Tuesday, January 6, 2009

अब तो हमें चीन को समझना होगा

नीरज नैयर
चीन की कुटिलता किसी से छिपी नहीं है लेकिन मुंबई हमले पर जिस तरह की खामोशी वो अख्तियार किए हुए हैं उसके बाद ड्रैगन से रिश्तों की पुर्नसमीक्षा आवश्यक हो गई है. आज जहां पूरा विश्व पाकिस्तान की मुखालफत में भारत के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है वहीं चीन अब भी दोहरी चालें चलने में लगा है. एक तरफ वह संयुक्त युध्दभ्यास के बहाने हमसे रिश्ते सुधारने का दिखावा करता है तो दूसरी तरफ हमारे दुश्मन की तामीरदारी करके हमें कमजोर बनाने की कोशिश. मुंबई हमले की साधारण शब्दों में निंदा करके चीन ने महज रस्म अदायगी की है. उसने एक बार भी अमेरिका, ब्रिटेन की तरह पाक के खिलाफ कड़े शब्दों का प्रयोग नहीं किया, उसने एक बार भी पाक को यह हिदायत देने की जहमत नहीं उठाई कि वो आतंकवादियों पर लगाम कसे. जबकि एक पड़ोसी होने के नाते उसका यह फर्ज़ बनता था.
तिब्बत मसले पर जिस तरह अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आलोचना के बावजूद भारत ने चीन से दोस्ती को नभाया था, चीन वैसा कुछ करता नजर नहीं आ रहा। उल्टा वो पाक को यह भरोसा दिलाने में लगा है कि अगर भारत सैन्य कार्रवाई करता है तो वो इस्लामाबाद का साथ देगा.


चीन के प्रधानमंत्री पाकिस्तानी हुक्मरानों को आश्वस्त कर चुके हैं कि उन्हें बीजिंग का पूरा समर्थन प्राप्त है. चीन का झुकाव शुरू से ही पाकिस्तान की तरफ ज्यादा रहा है. भारत से उसकी दोस्ती महज मुनाफे तक ही सीमित रही है. उसके नेता भारतीय नेतृत्व को बुलाते हैं, उनका भव्य स्वागत करते हैं, बेहतर संबंधों की आस बांधते हैं, सुनहरे वादे करते हैं और व्यापार बढ़ाने के समझौतों पर हस्ताक्षर कर बाकी मसलों को कूड़े की टोकरी में डाल देते हैं.
चीन 1962 के बाद से ऐसा ही करता आ रहा है. हालंकि पहले उसका मिजाज कुछ कड़क था जिसमें वक्त के साथ-साथ कुछ नरमी आई है लेकिन वो भी अपने फायदे के लिए. भारत और चीन के बीच 40 अरब डॉलर से ज्यादा का व्यापार है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के चीन यात्रा के वक्त दोनों देश 2010 तक इसे 60 अरब डॉलर करने पर समहत हुए थे. जबकि 1999 में दोनों देशों के बीच सिर्फ 2 अरब डॉलर का ही व्यापार था. 2007 में चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापार सहयोगी बनकर उHkरा था. पिछले साल भारत चीन में व्यापार में लगHkग 57 फीसदी का इजाफा भी हुआ था. चीनी कंपनियां भारतीय बाजार में लगातार पैठ बनाए जा रही है. मोबाइल फोन से लेकर लक्ष्मी गणेश की मूर्तियों तक मेड इन चाइना का बोलबाला है. चीन हर साल अपना सस्ता मद्दा माल भारतीय बाजारों में खपाकर अरबों कमा रहा है और भारतीय कंपनियों के लिये परेशानी बड़ा रहा है. आर्थिक के साथ-साथ चीन सामरिक मोर्चे पर भी हमें कमजोर करने में लगा है. वह पाकिस्तान के हाथ मजबूत कर रहा है. ताकि जब चाहे उनका इस्तेमाल भारत के खिलाफ कर सके.
खुफिया एजेंसी रॉ के शीर्ष अधिकारी भी स्वीकारते रहे हैं कि चीन का पाकिस्तान को आंख मूदकर सामरिक साझीदार बनाने का कदम चौंकाने वाला है. उसे उद्धपोत, मिसाइल, हथियार और अत्याधुनिक एयरक्राफ्ट देना उसकी मंशा पर शक करने के लिए काफी है. वैसे चीन का यह रुख कोई नया नहीं है. वह शुरू से ही Hkारत विरोधी मुहिम की अगुवाई करता रहा है. उसने भारत के परमाणु परिक्षण की दिल खोलकर आलोचना की मगर चुपके से पाकिस्तान को यह तकनीक उपलब्ध करा दी. वह चीन ही था जिसने सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सदस्यता की मांग का पुरजोर विरोध किया था.जबकि 1949 में भारत की सिफारिश की बदौलत ही चीन को संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता हासिल हुई थी. मुंबई हमले में अपने संगठनों की संलिप्तता को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बढ़ते दबाव के बावजूद पाक जिस अख्खड़ता के साथ भारत से पेश आ रहा है यह चीन की शह का ही नतीजा है. पूर्व में भी चीन की शह पर पाकिस्तान ऐसे ही पेश आता रहा है. 2001 में संसद पर हमले के वक्त भी उसने ऐसी ही उदंडता दिखाई थी. मई 2002 में चीन के विदेशी मंत्री ने इस्लामाबाद से यह ऐलान करके पाक के हौसले और बुलंद कर दिये थे कि Hkारत के खिलाफ हर लड़ाई में चीन पाक का साथ देगा. दरअसल चीन एशिया पर वर्चस्व की जंग लड़ रहा है. लिहाजा Hkारत की समृध्दि और अमेरिका से उसकी बढ़ती नजदीकी चीन को रास नहीं आ रही. इसलिए वो पाकिस्तान, म्यांमार, बांग्लादेश और अब नेपाल आदि देशों को मोहरा बनाकर भारत को कसने में लगा है.
नेपाल में माओवादियों की सरकार बनने के बाद चीन का प्रभाव वहां साफ नजर आ रहा है. अब तक नेपाल को लेकर भारत पूरी तरह बेफिक्र था. मगर प्रचंड के सत्ता में आने और चीन के प्रति लगाव दिखाने से उसकी परेशानी और बढ़ गई है. कहा तो यहां तक जा रहा है कि कोसी से बिहार में मची तबाही चीन के इशारे पर ही की गई थी. चीन चोरी छिपे वार करने का आदी है. वह खुलकर भारत के खिलाफ कभी नहीं बोलता. कुटनीति के जानकार भी मानते हैं कि चीन गुपचुप साजिश को अंजाम देता रहा है. कुछ समय पहले मलेशिया में जिस तरह से हिन्दुओं के साथ बर्ताव किया गया था और जिस तरह से भारत के पक्ष को मलेशिया सरकार ने हवा में उड़ाया था उसमें भी चीन की भूमिका की ही बातें सामने आई थीं. चीन की मंशा भारत को आंतरिक मसलों में उलझाकर रखने की है.
जम्मू कश्मीर के चरमपंथियों को वो समर्थन देता रहा है. नक्सलियों को भी गुपचुप बढ़ावा देने में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी है. उसकी सीमा से घुसपैठ की खबरें भी आने लगी हैं. ऐसे में अगर मुंबई हमले में उसके अप्रत्यक्ष सहयोग की बात कही जाए तो कुछ गलत नहीं होगा. चीन भारत को कमजोर करना चाहता है. उसकी मजबूत होती अर्थव्यवस्था को नेस्तनाबूद करना चाहता है और आतंकवाद के रास्ते वो ये सब आसानी से कर सकता है. शायद इसीलिए सुरक्षा परिषद में आतंकी संगठन जमात-उद-दावा पर प्रतिबंध की राह में उसने तीन बार रोड़ा अटकाया था. मुंबई हमले के बाद चीन का जो चेहरा सामने आया है उसे ध्यान में रखकर ही भारत को अब ड्रैगन से रिश्तों का खाका तैयार करना होगा. उसे चीन को यह बताना होगा कि अगर वो भारत का साथ चाहता है तो उसे पाकिस्तान से किनारा करना होगा, अगर वो व्यापार बढ़ाना चाहता है तो उसे सीमा विवाद पर भी बात करनी होगी. उसे यह अहसास दिलाना होगा कि दोस्ती महज एक तरफ से नहीं निHkाई जा सकती
नीरज नैयर

Thursday, December 25, 2008

ये तो होना ही था

नीरज नैयर
जार्ज डब्लू बुश ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में उन्हें यूं जलालत झेलनी पड़ेगी. इराक में जो कुछ भी हुआ उसने न सिर्फ बुश को बल्कि पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है. इराकी प्रधानमंत्री मलिकी की मौजूदगी में एक पत्रकार उठता है, बुश को गालियां देता है, अपना जूता निकालकर अमेरिकी राष्ट्रपति की तरफ फेंकता और पल भर में ही इतना प्रसिद्ध बन जाता है कि उसकी रिहाई के लिए सड़कों पर प्रदर्शन होने लगते हैं. इस घटना ने भले ही बुश विरोधियों को ताउम्र हंसने का मौका दे दिया हो मगर इसने इराकियों के उस दर्द और बेबसी को भी बयां किया है जो वो बरसों से झेलते आ रहे हैं. यह घटना इस बात का सुबूत है कि सद्दाम की मौत के इतने समय बाद भी बुश और अमेरिका के प्रति इराकियों के दिल में णनफरत कायम है. कहने को तो इराक में चुनी हुई सरकार है, लोगों को अपने हक की आवाज उठाने का अधिकार है मगर इसे सिर्फ कहने तक ही कहा जाए तो अच्छा बेहतर होगा. इराक में अब भी करीब 149,000 अमेरिकी और ब्रितानी सैनिक जमे हुए हैं, खून-खराबा वहां आम बात हो गई है.

कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं है. हर इराकी को दुश्मन के नजरीए से देखा जाता है. पैदा होने से पहले ही बच्चा गोलियों की इतनी आवाज सुन लेता है कि दुनिया में आने के बाद उसे ये सब खेल लगने लगता है. ऐसे मुल्क में रहने वालों से जूता फेंकने की नहीं तो और क्या उम्मीद की जा सकती है. सद्दाम के तनाशाही शासन के खात्मे के वक्त इराक में थोड़ा गुस्सा जरूर था मगर लोगों को इस बात की आस भी कि शायद अब उन्हें बेहतर जिंदगी नसीब होगी, उन्हें दूसरे मुल्कों के आवाम की तरह खुला माहौल मिलेगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. उल्टा उनकी जिंदगी बद से बदतर हो गई है. मानवीय हालात वहां हर रोज बिगड़ते जा रहे हैं. इराकियों की रोजमर्रा की जरूरतों पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा. उन्हें न तो भरपेट भोजन मिल रहा है और न ही पानी. हालात ये हो चले हैं कि लोगों को अपनी कमाई का एक तिहाई यानी करीब 150 डॉलर महज पानी खरीदने के लिए ही खर्च करना पड़ रहा हैं. स्वास्थ्य सेवाओं की हालत भी बिगड़ती जा रही है. जो सेवाएं उपलब्ध हैं वो इतनी मंहगी है कि आम आदमी की पहुंच में नहीं आती. सरकारी अस्पतालों में सिर्फ 30 हजार बिस्तर हैं जो 80 हजार की जरूरतों के आधे से भी कम हैं. लोगों का आर्थिक स्तर इतना गिर गया है कि कई-कई दिन घर में चूल्हा नहीं जल पाता. अमेरिका ने पहले कहा था कि लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना के बाद वो इराक से पूरी तरह हट जाएगा लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. हालात को काबू करने के नाम पर उसने सेना को वहीं बसा दिया. ब्रिटेन ने भी उसका भरपूर सहयोग दिया और अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी खामोशी साधे रहा.

इराक पर अमेरिका के हमले की शुरूआती दिनों में जमकर तारीफ हुई थी लेकिन धीरे-धीरे उसकी अमानवीय तस्वीरों के सामने आने के बाद अधिकतर लोगों की सोच बदल गई. अबू गरेब जेल में यातनाओं के फुटेज ने पूरी दुनिया को अमेरिकी सेना का खौफनाक चेहरा दिखाया. कहा जाता है कि बसरा के नजदीक बक्का में अमेरिकी सैनिकों के कब्जे में अब भी 20 हजार इराकी हैं, जिनमें सबसे ज्यादा तादाद पुरुषों की है. अतंरराष्ट्रीय संस्था रेडक्रास भी इराक के हालात पर ंचिंता जता चुकी है. उसका कहना है कि इराक के बदतर मानवीय हालात केवल तभी ठीक किए जा सकते हैं जब इराकी नागरिकों को रोजमर्रा की जरूरतों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया जाए. इराक में सद्दाम हुसैन के वक्त जो हालात थे उन्हें मौजूदा हालातों से बेहतर कहा जाए तो शायद गलत नहीं होगा. संयुक्त राष्ट्र डवलपमेंट प्रोग्राम की रिपोर्ट भी कुछ ऐसा ही बयां करती है. रिपोर्ट में कहा गया है कि युद्ध के बाद इराकियों का जीवन स्तर खतरनाक तरीके से गिरता जा रहा है. पानी-भोजन, बिजली और सुरक्षा जैसी मूलभूत जरूरतें भी वहां गंभीर समस्या बन गई हैं. इराक में 39 प्रतिशत आबादी 15 साल से कम उम्र के लोगों की है, जिनकी स्थिति सर्वाधिक दयानीय है. छह महने से पांच साल तक के अधिकतर बच्चे कुपोषण की गिरफ्त में हैं. साक्षारता का ग्राफ भी ऊपर चढ़ने के बजाए पिछले कुछ सालों में बहुत तेजी से नीचे आया है. इराक में जो एक और समस्या विकराल रूप धारण करती जा रही है वह है बेरोजगारी. करीब 37 फीसदी पढ़े-लिखे लोग नौकरी की तलाश में हताशा के शिकार बन बैठे हैं. और हर साल इन आंकड़ों में इजाफा हो रहा है. इसके साथ-साथ भ्रष्टाचार भी वहां तेजी से पैर पसार चुका है. कुछ महीनों में ही इसने तीन गुने से ज्यादा की रफ्तार पकड़ ली है.

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि इराक बर्बादी के ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां से बेहतरी की कोई उम्मीद दूर-दूर तक नजर नहीं आती. ऊपर से अमेरिका भी अब अपने वादों से मुकरने लगा है. इराकी नेतृत्व खुद यह आरोप लगा चुका है कि वाशिंगटन की तरफ से जिस तरह का आश्वासन दिया गया था वैसी मदद नहीं मिल पा रही है. अमेरिका ने इराक की स्थिति सुधारने के लिए सात प्रोजेक्ट चलाए थे जिनमें से अधिकतर बंद किए जा चुके हैं. इराक की णआर्थिक जरूरतों से भी अमेरिका ने पीछा छुड़ा लिया है. जबकि जापान आदि देशों से इराक के पुर्नउद्धार के लिए सहायता मिल रही है. दरअसल इराक अब अमेरिका के गले की हड्डी बन गया है. दिन ब दिन वहां खराब होते हालात से उसकी स्थिति भी बिगड़ती जा रही है. इराक को फिर से पैरों पर खड़ा करने का खर्चा उठाने में अब वो कानाकानी दिखा रहा है. हालांकि ये बात अलग है कि इराक में बने रहने के लिए अब तक वो बेशुमार पैसा बहा चुका है. इराक में जहां अमेरिका और ब्रिटेन की सेना डेरा डाले हुए हैं वहां आमजन की सुरक्षा व्यवस्था के सबसे बड़ी कमजोरी के रूप में उबरकर आना अपने आप में यह साबित करता है कि अमेरिका की इराकी जनता के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं उसे केवल वहां जमें रहने से मतलब है. कुछ वक्त पहले किए गये एक सर्वेक्षण में करीब 80 प्रतिशत लोगों का मानना था कि सुरक्षा व्यवस्था की हालत इतनी खस्ता हो चुकी है कि घर में भी लोग खुद को महफूज नहीं समझते.

भले ही अमेरिका और उसके सहयोगी अपनी इराक नीति कोआज भी वाजिब ठहरा रहे हो मगर वहां की जनता उन्हें इसके लिए कभी माफ नहीं करने वाली. दाने-दाने को मोहताज लोग, बिलखते बच्चे, अपनों की शवों पर मातम करती महिलाएं इराक की पहचान बन कर रह गई है. ऐसे में इराकी जनता की बुश के प्रति नारजागी का जो मुजाएरा बुश-मलिकी की प्रेस कांफ्रेंस में देखने को मिला उसे कतई गलत नहीं ठहराया जा सकता.
नीरज नैयर
9893121591

Wednesday, December 3, 2008

किस बिल में छिपे थे राज ठाकरे

नीरज नैयर
मुंबई में आतंकवाद की धुंध छटने के baad हर किसी की जुबान पर बस एक ही नाम है राज ठाकरे. हर कोई बस यही जानना चाहता है कि मराठी हितों की दुहाई देने वाला यह मराठी मानुस आखिर तीन दिनों तक किस बिल में छिपा रहा. जब आतंकवादी मराठियों के खून से होली खेल रहे थे तब राज और उसकी बहादुर सेना मर्दानगी त्यागकर हाथों में चूड़ियां पहने क्यों बैठी रही. अगर राज और उसके गुंडे मराठियों के सच्चे पैरोकार थे तो उन्हें सड़कों पर गोलियां बरसा रहे आतंकियों से लोहा लेना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, जब जान पर बन आई तो सारी मराठीगिरी पल भर में ही काफूर हो गई.

जिस मुंबई में हमेशा कभी दक्षिण भारतीयों के नाम पर तो कभी उत्तर भारतीयों के नाम पर नफरत का जहर घोला जाता रहा है उसी मुंबई को बचाने के लिए सेना और एनएसजी के कमांडो ने बिना कुछ सोच-विचारे जान की बाजी लगा दी क्यों? क्योंकि वह जानते हैं कि मुंबई भी उसी देश का हिस्सा है जिसमें यूपी और बिहार आते हैं. लेकिन राज ठाकरे जैसी संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों के दिमाग में यह बात आसानी से नहीं आएगी. राज ठाकरे ने यह ऐलान किया था कि वो किसी भी उत्तर भारतीय को महाराष्ट्र में नहीं घुसने देंगे तो फिर उन्होंने कमांडो से उनकी जात-पात जाने बगैर मुंबई में कैसे उतरने दिया. राज को चाहिए था कि वो पहले उत्तर भारतीय कमांडो की पहचान करते, फिर उनके साथ भी वैसा ही सुलूक करते जैसा वो आमजन के साथ करते आए हैं. लेकिन राज ने ऐसा कुछ नहीं किया. दरअसल राज जैसे लोग कुछ करने के काबिल भी नहीं हैं. वैमनस्य फैलाते-फैलाते वह खुद ऐसी गंदी दीवार में परिवर्तित हो गये हैं जिस पर थूकना भी कोई पसंद नहीं करता. मुंबई भले ही आज आतंकी हमले को लेकर चर्चा में है, पूरा देश मारे गये लोगों के गम में सिसकियां भर रहा है लेकिन कुछ वक्त पहले तक मुंबई अपनी नपुंसकता छिपाने के लिए मर्दानगी का भौंडा प्रदर्शन करने वाले राज ठाकरे की ज्यादतियों को लेकर सुर्खियों में थी. राज के पालतू , लोगों को बीच सड़क पर मार रहे थे, सरकारी संपत्ति को स्वाहा कर रहे थे और सरकार कह रही थी कि बच्चा बस थोड़ा सा बिगड़ गया है.

राज डंके की चोट पर चुन-चुनकर निर्दोष उत्तर भारतीयों पर हमले कर रहे थे लेकिन राज्य सरकार खामोश थी और केंद्र सरकार को इस ओर देखना भी मंजूर नहीं था. राजनीतिक अकर्मण्यता और खुद को बचाने की राजनीति के चलते ही राज जैसे लोगों का हौसला आज बुलंदी पर है. वरना क्या मजाल की एक अदना सा बौराया हुआ युवक 100-200 निठल्लों को लेकर पूरी सरकारी मिशनरी को जाम करने की हिम्मत दिखा सके. आज हालात यह हो गये हैं कि मुंबई में बसने वाला जो गैरमराठी कभी अपनेपन के साथ समुद्र के किनारे, सड़कों पर बेखौफ होकर टहला करता था वो आज घर से बाहर निकलने में भी घबराने लगा है. सबसे अजीब बात तो यह है कि राज के इस असभ्य तौर-तरीके पर राजनीतिक वर्ग के साथ-साथ सभ्य समाज भी मौन धारण किए हुए है. शायद सभी राज के लिए इस कहावत को चरितार्थ करते हैं कि पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर नहीं किया जाता.

वैसे ऐसा नहीं है कि केवल राज ठाकरे ही क्षेत्रवाद और जात-पात के नाम पर घिनौना खेल खेलने में लगे हैं या मुंबई ही अकेली इस आग में जल रही है. असम भी कुछ ऐसी ही स्थिति से गुजर रहा है और तमिलनाडु भी ऐसी लपटों से झुलस चुका है. मुंबई में करीब 40 साल पहले बाल ठाकरे ने भी मराठी माणुस का पत्ता खेलकर नफरत की सियासत से अपना घर सींचने की कोशिश की थी. उनकी बनाई शिवसेना ने हर वो काम किया था जो देश की एकता और अखंडता पर चोट करने वाला था. बस फर्क सिर्फ इतना था कि उस वक्त उनके निशाने पर दक्षिण भारतीय थे और आज उनके भतीजे के निशाने पर उत्तर भारतीय. 2006 में राज ने जब चाचा का दामन छोड़ा था तो बाल ठाकरे ने उन्हें बिना पतवार की नाव करार दिया था लेकिन आज राज उनसे आगे निकलने की होड़ में लगे और काफी हद तक निकल भी गये हैं. राज को मराठियों का काफी हद तक समर्थन मिल रहा है. पढ़े-लिखे लोग हालांकि राज के हिंसात्मक रवैये की निंदा जरूर कर रहे हैं मगर सिध्दांतत: वो राज से सहमत हैं. वो कहीं न कहीं समझते हैं कि बाहरी लोगों के आने से उनके अधिकारों में कटौती हुई है जबकि यह तर्कसंगत नहीं है. महाराष्ट्र में अब भी सबसे ज्यादा नौकरियां मराठियों के पास हैं.

हाल ही में सार्वजनिक हुई एक रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि की गई है. लेकिन राज को ऐसी रिपोर्टों से कोई मतलब नहीं उन्हें मतलब है तो केवल इस बात से कि कैसे चुनाव से पहले मराठी वोट बैंक को अपने पक्ष में किया जाए, कैसे बाल ठाकरे को नीचा दिखाया जाए और कैसे मराठियों का देवता बना जाए. राज जो भी कर रहे हैं उसका गुस्सा कई बार देश के अन्य राज्यों में दिखलाई पड़ चुका है. गैर-मराठी मराठियों से नफरत करने लगे हैं, उन्हें अपना दुश्मन समझने लगे हैं. बिहार में जब मराठी पर्यटकों को पुलिस सुरक्षा में सीमा से बाहर तक छोड़ा गया, उनसे हिंदी में बात करने को कहा गया, पारंपरिक वेशभूषा न पहनने की हिदायत दी गई तो समझ आ जाना चाहिए कि नफरत अब महाराष्ट्र तक ही सीमित नहीं रही. लोग राज से ज्यादा राज्य सरकार से खफा हैं. उन्हें लग रहा है कि सरकार खुद गैरमराठियों को बाहर करवाना चाहती है, इसलिए राज के खिलाफ कदम नहीं उठाए जा रहे हैं. उन पर केवल मामूली धाराएं लगाई जा रही हैं, ताकि आसानी से उन्हें बेल मिल जाए.

राज जब गिरफ्तार किए जाते हैं तो किसी अपराधी की तरह नहीं बल्कि किसी महाराजा की तरह जिनके साथ सैकड़ों सैनिक चल रहे होते हैं. अदालत से बाहर निकलने पर उनका बर्ताव किसी राजा से कम नहीं होता, पुलिस अधिकारी खुद उनकी कार का दरवाजा खोलते हैं, उन्हें सुलूट मारते हैं. यह सुनिश्चित करते हैं कि उन्हें कोई असुविधा न हो. पूरा सरकारी तंत्र राज के इर्द-गिर्द दिखाई पड़ता है ऐसे में उत्तर भारतीयों की आवाज किस को सुनाई दे सकती है. मुंबई हमले के तुरंत बाद एक हिंदीभाषी पत्रकार को इतना मारना कि उसकी टांग टूट जाए, रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोटें आ जाएं, खून रोकने के लिए कई टांके लगाने पड़ें तो राज के मानसिक दिवालिएपन का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकात है. राज भले ही तीन दिनों तक चूहा बने किसी बलि में छिपे रहे मगर अब फिर वो पागल कुत्ते की तरह गैरमराठियों को काटेंगे, सरकारी बाशिंदे फिर उन्हें पुचकारेंगे और फिर मुंबई नफरत की हिंसा में सुर्खियों बटोरती रहेगी.
नीरज नैयर
9893121591

हमने अमेरिका से कुछ क्यों नहीं सीखा

नीरज नैयर
मुंबई में जो कुछ भी हुआ उसे कभी नहीं भुलाया जा सकता. आतंकवादी समुद्र के रास्ते प्रवेश करते हैं, सड़कों पर अंधाधुंध गोलियां चलाते हैं, धमाके करते हैं. स्टेशन पर, अस्पताल में कहर बरपाते हैं और आसानी से ताज-ओबरॉय और नरीमन हाउस पर कब्जा कर लेते हैं और किसी को कानोंकान खबर भी नहीं होती. कहते हैं मुंबई कभी थमती नहीं, लेकिन गुरुवार 27 नवंबर को मुंबई थमी-थमी नजर आई. स्कूल-कॉलेज पूरी तरह बंद रहे, सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहा. लोग अपनों की खैरियत की दुआएं करते रहे. तीन दिन तक आतंकवादी खूनी खेल खेलते रहे और सरकार शब्दों की आड़ में अपनी नपुंसकता छुपाने की कोशिश करती रही.

दिल्ली धमाकों के बाद से ही ऐसी आशंका जताई जा रही थी कि आतंकी मुंबई को निशाना बना सकते हैं बावजूद इसके लापरवाही बरती गई. गृहमंत्री कपड़ों की चमकार में उलझे रहे और खुफिया एजेंसियां खामोशी की चादर ताने सोती रहीं. इस वीभत्स हमले ने मुंबई पुलिस और स्थानीय खुफिया तंत्र की मर्दानगी की हकीकत भी सामने ला दी है. कहा जा रहा है कि आतंकवादी करीब दो महीने तक नरीमन हाउस इलाके में रहकर अपनी तैयारियों को अंजाम देते रहे मगर तेज तर्रार कही जाने वाले एटीएस और हमेशा सजग रहने का दावा करने वाली पुलिस को पता ही नहीं चला. और तो और पुलिस को कोलाबा-कफरोड़ के मच्छी नगर समुद्र तट पर अंजान लोगों की मौजूदगी की खबर भी दी गई, लेकिन नाकारान यहां भी हावी रहा. अगर पुलिस उस खबर को गंभीरता से लेती तो शायद तस्वीर इतनी खौफनाक नहीं होती. मुंबई पर हमला देश पर सबसे बड़ा हमला है. आतंकियों ने गुपचुप बम धमाके करके कायरता नहीं दिखाई बल्कि सामने आकर फिल्मी अंदाज में नापाक इरादों को अंजाम दिया. यह अपने आप में एक बहुत बड़ा सवाल है कि आखिर आतंकी इतने बड़े हमले की साजिश के लिए साजो-सामान कैसे जुटाते रहे, इसे स्थानीय तंत्र की विफलता के साथ-साथ कहीं न कहीं इससे उसकी संलिप्तता के तौर पर भी देखा जाना चाहिए.

सरकार को अब यह स्वाकीर कर लेना चाहिए कि न तो उनका गृहमंत्री किसी काम का है और न ही इतना लंबा-चौड़ा खुफिया तंत्र. सितंबर में दिल्ली के हुए बम धमाकों के बाद कैबिनेट की विशेष बैठक में पाटिल ने खुफिया तंत्र को मजबूत करने के लिए एक विशेष योजना पेश की थी पर शायद उस पर काम करना उन्होंने मुनासिब नहीं समझा. पिछले तीन सालों में विभिन्न आतंकी घटनाओं में तीन हजार निर्दोष लोग मारे जा चुके हैं और करीब 1185 सुरक्षा जवान शहीद हो चुके हैं लेकिन अब तक कोई ऐसी रणनीति नहीं बनाई गई जो आतंक फैलाने वालों को माकूल जवाब दे सके. भारत में दुनिया भर के मुकाबले खुफिया सूचनाएं जुटाने वाली सबसे ज्यादा एजेंसियां मौजूद हैं इसके बाद भी आतंकी अपनी मनमर्जी के मुताबिक मासूमों की बलि चढ़ा रहे हैं. जयपुर, बेंगलुरू, अहमदाबाद, सूरत, दिल्ली, असम और अब मुंबई में जेहादी आतंकवाद का जो खौफजदा मंजर देखने को मिला है, उसके बाद देश को चलाने और आतंकवाद पर सियासत करने वालों के सिर शर्म से झुक जाने चाहिए. अमेरिका से परमाणु करार पर जश् मनाने वालों को इस बात पर भी गौर करना चाहिए था कि आखिर अमेरिका में 911 के बाद कोई आतंकी हमला क्यों नहीं हुआ. जबकि इस्लामी कट्टरपंथ में भारत से ज्यादा अमेरिका के दुश्मन शुमार हैं. अमेरिका ओसामा बिन लादेन के निशाने पर है बावजूद इसके वहां के बाशिंदे इस इत्मिनान के साथ सोते हैं कि 911 की पुनरावृत्ति नहीं होगी. ऐसा इसलिए क्योंकि वहां पर आतंकवाद के नाम पर सियासत के बजाय आतंकवादियों को सिसकियां भरने पर मजबूर करने की रणनीति पर काम किया जाता है. वहां राष्ट्रीय सुरक्षा को धर्म और संप्रदाय, समुदाय के नजरिये से नहीं देखा जाता. 911 के बाद आतंकवाद से लड़ाई के लिए अमेरिका ने खास रणनीति बनाई थी, जिसमें फौजी हमले के साथ-साथ आतंकवादियों के धन स्त्रोत को सुखाना प्रमुख था. हालांकि फौज कार्रवाई को लेकर उसे आलोचना का सामना करना पड़ा था.

इसके साथ ही खुफिया संस्थाओं सीआईए और एफबीआई को ज्यादा अधिकार दिए गये. आंतरिक और सीमा सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय खुफिया निदेशक का एक पद निर्मित किया गया, जिसका काम सभी खुफिया एजेंसियों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर निकाले गए निष्कर्ष से राष्ट्रपति को अवगत कराना है. नेशनल काउंटर-टेररिम सेंटर नाम की एक राष्ट्रीय संस्था खड़ी की गई, जिसका काम सभी खुफिया सूचनाओं की लगातार स्कैनिंग करके काम की सूचनाओं को क्रमबध्द रूप देना है. डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्युरिटी नाम से बाकायदा आंतरिक सुरक्षा मंत्रालय खड़ा किया गया, जिसका काम सभी रायों की पुलिस और कोस्टल गार्ड के बीच तालमेल बिठाना है. अमेरिका में भी यह काम आसान नहीं था लेकिन वहां की सरकार ने आतंकवाद को कुचलने की प्रतिबध्ता पर किसी को हावी नहीं होने दिया. हमारे यहां सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्यों पर है, केंद्र और राज्यों में अलग-अलग सरकार होने की वजह से आतंकवाद पर भी सियासत में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती. ऊपर से खुफिया एजेंसियां भी एक दूसरे को तवाो देने की आदत अब तक नहीं सीख पाई हैं. रॉ की सूचना को आईबी तवाो नहीं देती और आईबी की सूचना को राज्य के खुफिया तंत्र हवा में उड़ा देते हैं.

आतंकवादियों के वित्तीय स्त्रोतों को सुखाने की दिशा में भी कोई खास काम नहीं किया गया है. कुछ वक्त पहले ही खबर आई थी कि शेयर बाजार में आतंकवादियों का पैसा लगा है. बावजूद इसके सरकार ना-नुकुर करती रही मगर पर्याप्त कदम नहीं उठाए गये और अब आतंकवाद का मुंह-तोड़ जवाब देने की बातें कही जा रही हैं. कहा जा रहा है कि आतंकवादी भारत के हौसले को नहीं डिगा पाएंगे. ऑपरेशन पूरा होने पर जय-जयकार के नारे लगाए जा रहे हैं. खुशियां मनाई जा रही हैं लेकिन इस बात का भरोसा नहीं दिलाया जा रहा है कि अब ऐसे हमले नहीं होंगे. साफ है कि सरकार महज कुछ दिनों की जुबानी कसरत की अपनी आदत को दोहरा रही है.
नीरज नैयर
9893121591

Friday, November 28, 2008

आम जनता को नहीं मिला चुनावी तोहफा


नीरज नैयर
चुनावी समर में वादे, घोषणाएं और सौगातों की बरसात न हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता. सत्तासीन सरकार की दरयादिली चुनाव के वक्त ही नजर आती है. किसानों के कर्ज माफी, वेतन आयोग की सिफारिशों को मंजूरी और अभी हाल ही में सरकारी उपक्रमों के कर्मचारियों के वेतन में भारी-भरकम वृद्धि केंद्र सरकार की पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव और आने वाले लोकसभा चुनाव में हित साधने की कवायद का ही हिस्सा है. लेकिन इस कवायद में आम जनता की अनदेखी का सिलसिला भी बदस्तूर जारी है.

महंगाई के आंकड़े खुद ब खुद राजनीति के शिकार होने की दास्तां बयां कर रहे हैं. जो मुद्रास्फीति चांद के पार जाने को आमादा थी वो चुनाव आते ही यकायक पाताल की तरफ कैसे जाने लगी यह सोचने का विषय है. वैसे सोचने का विषय न भी होता अगर बढ़े हुए दाम भी महंगाई दर के साथ नीचे आ जाते, पर अफसोस की ऐसा कुछ होता दिखाई नहीं दे रहा. अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में लगी आग और कंपनियों को हो रहे वित्तीय घाटे का हवाला देते हुए केंद्र सरकार कई बार पेट्रोल-डीजल के दामों में अप्रत्याशित वृद्धि कर चुकी है. लेकिन अब जब कच्चा तेल 45 डॉलर प्रति बैरल पर सिमट गया है तब भी सरकार मूल्यों में कमी करके जनता के भार को हल्का करने की जहमत नहीं उठा रही. जब सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह स्वयं कह चुके हैं कि दाम नहीं घटेंगे तो फिर आम जनता को अपने चुनावी तोहफे की बांट जोहना छोड़ देना चाहिए. इसी साल 11 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में कच्चे तेल की कीमत 147.27 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई थी, इसके बाद सरकार ने मजबूरी प्रकट करते हुए पेट्रोल-डीजल के मूल्यों में बढ़ोतरी का ऐलान किया था. सरकार ने तर्क दिया गया था कि घाटा इतना बढ़ गया है कि कीमतें थाम पाना असंभव है. सरकार की योजना तो मार्च 2009 तक हर महीने पेट्रोल की कीमत में प्रति लीटर ढाई रुपये और डीजल में 2010 तक 75 पैसे वृध्दि की थी मगर वो उसमें सफल नहीं हो पाई.

बीच में भी जब तेल की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 65 डॉलर प्रति बैरल के नीचे पहुंच गई तब भी दाम घटाने की खबरों का सरकार ने खंडन किया था. तब कहा गया कि अभी पुराना घाटा ही पूरा किया जा सका है. यह भी कहा गया था कि तेल कंपनियां वास्तविक लाभ की स्थिति में तब आएंगी, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत 60 डॉलर पर पहुंच जाएगी, लेकिन अब तो कच्चा तेल सरकार द्वारा बताई गई कीमत से काफी नीचे आ गया है लेकिन केंद्र को अब भी परेशानी हो रही है. सरकार को डर है कि तेल की कीमत में फिर उछाल आ सकता है जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में माना जा रहा है कि आने वाले दिनों मे कीमतें और नीचे जाएंगी. दुनिया भर में छाई आर्थिक मंदी से पूर्व यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि कच्चे तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं. लेकिन मौजूदा दौर में ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता. अमेरिका और यूरोपीय बाजारों में आर्थिक मंदी के चलते तेल की मांग घटने से ही कीमतों में गिरावट का रुख है और तेल उत्पाद देश पहले ही उत्पादन बढ़ा चुके हैं. दुनिया भर के तमाम विशेषज्ञ भी कह चुके हैं कि हाल-फिलहाल मंदी के महमानव से छुटकारा नहीं मिलने वाला ऐसे में तेल की कीमतों में इजाफा होने की बात बेमानी है.

दरअसल सरकार का सारा ध्यान इस बात लोक-लुभावन घोषणाएं करके अपने पक्ष में माहौल बनाने पर है. इसलिए उसने विधानसभा चुनावों से ऐन पहले सरकारी उपक्रमों के कर्मचारियों के वेतनमानों में 300 फीसदी तक की बढाेतरी की है. तेल की राजनीति हमारे देश में शुरू से ही होती रही है. एनडीए सरकार के कार्यकाल में भी कीमतों के घोड़े खूब दौड़ाए गये थे लेकिन गनीमत यह रहती थी कि सरकार ने रोलबैक का प्रावधान भी खोल रखा था. ममता बनर्जी के तीखे विरोध के बाद अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को एक बार कदम कुछ वापस खींचने पड़े थे. सरकारें हमेशा तेल पर नुकसान का रोना रोती रहती हैं जबकि कहा जा रहा है कि एक लीटर पेट्रोल में उसे दस रुपये से ज्यादा का मुनाफा होता है. टैक्स की मार भी हमारे देश में सबसे ज्यादा है जिसके चलते तेल उत्पादों की कीमतें अन्य देशों के मुकाबले ऊंची रहती हैं. मौजूदा हालात में जहां चीन ने पेट्रोल-डीजल कीमतों में कुछ कमी कर दी हमारी सरकार अत्याधिक मुनाफा कमाकर अपने चुनावी हित साधने में लगी है.
नीरज नैयर
9893121591

Monday, November 24, 2008

श्रीलंका पर भारत की सोच सही

नीरज नैयर
श्रीलंका में लिट्टे के खिलाफ चल रहे अभियान का व्यापक असर देखने को मिल रहा है. लिट्टे अपने ही गढ़ में घिरते जा रहे हैं और श्रीलंकाई सेना उन्हें ढूढ़-ढूढ़कर मौत के घाट रही है. काफी वक्त के बाद किसी लंकाई राष्ट्रपति ने इस हद तक जाने की चेष्टा दिखाई है. महिंद्र राजपक्षे के कार्यकाल में लिट्टे के खिलाफ छेड़ा गया यह अब तक का सबसे बड़ा अभियान है. राजपक्षे लिट्टे के सफाए को दृढं संकल्पित नजर आ रहे हैं जो अमूमन अशांत रहने वाले श्रीलंका के लिए शुभ संकेत है. भारत सरकार भी लिट्टे के खात्मे को सही मान रही है इसलिए अपने सहयोगी दलों के हो-हल्ले के बाद भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने महेंद्र राजपक्षे से महज इतना भर कहा कि तमिलों की सुरक्षा का ख्याल रखा जाए. उन्होंने संघंर्ष वीराम जैसी कोई शर्त श्रीलंका पर थोपने की कोशिश नहीं की. इसमें कोई शक-शुबहा नहीं कि लिट्टे भारत में भी आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देता रहा है और उसने ही पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या की साजिश रची थी. ऐसे में दम तोड़ रहे लिट्टे के खिलाफ किसी तरह की नरमी सरकार की छवि को प्रभावित कर सकती थी. लेकिन मनमोहन सिंह ने बड़ी सूझबूझ के साथ काम लिया.
एक तरफ वो द्रमुक आदि दलों की मांग को श्रीलंका सरकार के सामने रखकर उन्हें यह समझाने में सफल रहे कि हम भी आप की चिंता से चिंतित हैं वहीं दूसरी तरफ लंकाई सेना के अभियान पर कोई कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त न करके उन्होंने यह भी जता दिया कि भारत श्रीलंका के साथ है. तमिलनाडु के राजनीतिक दल शुरू से ही यह समझते रहे हैं कि लिट्टे से जुड़े तमिल उनके भाई बंधू हैं, इसलिए लिट्टे के पक्ष में वहां से तरह-तरह की खबरें सामने आती रहती हैं. अभी हाल ही में लिट्टे के समर्थन को लेकर प्रमुख राजनीतिक दल के नेता को हिरासत में भी लिया गया था. कुछ राजनीतिक पार्टियां जैसे पीएमके, टीएनएम, दलित पैंथर्स आफ इंडिया ने भारत सरकार और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से पृथक तमिल राष्ट्र बनाने में मदद करने का अनुरोध भी किया था. इन सियासी दलों का यह मानना है कि श्रीलंकाई सेना निर्दोष तमिलों को मार रही है जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है. हां इतना जरूर है कि तमिल बहुसंख्य वाले इलाकों में चल रहे युद्व के कारण लाखों तमिल शरणार्थी का जीवन जीने को मजबूर हैं. लेकिन इसे गलत नजरीए से नहीं देखा जा सकता. पंजाब में आतंकवाद का सफाया करने के लिए सुपरकॉप केपीएस गिल ने जिस तरह की रणनीति अपर्नाई थी उसे लेकर भी काफी आलोचना हुई थी मगर अंजाम आज सबके सामने है. लिट्टे श्रीलंका के लिए ऐसी समस्या बन गये हैं जिसने वर्षों तक देश को आगे नहीं बढ़ने दिया.
गृहयुद्व की स्थिति के चलते न तो आर्थिक मोर्चे पर श्रीलंका को कोई खास सफलता हासिल हुई और न ही विश्व मंच पर वो अपनी दमदार पहचान बना पाया. उल्टा उसे कई बार वैश्विक समुदाय के दबाब का सामना जरूर करना पड़ा. हर रोज चलने वाले युद्व की वजह से वहां हालात यह हो गये हैं कि मुद्रास्फीति की दर 25 फीसदी की रफ्तार कायम किए हुए है. कुछ वक्त पहले श्रीलंका क्रिकेट र्बोर्ड ने भारतीय क्रिकेट बोर्ड से आर्थिक सहायता की मांग भी की थी. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि श्रीलंका में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है. लंकाई सरकार को हर साल लिट्टे से संघर्ष के लिए एक मोटी रकम खर्च करनी पड़ रही है. जिसकी वजह से देश की अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है. 2002 में लिट्टे और सरकार के बीच हुए संघर्ष वीराम के बाद काफी हद तक स्थिति संभलती नजर आ रही थी लेकिन जल्द ही सबकुछ हवा हो गया. श्रीलंका में अलग तमिल राष्ट्र बनाने की मांग और विवाद का सिलसिला काफी पुराना है. श्रीलंका की आजादी से पूर्व जब अंग्रेजों ने चाय और कॉफी की खेते के लिए तमिलों को यह बसाना शुरू किया तो सिंहलों के मन यह डर घर करने लगा कि कहीं उन्हें अपने ही देश में अल्पसंख्यक न बना दिया जाए. श्रीलंका में सिंहल आबादी तमिलों की अपेक्षाकृत अधिक है. इसलिए उनका विरोध भी प्रभावशाली रहा. 1948 में श्रीलंका की आजादी के बाद सत्ता सिंहला समुदाय के हाथ आई और उसने सिंहला हितों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया. सिंहला भाषा को देश की राष्ट्रीय भाषा बनाया गया, नौकरियों में सबसे अच्छे पद सिंहला आबादी के लिए आरक्षित किए गये. 1972 में श्रीलंका में बौद्व धर्म को देश का प्राथमिक धर्म घोषित करने के साथ ही विश्वविद्यायलों में तमिलों के लिए सीटें घटा दी गई.
अपने खिलाफ हो रहे सौतेले बर्ताव से तमिलों को धैर्य जवाब देने लगा और उन्होंने देश के उत्तर एवं पूर्वी हिस्सों में स्वायत्तता की मांग करनी शुरू कर दी. इसके बाद दोनों तरफ से खूनी संघर्ष का दौर शुरू हुआ. जिसने 1976 में लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल इलम (लिट्टे) को जन्म दिया. 1977 में सत्ता में आए जूनियस रिचर्ड जयवर्धने ने मामले को संभालने की काफी कोशिश की. उन्होंने तमिल क्षेत्रों में तमिल भाषा को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया, स्थानीय सरकारों में तमिलों को ज्यादा अधिकार दिए लेकिन सारे प्रयास नाकाफी साबित हुए. बात उस वक्त और बिगड़ गई जब 1983 में लिट्टे ने सेना के एक गश्ती दल पर हमला कर 13 सैनिकों को मार डाला. इसके बाद सिंहला उग्र हो गये और उन्होंने अगले दो दिनों तक जमकर हमले किए जिसमें हजारों तमिलों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. इसके बाद जब हालात हद से ज्यादा बेकाबू हो गये तो 1987 में श्रीलंका ने भारत के साथ समझौता किया जिसके तहत उत्तरी इलाकों में भारतीय शांति सेना कानून व्यवस्था पर नजर रखेगी. भारतीय सेना की मौजूदगी में लिट्टे संघर्ष वीराम के लिए तैयार हो गये थे लेकिन उसके एक गुट स्वतंत्र राष्ट्र की मांग दोबारा उठाकर मामले को फिर भड़का दिया. 1990 में शांति सेना वापस लौटी और 1991 में लिट्टे ने राजीव गांधी की हत्या करके भारतीय हस्तक्षेप का बदला निकाल लिया. इसके बाद 1993 में लिट्टे के अलगाववादियों ने श्रीलंका के राष्ट्रपति प्रेमदासा की भी हत्या कर डाली. चंद्रिका कुमारतुंगे के शासनकाल में भी इस समस्या के निपटारे के लिए बहुतरे प्रयत्न किए गये मगर कोई सार्थक परिणाम निकलकर सामने नहीं आए.
1995 में लिट्टे के संघर्ष वीराम का उल्लंधन करने के बाद सेना ने उसके खिलाफ कार्रवाई और तेज कर दी और मामला बढ़ता गया. इतने सालों तक खून की होली खेलने वाले लिट्टे के सफाए के लिए श्रीलंका सरकार अभियान चला रही है तो द्रमुक जैसी पार्टियों के पेट में दर्द हो रहा है, उन्हें लग रहा है कि भारत इस मामले में वैसा विरोध क्यों नहीं दर्ज करा रहा जैसा उसने बांग्लादेश और मालदीप में कि या था. लिट्टे कहते हैं कि उन्हें तमिलों का समर्थन प्राप्त है अगर ऐसा है तो उन्हें बंदूक छोड़कर चुनावी मैदान में उतरना चाहिए. अगर उन्हें अपनी जीत का भरोसा है तो फिर वो ऐसा करने से डर क्यों रहे हैं. यह बात सही है कि यह विवाद भी भेदभाव और पक्षपातपूर्ण सोच के कारण ही उबरा मगर आज इसने विकृत रूप अख्तियार कर लिया है, इसलिए सहानभूति, नरमी और तरस जैसे शब्दों के साथ इसे नहीं तोला जा सकता. समस्या के निपटारे के लिए श्रीलंका सरकार द्वारा जो रणनीति अपनाई जा रही है वो उसका आंतरिक मामला है और उसमें किसी भी तरह की दखलंदाजी की गुंदाइश नहीं है.
नीरज नैयर
9893121591

Monday, November 17, 2008

भारत की परेशानी बढ़ाएंगे ओबामा!

जार्ज डब्लू बुश के उत्तराधिकारी के रूप में बराक हुसैन ओबामा की ताजपोशी के बाद अब अमेरिका से भावी संबंधों को लेकर आकलन शुरू हो गया है. पिछले कुछ सालों में भारत-अमेरिका एक दूसरे के काफी करीब आए हैं. खासकर परमाणु करार ने दोनों देशों के बीच की दूरी पाटने में अहम किरदार निभाया है जिस तरह से बुश प्रसाान ने पाकिस्तान को एकतरफा मदद देने की आदत को छोड़कर भारत से द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने का प्रयास किया ठीक वैसी ही आशा ओबामा से की जा रही है. महात्मा गांधी के प्रशंसक और हनुमान भक्त की अपनी छवि के चलते ओबामा न केवल भारतीय अमेरिकी बल्कि भारत में रहने वाले लोगों के दिल में भी रच-बस गये हैं. भारतीय मीडिया ने भी उन्हें सिर-आंखों पर बैठाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. उन्हें हमेशा मैक्केन के मुकाबले तवाो दी गई. उनके कथनों को प्रमुखता से प्रकशित किया गया. कुछ वक्त के लिए तो ऐसा लगा जैसे या तो हम अमेरिकी हो गये हैं या फिा ओबामा भारतीय राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे हैं. डेमोक्रेट से उम्मीदवारी तय होने से लेकर व्हाइट हाउस के सफर तक उन्हें एक नायक के रूप में पेश किया गया. लिहाजा अब उनसे अपेक्षाएं भी बड़ी-बड़ी की जा रही हैं.

भारतीय यह मानकर चल रहे हैं कि संबंधों में मधुरता की दिशा में जो थोड़ी बहुत कसर बुश के कार्यकाल में रह गई थी उसे ओबामा पूरा कर देंगे. लेकिन अंकल सैम की विदाई को लेकर दिल्ली में जो मायूसी दिखाई दे रही है उससे साफ है कि ओबामा के साथ बेहतर भविष्य को लेकर भारतीय नेतृत्व भी कहीं न कहीं आशंकित है. भारत-अमेरिका परमाणु करार को लेकर जिस तरह का रुख ओबामा ने अपनाया था उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. ओबामा ने खुलकर भारत को छूट देने की मुखालफत की थी. इसलिए अब यह देखने वाली बात होगी कि वो करार पर नये सिरे से क्या रुख अख्तियार करते हैं. वैसे ऐसी भी आशंका जताई जा रही है कि ओबामा भारत को न्यूक्लियर टेस्ट बैन ट्रीट्री पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य कर सकते हैं. उस स्थिति में करार पर प्रश्चिन्ह लग जाएगा और भारत को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ेगा. इसके साथ ही कश्मीर पर ओबामा ने पूर्व में जो संकेत दिए थे अगर वो उस पर कायम रहते हैं तो निश्चित ही भारत के लिए परेशानी खड़ी कर सकते हैं. बराक ओबामा ने मतदान से कुछ दिन पूर्व कहा था कि हमें कश्मीर समस्या के समाधान की दिशा में कोशिश करनी चाहिए, इससे पाकिस्तान की चिंता भारत की तरफ से हट जाएगी और वह आतंकवादियों पर ध्यान केंद्रित कर सकेगा. जुलाई 2007 में विदेश नीति पर लिखे अपने लेख में ओबामा ने कहा था कि हम कश्मीर इश्यू को सुलझाने में भारत और पाकिस्तान के बीच वार्ता को प्रोत्साहित करेंगे. ओबामा ने यह भी कहा था कि वो पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को कश्मीर विवाद के निपटारे के लिए विशेष दूत बनाकर भेजेंगे. भारत शुरू से ही कश्मीर को द्विपक्षीय मुद्दा बताता रहा है. उसे न तो किसी का दखलंदाजी वाला रवैया पसंद है और न ही वो पसंद करने वाला है. बुश के कार्यकाल में भी जब जनमत संग्रह जैसी बातें उठी थी तो भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी. लिहाजा दोनों देशों के रिश्तों में काफी कुछ इसबात पर निर्भर करेगा कि ओबामा कश्मीर को कितनी तवाो देते हैं.

वैसे ओबामा के एजेंडे में इस वक्त ईरान, इराक, पाकिस्तान और अफगानिस्तान मुख्य रूप से शामिल हैं. ओबामा ईरान से चल रही तनातनी को जल्द खत्म करना चाहेंगे. बुश के साथ ईरान के संबंध किस कदर बिगड़ गये थे यह किसी से छिपा नहीं है. बात युद्ध तक पहुंच गई थी और अगर गर्माहट थोड़ी भी बढ़ जाती तो ईरान को भी इराक बनते देर नहीं लगती. ओबामा इराक में तैनात अमेरिकी सैनिकों की दशा पर पहले ही चिंता जता चुके हैं. ऐसे में उनकी कोशिश होगी कि इराक को वहां के हुक्मरानों के हवाले करके सेना को उस नरकीय जिंदगी से बाहर निकाला जाए. इसके बाद ओबामा पाकिस्तान और अफगानिस्तान से रिश्ते दुरुस्त करने की तरफ आगे बढ़ेंगे. पाकिस्तान से भी अमेरिका के रिश्ते पिछले कुछ वक्त से ठीक नहीं चल रहे हैं. आतंकवादियों पर पाक सीमा में घुसकर हमले संबंधी खुलासे के बाद जिस लहजे में पाक प्रधानमंत्री गिलानी ने बयानबाजी की थी उससे दोनों के रिश्तों में और तल्खी आ गई थी. भारत से परमाणु करार से पहले तक पाकिस्तान अमेरिका का विश्वस्त मित्र और सैनिक साजो-सामान का बहुत बड़ा खरीददार रहा है. पाकिस्तानी सेना की करीब 90 प्रतिशत खुराक अमेरिका की पूरी करता रहा है. ऐसे में ओबामा पाक पर पहले जैसी मेहरबानी दिखाएं तो कोई आश्चर्य नहीं होगा. हालांकि अपने चुनाव प्रचार के दौरान ओबामा ने यह कहकर कि पाक आतंकवाद के नाम पर अमेरिका से मिलने वाली रकम को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करता है, यह संकेत दिए थे कि वो पाक के साथ बेवजह नरमी नहीं बरतने वाले लेकिन इसे अमेरिका में रहने वाले भारतीयों को भावनात्मक रूप से प्रभावित कर वोट खींचने की कवायद के रूप में देखना गलत नहीं होगा. ओबामा ने हिलेरी क्लिंटन के साथ उम्मीदवारी पाने के द्वंद्व में यह भी कहा था कि वो आउटसोर्सिंग को अमेरिकी कामगारों के खिलाफ हिंसा मानते हैं क्योंकि इसके जरिए इन लोगों के रोजगार दूसरे देशों को भेजे जा रहे हैं.

गौरतलब है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में आउटसोर्सिंग के चलते कई कंपनियां यहां फली फूलीं. जिसकी वजह से बड़े पैमाने पर रोजगार उपलब्ध हुए हैं. इनमें इफॉम्रमेशन टैक्नोलाजी का सबसे बड़ा हिस्सा है. अब चूंकि ओबामा व्हाइट हाउस की गद्दी पर काबिज हो गये हैं इसलिए हो सकता है कि वो इस बारे में भी कुछ ऐसे कदम उठाएं जो भारत के लिहाज से अच्छे न हों. ओबामा का चुना जाना निश्चित ही अमेरिका के इतिहास में बहुत ही ऐतिहासिक क्षण हैं लेकिन भारत के लिए यह बदलाव खुशियों की बयार लेके आएगा ऐसी उम्मीदें पालना भी बेमानी होगा.
नीरज नैयर
9893121591