटी सी कहानी के जरिए बहुत कुछ बताने का प्रयास किया. कहानी कुछ यूं है, राजा का दरबार खचाखच भरा हुआ था क्योंकि एक अपराधी को सजा सुनाई जाने वाली थी. राजा ने कार्रवाई आरंभ करते हुए अपराधी से कहा, हम तुम पर रहम करते हैं आज हमारी बेटी का जन्मदिन है. लेकिन चूंकि तुमने अपराध किया है तो इसकी सजा तो तुम्हें मिलनी ही है पर हम तुम्हें अपनी सजा खुद चुनने का मौका देते हैं. ये जो तीन तख्तियां तुम्हारे सामने रखी हैं. इनमें तुम्हारे लिए सजाएं लिखी हैं. जो चाहे चुन लो. अपराधी को लगा कि राजा जब इतनी दरियादिली दिखा रहे हैं तो सजा भी मामूली सी होगी, ये सोचकर उसने झट से एक तख्ती उठाई पर उसपर लिखा था मौत. झुंझलाकर उसने दूसरी तख्ती देखी तो उसपर भी लिखा था मौत, तीसरी देखी तो उसपर भी मौत ही लिखा था. राजा ने जोर का ठहाका लगाया. यानी कहने को तो अपराधी के पास तीन विकल्प मौजूद थे लेकिन नतीजा सबका एक ही था. ऐसे ही जनता के पास भी कहने को तो बहुत सारे विकल्प मौजूद हैं, विभिन्न राजनीतिक दलों के ढेर सारे प्रत्याशी चुनावी मैदान में खम ठोंक रहे हैं मगर सबका लक्ष्य, सबका उद्देश्य एक ही है.
चुनाव से पूर्व लोकलुभावन वादे करो, हाथ-पांव जोड़ो और स?ाा में आने के बाद सबकुछ भूलकर दोनों हाथों से जेबें भरने में लग जाओ. शायद यही कारण है कि आज शिक्षित वर्ग का एक बहुत बड़ा हिस्सा वोट देने नहीं जाता. मतदान वाले दिन को लोग गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस की तरह महज राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मनाते हैं. पर क्या केवल इसलिए कि अधिकतर राजनीतिक दल और राजनीतिज्ञों का नजरीया और आदत एक जैसी होती है, हम वोट देने की अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ सकते हैं. मेरी समझ से तो शायद नहीं. हममें से ही कुछ लोग ऐसे हैं जो पहले तो वोट नहीं देते फिर बाद में स?ाा में आई पार्टी और प्रतिनिधियों पर अफसोस जताने लगते हैं. मुझे अब भी याद है उ?ार प्रदेश के विधानसभा चुनाव में जब भाजपा-बसपा गठजोड़ की सरकार बनी थी तो शिक्षित वर्ग के एक खास तबके ने इस बात पर बहुत अफसोस जाहिर किया था कि बसपा को भी स?ाा में भागीदारी मिल गई. उस वक्त इस तबके के अधिकतर लोगों ने यह कहकर वोट डालने से मना कर दिया था कि इतनी धूप में इतनी दूर कौन जाए, और वैसे भी स?ाा में कोई भी आए हमें क्या फर्क पड़ने वाला है.
हमें क्या फर्क पड़ने वाला है ये जुमला वोट न देने वालों की जुबान पर अक्सर सुनने को मिल जाया करता है. ढेरो तर्क वितर्क के साथ वो इस बात को साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते कि वोट देना महज समय की बर्बादी से ज्यादा कुछ नहीं. इससे तो बेतहर है घर में आराम से सुकून के कुछ पल बिताए जाएं. अगर हम बीते कुछ वर्षों के आंकड़ों पर गौर फरमाएं तो खुद ब खुद ये सच्चाई सामने आ जाएगी कि पढ़े-लिखे लोग वोट देने से कतराने लगे हैं. ये वोट न देने का ही नतीजा है कि आज आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग बेखौफ होकर न सिर्फ चुनावी मैदान में उतरते हैं बल्कि जीतकर संसद और विधानसभाओं की रौनक भी बढ़ाते हैं. वो इस बात को भली भांति जनते हैं कि जो वर्ग उनकी उम्मीदवारी का सबसे ज्यादा विरोध कर सकता है उसे वोटिंग के वक्त सोने से फुर्सत नहीं. जितनी तेजी से लोगों की वोट डालने की आदत छूटती जा रही है उतनी तेजी से राजनीति में दागियों की संख्या बढ़ती जा रही है. शांतप्रिय कहे जाने वाले मध्यप्रदेश की ही अगर बात करें तो 2003 के विधानसभा चुनाव में 36 ऐसे उम्मीदवार विधानसभा पहुंचे जिनपर आपराधिक मामले लंबित थे. ये दागी विधायक जीते हुए विधायकों का 16 फीसदी थे. ऐसे ही 2004 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में करीब 30 प्रतिशत दागी उम्मीदवारों ने जीत का स्वाद चखा. गलियों में दादागिरी करने वालों को संसद-विधानसभा भेजने के मामले में बिहार का कोई सानी नहीं है.
फरवरी 2005 के विधानसभा चुनाव में कुल जीते 243 उम्मीदवारों में से 102 पर आपराधिक मामले दर्ज थे और छह माह बाद यानी नवंबर में पुन: हुए चुनाव में यह आंकड़ा 119 तक पहुंच गया. दिल्ली की स?ाा की चाबी अपने पास रखने वाले उ?ार प्र्रदेश का भी इस मामले में बिहार से चोली-दामन का साथ हैं. 2007 के विधानसभा चुनाव में जीतकर आए 403 उम्मीदवारों में से 160 के ऊपर आपराधिक मामले दर्ज थे. यानी कुल विधायकों में से 40 फीसदी दागदार. इस मामले में उ?ार पूर्व के राज्यों की जनता की पसंद वाकई काबिले तारीफ है. 2008 में हुए नागालैंड विधानसभा चुनाव में महज दो दागी उम्मीदवार चुनावी मैदान में थे और मजे की बात ये रही कि उन्हें भी जीत नसीब नहीं हुई. ऐसे ही मेघालय के विधानसभा चुनाव में एक भी ही उम्मीदवार ऐसा नहीं था जिसके दामन पर दाग हो. ये तो बात हुई विधानसभा चुनावों की पिछले लोकसभा चुनाव की अगर बात की जाए तो वहां भी दागियों की भरमार रही. देश के सबसे बड़ी चुनावी महापर्व में बहुतरे दागियों ने हिस्सा लिया और जीतकर संसद को भी अखाड़ा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. 14वीं लोकसभा में 120 सांसद आपराधिक पृष्ठभूमि से है. अब ऐसे में देश की बागडोर कितने सुरक्षित हाथों में है इसका अंदाजा खुद ब खुद लगाया जा सकता है. मगर इसके लिए किसी और को दोष नहीं दिया जा सकता हम खुद ही दोषी है.
Saturday, April 4, 2009
कब तक छलोगे राम को
नीरज नैयर
कहने वाले ने सच ही कहा है, खुदा महफूज रखे मेरे बच्चों को इस सियासत से ये वो औरते हैं जो ताउम्र पेशा कराती हैं. वर्तमान में राजनीति का स्वरूप इतना विकृत हो चला है कि इससे ताल्लुकात रखने वाले भगवान को भी छलने का मौका नहीं चूकते. खुद को हिंदू हितों की सबसे बड़ी पैरोकार बताने वाली भाजपा सालों से ऐसा करती आ रही है. इस बार भी वेंटिलेटर पर पड़ी भाजपा खुद को पुन:जीवित करने के लिए राम की शरण में है, पार्टी राम मंदिर निर्माण के प्रति खुलकर प्रतिबध्दता जता रही है.
अभी कुछ दिन पहले जब भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने राम नाम के मार्ग पर लौटने की घोषणा की तो किसी को अचं भा नहीं हुआ, होना भी नहीं चाहिए था क्योंकि सब जानते हैं कि दुर्दिनों में ही भगवान की याद आती है और वैसे भी जिस पार्टी के पास न मुद्दे हों न एकजुटता उसका तो राम की शरण में लौटना स्व भाविक है. भाजपा रणनीतिकारों का मानना है कि लोकस भा चुनाव में रामनाम के सहारे हिंदुत्व की लहर पैदा करके ठीक वैसा ही माहौल तैयार किया जा सकता है जैसा 1999 में किया गया था. इसीलिए एक तरफ पार्टी मंदिर निर्माण की बात दोहरा रही है तो दूसरी तरफ वरुण गांधी जैसे उसके सिपहासलार समुदाय विशेष के खिलाफ जहर उगल रहे हैं. वरुण गांधी ने जिस तरह से पीलीभीत में भड़काऊ भाषण दिए और उसके बाद जिस तरह से भाजपा ने उनसे पल्ला झाड़ा यह सब प्रायोजित नजर आ रहा है. राजनीति की दुनिया में पैर जमाने की कोशिश कर रहे वरुण के मुंह से जो कटु शब्द निकले हैं वो उनके कम पार्टी के कट्टरवादी नेताओं के ज्यादा नजर आ रहे हैं. उत्तर प्रदेश विधानस भा चुनाव के वक्त भh भाजपा ने ऐसे ही जहरीली सीडी जारी करके मुस्लिमों को निशाना बनाया था.
यह बात सही है कि चुनाव में जात-पात, धर्म-समुदाय के हिसाब से वोट आज भी वि भाजित होते हैं लेकिन फिर भी स्थिति अब 10 साल पुरानी नहीं है. आज लोग समझने लगे हैं कि भगवान के नाम पर, समुदाय के नाम पर आपस में भिड़ाने वाले उनका कितना भला कर सकते हैं. शायद यही कारण हैं कि भगवा झंडा बुलंद करने वाली पार्टियो का वोट प्रतिशत लगातार कम होता जा रहा है. गुजरात में नरेंद्र मोदी जरूर अपवाद साबित हुए हैं परंतु बाकी राज्यों में हालात हालिया हुए विधानस भा चुनावों में सामने आ चुके हैं. राम नाप जपना या भगवान की शरण में लौटना गलत नहीं है, हर पार्टी की अपनी अलग विचारधारा होती है और उसे उस पर कायम रहने का पूरा अधिकार है, लेकिन जिस तरह का दोहरा रवैया भाजपा अपनाती रही है उसने लोगों को सोच को परिवर्तित किया है. बाबरी विध्वंस के बाद मंदिर निर्माण को लेकर भाजपा ने जो अभियान चलाया था उसी की बदौलत उसे केंद्र की सत्ता में जगह बनाने का मौका मिला. पार्टी नेता लंबे समय तक मंदिर के प्रति प्रतिबध्दता जताते रहे. मगर सत्ता के मोहपाश ने उन्हें राम से दूर कर दिया. पूरे पांच साल न तो उन्हें राम का ही ख्याल आया और न उनके भक्तों का. 2004 के लोकस भा चुनाव में भाजपा को मिली करारी हार के पीछे यह सबसे बड़ा कारक रहा.
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राजग सरकार ने जो शासन चलाया था उसे देखकर कोई भी यह नहीं सोच सकता था कि वाजपेयी पुन: प्रधानमंत्री नहीं बन सकेंगे. संतुलित सरकार चलाने बावजूद राजग को हार का सामना करना पड़ा तो सिर्फ और सिर्फ विचारधारा से अलग चलने की वजह से. 1990 के दशक में भाजपा की पहचान कट्टरवादी हिंदू पार्टी के रूप में थी. कम से कम हिंदुवादी तो यही समझते थे कि केवल भाजपा ही है जो हमारे हितों के लिए खुलकर लड़ सकती है. लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा ने भी पार्टी की हिंदुवादी छवि को और पुख्ता किया. मगर जिस तरह से झोपड़ी में रहने वाले का मिजाज महल में पहुंचकर बदल जाता है ठीक वैसे ही सत्ता में पहुंचने के बाद भाजपा का मिजाज भी बदल गया. और अब फिर पार्टी सत्ता तक पहुंचने के लिए राम नाम को सीढ़ी बनाने में लगी है. पार्टी के वरिष्ठ नेता मुख्तार अब्बास नकवी के बयान से साफ हो जाता है कि मंदिर निर्माण की बातें महज हिंदूवोट खींचने की कोशिश से ज्यादा कुछ नहीं. नकवी कह चुके हैं कि भाजपा कोई कंसट्रक्शन कंपनी नहीं जो मंदिर का निर्माण करवाएगी. मतलब भाजपा पुन: राम को छलने की कोशिश में है लेकिन जिस तरह से जनता जागरुक हो गई है वैसे ही भगवान राम भी उतने उदारवादी नहीं रहे कि बार-बार छलावा करने वाली पार्टी का बेड़ा पार लगा दें.
राम नाम का सहारा लेकर राजनीतिक रोटियां सेंकेने वाली भाजपा अगर अन्य मुद्दों की तरफ ध्यान केंद्रित करती तो शायद उसे जनता का भी साथ मिलता और भगवान राम का भी. क्योंकि यूपीए सरकार के कार्यकाल में जनता ने खुशी से ज्यादा आंसू बहाए हैं. कमरतोड़ महंगाई और पूंजीवादियों की जेब भरने की यूपीए की नीतियों से जनता पूरी तरह त्रस्त हो चुकी है, ऐसे में भाजपा के पास दूसरा विकल्प बनने का सुनहरा मौका था जिसे अब वो काफी हद तक गवां चुकी है
कहने वाले ने सच ही कहा है, खुदा महफूज रखे मेरे बच्चों को इस सियासत से ये वो औरते हैं जो ताउम्र पेशा कराती हैं. वर्तमान में राजनीति का स्वरूप इतना विकृत हो चला है कि इससे ताल्लुकात रखने वाले भगवान को भी छलने का मौका नहीं चूकते. खुद को हिंदू हितों की सबसे बड़ी पैरोकार बताने वाली भाजपा सालों से ऐसा करती आ रही है. इस बार भी वेंटिलेटर पर पड़ी भाजपा खुद को पुन:जीवित करने के लिए राम की शरण में है, पार्टी राम मंदिर निर्माण के प्रति खुलकर प्रतिबध्दता जता रही है.
अभी कुछ दिन पहले जब भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने राम नाम के मार्ग पर लौटने की घोषणा की तो किसी को अचं भा नहीं हुआ, होना भी नहीं चाहिए था क्योंकि सब जानते हैं कि दुर्दिनों में ही भगवान की याद आती है और वैसे भी जिस पार्टी के पास न मुद्दे हों न एकजुटता उसका तो राम की शरण में लौटना स्व भाविक है. भाजपा रणनीतिकारों का मानना है कि लोकस भा चुनाव में रामनाम के सहारे हिंदुत्व की लहर पैदा करके ठीक वैसा ही माहौल तैयार किया जा सकता है जैसा 1999 में किया गया था. इसीलिए एक तरफ पार्टी मंदिर निर्माण की बात दोहरा रही है तो दूसरी तरफ वरुण गांधी जैसे उसके सिपहासलार समुदाय विशेष के खिलाफ जहर उगल रहे हैं. वरुण गांधी ने जिस तरह से पीलीभीत में भड़काऊ भाषण दिए और उसके बाद जिस तरह से भाजपा ने उनसे पल्ला झाड़ा यह सब प्रायोजित नजर आ रहा है. राजनीति की दुनिया में पैर जमाने की कोशिश कर रहे वरुण के मुंह से जो कटु शब्द निकले हैं वो उनके कम पार्टी के कट्टरवादी नेताओं के ज्यादा नजर आ रहे हैं. उत्तर प्रदेश विधानस भा चुनाव के वक्त भh भाजपा ने ऐसे ही जहरीली सीडी जारी करके मुस्लिमों को निशाना बनाया था.
यह बात सही है कि चुनाव में जात-पात, धर्म-समुदाय के हिसाब से वोट आज भी वि भाजित होते हैं लेकिन फिर भी स्थिति अब 10 साल पुरानी नहीं है. आज लोग समझने लगे हैं कि भगवान के नाम पर, समुदाय के नाम पर आपस में भिड़ाने वाले उनका कितना भला कर सकते हैं. शायद यही कारण हैं कि भगवा झंडा बुलंद करने वाली पार्टियो का वोट प्रतिशत लगातार कम होता जा रहा है. गुजरात में नरेंद्र मोदी जरूर अपवाद साबित हुए हैं परंतु बाकी राज्यों में हालात हालिया हुए विधानस भा चुनावों में सामने आ चुके हैं. राम नाप जपना या भगवान की शरण में लौटना गलत नहीं है, हर पार्टी की अपनी अलग विचारधारा होती है और उसे उस पर कायम रहने का पूरा अधिकार है, लेकिन जिस तरह का दोहरा रवैया भाजपा अपनाती रही है उसने लोगों को सोच को परिवर्तित किया है. बाबरी विध्वंस के बाद मंदिर निर्माण को लेकर भाजपा ने जो अभियान चलाया था उसी की बदौलत उसे केंद्र की सत्ता में जगह बनाने का मौका मिला. पार्टी नेता लंबे समय तक मंदिर के प्रति प्रतिबध्दता जताते रहे. मगर सत्ता के मोहपाश ने उन्हें राम से दूर कर दिया. पूरे पांच साल न तो उन्हें राम का ही ख्याल आया और न उनके भक्तों का. 2004 के लोकस भा चुनाव में भाजपा को मिली करारी हार के पीछे यह सबसे बड़ा कारक रहा.
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राजग सरकार ने जो शासन चलाया था उसे देखकर कोई भी यह नहीं सोच सकता था कि वाजपेयी पुन: प्रधानमंत्री नहीं बन सकेंगे. संतुलित सरकार चलाने बावजूद राजग को हार का सामना करना पड़ा तो सिर्फ और सिर्फ विचारधारा से अलग चलने की वजह से. 1990 के दशक में भाजपा की पहचान कट्टरवादी हिंदू पार्टी के रूप में थी. कम से कम हिंदुवादी तो यही समझते थे कि केवल भाजपा ही है जो हमारे हितों के लिए खुलकर लड़ सकती है. लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा ने भी पार्टी की हिंदुवादी छवि को और पुख्ता किया. मगर जिस तरह से झोपड़ी में रहने वाले का मिजाज महल में पहुंचकर बदल जाता है ठीक वैसे ही सत्ता में पहुंचने के बाद भाजपा का मिजाज भी बदल गया. और अब फिर पार्टी सत्ता तक पहुंचने के लिए राम नाम को सीढ़ी बनाने में लगी है. पार्टी के वरिष्ठ नेता मुख्तार अब्बास नकवी के बयान से साफ हो जाता है कि मंदिर निर्माण की बातें महज हिंदूवोट खींचने की कोशिश से ज्यादा कुछ नहीं. नकवी कह चुके हैं कि भाजपा कोई कंसट्रक्शन कंपनी नहीं जो मंदिर का निर्माण करवाएगी. मतलब भाजपा पुन: राम को छलने की कोशिश में है लेकिन जिस तरह से जनता जागरुक हो गई है वैसे ही भगवान राम भी उतने उदारवादी नहीं रहे कि बार-बार छलावा करने वाली पार्टी का बेड़ा पार लगा दें.
राम नाम का सहारा लेकर राजनीतिक रोटियां सेंकेने वाली भाजपा अगर अन्य मुद्दों की तरफ ध्यान केंद्रित करती तो शायद उसे जनता का भी साथ मिलता और भगवान राम का भी. क्योंकि यूपीए सरकार के कार्यकाल में जनता ने खुशी से ज्यादा आंसू बहाए हैं. कमरतोड़ महंगाई और पूंजीवादियों की जेब भरने की यूपीए की नीतियों से जनता पूरी तरह त्रस्त हो चुकी है, ऐसे में भाजपा के पास दूसरा विकल्प बनने का सुनहरा मौका था जिसे अब वो काफी हद तक गवां चुकी है
Wednesday, March 25, 2009
इसलिए मिला ऑस्कर
नीरज नैयर
फिल्म स्लमडॉग मिलेनियर को लेकर चल रहे तर्क-कुर्तक से इतर यह वक्त जश् मनाने का है, क्योंकि भारत की झोली तीन ऑस्कर अवॉर्डों से गुलजार हुई है. जबकि फिल्म को आठ अवॉर्ड मिले हैं. भारतीय पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म के इतनी ऊंचाईयों पर पहुंचने के बाद अब यह चर्चा शुरू हो गई है कि आखिर एक साधारण सी स्टोरी को इतनी सफलता कैसे मिल गई, आखिर कैसे धारावी की झुग्गी-झोपड़ी और यहां के बच्चों का जीवन संघर्ष ऑस्कर की जूरी को इतना भाया कि फिल्म को पुरस्कारों से लाद दिया गया. शायद फिल्म का निर्देशन और प्रेजेंटेशन इतनी जबरदस्त रही कि उसने नीरस सी दिखने वाली पटकथा को भी सुपर-डुपर हिट बना डाला. निश्चित ही इस बात में कोई दो राय नहीं कि एक ऐसा विषय जिस पर न जाने कितनी बॉलीवुड फिल्में बनती रही हैं और बॉक्स ऑफिस पर दम तोड़ती रहीं को उठाकर भेड़-चाल से अलग दिखाना और उसमें ऐसी जान फूंकना कि वो खुद ब खुद चलने लगे कोई आसान काम नहीं था लेकिन बॉयल से उसे बखूबी कर दिया. भारतीय पृष्ठभूमि और यहां के लोगों को ध्यान में रखते हुए फिल्म के हर मोड़ को उसी अंदाज में फिल्माया गया जैसे आम हिंदी फिल्मों में होता है. फिल्म में गाने थे, एक्शन था, रोमांस था और कॉमेडी भी यानी बॉलीवुड टाइप मूवी मगर इसे फुल टू बॉलीवुड मूवी नहीं कहा जा सकता क्योंकिअगर यह फिल्म बॉलीवुड से निकलकर आई होती तो इतना दुख-दर्ददिखा दिया जाता कि टिकट खरीदकर टाइम पास करने आने वालों को बेवजह आंसू बहाने पड़ते. कुल मिलाकर फिल्म के हर एंगल में हकीकत से रू ब रू कराया गया. भारत की मुफलिसी, लाचारी का जो बखान किया गया है वो गलत नहीं है. लेकिन फिर भी फिल्म और इससे जुड़े कलाकारों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर जो प्रसिद्धि मिली है वो थोड़ी अचरज करने वाली है. खासकर ऑस्कर में. ऑस्कर समारोह में नामी-गिरामी हॉलीवुड फिल्मों को पछाड़ कर आठ अवॉर्ड हथिया लेना मामूली बात नहीं. स्लमडॉग मिलेनियर के गोल्डन ग्लोब से लेकर ऑस्कर तक के शानदार सफर के पीछे दो प्रमुख कारण नजर आते हैं. एक तो यह कि भारत कि जो तस्वीर पेश की गई है वैसी तस्वीर इतने पास से विश्व मंच पर शायद पहली बार पहुंची है और दूसरा, फिल्मभारतीय होते हुए भी ब्रिटेन से ताल्लुक रखती है. फिल्म के निर्देशक डैनी बॉयल ब्रितानी हैं. ऑस्कर में स्लमडॉग ब्रितानी फिल्म के रूप में ही नामांकित हुई थी. भारत में रहमान और पोकुट्टी से पहले जो एक मात्र ऑस्कर आया था वो फिल्म गांधी की कास्टयूम डिजाइनिंग के लिए भानू अथैया को मिला था लेकिन उसका निर्देशन भी एक विदेशी यानी हॉलीवुड के रिचर्ड एटनबरो ने किया था. 1992 में सत्यजीत रॉय को भी ऑस्कर मिला था पर लाइफ टाइम अचीवमेंट की श्रेणी में न कि किसी फिल्म के लिए. ऐसा नहीं है कि बॉलीवुड फिल्मों में इतना दम नहीं होता कि ऑस्कर की दौड़ में खुद को टिकाए रख सकें. लगान, तारे जमीं पर, वॉटर आदि बहुत सी फिल्में थीं जो ऑस्कर में नामांकित तो हुईं मगर हॉलीवुड की चमक-धमकके आगे पिछड़ती चली गईं. लगान को न सिर्फ देश में बल्कि विदेशों में भी खूब प्रशंसा मिली मगर नहीं मिला तो ऑस्कर. भारतीय फिल्में अंतरराष्ट्रीय मंच पर छाप छोड़ने में हमेशा से ही सफल रही हैं. मगर उन्हें महज कोरी वाह-वाही से संतोष करना पड़ा है. ऑस्कर में बैठी जूरी भारतीय फिल्मों के मार्मिक चित्रण और पटकथा को आज तक नहीं समझ पाई है. दरअसल यह कुछ और नहीं बल्कि मेड इन इंडिया का वो लेवल है जिसे देखकर ही समझ लिया जाता है कि यहां कुछ भी उस स्तर का नहीं हो सकता जिस स्तर का हॉलीवुड वाले बनाते हैं. इसलिए जब भी कोई फिल्म बॉलीवुड से ऑस्कर में जाती है उसे पहली दौड़ में ही बाहर कर दिया जाता है. चाहे फिर वो हॉलीवुड की नासमझी वाली फिल्मों से बेहतर ही क्यों न हों. आजादी के समय में भारतीयों को जिस दोयम दर्जे की नजर से देखा जाता था वही नजरीया आज भी कायम है. हमारी काबलियत का लोहा हर कोई मान चुका है, पूरे देश में भारतीय प्रतिभा का झंडा गाड़ रहे हैं. लेकिन ऑस्कर में भेदभाव का सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है. स्लमडॉग निश्चित ही बेहतरीन फिल्म है पर अगर उस पर मेड इन इंडिया का लेवल लगा होता तो शायद वो इतनी कामयाबी हासिल नहीं कर पाती. अल्ला रख्खा रहमान का संगीत इस फिल्म में कमाल का रहा है लेकिन इससे कई गुना अच्छा वो भारतीय फिल्मों में दे चुके हैं. रोजा, ताल जैसी बहुत सी फिल्में हैं जिनमें रहमान ने लोगों को न चाहते हुए भी थिरकने पर मजबूर कर दिया. लेकिन उन्हें ऑस्कर स्लमडॉग ही दिलवा सकी वो भी एक नहीं दो-दो क्योंकि वो ब्रिटिश फिल्म के रूप में नामांकित हुई थी. मशहूर हॉलीवुड स्टार ब्रैड पिट की जिस फिल्म को सर्वाधिक 13 नामंकन मिले थे उसे रेस में सबसे आगे माना जा रहा था. मगर ऑस्कर का फैसला करने वालों को एक विदेशी के हाथों उकेरी गई गरीब भारत की तस्वीर ज्यादा पसंद आई. फिल्म को हर क्षेत्र के लिए पुरस्कार से नवाजा गया. संगीत, पटकथा, निर्देशन, सांउड मिक्सिग आदि..आदि. हॉलीवुड अदाकारा केट विंसलेट को उनकी फिल्म द रीडर के लिए सर्वश्रेष्ट अभिनेत्री का जो खिताब दिया गया वो महज इसलिए कि स्लमडॉग में हीरोइन के करने के लिए कुछ खास नहीं था, या कह सकते हैं कि वो कोई विदेशी नहीं थी. अगर ऐसा होता तो शायद बेस्ट एक्ट्रस का सम्मान भी स्लमडॉग की झोली में आकर गिरता. फिल्म और उससे जुड़े कलाकारों के लेकर बॉलीवुड में जो जंग छिड़ी है वो शायद प्रतिस्पर्धा के दौर में दूसरे को आगे निकलता देख मन में उठने वाली ईष्या हो सकती है, फिल्म को लेकर हुए प्रदर्शन भी महज सुर्खियां बटोरने का हिस्सा हो सकते हैं लेकिन फिल्म ने सफलता के जो आयाम छूए है उसके पीछे इसके विदेशी होने की सच्चाई कोई फसाना नहीं हकीकत है इससे इंकार नहीं किया जा सकता.
फिल्म स्लमडॉग मिलेनियर को लेकर चल रहे तर्क-कुर्तक से इतर यह वक्त जश् मनाने का है, क्योंकि भारत की झोली तीन ऑस्कर अवॉर्डों से गुलजार हुई है. जबकि फिल्म को आठ अवॉर्ड मिले हैं. भारतीय पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म के इतनी ऊंचाईयों पर पहुंचने के बाद अब यह चर्चा शुरू हो गई है कि आखिर एक साधारण सी स्टोरी को इतनी सफलता कैसे मिल गई, आखिर कैसे धारावी की झुग्गी-झोपड़ी और यहां के बच्चों का जीवन संघर्ष ऑस्कर की जूरी को इतना भाया कि फिल्म को पुरस्कारों से लाद दिया गया. शायद फिल्म का निर्देशन और प्रेजेंटेशन इतनी जबरदस्त रही कि उसने नीरस सी दिखने वाली पटकथा को भी सुपर-डुपर हिट बना डाला. निश्चित ही इस बात में कोई दो राय नहीं कि एक ऐसा विषय जिस पर न जाने कितनी बॉलीवुड फिल्में बनती रही हैं और बॉक्स ऑफिस पर दम तोड़ती रहीं को उठाकर भेड़-चाल से अलग दिखाना और उसमें ऐसी जान फूंकना कि वो खुद ब खुद चलने लगे कोई आसान काम नहीं था लेकिन बॉयल से उसे बखूबी कर दिया. भारतीय पृष्ठभूमि और यहां के लोगों को ध्यान में रखते हुए फिल्म के हर मोड़ को उसी अंदाज में फिल्माया गया जैसे आम हिंदी फिल्मों में होता है. फिल्म में गाने थे, एक्शन था, रोमांस था और कॉमेडी भी यानी बॉलीवुड टाइप मूवी मगर इसे फुल टू बॉलीवुड मूवी नहीं कहा जा सकता क्योंकिअगर यह फिल्म बॉलीवुड से निकलकर आई होती तो इतना दुख-दर्ददिखा दिया जाता कि टिकट खरीदकर टाइम पास करने आने वालों को बेवजह आंसू बहाने पड़ते. कुल मिलाकर फिल्म के हर एंगल में हकीकत से रू ब रू कराया गया. भारत की मुफलिसी, लाचारी का जो बखान किया गया है वो गलत नहीं है. लेकिन फिर भी फिल्म और इससे जुड़े कलाकारों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर जो प्रसिद्धि मिली है वो थोड़ी अचरज करने वाली है. खासकर ऑस्कर में. ऑस्कर समारोह में नामी-गिरामी हॉलीवुड फिल्मों को पछाड़ कर आठ अवॉर्ड हथिया लेना मामूली बात नहीं. स्लमडॉग मिलेनियर के गोल्डन ग्लोब से लेकर ऑस्कर तक के शानदार सफर के पीछे दो प्रमुख कारण नजर आते हैं. एक तो यह कि भारत कि जो तस्वीर पेश की गई है वैसी तस्वीर इतने पास से विश्व मंच पर शायद पहली बार पहुंची है और दूसरा, फिल्मभारतीय होते हुए भी ब्रिटेन से ताल्लुक रखती है. फिल्म के निर्देशक डैनी बॉयल ब्रितानी हैं. ऑस्कर में स्लमडॉग ब्रितानी फिल्म के रूप में ही नामांकित हुई थी. भारत में रहमान और पोकुट्टी से पहले जो एक मात्र ऑस्कर आया था वो फिल्म गांधी की कास्टयूम डिजाइनिंग के लिए भानू अथैया को मिला था लेकिन उसका निर्देशन भी एक विदेशी यानी हॉलीवुड के रिचर्ड एटनबरो ने किया था. 1992 में सत्यजीत रॉय को भी ऑस्कर मिला था पर लाइफ टाइम अचीवमेंट की श्रेणी में न कि किसी फिल्म के लिए. ऐसा नहीं है कि बॉलीवुड फिल्मों में इतना दम नहीं होता कि ऑस्कर की दौड़ में खुद को टिकाए रख सकें. लगान, तारे जमीं पर, वॉटर आदि बहुत सी फिल्में थीं जो ऑस्कर में नामांकित तो हुईं मगर हॉलीवुड की चमक-धमकके आगे पिछड़ती चली गईं. लगान को न सिर्फ देश में बल्कि विदेशों में भी खूब प्रशंसा मिली मगर नहीं मिला तो ऑस्कर. भारतीय फिल्में अंतरराष्ट्रीय मंच पर छाप छोड़ने में हमेशा से ही सफल रही हैं. मगर उन्हें महज कोरी वाह-वाही से संतोष करना पड़ा है. ऑस्कर में बैठी जूरी भारतीय फिल्मों के मार्मिक चित्रण और पटकथा को आज तक नहीं समझ पाई है. दरअसल यह कुछ और नहीं बल्कि मेड इन इंडिया का वो लेवल है जिसे देखकर ही समझ लिया जाता है कि यहां कुछ भी उस स्तर का नहीं हो सकता जिस स्तर का हॉलीवुड वाले बनाते हैं. इसलिए जब भी कोई फिल्म बॉलीवुड से ऑस्कर में जाती है उसे पहली दौड़ में ही बाहर कर दिया जाता है. चाहे फिर वो हॉलीवुड की नासमझी वाली फिल्मों से बेहतर ही क्यों न हों. आजादी के समय में भारतीयों को जिस दोयम दर्जे की नजर से देखा जाता था वही नजरीया आज भी कायम है. हमारी काबलियत का लोहा हर कोई मान चुका है, पूरे देश में भारतीय प्रतिभा का झंडा गाड़ रहे हैं. लेकिन ऑस्कर में भेदभाव का सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है. स्लमडॉग निश्चित ही बेहतरीन फिल्म है पर अगर उस पर मेड इन इंडिया का लेवल लगा होता तो शायद वो इतनी कामयाबी हासिल नहीं कर पाती. अल्ला रख्खा रहमान का संगीत इस फिल्म में कमाल का रहा है लेकिन इससे कई गुना अच्छा वो भारतीय फिल्मों में दे चुके हैं. रोजा, ताल जैसी बहुत सी फिल्में हैं जिनमें रहमान ने लोगों को न चाहते हुए भी थिरकने पर मजबूर कर दिया. लेकिन उन्हें ऑस्कर स्लमडॉग ही दिलवा सकी वो भी एक नहीं दो-दो क्योंकि वो ब्रिटिश फिल्म के रूप में नामांकित हुई थी. मशहूर हॉलीवुड स्टार ब्रैड पिट की जिस फिल्म को सर्वाधिक 13 नामंकन मिले थे उसे रेस में सबसे आगे माना जा रहा था. मगर ऑस्कर का फैसला करने वालों को एक विदेशी के हाथों उकेरी गई गरीब भारत की तस्वीर ज्यादा पसंद आई. फिल्म को हर क्षेत्र के लिए पुरस्कार से नवाजा गया. संगीत, पटकथा, निर्देशन, सांउड मिक्सिग आदि..आदि. हॉलीवुड अदाकारा केट विंसलेट को उनकी फिल्म द रीडर के लिए सर्वश्रेष्ट अभिनेत्री का जो खिताब दिया गया वो महज इसलिए कि स्लमडॉग में हीरोइन के करने के लिए कुछ खास नहीं था, या कह सकते हैं कि वो कोई विदेशी नहीं थी. अगर ऐसा होता तो शायद बेस्ट एक्ट्रस का सम्मान भी स्लमडॉग की झोली में आकर गिरता. फिल्म और उससे जुड़े कलाकारों के लेकर बॉलीवुड में जो जंग छिड़ी है वो शायद प्रतिस्पर्धा के दौर में दूसरे को आगे निकलता देख मन में उठने वाली ईष्या हो सकती है, फिल्म को लेकर हुए प्रदर्शन भी महज सुर्खियां बटोरने का हिस्सा हो सकते हैं लेकिन फिल्म ने सफलता के जो आयाम छूए है उसके पीछे इसके विदेशी होने की सच्चाई कोई फसाना नहीं हकीकत है इससे इंकार नहीं किया जा सकता.
Monday, March 2, 2009
आखिर बाघ बचें तो कैसे
बाघों को बचाने के लिए कागजी और जुबानी तौर पर जितना काम किया जाता रहा है. अगर उसका एक प्रतिशत भी हकीकत में किया जाता तो शायद बाघों की घटती संख्या पर अंकुश लगाया जा सकता था.
अब तक हमें सुकून था कि सरिस्का जैसे हालात कहीं और नहीं हैं. कम से कम मध्यप्रदेश में तो बिल्कुल नहीं लेकिन हाल ही में आई कुछ खबरों के बाद यह साफ हो गया है कि बाघों के लिए मशहूर मध्यप्रदेश का पन्ना टाइगर रिजर्व भी सरिस्का में तब्दील हो चुका है. यहां काफी समय से एक बाघ ही दिखाई दे रहा है. जबकि 2006 में की गई गणना में 24 बाघ होने की बात कही गई थी. 452 वर्ग किलोमीटर में फैले पन्ना राष्ट्रीय उद्यान में बाघों की घटती संख्या को लेकर कई बार आवाजें उठती रहीं लेकिन किसी ने उनपर गौर करना मुनासिब नहीं समझा. संबंधित अधिकारी सच को छुपाने में लगे रहे और धीरे-धीरे बाघों का सफाया होता गया. इसे सरकारी अमले की संवेदनशून्यता ही कहा जाएगा कि उसने एक बार भी ऐसी खबरों पर सर्तक होने की जहमत नहीं उठाई और अब बैठकें हो रही हैं, फटकार लगाई जा रही है, बांधवगढ़ से दो बाघिनों को लाकर बाघ बचाने की मुहिम के प्रति प्रतिबध्यता दशाई जा रही है लेकिन अब भी इस बात पर गौर नहीं किया जा रहा है कि आखिर ऐसी नौबत आई ही क्यों. यह केवल मध्यप्रदेश की बात नहीं है कामोबश पूरे देश का ऐसा ही हाल है. देश में हर साल टाइगर प्रोजेक्ट के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं बावजूद इसके बाघों की संख्या खतरनाक तरीके से घटती जा रहा है. पिछले चार सालों के दरमां एक अरब 96 करोड़ का पैकेज बाघ संरक्षण के लिए जारी किया जा चुका है. लेकिन हकीकत हमारे सामने है. वर्ष 2001-2002 में हुई गणना में देश में 3652 बाघ होने के दावे किए गये. ताजा गणना में 60 प्रतिशत से अधिक की कमी के साथ इनकी संख्या 1500 के आस-पास बताई गई मगर मौजूदा हालातों को देखते हुए यह बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि देश में इतने बाघ भी बचे होंगे. मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उडीसा, झारखंड में कुल 601 बाघ बचे हैं जिनमें से 300 सिर्फ मध्यप्रदेश में ही हैं. 2004 के दौरान मध्यप्रदेश में इनकी संख्या 700 के करीब हुआ करती थी. पर अब यहां के टाइगर रिजर्वों की हालत भी कुछ खास ठीक नहीं चल रही. पन्ना का सच सामने आ चुका है, कान्हा में भी स्थिति बिगड़ती जा रही है. बीते कुछ दिनों में यहां दो बाघों की रहस्यमय तरीके से मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने 2002 में जो रिपोर्ट जारी की थी उसमें कान्हा में बाघों की संख्या 131 बताई गई थी लेकिन 2006-07 तक पहुंचते-पहुंचते यह आंकड़ा 89 तक सिमट गया और अब ऐसी आशंका है कि यहां भी ज्यादा बाघ नहीं बचे हैं. हाल ही में शिकार की कुछ घटनाओं से बाघ संरक्षण के नाम पर किए जा रहे राज्य स्तरीय बड़े-बड़े दावों की असलीयत सामने आ चुकी है. बाघ सरंक्षण के प्रति सरकार की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि फॉरेस्ट गार्ड के बहुत से पद अब भी खाली पड़े हैं. सच तो यह है कि वन एवं पर्यावरण विभाग इस चुनौती से निपटने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं है. कर्मचारियोंको न तो पर्याप्त ट्रेनिंग दी जाती है और न ही उनके पास पर्याप्त सुविधाएं हैं. शिकारी अत्याधुनिक हथियारों का प्रयोग कर रहे हैं जबकि वन्य प्राणियों की हिफाजत का तमगा लगाने वालों के पास वो ही पुराने हथियार हैं. हालात ये हो चले हैं कि अधिकतर अधिकारी महज अपनी नौकरी बचाने के लिए काम कर रहे हैं. उनमें न तो वन्यजीवों के प्रति कोई संवेदना है और न ही काम के प्रति कोई लगाव. यही कारण है कि रोक के बावजूद बाघों का शिकार बड़े पैमाने पर जारी है. संगठित आपराधिक गिरोह वन्यजीवों की खाल की तस्करी में लगे हुए हैं. थोड़े से पैसे के लिए कहीं-कहीं वन विभाग के लोग भी इनकी मदद में शरीक हो जाते हैं. बाघों को बचाने के लिए स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिहं पहल कर चुके हैं. कई समीतियां बनाई गईं हैं, कई प्रोजेक्ट चलाए गये हैं मगर इस दुर्लभ प्राणी के अस्तित्व की टूटती डोर को थामने वाले सार्थक नतीजे अब तक सामने नहीं आ पाए हैं. जंगलों का सिमटना और उसमें मानवीय दखलंदाजी बदस्तूर जारी है. नतीजतन बाघों की रिहाइश वाले इलाकों में ही बाघों की संख्या घटती जा रही है. जंगल में पर्याप्त भोजन का आभाव हो चला है जिसके चलते बाघ गांवों का रुख कर रहे हैं और क्रूर इंसान के हाथों मारे जा रहे हैं. महज चंद दिनों में ही इसके बहुत से मामले सामने आ चुके हैं. उत्तर प्रदेश में दो बाघों को मारने की कोशिश चल रही है क्योंकि भूख की तड़पन में उनसे मानव का शिकार हो गया, वन विभाग खुद मोर्चा संभाला हुआ है. जंगल के राजा को जंगल में घेरकर मारने की कवायद से जंगल के बाशिंदे सहमे हुए हैं. कुछ समय पहले कुछ चीतों को भी मानव के हाथों मौत मिली थी, उनका कसूर भी इतना था कि वो भूख बर्दाश्त नहीं कर पाए और बस्तियों की तरफ रुख कर बैठे. बाघ जंगल से बाहर आते हैं तो लोगों द्वारा मार दिए जाते हैं. जंगल में रहते हैं तो शिकारियों का शिकार बन जाते हैं. संरक्षण ग्रहों में संरक्षण के नाम पर उनकी जिंदगी से जुआ खेला जा रहा है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर यह प्राणी बचे तो कैसे. सरकार भले ही इस बात को स्वीकार न करे मगर सच यही है कि जितनी तेजी से बाघों के घर सुरक्षित करने की योजनाएं परवान चढ़ी, जंगलों को टाइगर रिजर्व घाषित किया गया. उतनी ही तेजी से बाघ तस्करों के लालच और सरकार की सुस्ती का शिकार होते गये. जितनी तेजी से देश में बाघों की संख्या घट रही है उससे वो दिन दूर नहीं जब हमें राष्ट्रीय पशु के लिए किसी और जानवर को चुनना होगा. एक संस्था ने हाल ही में ऐसा कैंपेन चलाकर बाघों के मिटते अस्तित्व की तरफ ध्यान खींचने की कोशिश की है लेकिन उसकी यह कवायद कोई खास असर छोड़ पाएगी इसकी संभावना कम ही दिखाई पड़ती है. क्योंकि एक आम आदमी से लेकर देश की सर्वोच्च कुर्सी पर बैठा व्यक्ति भी इस बात से अच्छी तरह वाकिफ है कि बाघ विलुप्ती के कगार पर हैं. लेकिन फिर भी बाघ सरंक्षण के नाम पर जुबान जमा खर्ची के अलावा कुछ नहीं किया जा रहा. इस दिशा में ठोस और गंभीर कदम उठाने की दरकार अब भी कायम है.
अब तक हमें सुकून था कि सरिस्का जैसे हालात कहीं और नहीं हैं. कम से कम मध्यप्रदेश में तो बिल्कुल नहीं लेकिन हाल ही में आई कुछ खबरों के बाद यह साफ हो गया है कि बाघों के लिए मशहूर मध्यप्रदेश का पन्ना टाइगर रिजर्व भी सरिस्का में तब्दील हो चुका है. यहां काफी समय से एक बाघ ही दिखाई दे रहा है. जबकि 2006 में की गई गणना में 24 बाघ होने की बात कही गई थी. 452 वर्ग किलोमीटर में फैले पन्ना राष्ट्रीय उद्यान में बाघों की घटती संख्या को लेकर कई बार आवाजें उठती रहीं लेकिन किसी ने उनपर गौर करना मुनासिब नहीं समझा. संबंधित अधिकारी सच को छुपाने में लगे रहे और धीरे-धीरे बाघों का सफाया होता गया. इसे सरकारी अमले की संवेदनशून्यता ही कहा जाएगा कि उसने एक बार भी ऐसी खबरों पर सर्तक होने की जहमत नहीं उठाई और अब बैठकें हो रही हैं, फटकार लगाई जा रही है, बांधवगढ़ से दो बाघिनों को लाकर बाघ बचाने की मुहिम के प्रति प्रतिबध्यता दशाई जा रही है लेकिन अब भी इस बात पर गौर नहीं किया जा रहा है कि आखिर ऐसी नौबत आई ही क्यों. यह केवल मध्यप्रदेश की बात नहीं है कामोबश पूरे देश का ऐसा ही हाल है. देश में हर साल टाइगर प्रोजेक्ट के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं बावजूद इसके बाघों की संख्या खतरनाक तरीके से घटती जा रहा है. पिछले चार सालों के दरमां एक अरब 96 करोड़ का पैकेज बाघ संरक्षण के लिए जारी किया जा चुका है. लेकिन हकीकत हमारे सामने है. वर्ष 2001-2002 में हुई गणना में देश में 3652 बाघ होने के दावे किए गये. ताजा गणना में 60 प्रतिशत से अधिक की कमी के साथ इनकी संख्या 1500 के आस-पास बताई गई मगर मौजूदा हालातों को देखते हुए यह बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि देश में इतने बाघ भी बचे होंगे. मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उडीसा, झारखंड में कुल 601 बाघ बचे हैं जिनमें से 300 सिर्फ मध्यप्रदेश में ही हैं. 2004 के दौरान मध्यप्रदेश में इनकी संख्या 700 के करीब हुआ करती थी. पर अब यहां के टाइगर रिजर्वों की हालत भी कुछ खास ठीक नहीं चल रही. पन्ना का सच सामने आ चुका है, कान्हा में भी स्थिति बिगड़ती जा रही है. बीते कुछ दिनों में यहां दो बाघों की रहस्यमय तरीके से मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने 2002 में जो रिपोर्ट जारी की थी उसमें कान्हा में बाघों की संख्या 131 बताई गई थी लेकिन 2006-07 तक पहुंचते-पहुंचते यह आंकड़ा 89 तक सिमट गया और अब ऐसी आशंका है कि यहां भी ज्यादा बाघ नहीं बचे हैं. हाल ही में शिकार की कुछ घटनाओं से बाघ संरक्षण के नाम पर किए जा रहे राज्य स्तरीय बड़े-बड़े दावों की असलीयत सामने आ चुकी है. बाघ सरंक्षण के प्रति सरकार की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि फॉरेस्ट गार्ड के बहुत से पद अब भी खाली पड़े हैं. सच तो यह है कि वन एवं पर्यावरण विभाग इस चुनौती से निपटने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं है. कर्मचारियोंको न तो पर्याप्त ट्रेनिंग दी जाती है और न ही उनके पास पर्याप्त सुविधाएं हैं. शिकारी अत्याधुनिक हथियारों का प्रयोग कर रहे हैं जबकि वन्य प्राणियों की हिफाजत का तमगा लगाने वालों के पास वो ही पुराने हथियार हैं. हालात ये हो चले हैं कि अधिकतर अधिकारी महज अपनी नौकरी बचाने के लिए काम कर रहे हैं. उनमें न तो वन्यजीवों के प्रति कोई संवेदना है और न ही काम के प्रति कोई लगाव. यही कारण है कि रोक के बावजूद बाघों का शिकार बड़े पैमाने पर जारी है. संगठित आपराधिक गिरोह वन्यजीवों की खाल की तस्करी में लगे हुए हैं. थोड़े से पैसे के लिए कहीं-कहीं वन विभाग के लोग भी इनकी मदद में शरीक हो जाते हैं. बाघों को बचाने के लिए स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिहं पहल कर चुके हैं. कई समीतियां बनाई गईं हैं, कई प्रोजेक्ट चलाए गये हैं मगर इस दुर्लभ प्राणी के अस्तित्व की टूटती डोर को थामने वाले सार्थक नतीजे अब तक सामने नहीं आ पाए हैं. जंगलों का सिमटना और उसमें मानवीय दखलंदाजी बदस्तूर जारी है. नतीजतन बाघों की रिहाइश वाले इलाकों में ही बाघों की संख्या घटती जा रही है. जंगल में पर्याप्त भोजन का आभाव हो चला है जिसके चलते बाघ गांवों का रुख कर रहे हैं और क्रूर इंसान के हाथों मारे जा रहे हैं. महज चंद दिनों में ही इसके बहुत से मामले सामने आ चुके हैं. उत्तर प्रदेश में दो बाघों को मारने की कोशिश चल रही है क्योंकि भूख की तड़पन में उनसे मानव का शिकार हो गया, वन विभाग खुद मोर्चा संभाला हुआ है. जंगल के राजा को जंगल में घेरकर मारने की कवायद से जंगल के बाशिंदे सहमे हुए हैं. कुछ समय पहले कुछ चीतों को भी मानव के हाथों मौत मिली थी, उनका कसूर भी इतना था कि वो भूख बर्दाश्त नहीं कर पाए और बस्तियों की तरफ रुख कर बैठे. बाघ जंगल से बाहर आते हैं तो लोगों द्वारा मार दिए जाते हैं. जंगल में रहते हैं तो शिकारियों का शिकार बन जाते हैं. संरक्षण ग्रहों में संरक्षण के नाम पर उनकी जिंदगी से जुआ खेला जा रहा है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर यह प्राणी बचे तो कैसे. सरकार भले ही इस बात को स्वीकार न करे मगर सच यही है कि जितनी तेजी से बाघों के घर सुरक्षित करने की योजनाएं परवान चढ़ी, जंगलों को टाइगर रिजर्व घाषित किया गया. उतनी ही तेजी से बाघ तस्करों के लालच और सरकार की सुस्ती का शिकार होते गये. जितनी तेजी से देश में बाघों की संख्या घट रही है उससे वो दिन दूर नहीं जब हमें राष्ट्रीय पशु के लिए किसी और जानवर को चुनना होगा. एक संस्था ने हाल ही में ऐसा कैंपेन चलाकर बाघों के मिटते अस्तित्व की तरफ ध्यान खींचने की कोशिश की है लेकिन उसकी यह कवायद कोई खास असर छोड़ पाएगी इसकी संभावना कम ही दिखाई पड़ती है. क्योंकि एक आम आदमी से लेकर देश की सर्वोच्च कुर्सी पर बैठा व्यक्ति भी इस बात से अच्छी तरह वाकिफ है कि बाघ विलुप्ती के कगार पर हैं. लेकिन फिर भी बाघ सरंक्षण के नाम पर जुबान जमा खर्ची के अलावा कुछ नहीं किया जा रहा. इस दिशा में ठोस और गंभीर कदम उठाने की दरकार अब भी कायम है.
Monday, February 9, 2009
कुछ तो करना होगा नेपाल का
नीरज नैयर
नेपाल में माओवादी सरकार के गठन के वक्त जैसी आशंकाएं जताई जा रही थीं वो अब सही साबित होती जा रही हैं. नेपाली नेताओं के भाषण और उनकी कार्यशैली में भारत विरोधी अभियान की झलक नजर आने लगी है. माओवादी सरकार के बाशिंदे न केवल भारत के प्रति आलोचनात्मक रवैया अपनाए हुए हैं बल्कि आम जनता में उसके खिलाफ व्यापक माहौल भी तैयार कर रहे हैं.
पशुपतिनाथ मंदिर विवाद इसका सबसे ताजा उदाहरण हैं. दशकों से काठमांडू स्थिति इस मंदिर में भारतीय पुजारी पूजा अर्चना करते आए हैं लेकिन नेपाली प्रधानमंत्री प्रचंड ने इस परंपरा को तोड़ने की कोशिश की. प्रचंड की चाहत थी कि मंदिर में नेपाली पुजारियों को ही पूजा करने का अधिकार मिले. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय मूल के पुजारियों की बर्खास्तगी को अवैध करार देते हुए उनके निर्णय को खारिज कर दिया. माओवादियों को कोर्ट का फैसला रास नहीं आ रहा है. प्रचंड के बयानों में हमेशा से ही भारत के खिलाफ नफरत दिखाई देती रही है. प्रधानमंत्री बनने के बाद जिस लहजे में उन्होंने संधियों की पुर्नसमीक्षा की बात कही थी उसी से साफ हो गया था कि उनकी मंशा भारत के साथ दोस्त से ज्यादा दुश्मन की तरह पेश आने की है.माओवादियों का झुकाव भारत की अपेक्षा चीन की तरफ अधिक रहा है.
वो शुरू से ही यह कहते आ रहे हैं कि नेपाल की गरीबी का मुख्य कारण भारत है. माओवादी संगठन भारत को नेपाल के पिछडेपन का कारण मानते हैं. पद संभालने के बाद प्रचंड ने अपनी पहली आधिकारिक यात्रा की शुरूआत चीन से की. वो पहले चीन गये उसके बाद भारत आए. जब नेपाल में माओवादी सत्ता संघर्ष में शामिल थे उस वक्त चीन उनको भरपूर सहयोग मिला. चीन माओवादियों के हर अभियान में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सम्मलित रहा. इस लिहाज से अब वो नेपाल के ज्यादा करीब पहुंच गया है. उसकी योजना नेपाल तक रेल लाइन बिछाने की है. ठीक ऐसी ही शुरूआत उसने तिब्बत के साथ भी की थी और आज तिब्बती पूरी तरह से उसके गुलाम बनकर रह गये हैं. जिसका खामियाजा भारत को भी चुकाना पड़ रहा है. 1950 के दौर में भारत-तिब्बत सीमा पर भारत के महज चंद सैनिक की तैनात हुआ करते थे लेकिन आज वहां सुरक्षा के लिए प्रतिदिन भारी-भरकम रकम खर्च की जा रही है. हालांकि नेपाल की ऐसी कोई बिसात नहीं है कि उसकी ढेड़ी नजर हमारे लिए घातक साबित हो सकती है लेकिन पर्दे के पीछे से उसकी कारगुजारी काफी हद तक हमें प्रभावित कर सकती है. बीते दिनों बिहार में बरपे कोसी के कहर को हल्के में नहीं लिया जा सकता. कहा जा रहा है कि चीन के इशारे पर ही नेपाल कोसी की विकरालता का रुख भारत की तरफ मोड़ दिया. इससे पहले भी बिहार में बाढ़ आई हैं मगर इस बार तबाही का मंजर कुछ ज्यादा ही भयानक था.
अभी हाल ही में माओवादी सरकार के एक मंत्री ने सार्वजनिक तौर पर भारत के खिलाफ जिस तरह की भाषाशैली का प्रयोग किया था वो चीन के प्रति उनकी निर्भरता को प्रदर्शित करने के लिए काफी है. वैसे नेपाल का चीन के प्रति लगाव कोई नई बात नहीं है, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि प्रचंड के सत्ता संभालने के बाद उस लगाव में झुकाव अत्याधिक रूप से बढ़ रहा है. राजा महेंद्र के कार्यकाल के दौरान ही नेपाल ने भारत पर से अपनी निर्भरता खत्म कर चीन से अपने संबंधों की पहल शुरू कर दी थी. 1955 में संयुक्त राष्ट्र संगठन की सदस्यता मिलने के बाद उसने भारत की निर्भरता से निकलने के लिए हाथ-पांव मारना तेज कर दिया. नतीजतन 1956 में चीन के साथ उसने एक महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसके बाद 1961 में नेपाल नरेश ने चीन के साथ सीमा समझौता करके चीन के प्रति नजदीकी का आधिकारिक ऐलान कर दिया.
इसके पीछे चीन की मंशा नेपाल से भारत की छवि को पूरी तरह मिटाना था. 1962 में भारत से युध्द के बाद चीन ने नेपाल को खास तवाो देना शुरू कर दिया. सामिरक तौर पर उसे नेपाल भारत को कमजोर करने के हथियार के रूप में दिखाई देने लगा. आज मुंबई हमले के बाद जिस तरह से चीन पाकिस्तान के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है ठीक वैसी ही नीति उसने नेपाल को लेकर अपनाई थी, 1962 के दौर में उसके विदेशमंत्री ने कहा था, नेपाल कई साल से विदेशी आक्रमणकारियों से लड़ता रहा है इसलिए हम नेपाल के राजा को आश्वस्त करना चाहते हैं कि भविष्य में नेपाल पर किसी तरह के विदेशी आक्रमण की स्थिति में चीन सदैव नेपाल के साथ खड़ा होगा. उनका इशारा भारत की तरफ था. 1988 में नेपाल ने बडे पैमाने पर चीन से हथियार खरीदे. यह खरीदारी एक तरह से पूर्व में की गई संधियों के खिलाफ थी. उन संधियों में कहा गया था कि नेपाल अगर अन्य देशों से हथियारों की खरीदेगा तो उसे भारत की स्वीकृति लेनी होगी. बावजूद इसके नेपाल भारत के लिए कभी इतना खतरनाक साबित नहीं हुआ जितना अब होता दिखाई दे रहा है. चीन की पहुंच पाकिस्तान, बर्मा, श्रीलंका आदि देशों तक पहले ही हो गई थी अब उसने नेपाल को भी पूरी तरह से अपने प्रभुत्व में ले लिया है. वो नेपाल के रास्ते हमारे सीने पर सवार होने की रणनीति बना रहा है. सामरिक दृष्टि से नेपाल पर चीन की पकड़ भारत के लिए चिंता का विषय बन गया है.
अगर चीन नेपाल को तिब्बत की तरह हजम करने में कामयाब रहा तो फिर उसे रोकना मुश्किल हो जाएगा. लिहाजा इस संभावित खतरे को ध्यान में रखते हुए सरकार को कुछ न कुछ तो करना होगा. ऐसी दीर्घकालीन नीतियां बनानी होगी जिससे नेपाल भारत के साए में अपने को महफूज समझे और चीन से बढ़ती उसकी नजदीकियों पर अंकुश लग सके.
नीरज नैयर
नेपाल में माओवादी सरकार के गठन के वक्त जैसी आशंकाएं जताई जा रही थीं वो अब सही साबित होती जा रही हैं. नेपाली नेताओं के भाषण और उनकी कार्यशैली में भारत विरोधी अभियान की झलक नजर आने लगी है. माओवादी सरकार के बाशिंदे न केवल भारत के प्रति आलोचनात्मक रवैया अपनाए हुए हैं बल्कि आम जनता में उसके खिलाफ व्यापक माहौल भी तैयार कर रहे हैं.
पशुपतिनाथ मंदिर विवाद इसका सबसे ताजा उदाहरण हैं. दशकों से काठमांडू स्थिति इस मंदिर में भारतीय पुजारी पूजा अर्चना करते आए हैं लेकिन नेपाली प्रधानमंत्री प्रचंड ने इस परंपरा को तोड़ने की कोशिश की. प्रचंड की चाहत थी कि मंदिर में नेपाली पुजारियों को ही पूजा करने का अधिकार मिले. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय मूल के पुजारियों की बर्खास्तगी को अवैध करार देते हुए उनके निर्णय को खारिज कर दिया. माओवादियों को कोर्ट का फैसला रास नहीं आ रहा है. प्रचंड के बयानों में हमेशा से ही भारत के खिलाफ नफरत दिखाई देती रही है. प्रधानमंत्री बनने के बाद जिस लहजे में उन्होंने संधियों की पुर्नसमीक्षा की बात कही थी उसी से साफ हो गया था कि उनकी मंशा भारत के साथ दोस्त से ज्यादा दुश्मन की तरह पेश आने की है.माओवादियों का झुकाव भारत की अपेक्षा चीन की तरफ अधिक रहा है.
वो शुरू से ही यह कहते आ रहे हैं कि नेपाल की गरीबी का मुख्य कारण भारत है. माओवादी संगठन भारत को नेपाल के पिछडेपन का कारण मानते हैं. पद संभालने के बाद प्रचंड ने अपनी पहली आधिकारिक यात्रा की शुरूआत चीन से की. वो पहले चीन गये उसके बाद भारत आए. जब नेपाल में माओवादी सत्ता संघर्ष में शामिल थे उस वक्त चीन उनको भरपूर सहयोग मिला. चीन माओवादियों के हर अभियान में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सम्मलित रहा. इस लिहाज से अब वो नेपाल के ज्यादा करीब पहुंच गया है. उसकी योजना नेपाल तक रेल लाइन बिछाने की है. ठीक ऐसी ही शुरूआत उसने तिब्बत के साथ भी की थी और आज तिब्बती पूरी तरह से उसके गुलाम बनकर रह गये हैं. जिसका खामियाजा भारत को भी चुकाना पड़ रहा है. 1950 के दौर में भारत-तिब्बत सीमा पर भारत के महज चंद सैनिक की तैनात हुआ करते थे लेकिन आज वहां सुरक्षा के लिए प्रतिदिन भारी-भरकम रकम खर्च की जा रही है. हालांकि नेपाल की ऐसी कोई बिसात नहीं है कि उसकी ढेड़ी नजर हमारे लिए घातक साबित हो सकती है लेकिन पर्दे के पीछे से उसकी कारगुजारी काफी हद तक हमें प्रभावित कर सकती है. बीते दिनों बिहार में बरपे कोसी के कहर को हल्के में नहीं लिया जा सकता. कहा जा रहा है कि चीन के इशारे पर ही नेपाल कोसी की विकरालता का रुख भारत की तरफ मोड़ दिया. इससे पहले भी बिहार में बाढ़ आई हैं मगर इस बार तबाही का मंजर कुछ ज्यादा ही भयानक था.
अभी हाल ही में माओवादी सरकार के एक मंत्री ने सार्वजनिक तौर पर भारत के खिलाफ जिस तरह की भाषाशैली का प्रयोग किया था वो चीन के प्रति उनकी निर्भरता को प्रदर्शित करने के लिए काफी है. वैसे नेपाल का चीन के प्रति लगाव कोई नई बात नहीं है, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि प्रचंड के सत्ता संभालने के बाद उस लगाव में झुकाव अत्याधिक रूप से बढ़ रहा है. राजा महेंद्र के कार्यकाल के दौरान ही नेपाल ने भारत पर से अपनी निर्भरता खत्म कर चीन से अपने संबंधों की पहल शुरू कर दी थी. 1955 में संयुक्त राष्ट्र संगठन की सदस्यता मिलने के बाद उसने भारत की निर्भरता से निकलने के लिए हाथ-पांव मारना तेज कर दिया. नतीजतन 1956 में चीन के साथ उसने एक महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसके बाद 1961 में नेपाल नरेश ने चीन के साथ सीमा समझौता करके चीन के प्रति नजदीकी का आधिकारिक ऐलान कर दिया.
इसके पीछे चीन की मंशा नेपाल से भारत की छवि को पूरी तरह मिटाना था. 1962 में भारत से युध्द के बाद चीन ने नेपाल को खास तवाो देना शुरू कर दिया. सामिरक तौर पर उसे नेपाल भारत को कमजोर करने के हथियार के रूप में दिखाई देने लगा. आज मुंबई हमले के बाद जिस तरह से चीन पाकिस्तान के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है ठीक वैसी ही नीति उसने नेपाल को लेकर अपनाई थी, 1962 के दौर में उसके विदेशमंत्री ने कहा था, नेपाल कई साल से विदेशी आक्रमणकारियों से लड़ता रहा है इसलिए हम नेपाल के राजा को आश्वस्त करना चाहते हैं कि भविष्य में नेपाल पर किसी तरह के विदेशी आक्रमण की स्थिति में चीन सदैव नेपाल के साथ खड़ा होगा. उनका इशारा भारत की तरफ था. 1988 में नेपाल ने बडे पैमाने पर चीन से हथियार खरीदे. यह खरीदारी एक तरह से पूर्व में की गई संधियों के खिलाफ थी. उन संधियों में कहा गया था कि नेपाल अगर अन्य देशों से हथियारों की खरीदेगा तो उसे भारत की स्वीकृति लेनी होगी. बावजूद इसके नेपाल भारत के लिए कभी इतना खतरनाक साबित नहीं हुआ जितना अब होता दिखाई दे रहा है. चीन की पहुंच पाकिस्तान, बर्मा, श्रीलंका आदि देशों तक पहले ही हो गई थी अब उसने नेपाल को भी पूरी तरह से अपने प्रभुत्व में ले लिया है. वो नेपाल के रास्ते हमारे सीने पर सवार होने की रणनीति बना रहा है. सामरिक दृष्टि से नेपाल पर चीन की पकड़ भारत के लिए चिंता का विषय बन गया है.
अगर चीन नेपाल को तिब्बत की तरह हजम करने में कामयाब रहा तो फिर उसे रोकना मुश्किल हो जाएगा. लिहाजा इस संभावित खतरे को ध्यान में रखते हुए सरकार को कुछ न कुछ तो करना होगा. ऐसी दीर्घकालीन नीतियां बनानी होगी जिससे नेपाल भारत के साए में अपने को महफूज समझे और चीन से बढ़ती उसकी नजदीकियों पर अंकुश लग सके.
नीरज नैयर
Friday, January 16, 2009
कुछ भी ठीक नहीं है भारतीय सेना में
नीरज नैयर
बचपन से हम भारतीय सेना के पराक्रम, शौर्य, अनुशासन, ईमानदारी और जिंदादिली के किस्से सुनते आए हैं इसलिए हमारा दिलो दिमाग सहज ही इस बात को मानने के लिए नहीं होता कि सेना में कुछ भी गलत हो सकता है. जब कभी सेना के किसी जवान या अफसर की अपराध में संलिप्तता की खबरें आती हैं तो हमें उसमें षड़यंत्र की धुंध दिखाई देने लगती है. मालेगांव धमाके इसका सबसे ताजा उदाहरण है. सेना को हम ऐसी संस्था के रूप में देखते हैं जहां केवल देश पर मर मिटने का जज्बा जगाया जाता है. जहां भ्रष्टाचार, विलासिता जैसे शब्दों के लिए कोई जगह नहीं होती. आपात स्थितियों में सेना जिस फरिश्ते की सी भूमिका में सामने आती है उसे हमारा दिमाग कभी भूलने को तैयार नहीं होता. लेकिन हकीकत अक्सर बिल्कुल वैसी नहीं होती जैसी हम कल्पना करते हैं, सेना पर भी ये बात लागू होती है.
पिछले कुछ वक्त में सेना की वर्दी पर जितने दाग लगे हैं वो यह साबित करने के लिए काफी हैं कि अनुशासन की ऊंची-ऊंची दीवारों के पीछे कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है. यौन उत्पीड़न, बलात्कार, भ्रष्टाचार और भेदभाव जैसे अस्वीकार्य शब्द जो अब तक पुलिस महकमे की शोभा बढ़ाते रहे हैं. अब फौजी वर्दी के साथ भी जुड़ने लगे हैं. हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं कि फौज की ईमानदारी को पुलिस के साथ तौलकर नहीं देखा जा सकता. फौज में जहां अनैतिक कृत्यों के एक-दो मामले सामने आते हैं. वहीं पुलिस में ऐसी लंबी-चौड़ी फेहरिस्त है, लेकिन फिर भी सच यही है कि कायदे+कानून की अभेद समझे जाने वाली दीवार में दरारें पड़ने लगी हैं. अभी हाल में ही सेना के दूसरे सबसे बडे अधिकारी की भ्रष्टाचार में लिप्तता का सामने आया मामला इन दरारों की चौड़ाई को खुद ब खुद बयां कर रहा है. सेना में भ्रष्टाचार ऊपरी स्तर पर किस कदर फैल चुका है. यह मामला इसकी बानगी भर है. कैग भी अपनी रिपोर्ट सेना में तेजी से फैलते भ्रष्टाचार का खुलासा कर चुका है.
कैग की रिपोर्ट में ही यह सच सामने आया था कि किस तरह से कुछ बड़े सैन्य अधिकारी सिक्किम और सियाचिन में तैनात जवानों की जिंदगियों का सौदा अपनी जेबें भरने के लिए कर रहे थे. जूतों की खरीद में अनियमितताओं के इस मामले को कैग ने 328 जवानों की मौत की वजह भी ठहराया था. 2005 में सौदा निरस्त करने के बाद भी सेना सालों तक इटली की एक कंपनी से खराब जूते खरीदती रही, यह जानने के बाद भी कि वो-15 डिग्री तापमान के बाद काम करना बंद कर देते हैं. ऐसे ही पेट्रोल की जगह पानी सप्लाई के मामले ने भी सेना में स्वार्थता और भ्रष्टाचार की परतों को उजागर किया था. घाटी में तैनात एक बिग्रेडियर लंबे समय तक सियाचिन में तैनात जवानों को पेट्रोल की जगह पानी की सप्लाई करता रहा. जब जम्मू-कश्मीर पुलिस ने इस गोरखधंधे से पर्दा उठाया तो सेना में भूचाल आ गया, लेकिन थोड़े ही वक्त में सबकुछ ऐसे शांत हो गया जैसे कुछ हुआ ही न हो.
सेना के संगठनात्मक ढांचे में भ्रष्टाचार का बहाव न तो ऊपर से नीचे की ओर है और न ही नीचे से ऊपर की ओर. यह केवल ऊपरी सतह पर अपनी पकड़ बनाए हुए है. निचले स्तर पर न तो इतने अधिकार होते हैं और न ही इतनी हिम्मत की वो ऐसे-वैसे काम में हाथ डाल सकें. कई सैन्य अधिकारी खुद इस बात को दबी जबान से स्वीकार करते हैं कि कभी-कभी उन्हें आलाधिकारियों के ऐसे काम भी करने पड़ते हैं. जो आर्मी मैन्यूअल के खिलाफ हैं क्योंकि ऐसा न करने की दशा में उन्हें अनुशासनहीनता का तमगा लगाकर बाहर का रास्ता दिखाए जाने का डर होता है. भ्रष्टाचार के साथ-साथ महिला मुद्दे पर भी सेना जब तक कठघरे में खड़ी दिखाई देती है. मेजर जनरल स्तर तक के बड़े अधिकारी पर भी दर्ुव्यवहार के आरोप लग चुके हैं. जम्मू-कश्मीर के लेह जिले में तीसरी इन्फैंट्री में तैनात मेजर जनरल एके लाल पर कैप्टन नेहा रावत ने दर्ुव्यवहार का आरोप लगाकर सेना को हिलाकर रख दिया था. यह पहला मौका था जब इतने बड़े अफसर को ऐसे मामले ने जांच का सामना करना पड़ा हो. महिला अधिकारी ने योग की एक कक्षा के दौरान वरिष्ठ अधिकारी के व्यवहार पर आपत्ति जताई थी. योग कक्षा का आयोजन मेजर जनरल लाल ने ही किया था.
वायुसेना की एक महिला अफसर ने भी ऐसी ही शिकायत की थी लेकिन उसे इसकी कीमत अपनी नौकरी से हाथ धोकर चुकानी पड़ी. सेना में महिला अधिकारियों से दर्ुव्यवहार और शोषण के कई मामले सामने आ चुके हैं. जम्मू में तैनात कैप्टन मेघा राजदान की रहस्यमय परिस्थितियों से हुई मौत को इसी नजरिये से देखा गया था. उनके पिता ने हत्या की आशंका जाहिर करते हुए वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों पर उंगली उठाई थी. एक अन्य महिला अफसर सुष्मिता चक्रवर्ती की मौत को भी उनके परिवार ने हत्या करार दिया था. बावजूद इसके सैन्य अधिकारी बेहतर चैनल सिस्टम की दुहाई देते नहीं थकते. अनुशासन की दीवार फांदकर सामने आए इन चंद मामलों के अलावा सेना के लिए सबसे घातक साबित हो रहा है बाहरी तौर पर उसकी धूल-धूसरित होती छवि. सैन्य अफसरों पर न सिर्फ बलात्कार जैसे संगीन आरोप लग रहे हैं बल्कि साबित भी हो रहे हैं. कश्मीर में सेना की छवि को मेजर रहमान हुसैन की करतूतों ने खासा प्रभावित किया था. रहमान पर तीन महिलाओं के साथ बलात्कार का आरोप था. जिसे लेकर बड़े पैमाने पर घाटी में विरोध प्रदर्शन भी हुए थे. सेना ने पहले तो सभी आरोपों को खारिज कर दिया था लेकिन बाद में उसे जांच का आदेश देने के बाद कोर्ट मार्शल की कार्रवाई शुरू करनी पड़ी. अपनी छवि को सुधारने के लिए 15 सालों में यह पहली बार था जब सेना ने किसी अफसर के खिलाफ कोर्ट मार्शल का इतना प्रचार किया. पिछले कुछ सालों से सेना में स्थितियां लगातार खराब होती जा रही हैं.
अधिकारियों की कमी से जूझने के साथ-साथ उसे ऐसे मोर्चों पर भी जूझना पड़ रहा है जिनसे कभी उसका वास्ता नहीं रहा. तरक्की के लिए फर्जी मुठभेड़ के जो आरोप पुलिस को परेशान करते रहे थे वो अब सेना का भी हिस्सा बन गये हैं. जम्मू-कश्मीर में जिस तरह से मौलवी शौकत नाम के शख्स को घर से उठाकर फर्जी मुठभेड़ में मार गिराने के बाद उसे पाकिस्तानी चरमपंथी अबू जाहिद बताना और उसके शव को श्रीनगर से 50 किलोमीटर दूर दफन कर देना यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि सेना भी पुलिस की राह पर चल निकली है. इस मामले ने पूरी घाटी में सेना के खिलाफ व्यापक माहौल तैयार करने में अहम भूमिका निभाई थी. सेना में वैसा कुछ भी नहीं चल रहा है जैसा अब तक हम सोचते आ रहे हैं. भ्रष्टाचार से लेकर शोषण जैसी कुरुतियां वहां अपनी पैठ बना चुकी हैं. शौर्य, अनुशासन और ईमानदारी जैसे शब्द अब उसका साथ छोड़ने लगे हैं.
नीरज नैयर
बचपन से हम भारतीय सेना के पराक्रम, शौर्य, अनुशासन, ईमानदारी और जिंदादिली के किस्से सुनते आए हैं इसलिए हमारा दिलो दिमाग सहज ही इस बात को मानने के लिए नहीं होता कि सेना में कुछ भी गलत हो सकता है. जब कभी सेना के किसी जवान या अफसर की अपराध में संलिप्तता की खबरें आती हैं तो हमें उसमें षड़यंत्र की धुंध दिखाई देने लगती है. मालेगांव धमाके इसका सबसे ताजा उदाहरण है. सेना को हम ऐसी संस्था के रूप में देखते हैं जहां केवल देश पर मर मिटने का जज्बा जगाया जाता है. जहां भ्रष्टाचार, विलासिता जैसे शब्दों के लिए कोई जगह नहीं होती. आपात स्थितियों में सेना जिस फरिश्ते की सी भूमिका में सामने आती है उसे हमारा दिमाग कभी भूलने को तैयार नहीं होता. लेकिन हकीकत अक्सर बिल्कुल वैसी नहीं होती जैसी हम कल्पना करते हैं, सेना पर भी ये बात लागू होती है.
पिछले कुछ वक्त में सेना की वर्दी पर जितने दाग लगे हैं वो यह साबित करने के लिए काफी हैं कि अनुशासन की ऊंची-ऊंची दीवारों के पीछे कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है. यौन उत्पीड़न, बलात्कार, भ्रष्टाचार और भेदभाव जैसे अस्वीकार्य शब्द जो अब तक पुलिस महकमे की शोभा बढ़ाते रहे हैं. अब फौजी वर्दी के साथ भी जुड़ने लगे हैं. हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं कि फौज की ईमानदारी को पुलिस के साथ तौलकर नहीं देखा जा सकता. फौज में जहां अनैतिक कृत्यों के एक-दो मामले सामने आते हैं. वहीं पुलिस में ऐसी लंबी-चौड़ी फेहरिस्त है, लेकिन फिर भी सच यही है कि कायदे+कानून की अभेद समझे जाने वाली दीवार में दरारें पड़ने लगी हैं. अभी हाल में ही सेना के दूसरे सबसे बडे अधिकारी की भ्रष्टाचार में लिप्तता का सामने आया मामला इन दरारों की चौड़ाई को खुद ब खुद बयां कर रहा है. सेना में भ्रष्टाचार ऊपरी स्तर पर किस कदर फैल चुका है. यह मामला इसकी बानगी भर है. कैग भी अपनी रिपोर्ट सेना में तेजी से फैलते भ्रष्टाचार का खुलासा कर चुका है.
कैग की रिपोर्ट में ही यह सच सामने आया था कि किस तरह से कुछ बड़े सैन्य अधिकारी सिक्किम और सियाचिन में तैनात जवानों की जिंदगियों का सौदा अपनी जेबें भरने के लिए कर रहे थे. जूतों की खरीद में अनियमितताओं के इस मामले को कैग ने 328 जवानों की मौत की वजह भी ठहराया था. 2005 में सौदा निरस्त करने के बाद भी सेना सालों तक इटली की एक कंपनी से खराब जूते खरीदती रही, यह जानने के बाद भी कि वो-15 डिग्री तापमान के बाद काम करना बंद कर देते हैं. ऐसे ही पेट्रोल की जगह पानी सप्लाई के मामले ने भी सेना में स्वार्थता और भ्रष्टाचार की परतों को उजागर किया था. घाटी में तैनात एक बिग्रेडियर लंबे समय तक सियाचिन में तैनात जवानों को पेट्रोल की जगह पानी की सप्लाई करता रहा. जब जम्मू-कश्मीर पुलिस ने इस गोरखधंधे से पर्दा उठाया तो सेना में भूचाल आ गया, लेकिन थोड़े ही वक्त में सबकुछ ऐसे शांत हो गया जैसे कुछ हुआ ही न हो.
सेना के संगठनात्मक ढांचे में भ्रष्टाचार का बहाव न तो ऊपर से नीचे की ओर है और न ही नीचे से ऊपर की ओर. यह केवल ऊपरी सतह पर अपनी पकड़ बनाए हुए है. निचले स्तर पर न तो इतने अधिकार होते हैं और न ही इतनी हिम्मत की वो ऐसे-वैसे काम में हाथ डाल सकें. कई सैन्य अधिकारी खुद इस बात को दबी जबान से स्वीकार करते हैं कि कभी-कभी उन्हें आलाधिकारियों के ऐसे काम भी करने पड़ते हैं. जो आर्मी मैन्यूअल के खिलाफ हैं क्योंकि ऐसा न करने की दशा में उन्हें अनुशासनहीनता का तमगा लगाकर बाहर का रास्ता दिखाए जाने का डर होता है. भ्रष्टाचार के साथ-साथ महिला मुद्दे पर भी सेना जब तक कठघरे में खड़ी दिखाई देती है. मेजर जनरल स्तर तक के बड़े अधिकारी पर भी दर्ुव्यवहार के आरोप लग चुके हैं. जम्मू-कश्मीर के लेह जिले में तीसरी इन्फैंट्री में तैनात मेजर जनरल एके लाल पर कैप्टन नेहा रावत ने दर्ुव्यवहार का आरोप लगाकर सेना को हिलाकर रख दिया था. यह पहला मौका था जब इतने बड़े अफसर को ऐसे मामले ने जांच का सामना करना पड़ा हो. महिला अधिकारी ने योग की एक कक्षा के दौरान वरिष्ठ अधिकारी के व्यवहार पर आपत्ति जताई थी. योग कक्षा का आयोजन मेजर जनरल लाल ने ही किया था.
वायुसेना की एक महिला अफसर ने भी ऐसी ही शिकायत की थी लेकिन उसे इसकी कीमत अपनी नौकरी से हाथ धोकर चुकानी पड़ी. सेना में महिला अधिकारियों से दर्ुव्यवहार और शोषण के कई मामले सामने आ चुके हैं. जम्मू में तैनात कैप्टन मेघा राजदान की रहस्यमय परिस्थितियों से हुई मौत को इसी नजरिये से देखा गया था. उनके पिता ने हत्या की आशंका जाहिर करते हुए वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों पर उंगली उठाई थी. एक अन्य महिला अफसर सुष्मिता चक्रवर्ती की मौत को भी उनके परिवार ने हत्या करार दिया था. बावजूद इसके सैन्य अधिकारी बेहतर चैनल सिस्टम की दुहाई देते नहीं थकते. अनुशासन की दीवार फांदकर सामने आए इन चंद मामलों के अलावा सेना के लिए सबसे घातक साबित हो रहा है बाहरी तौर पर उसकी धूल-धूसरित होती छवि. सैन्य अफसरों पर न सिर्फ बलात्कार जैसे संगीन आरोप लग रहे हैं बल्कि साबित भी हो रहे हैं. कश्मीर में सेना की छवि को मेजर रहमान हुसैन की करतूतों ने खासा प्रभावित किया था. रहमान पर तीन महिलाओं के साथ बलात्कार का आरोप था. जिसे लेकर बड़े पैमाने पर घाटी में विरोध प्रदर्शन भी हुए थे. सेना ने पहले तो सभी आरोपों को खारिज कर दिया था लेकिन बाद में उसे जांच का आदेश देने के बाद कोर्ट मार्शल की कार्रवाई शुरू करनी पड़ी. अपनी छवि को सुधारने के लिए 15 सालों में यह पहली बार था जब सेना ने किसी अफसर के खिलाफ कोर्ट मार्शल का इतना प्रचार किया. पिछले कुछ सालों से सेना में स्थितियां लगातार खराब होती जा रही हैं.
अधिकारियों की कमी से जूझने के साथ-साथ उसे ऐसे मोर्चों पर भी जूझना पड़ रहा है जिनसे कभी उसका वास्ता नहीं रहा. तरक्की के लिए फर्जी मुठभेड़ के जो आरोप पुलिस को परेशान करते रहे थे वो अब सेना का भी हिस्सा बन गये हैं. जम्मू-कश्मीर में जिस तरह से मौलवी शौकत नाम के शख्स को घर से उठाकर फर्जी मुठभेड़ में मार गिराने के बाद उसे पाकिस्तानी चरमपंथी अबू जाहिद बताना और उसके शव को श्रीनगर से 50 किलोमीटर दूर दफन कर देना यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि सेना भी पुलिस की राह पर चल निकली है. इस मामले ने पूरी घाटी में सेना के खिलाफ व्यापक माहौल तैयार करने में अहम भूमिका निभाई थी. सेना में वैसा कुछ भी नहीं चल रहा है जैसा अब तक हम सोचते आ रहे हैं. भ्रष्टाचार से लेकर शोषण जैसी कुरुतियां वहां अपनी पैठ बना चुकी हैं. शौर्य, अनुशासन और ईमानदारी जैसे शब्द अब उसका साथ छोड़ने लगे हैं.
नीरज नैयर
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