Monday, November 24, 2008

श्रीलंका पर भारत की सोच सही

नीरज नैयर
श्रीलंका में लिट्टे के खिलाफ चल रहे अभियान का व्यापक असर देखने को मिल रहा है. लिट्टे अपने ही गढ़ में घिरते जा रहे हैं और श्रीलंकाई सेना उन्हें ढूढ़-ढूढ़कर मौत के घाट रही है. काफी वक्त के बाद किसी लंकाई राष्ट्रपति ने इस हद तक जाने की चेष्टा दिखाई है. महिंद्र राजपक्षे के कार्यकाल में लिट्टे के खिलाफ छेड़ा गया यह अब तक का सबसे बड़ा अभियान है. राजपक्षे लिट्टे के सफाए को दृढं संकल्पित नजर आ रहे हैं जो अमूमन अशांत रहने वाले श्रीलंका के लिए शुभ संकेत है. भारत सरकार भी लिट्टे के खात्मे को सही मान रही है इसलिए अपने सहयोगी दलों के हो-हल्ले के बाद भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने महेंद्र राजपक्षे से महज इतना भर कहा कि तमिलों की सुरक्षा का ख्याल रखा जाए. उन्होंने संघंर्ष वीराम जैसी कोई शर्त श्रीलंका पर थोपने की कोशिश नहीं की. इसमें कोई शक-शुबहा नहीं कि लिट्टे भारत में भी आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देता रहा है और उसने ही पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या की साजिश रची थी. ऐसे में दम तोड़ रहे लिट्टे के खिलाफ किसी तरह की नरमी सरकार की छवि को प्रभावित कर सकती थी. लेकिन मनमोहन सिंह ने बड़ी सूझबूझ के साथ काम लिया.
एक तरफ वो द्रमुक आदि दलों की मांग को श्रीलंका सरकार के सामने रखकर उन्हें यह समझाने में सफल रहे कि हम भी आप की चिंता से चिंतित हैं वहीं दूसरी तरफ लंकाई सेना के अभियान पर कोई कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त न करके उन्होंने यह भी जता दिया कि भारत श्रीलंका के साथ है. तमिलनाडु के राजनीतिक दल शुरू से ही यह समझते रहे हैं कि लिट्टे से जुड़े तमिल उनके भाई बंधू हैं, इसलिए लिट्टे के पक्ष में वहां से तरह-तरह की खबरें सामने आती रहती हैं. अभी हाल ही में लिट्टे के समर्थन को लेकर प्रमुख राजनीतिक दल के नेता को हिरासत में भी लिया गया था. कुछ राजनीतिक पार्टियां जैसे पीएमके, टीएनएम, दलित पैंथर्स आफ इंडिया ने भारत सरकार और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से पृथक तमिल राष्ट्र बनाने में मदद करने का अनुरोध भी किया था. इन सियासी दलों का यह मानना है कि श्रीलंकाई सेना निर्दोष तमिलों को मार रही है जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है. हां इतना जरूर है कि तमिल बहुसंख्य वाले इलाकों में चल रहे युद्व के कारण लाखों तमिल शरणार्थी का जीवन जीने को मजबूर हैं. लेकिन इसे गलत नजरीए से नहीं देखा जा सकता. पंजाब में आतंकवाद का सफाया करने के लिए सुपरकॉप केपीएस गिल ने जिस तरह की रणनीति अपर्नाई थी उसे लेकर भी काफी आलोचना हुई थी मगर अंजाम आज सबके सामने है. लिट्टे श्रीलंका के लिए ऐसी समस्या बन गये हैं जिसने वर्षों तक देश को आगे नहीं बढ़ने दिया.
गृहयुद्व की स्थिति के चलते न तो आर्थिक मोर्चे पर श्रीलंका को कोई खास सफलता हासिल हुई और न ही विश्व मंच पर वो अपनी दमदार पहचान बना पाया. उल्टा उसे कई बार वैश्विक समुदाय के दबाब का सामना जरूर करना पड़ा. हर रोज चलने वाले युद्व की वजह से वहां हालात यह हो गये हैं कि मुद्रास्फीति की दर 25 फीसदी की रफ्तार कायम किए हुए है. कुछ वक्त पहले श्रीलंका क्रिकेट र्बोर्ड ने भारतीय क्रिकेट बोर्ड से आर्थिक सहायता की मांग भी की थी. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि श्रीलंका में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है. लंकाई सरकार को हर साल लिट्टे से संघर्ष के लिए एक मोटी रकम खर्च करनी पड़ रही है. जिसकी वजह से देश की अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है. 2002 में लिट्टे और सरकार के बीच हुए संघर्ष वीराम के बाद काफी हद तक स्थिति संभलती नजर आ रही थी लेकिन जल्द ही सबकुछ हवा हो गया. श्रीलंका में अलग तमिल राष्ट्र बनाने की मांग और विवाद का सिलसिला काफी पुराना है. श्रीलंका की आजादी से पूर्व जब अंग्रेजों ने चाय और कॉफी की खेते के लिए तमिलों को यह बसाना शुरू किया तो सिंहलों के मन यह डर घर करने लगा कि कहीं उन्हें अपने ही देश में अल्पसंख्यक न बना दिया जाए. श्रीलंका में सिंहल आबादी तमिलों की अपेक्षाकृत अधिक है. इसलिए उनका विरोध भी प्रभावशाली रहा. 1948 में श्रीलंका की आजादी के बाद सत्ता सिंहला समुदाय के हाथ आई और उसने सिंहला हितों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया. सिंहला भाषा को देश की राष्ट्रीय भाषा बनाया गया, नौकरियों में सबसे अच्छे पद सिंहला आबादी के लिए आरक्षित किए गये. 1972 में श्रीलंका में बौद्व धर्म को देश का प्राथमिक धर्म घोषित करने के साथ ही विश्वविद्यायलों में तमिलों के लिए सीटें घटा दी गई.
अपने खिलाफ हो रहे सौतेले बर्ताव से तमिलों को धैर्य जवाब देने लगा और उन्होंने देश के उत्तर एवं पूर्वी हिस्सों में स्वायत्तता की मांग करनी शुरू कर दी. इसके बाद दोनों तरफ से खूनी संघर्ष का दौर शुरू हुआ. जिसने 1976 में लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल इलम (लिट्टे) को जन्म दिया. 1977 में सत्ता में आए जूनियस रिचर्ड जयवर्धने ने मामले को संभालने की काफी कोशिश की. उन्होंने तमिल क्षेत्रों में तमिल भाषा को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया, स्थानीय सरकारों में तमिलों को ज्यादा अधिकार दिए लेकिन सारे प्रयास नाकाफी साबित हुए. बात उस वक्त और बिगड़ गई जब 1983 में लिट्टे ने सेना के एक गश्ती दल पर हमला कर 13 सैनिकों को मार डाला. इसके बाद सिंहला उग्र हो गये और उन्होंने अगले दो दिनों तक जमकर हमले किए जिसमें हजारों तमिलों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. इसके बाद जब हालात हद से ज्यादा बेकाबू हो गये तो 1987 में श्रीलंका ने भारत के साथ समझौता किया जिसके तहत उत्तरी इलाकों में भारतीय शांति सेना कानून व्यवस्था पर नजर रखेगी. भारतीय सेना की मौजूदगी में लिट्टे संघर्ष वीराम के लिए तैयार हो गये थे लेकिन उसके एक गुट स्वतंत्र राष्ट्र की मांग दोबारा उठाकर मामले को फिर भड़का दिया. 1990 में शांति सेना वापस लौटी और 1991 में लिट्टे ने राजीव गांधी की हत्या करके भारतीय हस्तक्षेप का बदला निकाल लिया. इसके बाद 1993 में लिट्टे के अलगाववादियों ने श्रीलंका के राष्ट्रपति प्रेमदासा की भी हत्या कर डाली. चंद्रिका कुमारतुंगे के शासनकाल में भी इस समस्या के निपटारे के लिए बहुतरे प्रयत्न किए गये मगर कोई सार्थक परिणाम निकलकर सामने नहीं आए.
1995 में लिट्टे के संघर्ष वीराम का उल्लंधन करने के बाद सेना ने उसके खिलाफ कार्रवाई और तेज कर दी और मामला बढ़ता गया. इतने सालों तक खून की होली खेलने वाले लिट्टे के सफाए के लिए श्रीलंका सरकार अभियान चला रही है तो द्रमुक जैसी पार्टियों के पेट में दर्द हो रहा है, उन्हें लग रहा है कि भारत इस मामले में वैसा विरोध क्यों नहीं दर्ज करा रहा जैसा उसने बांग्लादेश और मालदीप में कि या था. लिट्टे कहते हैं कि उन्हें तमिलों का समर्थन प्राप्त है अगर ऐसा है तो उन्हें बंदूक छोड़कर चुनावी मैदान में उतरना चाहिए. अगर उन्हें अपनी जीत का भरोसा है तो फिर वो ऐसा करने से डर क्यों रहे हैं. यह बात सही है कि यह विवाद भी भेदभाव और पक्षपातपूर्ण सोच के कारण ही उबरा मगर आज इसने विकृत रूप अख्तियार कर लिया है, इसलिए सहानभूति, नरमी और तरस जैसे शब्दों के साथ इसे नहीं तोला जा सकता. समस्या के निपटारे के लिए श्रीलंका सरकार द्वारा जो रणनीति अपनाई जा रही है वो उसका आंतरिक मामला है और उसमें किसी भी तरह की दखलंदाजी की गुंदाइश नहीं है.
नीरज नैयर
9893121591

Monday, November 17, 2008

भारत की परेशानी बढ़ाएंगे ओबामा!

जार्ज डब्लू बुश के उत्तराधिकारी के रूप में बराक हुसैन ओबामा की ताजपोशी के बाद अब अमेरिका से भावी संबंधों को लेकर आकलन शुरू हो गया है. पिछले कुछ सालों में भारत-अमेरिका एक दूसरे के काफी करीब आए हैं. खासकर परमाणु करार ने दोनों देशों के बीच की दूरी पाटने में अहम किरदार निभाया है जिस तरह से बुश प्रसाान ने पाकिस्तान को एकतरफा मदद देने की आदत को छोड़कर भारत से द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने का प्रयास किया ठीक वैसी ही आशा ओबामा से की जा रही है. महात्मा गांधी के प्रशंसक और हनुमान भक्त की अपनी छवि के चलते ओबामा न केवल भारतीय अमेरिकी बल्कि भारत में रहने वाले लोगों के दिल में भी रच-बस गये हैं. भारतीय मीडिया ने भी उन्हें सिर-आंखों पर बैठाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. उन्हें हमेशा मैक्केन के मुकाबले तवाो दी गई. उनके कथनों को प्रमुखता से प्रकशित किया गया. कुछ वक्त के लिए तो ऐसा लगा जैसे या तो हम अमेरिकी हो गये हैं या फिा ओबामा भारतीय राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे हैं. डेमोक्रेट से उम्मीदवारी तय होने से लेकर व्हाइट हाउस के सफर तक उन्हें एक नायक के रूप में पेश किया गया. लिहाजा अब उनसे अपेक्षाएं भी बड़ी-बड़ी की जा रही हैं.

भारतीय यह मानकर चल रहे हैं कि संबंधों में मधुरता की दिशा में जो थोड़ी बहुत कसर बुश के कार्यकाल में रह गई थी उसे ओबामा पूरा कर देंगे. लेकिन अंकल सैम की विदाई को लेकर दिल्ली में जो मायूसी दिखाई दे रही है उससे साफ है कि ओबामा के साथ बेहतर भविष्य को लेकर भारतीय नेतृत्व भी कहीं न कहीं आशंकित है. भारत-अमेरिका परमाणु करार को लेकर जिस तरह का रुख ओबामा ने अपनाया था उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. ओबामा ने खुलकर भारत को छूट देने की मुखालफत की थी. इसलिए अब यह देखने वाली बात होगी कि वो करार पर नये सिरे से क्या रुख अख्तियार करते हैं. वैसे ऐसी भी आशंका जताई जा रही है कि ओबामा भारत को न्यूक्लियर टेस्ट बैन ट्रीट्री पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य कर सकते हैं. उस स्थिति में करार पर प्रश्चिन्ह लग जाएगा और भारत को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ेगा. इसके साथ ही कश्मीर पर ओबामा ने पूर्व में जो संकेत दिए थे अगर वो उस पर कायम रहते हैं तो निश्चित ही भारत के लिए परेशानी खड़ी कर सकते हैं. बराक ओबामा ने मतदान से कुछ दिन पूर्व कहा था कि हमें कश्मीर समस्या के समाधान की दिशा में कोशिश करनी चाहिए, इससे पाकिस्तान की चिंता भारत की तरफ से हट जाएगी और वह आतंकवादियों पर ध्यान केंद्रित कर सकेगा. जुलाई 2007 में विदेश नीति पर लिखे अपने लेख में ओबामा ने कहा था कि हम कश्मीर इश्यू को सुलझाने में भारत और पाकिस्तान के बीच वार्ता को प्रोत्साहित करेंगे. ओबामा ने यह भी कहा था कि वो पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को कश्मीर विवाद के निपटारे के लिए विशेष दूत बनाकर भेजेंगे. भारत शुरू से ही कश्मीर को द्विपक्षीय मुद्दा बताता रहा है. उसे न तो किसी का दखलंदाजी वाला रवैया पसंद है और न ही वो पसंद करने वाला है. बुश के कार्यकाल में भी जब जनमत संग्रह जैसी बातें उठी थी तो भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी. लिहाजा दोनों देशों के रिश्तों में काफी कुछ इसबात पर निर्भर करेगा कि ओबामा कश्मीर को कितनी तवाो देते हैं.

वैसे ओबामा के एजेंडे में इस वक्त ईरान, इराक, पाकिस्तान और अफगानिस्तान मुख्य रूप से शामिल हैं. ओबामा ईरान से चल रही तनातनी को जल्द खत्म करना चाहेंगे. बुश के साथ ईरान के संबंध किस कदर बिगड़ गये थे यह किसी से छिपा नहीं है. बात युद्ध तक पहुंच गई थी और अगर गर्माहट थोड़ी भी बढ़ जाती तो ईरान को भी इराक बनते देर नहीं लगती. ओबामा इराक में तैनात अमेरिकी सैनिकों की दशा पर पहले ही चिंता जता चुके हैं. ऐसे में उनकी कोशिश होगी कि इराक को वहां के हुक्मरानों के हवाले करके सेना को उस नरकीय जिंदगी से बाहर निकाला जाए. इसके बाद ओबामा पाकिस्तान और अफगानिस्तान से रिश्ते दुरुस्त करने की तरफ आगे बढ़ेंगे. पाकिस्तान से भी अमेरिका के रिश्ते पिछले कुछ वक्त से ठीक नहीं चल रहे हैं. आतंकवादियों पर पाक सीमा में घुसकर हमले संबंधी खुलासे के बाद जिस लहजे में पाक प्रधानमंत्री गिलानी ने बयानबाजी की थी उससे दोनों के रिश्तों में और तल्खी आ गई थी. भारत से परमाणु करार से पहले तक पाकिस्तान अमेरिका का विश्वस्त मित्र और सैनिक साजो-सामान का बहुत बड़ा खरीददार रहा है. पाकिस्तानी सेना की करीब 90 प्रतिशत खुराक अमेरिका की पूरी करता रहा है. ऐसे में ओबामा पाक पर पहले जैसी मेहरबानी दिखाएं तो कोई आश्चर्य नहीं होगा. हालांकि अपने चुनाव प्रचार के दौरान ओबामा ने यह कहकर कि पाक आतंकवाद के नाम पर अमेरिका से मिलने वाली रकम को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करता है, यह संकेत दिए थे कि वो पाक के साथ बेवजह नरमी नहीं बरतने वाले लेकिन इसे अमेरिका में रहने वाले भारतीयों को भावनात्मक रूप से प्रभावित कर वोट खींचने की कवायद के रूप में देखना गलत नहीं होगा. ओबामा ने हिलेरी क्लिंटन के साथ उम्मीदवारी पाने के द्वंद्व में यह भी कहा था कि वो आउटसोर्सिंग को अमेरिकी कामगारों के खिलाफ हिंसा मानते हैं क्योंकि इसके जरिए इन लोगों के रोजगार दूसरे देशों को भेजे जा रहे हैं.

गौरतलब है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में आउटसोर्सिंग के चलते कई कंपनियां यहां फली फूलीं. जिसकी वजह से बड़े पैमाने पर रोजगार उपलब्ध हुए हैं. इनमें इफॉम्रमेशन टैक्नोलाजी का सबसे बड़ा हिस्सा है. अब चूंकि ओबामा व्हाइट हाउस की गद्दी पर काबिज हो गये हैं इसलिए हो सकता है कि वो इस बारे में भी कुछ ऐसे कदम उठाएं जो भारत के लिहाज से अच्छे न हों. ओबामा का चुना जाना निश्चित ही अमेरिका के इतिहास में बहुत ही ऐतिहासिक क्षण हैं लेकिन भारत के लिए यह बदलाव खुशियों की बयार लेके आएगा ऐसी उम्मीदें पालना भी बेमानी होगा.
नीरज नैयर
9893121591

Sunday, November 9, 2008

कठघरे में न्यायपालिका

नीरज नैयर
हमें अक्सर खाकी वर्दी की आड़ में रिश्वत लेते हाथ तो नजर आते हैं मगर काले कोट की कालिख कभी नहीं दिखाई देती. अब तक हमें लगता था कि भ्रष्टाचार केवल कुछ सरकारी महकमों और पुलिस तक ही सीमित है लेकिन अब यह अभास होने लगा है कि इसकी पहुंच न्यायपालिक तक भी हो गई है. उत्तर प्रदेश के बहुचर्चित पीएफ घोटाले में जिस तरह से 36 जजों के नाम सामने आए हैं उससे न्यायाधीशों की न्यायिक जवाबदेही तय करने की जरूरत फिर से महसूस होने लगी है.इस मामले में जिन जजों का नाम लिया जा रहा है उनमें इलाहाबाद हाईकोर्ट, उत्तरांचल हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज शामिल हैं. इनमें एक जज उच्चतम न्यायालय, दो उच्च न्यायालयों के 11 जज (जिनमें कुछ सेवा में हैं और कुछ सेवानिवृत हो चुके हैं)और जिला एवं अतिरिक्त जिला जज स्तर के 24 अन्य न्यायाधीश लिप्त बताए जा रहे हैं. इसे देश की न्यायपालिका के इतिहास में भ्रष्टाचार और धोखाधडी क़ा सबसे बड़ा मामला कहा जाए तो कोई अतिशियोक्ति नहीं होगी.

एक साथ इतने सारे जजों की भ्रष्टाचार में संलिप्तता का मामला शायद ही कभी सुनने में आया हो. लंबे समय तक चले इस सुनियोजित भ्रष्टाचार के मामले में कर्मचारी भविष्य निधि यानी पीएफ फंड से फर्जी नामों के सहारे बडी धनराशि निकाली गई और उनके लिए फर्जी खाते भी खुलवाए गये. जहां चैकों का भुगतान किया गया. यह धनराशि गाजियाबाद जिला अदालत के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने बड़े-बड़े जजों को महंगे उपहार और उनके बिलों के भुगतान के लिए निकलवाई थी. वैसे यह कोई अकेला ऐसा मामला नहीं है जिसने न्यायपालिका को खुद कठघरे में खड़ा कर दिया हो, ऐसे मामलों की लंबी चौड़ी फेहरिस्त है. उत्तर प्रदेश के साथ ही कोलकाता, हरियाण एवं पंजाब के कुछ जजों ने जिस तरह से न्याय के मंदिर से नाटों का कारोबार किया उसने न सिर्फ न्यायपालिका की छवि को तार-तार किया है बल्कि न्याय की खातिर अदालत की चौखट तक पहुंचने वालों के मन में डर और संशय कायम करने में भी अहम भूमिका निभाई है. कोलकाता हाईकोर्ट के जज सौमित्र सेन पर जहां महाभियोग चलाने की तैयारी हो रही है वहीं पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की जज निर्मला यादव को न्यायिक कार्यों के दायित्व से मुक्त कर दिया गया है. सेन पर 1993 में कोर्ट के रिसीवर के रूप में भारत इस्पात प्राधिकरण्र और भारत जहाजरानी निगम के बीच फायरब्रिक्स से जुड़े मामले के मुकदमें में 32 लाख रुपए की रिश्वत का आरोप है. ऐसे ही निर्मला यादव भी 15 लाख की रिश्वत के केस में उलझी हुई हैं.

भले ही दोनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए हों मगर न्यायपालिका में इस कदर बढ़ते भ्रष्टाचार ने इस बहस को जन्म दिया है कि क्या जजों को कानूनी संरक्षण देना जायज है. न्यायाधीश अपने द्वारा बनाई गई चार दीवारी के भीतर भ्रष्टाचार का हिस्सा बनने का साहस इसलिए जुटा पाते हैं क्योंकि वो जानते हैं कि तमाम कानूनी झंझावत और अवमानना की ढाल के सहारे वो बड़ी से बड़ी लड़ाई जीत सकते हैं. पीफए घोटाले में गाजियाबाद कोर्ट के नजीर आशुतोष अस्थाना के 36 जजों के नाम गिनाए जाने के बाद भी आला पुलिस अधिकारी जजों से पूछताछ को लेकर बगले झांकते रहे. दरअसल किसी भी जज के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने से पहले सर्वोच्च न्यायालय की अनुमति लेने संबंधी कानून के चलते पुलिस भी ऐसे मामलों में हाथ डालने से बचती है जिससे किसी न्यायाधीश का नाम जुड़ा हो. खुद पुलिस अधिकारी इस बात को स्वीकार करते हैं. वैसे जजों को प्राप्त कानूनी संरक्षण को लेकर स्थिति पूरी तरह साफ नहीं है. कुछ जानकारों का मानना है कि जजों को सिर्फ ऐसे दीवानी और आपराधिक मामलों में कानूनी संरक्षण हासिल है जो उनके डयूटी पर रहते हुए या कोई कानूनी कर्तव्य निभाते हुए होते हैं. वहीं कुछ विशेषज्ञों कुछ अनुसार अगर कोई जज रिश्वत लेते या गैर कानूनी रूप से तोहफा स्वीकारता है तो यह उनकी कोई सरकारी डयूटी नहीं है और ऐसे मामलों में कानून पुलिस को जांच-पड़ताल से नहीं रोक सकता, कानून महज मुकदमा चलाने से रोक सकता है. निचली अदालतों में पैसा देकर अपने पक्ष में फैसला सुनाने के तमाम मामले सामने आ चुके हैं पर अफसोस कि आरोपी को दोषी सिद्ध करने और उसे समुचित दंड देने की बातें सामने नहीं आती. न्यायपालिका से जुड़ चंद लोगों ने भारतीय न्याय व्यवस्था को किस कदर नीलाम कर रखा है इसका अंदाजा राजस्थान के उस चर्चित मामले से लगाया जा सकता है जिसमें एक जज ने पक्ष में फैसला सुनाने के के लिए सेक्स की मांग की थी. वहीं अहमदाबाद के मैट्रोपोलिटियन मजिस्टे्रट ने 40,000 के एवज में बिना सोच-समझे पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के खिलाफ जमानती वारंट जारी कर दिया था. न्याय व्यवस्था का आशय है दोषी को सजा मिले, याची को सही समय पर न्याय मिले, निर्दोष को लंबे समय तक बेवजह जेल की दीवारों से सिर न टकराना पड़े लेकिन व्यावहारिक रूप में ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है. भ्रष्टाचारियों को सबक सिखाने वाली न्यायपालिका खुद भ्रष्टाचार के भंवर में फंसती जा रही है. कुछ वक्त पहले तक इस तरह की घटनाएं शायद नहीं होती थी मगर अब आए दिन ऐसे मामले सुनने में आते रहते हैं. ऐसी घटनाओं से यह लगने है कि न्यायाधीश बनने के बाद कुछ लोग अनुशासनहीन, भ्रष्टाचारी बन गये हैं उनका आचरण और कार्य पद की मर्यादा तथा उसकी गरिमा के खिलाफ होने लगा है. न्यायपालिका में बढ़ती इस प्रवति पर रोक के लिए प्रभावी कदम उठाए जाने का सही वक्त अब आ गया है अगर अब भी इस दिशा में कुछ नहीं किया गया तो जो थोड़ा बहुत विश्वास न्यायपालिका में कायम है वो भी काफुर हो जाएगा.

लगते रहे दाग
-भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार महाभियोग प्रस्ताव 1993 में वी. रामास्वामी के खिलाफ लाया गया था. पंजाब और हरियाणा के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए पद के दुरुपयोग के दोषी पाए गये थे. हालांकि कांग्रेस सदस्यों की गैरहाजिरी के चलते उनका कुछ नहीं बिगड़ पाया था. -देश के पूर्व चीफ जस्टिस वाई.के. सब्बरवाल पर दिल्ली में सीलिंग के दौरान प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के उलट आदेश जारी करने का आरोप लगा था. इसके साथ ही उनपर अपने परिवार के व्यापारिक हितों को बढ़ावा देने का भी आरोप लगा.
-सुप्रीम कोर्ट के जज एम.एम. पंछी पर न्यायिक उत्तरदायित्व समिति ने भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था. महाभियोग के लिए सांसदों के समर्थन मिलने से पहले वो भारत के मुख्य न्यायाधीश बन गए थे.
-गाजियाबाद कोर्ट के पूर्व केंद्रीय कोषागार अधिकारी आशुतोष अस्थाना ने आठ सालों तक न्यायिक अधिकारियों ये साठगांठ कर जजों को उपहार देने के लिए ट्रेजरी फंड से सात करोड़ रुपए की हेराफेरी की.
-पंजाब और हरियाणा की जस्टिस निर्मल यादव को 15 लाख की रिश्वत के आरोप में न्यायिक दायित्वों से मुक्त कर दिया गया है. इस मामले का खुलासा तब हुआ जब निर्मल को मिलने वाली रकम गलती से दूसरी जज के घर पहुंच गई और उन्होंने पुलिस को बुलाकर रिश्वत देने वाले को पकड़वा दिया.
-न्यायाधीश ए.एस आनंद पर जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में पद पर रहते हुए भ्रष्टाचार के आरोप लगे लेकिन उनके खिलाफ कोई आरोप साबित नहीं हो पाया.
-वरिष्ठ वकील आरके आनंद और आईयू खान को न्याय में बाधा डालने का दोषी करार देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने चार महीने के लिए उनकी वकालत पर रोक लगाने के साथ-साथ दो हजार का जुर्माना भी लगाया था. दोनों पर बीएमडब्लू मामले में एक न्यूज चैनल के स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर प्रमुख गवाह को रिश्वत देकर बयान बदलने के लिए दबाव डालने का दोषी पाया गया था.

महाभियोग की कठिन डगर
कोलकाता हाईकोर्ट के जज सौमित्र सेन पर भले ही महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी हो रही हो मगर इसकी उम्मीद कम ही नजर आती है. कानून कवच के चलते सेन भी रामस्वामी की तरह साफ बचके निकल सकते हैं. उन्हें पद से हटाए जाने का प्रस्ताव तभी पेश किया जा सकेगा जब लोकसभा के 100 सांसदों और राज्यसभा के 50 सांसदों का इसे समर्थन मिले. हालांकि यूपीए सरकार के लिए इसे जुटाना कोई टेढ़ी खीर नहीं होगी मगर इसके लिए जिस राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत होती है वो शायद कांग्रेस में नही है. कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज खुद इस बात को स्वीकार करते हैं कि किसी जज के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाना उतना आसान नहीं है जितना दिखाई देता है. 1993 में सुप्रीम कोर्ट के जज वी. रामस्वामी के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया चली. महालेखाकार ने उनके आवास की फर्निशिंग के काम में भारी विसंगतियां पाईं थीं. रामस्वामी पर यह भी आरोप था कि परिवार द्वारा किए गये फोन कॉल्सों की धनरााशि प्राप्त करने के लिए उन्होंने गलत तरीके से दावा किया था. लेकिन रामस्वामी के खिलाफ प्रस्ताव सदन में पेश नहीं हो पाया. सेन के मामले में भी सियासी खींचतान के चलते महाभियोग प्रक्रिया बाधित हो सकती है. हो सकता है लोकसभा पहले ही भंग कर दी जाए और महाभियोग प्रक्रिया अधर में लटक जाए. यह प्रक्रिया दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों पर भी निर्भर है लेकिन इस मुद्दे पर उनके दृष्टिकोण अभी तक स्पष्ट नहीं हैं.

उम्मीद की किरण
न्यायापालिका के दामन पर लगते भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा कारण जजों की जवाबदेही तय नहीं होना है. लेकिन जजों के खिलाफ जांच के लिए न्यायिक परिषद के गठन का जो फैसला केंद्र सरकार ने लिया है उसे उम्मीद की एक किरण जरूर कहा जा सकता है. न्यायिक परिषद की स्थापना का उद्देश्य न्यायपालिका के कामकाज में पारदर्शिता लाना तथा उसकी साख बढाना है. न्यायाधीश जांच संशोधन विधेयक 2008 संसद में 2006 में पेश किए गए इसी नाम के विधेयक के स्थान पर लाया जाएगा. नए विधेयक में पिछले विधेयक के बारे में संसद की स्थाई समिति की सिफारिशों को शामिल किया गया है.

Monday, October 13, 2008

पाक: दिल में कुछ जुबां पर कुछ

नीरज नैयर
मिस्टर 10 पसर्ेंट से राष्ट्रपति के ओहदे तक पहुंचे आसिफ अली जरदारी भारत के साथ रिश्तों की गर्माहट को और बढ़ाना चाहते हैं. बीते दिनों संयुक्त राष्ट्र महासभा में जरदारी ने गर्मजोशी से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का इस्तकबाल करके यह जताने का प्रयास किया कि वो दहशतगर्दी के खेल से हटकर कुछ करने की सोच रहे हैं. बेनजीर भुट्टो की मौत के बाद पाक हुकूमत के अंदरूनी मामलों में उलझे रहने के चलते भारत-पाक बातचीत सर्द खाने में पड़ी थी जिसे पाकिस्तानी राष्ट्रपति फिर से माकूल माहौल में लाने की जद्दोजहद करते दिखाई पड़ रहे हैं. दोनों देशों ने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाने, संयुक्त आतंकवाद निरोधक नीति पर काम करने एवं द्विपक्षीय व्यापार के लिए सीमा की बंदिशें खोलने पर सहमति जताई है.

जिसे निहायत ही अच्छा कदम समझा जा सकता है. वैसे इस बात में कोई शक-शुबहा नहीं कि जरदारी जब से सत्ता में आए हैं भारत-पाक के बीच उपजी कटुता को मिटाने की बातें करते रहे हैं लेकिन पाकिस्तान के तख्तोताज पर काबिज हुक्मरानों की ऐसी भारत पसंदगी ने वक्त दर वक्त जो निशानात रिश्तों की तस्वीर पर छोड़े हैं उससे जरदारी की बातों को सहज ही स्वीकारा नहीं जा सकता. पाकिस्तान की विदेश नीति में कश्मीर हमेशा सबसे ऊपर रहा है. वहां की अवाम भी शायद उसी नेता के सिर पर सेहरा बांधना पसंद करती है जो कश्मीर की चिंगारी को सुलगाता रहे. ऐसे में जरदारी इससे कैसे अछूते रह सकते हैं. राष्ट्रपति बनने के बाद अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस में ही आवाम को संबोधित करते हुए जरदारी ने ऐलान किया था कि मुल्क कश्मीर के मामले में बहुत जल्दी खुशखबरी सुनेगा. संयुक्त राष्ट्र महासभा में मनमोहन सिंह से संबंधों को नए आयाम देने के वादे के बाद जरदारी ने पाकिस्तानी खबरनवीसों से जो कुछ कहा वह उनके दिल और जुबां के बीच के अंतर को बयां करने के लिए काफी है. जरदारी ने कहा कि असल मुद्दा कश्मीर है और अगर द्विपक्षीय वार्ता से नतीजा नहीं निकलता तो हम संयुक्त राष्ट्र का दरवाजा खटखटाने से भी एतराज नहीं करेंगे. अभी हाल ही में जब जरदारी ने कश्मीर में हिंसक संघर्ष करने वालों को आतंकवादी करार दिया तो उसकी गूंज दिल्ली तक सुनाई दी, भारत सरकार ने दिल खोलकर पाकिस्तानी सदर के बयान का स्वागत किया लेकिन महज चंद घंटों के अंतराल में ही यह साफ हो गया कि पाक सिपहसलारों के जहन में कश्मीर के अलावा कुछ और ठहर ही नहीं सकता. पर यहां जरदारी की मंशा पर पूरी तरह सवालात उठाना भी जायज नहीं होगा.

जरदारी ने जिस तरह हिम्मत के साथ कश्मीर मसले पर इतनी ज्वलंत टिप्पणी करने का साहस दिखाया उतना शायद ही पाक का कोई शासक कर सका हो. पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ तो इन्हें स्वतंत्रता सेनानी कहा करते थे. वैसे यह अनायास ही नहीं है, जरदारी के इस बयान के पीछे कई कारण छिपे हैं. पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की बदहाली किसी से छिपी नहीं है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसी कई चीजें हुई हैं, जो पाकिस्तान के खिलाफ जाती हैं. एक तो उसके सीमांत इलाके में अमेरिका की सैन्य कार्रवाई बदस्तूर जारी है जिसे लेकर पाक में आक्रोश है. दूसरे, अमेरिका और फ्रांस के साथ हुए भारत के परमाणु समझौते ने इस्लामाबाद को चिंतित और कुंठित कर दिया है. ऐसे में भारत को पहले की तरह अपना दुश्मन बताकर पाकिस्तान यूरोप या अमेरिका से कुछ हासिल नहीं कर सकता. लिहाजा सीमा पार से दोस्ती की पींगे बढ़ाने की बातें कही जा रही हैं. रह-रहकर संघर्ष विराम का उल्लंघन और पाक प्रधानमंत्री गिलानी की चीन से परमाणु करार की रट पड़ोसी मुल्क की कुंठा का ही परिणाम है. बीते कुछ दिनों में ही पाकिस्तानी फौज द्वारा सीमा पार से अकारण ही गोलीबारी की अनगिनत खबरें सामने आ चुकी हैं. घुसपैठ का आलम यह है कि अगर हमारी सेना सतर्क नहीं होती तो कारगिल की पुनरावृत्ति हो चुकी होती. कश्मीर में अलगाववादियों को आईएसआई और पाक सेना का पूरा समर्थन मिल रहा है. देश के अलग-अलग हिस्सों में हुए बम धमाकों में पाकिस्तानी आतंकवादी संगठनों की संलिप्तता किसी से छिपी नहीं है. यही कारण है कि पाकिस्तान की नई सरकार भारत परस्त नजरिए अपनाकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अपनी छवि सुधारना चाहती है. करार के बाद भारत न केवल अमेरिका के नजदीक आ गया है बल्कि उसे अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में टांग फैलाकर बैठने का हक भी हासिल हो गया है. फ्रांस आदि देशों से भारत की बढ़ती नजदीकी पाक की परेशानी को और बढ़ा रही है. दरअसल अमेरिका से पाक के रिश्ते अब उतने मधुर नहीं रहे हैं जितने पहले थे. अपनी सीमा में अमेरिकी सैनिकों की कार्रवाई से बौखलाकर पाक पीएम गिलानी ने जिस लहजे में अमेरिका को चेताया था उससे साफ है कि बुश-मुश द्वारा तैयार की गई रिश्तों की गांठ ढीली पड़ गई है.
पाकिस्तान ने आतंकवाद के नाम पर अमेरिका से सालों तक जो मोटी रकम वसूली थी उस पर ओबामा या मैक्केन के आने के बाद रोक लग सकी है. पाक की छवि वैसे भी विश्व पटल पर आतंकवादी देश के रूप में बनी हुई है, ऐसे में अमेरिका से लेकर यूरोप तक भारत के दोस्तों की फेहरिस्त बढ़ने से पाक की भारत विरोधी गतिविधि उसके संकटकाल को और लंबा खींच सकती है, लिहाजा सोची-समझी रणनीति के तहत ही कश्मीर पर जरदारी का बयान और आतंकवाद के सफाए के लिए मिलकर लड़ने जैसे बातें पड़ोसी मुल्क के सियासतदां की तरफ से आ रही है. पाकिस्तान का इतिहास इस बात का गवाह है कि वहां के शासकों ने कभी भारत का भला नहीं चाहा, बात चाहे बेनजीर की हो, शरीफ की हो या फिर मुशर्रफ की हर किसी के दिल में कुछ और जुबां पर कुछ और रहा, सबकी यही कोशिश रही कि कश्मीर छीनकर हिंदुस्तान की हरियाली को उजाड़ा जाए. भारत हमेशा ही पाकिस्तान को अपना दोस्त, अपना भाई समझता रहा है लेकिन पाकिस्तान ने हमेशा दोस्ती को बहुत हल्के में लिया. अगर इस्लामाबाद असलियत में भारत से दोस्ती बढ़ाना चाहता है केवल खुशफहमी वाले बयानात से कुछ नहीं होगा उसे जमीनी स्तर पर कदम आगे बढ़ाना होगा, पर अफसोस ऐसी उम्मीद दूर-दूर तक दिखलाई नहीं पड़ती.
नीरज नैयर

Saturday, October 4, 2008

बिल चुकाने के पैसे नहीं किस बात का राष्ट्रीय खेल

नीरज नैयरजब केपीएस गिल को आईएचएफ से बाहर का रास्ता दिखाया गया तो पूरे देश के हॉकी प्रेमियों में जश् का माहौल था. उम्मीदें लगाई जा रही थीं कि हॉकी अब फिर से अपने पैरों पर खड़े हो सकेगी. मैदानों में लगने वाला खिलाड़ियों का जमावड़ा इस बात की गवाही दे रहा था कि क्रिकेट के काले बादलों ने भले ही हॉकी को कुछ देर के लिए ढक लिया हो मगर उसकी चमक आज भी कायम है. पर अब लगता है कि वो जोश, वो जुनून, वो स्टिक के सहारे दुनिया जीतने का जज्बा सब बेकार है. सच तो यह है कि इस मुल्क में न तो हॉकी का उद्धार हो सकता है और न इससे ताल्लुकात रखने वालों का. अप्रैल-मई में ऑस्ट्रेलिया में जो कुछ भी हुआ उसके बाद शायद ही कोई हॉकी में अपना भविष्य देखना चाहेगा. पूरे देश के लिए इससे ज्यादा शर्म की बात और क्या हो सकती है कि टीम के पास खाने का बिल चुकाने तक के पैसे नहीं थे. वो तो भला हो उस भारतीय मूल के व्यक्ति का जिसने बिल चुकाकर विदेशी सरजमीं पर देश की इात को तार-तार होने से बचा लिया. लेकिन अब वो बेचारा खुद अपनी 7.2 लाख की भारी-भरकम रकम वापस लेने के लिए दर-दर भटक रहा है.

इसे हॉकी और उसके प्रेमियों के प्रति उदासीनता ही कहा जाएगा कि आईएचएफ से लेकर खेल मंत्रालय तक देश की लाज रखने वाले की सुनने को तैयार नहीं है. छह महीने गुजर जाने के बाद भी उसे रकम नहीं लौटाई गई है. ओलंपिक में क्वालीफाई न कर पाना भले ही भारतीय हॉकी के इतिहास का सबसे काला दिन हो मगर इस वाक्य के बाद अब यह उम्मीद लगाना बेमानी होगा की हॉकी का स्वर्णिम युग कभी लौट के आएगा. हॉकी अब पूरी तरह से खत्म हो गई है. इसको बचाने के लिए अब कोई आगे नहीं आने वाला. किसी जमाने में हिटलर तक को मोहित करने वाली भारतीय हॉकी की सफलता के दौर में इसके पास बहुत माई-बाप थे, लेकिन आज ऐसा कुछ नहीं है. ग्वास्कर, ब्रैडमैन, कपिल देव का नाम अब भी लोगों की जुंबा पर हैं मगर ध्यानचंद, केडी सिंह बाबू, अशोक कुमार को लोगों ने कब का भुला दिया. आलम यह है कि हॉकी आज केवल गली-मोहल्लों का खेल बनकर ही रह गई है. हॉकी को रसातल में ले जाने का जिम्मा भले ही हॉकी फेडरेशन का हो, लेकिन कुछ बातें हैं, जिन पर गौर करें, तो हॉकी में फैली हताशा समझी जा सकती है. इसकी एक वजह तो क्रिकेट का ब्रांड बनना या उसका एकाधिकार ही है. हॉकी में 1975 की पराजय के दस साल के भीतर क्रिकेट भारत में ब्रांड बनने लगा था. यह जानकर हैरत होती है कि वर्ष 1983 की विजेता टीम की अगवानी और सम्मान कार्यक्रम कराने के लिए लता मंगेशकर ने बीसीसीआई के लिए पैसे जुटाए थे, क्योंकि क्रिकेट को भारत सरकार से वित्तीय सहायता नहीं मिलती थी और बीसीसीआई के पास इतने पैसे नहीं थे. मगर अब क्रिकेटरों के लिए करोड़ों की बोली लग रही है. जो शाहरुख खान चक दे इंडिया में हॉकी के दीवाने दिखाए थे वो असल जिंदगी में क्रिकेट खरीद रहे हैं. जो मां-बाप यह नहीं चाहते कि उनका बच्चा हॉकी में समय बर्बाद करे वो बिल्कुल सही हैं. क्रिकेट में पैसा है, शौहरत है, सम्मान है. पर हॉकी में क्या है. न पैसा, न शौहरत और न ही सम्मान.

टीम इंडिया जब कोई टूर्नामेंट जीतकर आती है तो उसके स्वागत में पलक पांवड़े बिछाए जाते हैं मगर जब हॉकी खिलाड़ी जीतकर आते हैं तो उनके स्वागत के लिए भी कोई आना गंवारा नहीं समझता. जब सरकार खुद राष्ट्रीय खेल को दफन करने पर अमादा हो तो फिर किसी और को दोष देने से क्या फायदा. देश में अब तक सरकार स्पोट्र्स कल्चर बनाने में नाकाम रही है. नेशनल स्पोट्र्स पॉलिसी की बातें भी धूल फांक रही हैं, जिससे तहत ग्रामीण स्तर पर खेलों को पहुंचाकर प्रतिभा खोजने का लक्ष्य रखा गया था. इसके अलावा सबसे बड़ी बात तो यह है कि देश में हॉकी के लिए पर्याप्त मैदान तक नहीं है. स्कूल और कॉलेज की हॉकी आज भी घास पर खेली जाती है. ऐसे में एस्ट्रो टर्फ की रफ्तार से खिलाड़ी कैसे तालमेल बिठा सकते हैं. देश भर में लगभग एक दर्जन मैदान में ही एस्ट्रो टर्फ बिछी है और रही सही कसर सरकार ने पिछले साल हॉकी को अपनी प्राथमिक सूची से हटाकर कर दी है. आखिरी बार हम वर्ष 1975 में क्वालालंपुर में घास के मैदान पर विश्व चैंपियन बने थे. और मॉस्को में पॉलीग्रास पर ताकतवर मुल्कों की गैरमौजूदगी में हमने ओलंपिक जीता था. सरकार शायद समझती है कि कमजोर कंधों को सहारे की जरूरत नहीं होती तभी तो दमतोड़ रही हॉकी के साथ ऐसा सौतेला बर्ताव किया जा रहा है. यह हॉकी खिलाड़ियों की बदकिस्तमी है कि राष्ट्रीय खेल से जुड़े होने के बाद भी उन्हें इस तरह की जलालत अमूमन झेलनी पड़ती है.
चाहे कोई लाख दिलासे दे मगर कड़वी सच्चाई यही है कि स्टिक के जादूगर ध्यानचंद के सपनों का अब अंत हो चुका है. अगर ध्यानचंद आज होते तो शायद इस घटना के बाद वो भी अपनी हॉकी को एक ऐसे खूंटे पर टांग देते जहां से उसे चाहकर भी उतारना मुमकिन नहीं होता. ओलंपिक में अभिनव बिंद्रा और विजेंद्र के पदक जीतने के बाद अभी जरूर अन्य खेलों को प्रोत्साहन देने की बड़ी-बड़ी बातें की जा रही हैं मगर वक्त गुजरते ही यह बातें हॉकी की तरह धीरे-धीरे दम तोड़ देंगी. क्रिकेट के अलावा हमारे देश में किसी और खेल का कोई स्थान नहीं यह बात अब हमें समझ लेनी चाहिए, हमें भूल जाना चाहिए राष्ट्रीय खेल भी कुछ होता है शायद तब ऐसे वाक्यों पर न शर्म से आंखें झुकेंगी और न दिल रोएगा.
नीरज नैयर9893121591

Monday, September 22, 2008

आखिर क्रिकेटरों की जेब से पैसा क्यों नहीं निकलता

नीरज नैयर
ये एक विचारणीय प्रश् है कि आखिर हमारे क्रिकेटरों की जेब से पैसा क्यों नहीं निकलता. ऐसे वक्त में जब पूरा देश बाढ़ पीड़ित बिहारवासियों की मदद को बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहा है. हमारे क्रिकेटर खामोश बैठे हैं. बॉलीवुड से लेकर उद्योगपतियों तक, राजनीतिज्ञों से लेकर आम आदमी तक हर कोई अपनी-आपनी सामर्थ्य के मुताबिक प्रकृति का कहर झेल रहे लोगों के आंसू पोछने की कोशिश में लगा है. बिहार में कोसी ने जो तबाही मचाई है उसकी भरपाई तो शायद ही हो पाए मगर थोड़ी-थोड़ी मदद दाने-दाने मोहताज लोगों को कुछ सहारा जरूर दे सकती है. बिहार में विकरालता और बेबसी का आलम ये हो चला है किखाने के लिए खून बहाया जा रहा है. लोग खाद्य सामग्री के लिए एक-दूसरे को कुचलने पर आमादा है. पर हमारे क्रिकेटरों के कानों तक शायद उन लोगों की करुण पुकार अब तक नहीं पहुंच पाई है. हमारे देश में क्रिकेट को धर्म और क्रिकेटरों को भगवान का दर्जा दिया जाता है. क्रिकेट के प्रति समर्पण और उन्माद का जो नजारा भारत में देखने को मिलता है वह कहीं और नहीं मिल सकता. क्रिकेट और क्रिकेटरों का देश में एकक्षत्र राज है उनके आगे किसी दूसरे को तवाो दी गई हो ऐसा शायद ही कभी देखने-सुनने में आया हो. भले ही इस उपमहाद्वीप पर क्रिकेट में आए पैसे की बात सबसे अधिक होती है लेकिन सही मायने में देखा जाए तो केवल भारत ही कुबेर है. पिछले दस सालों के दौरान क्रिकेट में इतना पैसा आया है कि इससे जुड़े लोगों से संभाले नहीं संभलरहा है.


सिर्फ सचिन, सौरव और गांगुली ही नहीं धोनी-युवराज जैसे खिलाड़ियों की युवा ब्रिगेड भी करोड़ों में खेल रही है. धोनी एक फीता काटने के 50 लाख लेते हैं तो युवराज रैंप पर चलने को 40. क्रिकेट ने इन लोगों को इतना दिया है कि दोनों हाथों से लुटाने पर भी जेब खाली नहीं होने वाली. पर अफसोस कि दोनों हाथ से लुटाना तो दूर इनकी जेब से एक धेला तक नहीं निकलता. दुनिया के हर धर्म में परोपकार और सामाजिक दायित्व का तत्व विद्यमान होता है मगर जब बात हमारे क्रिकेटरों और क्रिकेट की आती है तो इसका साया तक उन पर नहीं दिखाई देता. देश की जनता से क्रिकेटरों को जो शानो-शौकत मिली है उसके बदले में वह कभी कुछ लौटाते नजर नहीं आते. पड़ोस में पाकिस्तान की ही अगर बात करें तो इमरान खान ने अपने सेलेब्रिटी स्टेटस की बदौलत ही कैंसर का एक बड़ा सा अस्पताल खड़ा कर डाला. आस्ट्रेलिया के स्टीव वॉ वर्षो से बच्चों के कल्याण के लिए कुछ न कुछ करते रहे हैं. ऐसे ही न्यूजीलैंड के क्रिस कैंस से लेकर टेनिस स्टार रोजर फेडरर तक हर कोई समाज के प्रति अपनी भूमिका पर खरा उतरा है. मगर लगता है हमारे क्रिकेटरों को इस बात से कोई सरोकार नहीं, उन्हें सरोकार है तो बस इस बात से ही कि कैसे कम से कम वक्त में ज्यादा से ज्यादा पैसे बटोरे जाएं. हमारे देश में सचिन तेंदुलकर भले ही एक-आध बार कैंसर पीड़ित बच्चों में खुशियां बांटते नजर आए हों पर बाकि खिलाड़ियों के पास तो शायद इतना भी वक्त नहीं. कहने का मतलब यह हरजिग नहीं है कि क्रिकेटर सबकुछ छोड़कर समाज सेवक बन जाएं, किसी सेलिब्रिटी के समाज कल्याण के कार्यो से जुड़ना उसके उद्देश्य प्राप्ति में प्रेरक होता है. बड़े नामों के साथ आने से न केवल मुद्दे सुर्खियों में रहते हैं बल्कि उन्हें आर्थिक सहायता का सहारा भी मिल जाता है.


बॉलीवुड का ही अगर उदाहरण लें तो उसने समाजिक दायित्व का निर्वाहन करने में हमेशा मिसाले पेश की हैं. सुनील दत्त और नर्गिस का युद्ध के दिनों में सैनिकों का हौसला बढाना भला कौन भूल सकता है. बात चाहे गुजरात और जम्मू-कश्मीर में भूकंप की हो या सूनामी जैसी आपदाओं की बॉलीवुड कलाकार हमेशा दिल खोलकर मदद के लिए तैयार रहे. हालांकि यह बात अलग है कि उनकी कोशिशों पर रह-रहकर सवाल उठते रहे हैं. कोई इसे पब्लिसिटी स्ंटट कहता हैं तो कोई कुछ और. पर हमारे क्रिकेटर तो कभी भी कुछ ऐसा करने की जहमत नहीं उठाते जिससे वे इन सवालों में घिरें. यह सिर्फ अकेले खिलाड़ियों की ही बात नहीं है, घर का बड़ा ही अगर नालायक हो तो फिर बच्चों के क्या कहने. दुनिया के सबसे अमीर बोर्ड का दर्जा पाने वाले बीसीसीआई का भी सामाजिक दायित्व से दूर का नाता नहीं है. भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का सालाना कारोबार करोड़ों रुपए का है, वर्ल्ड कप के दौरान महज टीवी करार से ही उसने 1200 करोड़ से अधिक की कमाई की थी, अभी हाल ही में संपन्न हुई इंडियन प्रीमियर लीग के दौरान भी उसने जमकर धन कूटा. मगर आज तक शायद ही कभी कोई ऐसी खबर सुनने में आई हो जब बोर्ड ने खुद आगे बढ़कर समाज के लिए कुछ किया हो. सिवाए बरसो-बरस आयोजित होने वाले एक-दो चैरिटी मैचों के. अक्सर सुनने में आता है कि फंला खिलाड़ी ने आर्थिक तंगी के चलते मौत को गले लगा लिया, इसका सबसे ताजा उदाहरण उत्तर प्रदेश का है, जहां आर्थिक बदहाली ने एक होनहार रणजी खिलाड़ी को जान देने पर मजबूर कर दिया. क्या बीसीसीआई का ऐसे खिलाड़ियों के प्रति कोई दायित्व नहीं . बोर्ड कतई चैरिटी न करे मगर इतना तो कर सकता है कि क्रिकेट मैच के टिकट ब्रिकी से होने वाली आय में से एक रुपया ऐसे खिलाड़ियों के कल्याण में लगा दे. देश के लिए कुछ करना तो दूर की बात है अपनी खिलाड़ी बिरादरी के लिए तो बोर्ड कुछ कर ही सकता है. क्या इतना बड़ा कारोबार और क्रिकेटरों की चमक-धमक महज मनोरंजन तक ही सीमित है. क्या बोर्ड और खिलाड़ियों का जेब भरने के अलावा कोई सामजिक दायित्व नहीं है.
नीरज नैयर
(9893121591)

Wednesday, September 17, 2008

गुस्ताव की गुस्ताखी का कुसूरवार कौन

नीरज नैयर
कैरोबियाई देशों में तबाही मचाने के बाद अब समुद्री तूफान गुस्ताव अमेरिका के लिए दहशत बना हुआ है. गुस्ताव को तूफानों का बाप कहा जा रहा है. मौसम विज्ञानी भी इसकी भयावहता से हैरान हैं. वैसेयह कोई पहला मौका नहीं है जब समुद्र से तबाही की खौफनाक तस्वीर सामने आई हो. बीते दिनों म्यांमार में कहर ढ़ाने वाला नर्गिस और अमेरिका को रुलाने वाला कैटरीना भी आमतौर पर शांत रहने वाले समुद्र का रौद्र रूप था. ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर गुस्ताव जैसे समुद्री तूफानों की गुस्ताखी का कुसूरवार कौन है. या इन्हें महज प्राकृतिक आपदा कहकर हम अपना पल्ला झाड़ सकते हैं. शायद नहीं. गुस्ताव, नर्गिस और कैटरीना जैसे तूफान महज प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि मानव की कारगुजारियों का ही नतीजा है. ग्लोबल वार्मिंग एक ऐसी सच्चाई है जिसे जानकार भी हम अंजान बने बैठे हैं.


प्रकृति से छेड़छाड़ के अनगिनत खौफनाक चेहरे हमारे सामने आ चुके हैं बावजूद इसके विकास की अंधी दौड़ में हम पर्यावरण संतुलन की बातों को हम हवा में उडाए जा रहे हैं. अफसोस की बात तो यह है कि इस अहम् मसले पर ठोस समाधान निकालने के बजाए विकसित और विकासशील देश आपसी लड़ाई में उलझे हैं. अमेरिका कार्बन उत्सर्जन के लिए भारत और चीन आदि देशों को दोषी ठहरा रहा है, तो भारत अमेरिका को. अमेरिका का तर्क है कि विकसित बनने की होड़ में विकासशील देश पर्यावरण को अंधाधुंध तरीके से नुकसान पहुंचा रहे हैं. जबकि विकसाशील देशों का कहना है कि अमेरिका आदि देश अपने गिरेबां में झांके बिना दूसरों पर दोषारोपण कर रहे हैं. जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए दिसंबर 2007 में बाली में हुआ सम्मेलन भी इसी नोंक-झोंक की भेंट चढ़ गया था. पिछली एक सदी में आबादी में इजाफे, बढ़ते औद्योगिकीकरण और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन के चलते पारिस्थितिकीय संतुलन खत्म होने लगा है. जिसके चलते गंभीर खतरे उत्पन्न हो रहे हैं


ग्लोबल वार्मिंग के चलते पृथ्वी के तापमान में लगातार हो रही वृद्धि विनाश को जन्म दे रही है. इंटरगवर्मेन्टल पैनल ऑन क्लाईमेट चेंज (आईपीसीसी) ने 2007 की अपनी रिपोर्ट में साफ संकेत दिया था कि जलवायु परिवर्तन के चलते तूफानों की विकरालता में वृद्धि होगी और ऐसा बाकायदा हो रहा है. 1970 के बाद उत्तरी अटलांटिक में ट्रोपिकल तूफानों में बढ़ोतरी हुई है तथा समुद्र के जलस्तर और सतह के तापमान में भी वृद्धि हो रही है. लोबल वार्मिंग की वजह से समुद्र के तापमान में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 100 फीट पर ही तापमान पहले ही अपेक्षा कहीं अधिक गर्म हो गया है.


पिछले कुछ सालों में महासागर का तापमान सामान्य स्तर से करीब 20 गुना यादा गर्म पाया गया है. भारतीय समुद्र क्षेत्र का भी जलस्तर पहले से कहीं यादा तेजी से बढ़ रहा है.अभी तक के आकलनों के अनुसार इसमें सालाना 1 मिलीमीटर की बढ़ोत्तरी हो रही थी लेकिन ताजा आकलन बताता है कि अब यह बढ़ोत्तरी सालाना 2.5 मिमी की दर से हो रही है. भारत का समुद्र तट 7500 किलोमीटर लंबा है और देश की 35 फीसदी आबादी समुद्र के तटों पर बसी हुई है. यानी 36-37 करोड़ लोगों के लिए भविष्य में खतरा उत्पन्न हो सकता है. जलस्तर में इजाफे के साथ-साथ समुद्र का तापमान भी बढ़ रहा है. इस सदी के म य तक यानी 2050 तक समुद्र के तापमान में 1.5-2 डिग्री तक की बढ़ोतरी हो जाएगी. जबकि सदी के अंत तक यह बढ़ोतरी 2.3-3.5 डिग्री तक की होगी. ये आंकड़े चिंता पैदा करने वाले हैं. क्योंकि जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र संघ के इंटरगवर्मेन्टल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की रिपोर्ट में कहा गया है कि बीसवीं सदी के दौरान समुद्र के जलस्तर में कुल 1.7 मिमी की बढ़ोतरी हुई है. दूसरे, जलस्तर में सालाना बढ़ोतरी सिर्फ 0.5 फीसदी की रही है. 1993-2003 के दौरान समुद्र के जलस्तर में बढ़ोतरी 0.7 मिमी सालाना रही है, जबकि ताजा आंकड़े इससे कहीं यादा भयावह हैं. जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं जिससे समुद्र का जलस्तर लगातार बढ़ता जा रहा है. हिमालय से लेकर अंटार्कटिक तक लेशियरों का पिघलना जारी है. ग्लेशियरों के पिघलने के प्रमुख कारणों में से एक जहरीले रसायन डीडीटी के अंधाधुंध इस्तेमाल को भी माना जा रहा है. हालांकि अब इसका इस्तेमाल काफी कम हो गया है. लेकिन दो दशक पहले तक पूरी दुनिया में बतौर कीटनाशक इसका खूब इस्तेमाल होता था.

वैज्ञानिकों का कहना है कि हवा के साथ डीडीटी के अंश ग्लेशियरों तक पहुंचते हैं और ऊंचे ग्लेशियरों की बर्फ में भंडारित होते रहते हैं जो अब बर्फ को गलाकर पानी बना रहे हैं. हाल में किए गए शोध में अंटार्कटिक में पाए जाने वाले पेंगुइन के रक्त में डीडीटी के अंश मिले हैं. इस आधार पर वैज्ञानिकों का दावा है कि ग्लेशियरों में अभी भी डीटीटी के कण मौजूद हैं जो इनके पिघलने का कारण बन रहे हैं. अंटार्कटिक में पिछले 30-40 सालों के दौरान ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार तेज हुई है तथा औसत तापमान में छह डिग्री की बढ़ोतरी हुई है. हाल के वर्षों में जिस तेजी से दुनिया में जलवायु परिवर्तन हो रहा है उतनी तेजी से पिछले 10 हजार वर्षों में कभी नहीं हुआ. वर्तमान में कार्बन उत्सर्जन की दर को अगर नियंत्रित नहीं किया गया तो वर्ष 2050 तक दुनिया का औसत तापमान दो डिग्री बढ़ जाएगा. जिससे समुद्र तल का स्तर भयंकर रफ्तार से बढ़ेगा, आंधियों और तूफान के साथ-साथ असहनीय गर्मी भी झेलनी पड़ेगी. इन आपदाओं में से कई सच्चाई बन कर हमारे सामने अब तक आ चुकी हैं.


दक्षिणी एशिया में पहले भीषण बाढ़ से लोगों का सामना बीस सालों में एक बार होता था लेकिन हाल के दशकों में पांच सालों में लोगों को भीषण बाढ़ की तबाही झेलनी पड़ती है. यह दुखद है कि ग्लोबल वार्मिंग को नजरअंदाज करने का खामियाजा भुगतने के बाद भी हम इसे लेकर सचेत नहीं हो रहे हैं. जलवायु परिवर्तन को महज सरकार की जिम्मेदारी कहकर भी नहीं टाला जा सकता. हर व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी स्वयं उठानी होगी.

नीरज नैयर
9893121591