नीरज नैयर
कैरोबियाई देशों में तबाही मचाने के बाद अब समुद्री तूफान गुस्ताव अमेरिका के लिए दहशत बना हुआ है. गुस्ताव को तूफानों का बाप कहा जा रहा है. मौसम विज्ञानी भी इसकी भयावहता से हैरान हैं. वैसेयह कोई पहला मौका नहीं है जब समुद्र से तबाही की खौफनाक तस्वीर सामने आई हो. बीते दिनों म्यांमार में कहर ढ़ाने वाला नर्गिस और अमेरिका को रुलाने वाला कैटरीना भी आमतौर पर शांत रहने वाले समुद्र का रौद्र रूप था. ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर गुस्ताव जैसे समुद्री तूफानों की गुस्ताखी का कुसूरवार कौन है. या इन्हें महज प्राकृतिक आपदा कहकर हम अपना पल्ला झाड़ सकते हैं. शायद नहीं. गुस्ताव, नर्गिस और कैटरीना जैसे तूफान महज प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि मानव की कारगुजारियों का ही नतीजा है. ग्लोबल वार्मिंग एक ऐसी सच्चाई है जिसे जानकार भी हम अंजान बने बैठे हैं.
प्रकृति से छेड़छाड़ के अनगिनत खौफनाक चेहरे हमारे सामने आ चुके हैं बावजूद इसके विकास की अंधी दौड़ में हम पर्यावरण संतुलन की बातों को हम हवा में उडाए जा रहे हैं. अफसोस की बात तो यह है कि इस अहम् मसले पर ठोस समाधान निकालने के बजाए विकसित और विकासशील देश आपसी लड़ाई में उलझे हैं. अमेरिका कार्बन उत्सर्जन के लिए भारत और चीन आदि देशों को दोषी ठहरा रहा है, तो भारत अमेरिका को. अमेरिका का तर्क है कि विकसित बनने की होड़ में विकासशील देश पर्यावरण को अंधाधुंध तरीके से नुकसान पहुंचा रहे हैं. जबकि विकसाशील देशों का कहना है कि अमेरिका आदि देश अपने गिरेबां में झांके बिना दूसरों पर दोषारोपण कर रहे हैं. जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए दिसंबर 2007 में बाली में हुआ सम्मेलन भी इसी नोंक-झोंक की भेंट चढ़ गया था. पिछली एक सदी में आबादी में इजाफे, बढ़ते औद्योगिकीकरण और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन के चलते पारिस्थितिकीय संतुलन खत्म होने लगा है. जिसके चलते गंभीर खतरे उत्पन्न हो रहे हैं
ग्लोबल वार्मिंग के चलते पृथ्वी के तापमान में लगातार हो रही वृद्धि विनाश को जन्म दे रही है. इंटरगवर्मेन्टल पैनल ऑन क्लाईमेट चेंज (आईपीसीसी) ने 2007 की अपनी रिपोर्ट में साफ संकेत दिया था कि जलवायु परिवर्तन के चलते तूफानों की विकरालता में वृद्धि होगी और ऐसा बाकायदा हो रहा है. 1970 के बाद उत्तरी अटलांटिक में ट्रोपिकल तूफानों में बढ़ोतरी हुई है तथा समुद्र के जलस्तर और सतह के तापमान में भी वृद्धि हो रही है. लोबल वार्मिंग की वजह से समुद्र के तापमान में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 100 फीट पर ही तापमान पहले ही अपेक्षा कहीं अधिक गर्म हो गया है.
पिछले कुछ सालों में महासागर का तापमान सामान्य स्तर से करीब 20 गुना यादा गर्म पाया गया है. भारतीय समुद्र क्षेत्र का भी जलस्तर पहले से कहीं यादा तेजी से बढ़ रहा है.अभी तक के आकलनों के अनुसार इसमें सालाना 1 मिलीमीटर की बढ़ोत्तरी हो रही थी लेकिन ताजा आकलन बताता है कि अब यह बढ़ोत्तरी सालाना 2.5 मिमी की दर से हो रही है. भारत का समुद्र तट 7500 किलोमीटर लंबा है और देश की 35 फीसदी आबादी समुद्र के तटों पर बसी हुई है. यानी 36-37 करोड़ लोगों के लिए भविष्य में खतरा उत्पन्न हो सकता है. जलस्तर में इजाफे के साथ-साथ समुद्र का तापमान भी बढ़ रहा है. इस सदी के म य तक यानी 2050 तक समुद्र के तापमान में 1.5-2 डिग्री तक की बढ़ोतरी हो जाएगी. जबकि सदी के अंत तक यह बढ़ोतरी 2.3-3.5 डिग्री तक की होगी. ये आंकड़े चिंता पैदा करने वाले हैं. क्योंकि जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र संघ के इंटरगवर्मेन्टल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की रिपोर्ट में कहा गया है कि बीसवीं सदी के दौरान समुद्र के जलस्तर में कुल 1.7 मिमी की बढ़ोतरी हुई है. दूसरे, जलस्तर में सालाना बढ़ोतरी सिर्फ 0.5 फीसदी की रही है. 1993-2003 के दौरान समुद्र के जलस्तर में बढ़ोतरी 0.7 मिमी सालाना रही है, जबकि ताजा आंकड़े इससे कहीं यादा भयावह हैं. जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं जिससे समुद्र का जलस्तर लगातार बढ़ता जा रहा है. हिमालय से लेकर अंटार्कटिक तक लेशियरों का पिघलना जारी है. ग्लेशियरों के पिघलने के प्रमुख कारणों में से एक जहरीले रसायन डीडीटी के अंधाधुंध इस्तेमाल को भी माना जा रहा है. हालांकि अब इसका इस्तेमाल काफी कम हो गया है. लेकिन दो दशक पहले तक पूरी दुनिया में बतौर कीटनाशक इसका खूब इस्तेमाल होता था.
वैज्ञानिकों का कहना है कि हवा के साथ डीडीटी के अंश ग्लेशियरों तक पहुंचते हैं और ऊंचे ग्लेशियरों की बर्फ में भंडारित होते रहते हैं जो अब बर्फ को गलाकर पानी बना रहे हैं. हाल में किए गए शोध में अंटार्कटिक में पाए जाने वाले पेंगुइन के रक्त में डीडीटी के अंश मिले हैं. इस आधार पर वैज्ञानिकों का दावा है कि ग्लेशियरों में अभी भी डीटीटी के कण मौजूद हैं जो इनके पिघलने का कारण बन रहे हैं. अंटार्कटिक में पिछले 30-40 सालों के दौरान ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार तेज हुई है तथा औसत तापमान में छह डिग्री की बढ़ोतरी हुई है. हाल के वर्षों में जिस तेजी से दुनिया में जलवायु परिवर्तन हो रहा है उतनी तेजी से पिछले 10 हजार वर्षों में कभी नहीं हुआ. वर्तमान में कार्बन उत्सर्जन की दर को अगर नियंत्रित नहीं किया गया तो वर्ष 2050 तक दुनिया का औसत तापमान दो डिग्री बढ़ जाएगा. जिससे समुद्र तल का स्तर भयंकर रफ्तार से बढ़ेगा, आंधियों और तूफान के साथ-साथ असहनीय गर्मी भी झेलनी पड़ेगी. इन आपदाओं में से कई सच्चाई बन कर हमारे सामने अब तक आ चुकी हैं.
दक्षिणी एशिया में पहले भीषण बाढ़ से लोगों का सामना बीस सालों में एक बार होता था लेकिन हाल के दशकों में पांच सालों में लोगों को भीषण बाढ़ की तबाही झेलनी पड़ती है. यह दुखद है कि ग्लोबल वार्मिंग को नजरअंदाज करने का खामियाजा भुगतने के बाद भी हम इसे लेकर सचेत नहीं हो रहे हैं. जलवायु परिवर्तन को महज सरकार की जिम्मेदारी कहकर भी नहीं टाला जा सकता. हर व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी स्वयं उठानी होगी.
नीरज नैयर
9893121591
Wednesday, September 17, 2008
Tuesday, September 9, 2008
मुशर्रफ का जाना भारत पर भारी !
नीरज नैयर
जैसे-तैसे जम्हूरियत के रास्ते पर आया पाकिस्तान फिर अस्थिरता के अंधेरे में डूबता दिखाई दे रहा है. नवाज और जरदारी के बेमेल गठबंधन के बेमेल फैसले ने इस विचारणीय प्रश को जन्म दिया है कि क्या मुशर्रफ को हटाने से पाक में राजनीतिक स्थायित्व कामय रह पाएगा? जनरल के जाने के चंद घंटे बाद ही जिस तरह की राजनीति उथल-पुथल और अराजकता पाक में उत्पन्न हुई है उससे यह अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है कि पाक का भविष्य्य कितना उज्वल होगा. जरदारी के मुशर्रफ का चोला पहनने की जल्दबाजी और बर्खास्त जजों की बहाली के मसले पर आनाकानी के चलते शरीफ ने गठबंधन की गांठ खोल दी हैं. शरीफ जजों की बहाली के मसले पर अड़े हुए थे जबकि जरदारी ऐसा कुछ नहीं करना चाहते. जरदारी को लगता है कि अगर पूर्व मुख्य न्यायाधीश इफ्तिकार मोहम्मद चौधरी को बहाल किया गया तो वह खुद भी शिकार बन सकते हैं. ज्यादा उम्मीद इस बात की है कि मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार मुहम्मद चौधरी बहाल होकर आसिफ अलीजरदारी को मुशर्रफ के बनाए अधिनियम के तहत मिलने वाली छूट खत्म कर दें. जिसके बाद उनका बचना मुश्किल होगा. उन पर भष्टाचार के ढ़ेरों मामले थे जिन्हें समझौते के तहत जनरल ने खत्म कर दिए थे. ऐसे में सरकार भले ही न गिरे मगर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दोनों छोरों पर अस्थिरता का संकट हमेशा बरकरार रहेगा, जो खुद पाकिस्तान और उसके पड़ोसी मुल्क यानी भारत के लिए किसी लिहाज से शुभ नहीं है।
इतिहास गवाह है कि जब भी पड़ोस में सियासी हलचल उठी है उसका सीधा असर हिंदुस्तान की हरियाली पर पड़ा है. मुशर्रफ के त्यागपत्र से पाकिस्तान में आईएसआई और कट्टरपंथियों का वहां की राजनीति में सीधा हस्तक्षेप होने की आशंका काफी हद तक बढ़ गई है. हो सकता है कि मुल्क के सियासी मामलों में फौज का दखल भी दोबारा शुरू हो जाए. जैसे कि जनरल जिया उल हक की विमान हादसे में मौत के बाद हुआ था. जिससे भीरत के साथ उसके रिश्तों में फिर से तल्खी लौट सकती है. कश्मीर मुद्दे और भारत के साथ रिश्तों को लेकर पाक की सरकार कट्टरपंथियों के दबाव में रहती है, लिहाजा कश्मीर पर पाकिस्तान कोई नई फुलझड़ी छोड़ सकता है. वैसे उसने इसकी पहल भी कर दी है. पाक संसद ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया है जिसमें कश्मीर में जनमत संग्रह करने की बात कही गई है. इसके साथ ही पाक एक समिति भी बनाने जा रहा है जिसका काम घाटी में मानवाधिकार उल्लंघन के आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने पेश करना होगा. मतलब यह साफ है कि पाकिस्तान एक बार फिर कश्मीर को बर्निंग इश्यू बनाने जा रहा है. वो जम्मू-कश्मीर में अमरनाथ श्राइन बोर्ड विवाद को लेकर चल रहे महासंग्राम में गुपचुप तौर पर अपने हिस्सेदारी बढ़ाकर यह दिखाना चाहता है कि भारत सरकार के साथ कश्मीरियों का हित सुरक्षित नहीं है. अब तक कश्मीर पर गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी मगर पाक के इस कदम के चलते उसका पटरी से उतरना तय है. कश्मीर मसले को जितना उछाला जाएगा, भारत पर उतना ही दबाव पड़ेगा. पाकिस्तान इस बात को बखूबी जानता है, इसलिए उसने मुशर्रफ की विदाई के तुरंत बाद अपना घर संभालने के बजाए कश्मीर पर टांग अड़ाना ज्यादा बेहतर समझा. मुशर्रफ ने भले ही कारगिल के जरिए भारत में सेंध लगाने की कोशिश की हो मगर इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि उनके कार्यकाल में ही दोनों देश एक-दूसरे के करीब आने को बेकरार दिखे।
यह काबिले गौर है कि जनरल के शासन में 2004 के संघर्षविराम का एक बार भी उल्लंघन नहीं हुआ. जबकि लोकतांत्रिक सरकार बनने के बाद पाकिस्तानी फौज सीमा पर गोलीबारी करने को आतुर नजर आ रही है. पाकिस्तान हुक्मरानों की भारत के प्रति दिलचस्पी शुरू से ही रही है. 1971 की लड़ाई में मुंह की खाने के बाद जुल्फिकार अली भुट्टो ने कहा था कि बांग्लादेश हमारा आंतरिक मामला था और भारत ने इसमें हस्तक्षेप कर हमारी टांग काटी है. हम भारत का सिर काट कर ही दम लेंगे. तब से पाकिस्तान कश्मीर को भारत से छीनकर हमारा सर कलम करने की जद्दोजहद में लगा हुआ है. मुशर्रफ ने भी उसी परंपरा को आगे बढ़ाया. जम्हूरियत की बेटी कही जाने वाली बेनजीर भुट्टो की हत्या के बाद चुनी गई नवाज और जरदारी की गठबंधन सरकार को लेकर तमाम उम्मीदें पाली गईं थीं. कहा जा रहा था पाकिस्तान कश्मीर के समाधान की दिशा में कोई सार्थक पहल कर सकता है, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. उल्टा पाकिस्तान की नई सरकार ने भारत सिरदर्दी जरूर बढ़ा दी।
जयपुर धमाके, काबुल स्थित भारतीय दूतावास पर हमला आदि कुछ ऐसी घटनाएं थी जिन्होंने अहसास दिलाया कि आईएसआई अब पहले से ज्यादा स्वतंत्र होकर काम कर रही है. भारत ने इस बात को बार-बार दोहराया कि काबुल धमाके में आईएसआई का हाथ है मगर पाक प्रधानमंत्री गिलानी से नवाज और जरदारी तक कोई इसे पचाने को तैयार नहीं है.ण मुशर्रफ ने जरूर आतंकवाद से लड़ाई को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया हो पर अमेरिका के दबाव के चलते उन्होंने कुछ हद तक अपने पाले हुए दहशतगर्दो को नियंत्रित करने का प्रयास किया. तमाम विरोध के बावजूद लाल मस्जिद पर हमला इसी का एक हिस्सा था. उन्होंने कुछ आतंकी संगठनों पर प्रतिबंध भी लगाया, लेकिन उनके जाने के बाद प्रतिबंधित गुट फिर से सक्रीय होने लगे हैं. लश्कर-ए-तोयबा के गैरकानूनी घोषित होने के बाद इसका नाम जमात उद दावा कर दिया गया. कराची में इसका दफ्तर भी बंद कर दिया गया. लेकिन अब उसे फिर से खोल दिया गया है. ऐसे ही जैश-ए-मोहम्मद भी फिर से हरकत में आ गया है. पाकिस्तान में महज कुछ दिनों में ही जो हालात उभर कर सामने आए हैं उसे देखने के बाद यह नहीं कहा जा सकता कि मुशर्रफ के जाने का भारत पर कोई असर नहीं पड़ेगा. ऐसे वक्त में जब दोनों देश रिश्ते सुधारने की तरफ आगे बढ़ रहे थे जनरल का जाना भारत की परेशानियों में भी इजाफा कर सकता है
जैसे-तैसे जम्हूरियत के रास्ते पर आया पाकिस्तान फिर अस्थिरता के अंधेरे में डूबता दिखाई दे रहा है. नवाज और जरदारी के बेमेल गठबंधन के बेमेल फैसले ने इस विचारणीय प्रश को जन्म दिया है कि क्या मुशर्रफ को हटाने से पाक में राजनीतिक स्थायित्व कामय रह पाएगा? जनरल के जाने के चंद घंटे बाद ही जिस तरह की राजनीति उथल-पुथल और अराजकता पाक में उत्पन्न हुई है उससे यह अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है कि पाक का भविष्य्य कितना उज्वल होगा. जरदारी के मुशर्रफ का चोला पहनने की जल्दबाजी और बर्खास्त जजों की बहाली के मसले पर आनाकानी के चलते शरीफ ने गठबंधन की गांठ खोल दी हैं. शरीफ जजों की बहाली के मसले पर अड़े हुए थे जबकि जरदारी ऐसा कुछ नहीं करना चाहते. जरदारी को लगता है कि अगर पूर्व मुख्य न्यायाधीश इफ्तिकार मोहम्मद चौधरी को बहाल किया गया तो वह खुद भी शिकार बन सकते हैं. ज्यादा उम्मीद इस बात की है कि मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार मुहम्मद चौधरी बहाल होकर आसिफ अलीजरदारी को मुशर्रफ के बनाए अधिनियम के तहत मिलने वाली छूट खत्म कर दें. जिसके बाद उनका बचना मुश्किल होगा. उन पर भष्टाचार के ढ़ेरों मामले थे जिन्हें समझौते के तहत जनरल ने खत्म कर दिए थे. ऐसे में सरकार भले ही न गिरे मगर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दोनों छोरों पर अस्थिरता का संकट हमेशा बरकरार रहेगा, जो खुद पाकिस्तान और उसके पड़ोसी मुल्क यानी भारत के लिए किसी लिहाज से शुभ नहीं है।
इतिहास गवाह है कि जब भी पड़ोस में सियासी हलचल उठी है उसका सीधा असर हिंदुस्तान की हरियाली पर पड़ा है. मुशर्रफ के त्यागपत्र से पाकिस्तान में आईएसआई और कट्टरपंथियों का वहां की राजनीति में सीधा हस्तक्षेप होने की आशंका काफी हद तक बढ़ गई है. हो सकता है कि मुल्क के सियासी मामलों में फौज का दखल भी दोबारा शुरू हो जाए. जैसे कि जनरल जिया उल हक की विमान हादसे में मौत के बाद हुआ था. जिससे भीरत के साथ उसके रिश्तों में फिर से तल्खी लौट सकती है. कश्मीर मुद्दे और भारत के साथ रिश्तों को लेकर पाक की सरकार कट्टरपंथियों के दबाव में रहती है, लिहाजा कश्मीर पर पाकिस्तान कोई नई फुलझड़ी छोड़ सकता है. वैसे उसने इसकी पहल भी कर दी है. पाक संसद ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया है जिसमें कश्मीर में जनमत संग्रह करने की बात कही गई है. इसके साथ ही पाक एक समिति भी बनाने जा रहा है जिसका काम घाटी में मानवाधिकार उल्लंघन के आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने पेश करना होगा. मतलब यह साफ है कि पाकिस्तान एक बार फिर कश्मीर को बर्निंग इश्यू बनाने जा रहा है. वो जम्मू-कश्मीर में अमरनाथ श्राइन बोर्ड विवाद को लेकर चल रहे महासंग्राम में गुपचुप तौर पर अपने हिस्सेदारी बढ़ाकर यह दिखाना चाहता है कि भारत सरकार के साथ कश्मीरियों का हित सुरक्षित नहीं है. अब तक कश्मीर पर गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी मगर पाक के इस कदम के चलते उसका पटरी से उतरना तय है. कश्मीर मसले को जितना उछाला जाएगा, भारत पर उतना ही दबाव पड़ेगा. पाकिस्तान इस बात को बखूबी जानता है, इसलिए उसने मुशर्रफ की विदाई के तुरंत बाद अपना घर संभालने के बजाए कश्मीर पर टांग अड़ाना ज्यादा बेहतर समझा. मुशर्रफ ने भले ही कारगिल के जरिए भारत में सेंध लगाने की कोशिश की हो मगर इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि उनके कार्यकाल में ही दोनों देश एक-दूसरे के करीब आने को बेकरार दिखे।
यह काबिले गौर है कि जनरल के शासन में 2004 के संघर्षविराम का एक बार भी उल्लंघन नहीं हुआ. जबकि लोकतांत्रिक सरकार बनने के बाद पाकिस्तानी फौज सीमा पर गोलीबारी करने को आतुर नजर आ रही है. पाकिस्तान हुक्मरानों की भारत के प्रति दिलचस्पी शुरू से ही रही है. 1971 की लड़ाई में मुंह की खाने के बाद जुल्फिकार अली भुट्टो ने कहा था कि बांग्लादेश हमारा आंतरिक मामला था और भारत ने इसमें हस्तक्षेप कर हमारी टांग काटी है. हम भारत का सिर काट कर ही दम लेंगे. तब से पाकिस्तान कश्मीर को भारत से छीनकर हमारा सर कलम करने की जद्दोजहद में लगा हुआ है. मुशर्रफ ने भी उसी परंपरा को आगे बढ़ाया. जम्हूरियत की बेटी कही जाने वाली बेनजीर भुट्टो की हत्या के बाद चुनी गई नवाज और जरदारी की गठबंधन सरकार को लेकर तमाम उम्मीदें पाली गईं थीं. कहा जा रहा था पाकिस्तान कश्मीर के समाधान की दिशा में कोई सार्थक पहल कर सकता है, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. उल्टा पाकिस्तान की नई सरकार ने भारत सिरदर्दी जरूर बढ़ा दी।
जयपुर धमाके, काबुल स्थित भारतीय दूतावास पर हमला आदि कुछ ऐसी घटनाएं थी जिन्होंने अहसास दिलाया कि आईएसआई अब पहले से ज्यादा स्वतंत्र होकर काम कर रही है. भारत ने इस बात को बार-बार दोहराया कि काबुल धमाके में आईएसआई का हाथ है मगर पाक प्रधानमंत्री गिलानी से नवाज और जरदारी तक कोई इसे पचाने को तैयार नहीं है.ण मुशर्रफ ने जरूर आतंकवाद से लड़ाई को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया हो पर अमेरिका के दबाव के चलते उन्होंने कुछ हद तक अपने पाले हुए दहशतगर्दो को नियंत्रित करने का प्रयास किया. तमाम विरोध के बावजूद लाल मस्जिद पर हमला इसी का एक हिस्सा था. उन्होंने कुछ आतंकी संगठनों पर प्रतिबंध भी लगाया, लेकिन उनके जाने के बाद प्रतिबंधित गुट फिर से सक्रीय होने लगे हैं. लश्कर-ए-तोयबा के गैरकानूनी घोषित होने के बाद इसका नाम जमात उद दावा कर दिया गया. कराची में इसका दफ्तर भी बंद कर दिया गया. लेकिन अब उसे फिर से खोल दिया गया है. ऐसे ही जैश-ए-मोहम्मद भी फिर से हरकत में आ गया है. पाकिस्तान में महज कुछ दिनों में ही जो हालात उभर कर सामने आए हैं उसे देखने के बाद यह नहीं कहा जा सकता कि मुशर्रफ के जाने का भारत पर कोई असर नहीं पड़ेगा. ऐसे वक्त में जब दोनों देश रिश्ते सुधारने की तरफ आगे बढ़ रहे थे जनरल का जाना भारत की परेशानियों में भी इजाफा कर सकता है
Thursday, August 28, 2008
फेडरल एजेंसी पर सियासत बेमानी
नीरज नैयर
परमाणु करार के बाद फेडरल एजेंसी को लेकर देश की सियासत गर्माई हुई है. यूपीए सरकार के प्रस्ताव पर अधिकतर राज्य नाक-मुंह सिकोड़े हुए हैं. उनका मानना है कि केंद्र सरकार फेडरल एजेंसी के नाम पर उनके कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप की योजना बना रही है. जबकि असलियत में ऐसा कुछ भी नहीं है. बीते कुछ समय में जिस तरह से आतंकवादी वारदातों में इजाफा हुआ है, उसने राज्य सरकारों की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है. बेंगलुरु धमाकों के वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जिस तरह से आतंकवादियों को ललकार रहे थे अहमदाबाद धामाकों के बाद उनके मुंह से आवाज नहीं निकल रही है. हालात यह हो चले हैं कि देश के विभिन्न क्षेत्रों में हर तीसरे माह सीरियल ब्लास्ट हो रहे हैं, जिनकी जांच पड़ताल तो दूर की बात है इनमें शामिल आतंकी संगठनों के सुराग तक राज्यों की पुलिस नहीं लगा पाई है. पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठनों ने साल 2001 से अब तक विभिन्न वारदातों में करीब 69 बड़े धामाके किए, इनमें से ज्यादातर को अब तक सुलझाया नहीं जा सका है. जांच एजेंसियों ने अधिकतर मामलों में जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा, हिजबुल मुजाहिदी, हूजी और सिमी आदि संगठनों पर ऊंगली उठाई है मगर ऐसे किसी व्यक्ति को पकड़ने में उन्हें सफलता हाथ नहीं लगी है, जो इन मामलों का मास्टरमांइड हो. बावजूद इसके फेडरल एजेंसी की मुखालफत समझ से परे है. रक्षा विशेषज्ञ भी मौजूदा वक्त में एक ऐसी एजेंसी की जरूरत दर्शा चुके हैं जो सीमाओं के फेर में न उलझे. सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह और सी. उदय भास्कर का मानना है कि तमाम इंतजामों के होते हुए आतंकवादी वारदातें समन्वय की कमी को दर्शाती हैं. दो राज्यों की पुलिस में कोई तालमेल नहीं होता, लिहाजा केंद्रीय जांच एजेंसी का होना जरूरी है. ये बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि हमारे देश में आतंकवाद पर भी राजनीति होती है. भाजपा हर धमाके के बाद पोटा का रोना रोने लगी है जबकि इससे इतर भी कुछ सोचा जा सकता है. अमेरिका आदि देशों में भी तो सियासत का रंग यहां से जुदा नहीं है मगर वहां आतंकवाद जैसे मुद्दों पर एक दूसरे की टांग खींचने के बजाए मिलकर काम किया जाता है. अमेरिका ने अलकायदा का नामों निशान मिटाने के लिए इराके के साथ जो किया क्या वो हमारे देश में मुमकिन है? शायद नहीं. राज्य सरकारों अपनी सुरक्षा व्यवस्था की चाहें लाख पीठ थपथपाएं मगर सच यही है कि उनका पुलिस तंत्र अब इस काबिल नहीं रहा कि आतंकवादियों से मुकाबला कर सके. इसमें सुधार अत्यंत आवश्यक है पर राज्य इसके प्रति भी गंभीर नहीं दिखाई देते. केंद्र सरकार से हर साल पुलिस आधुनिकीकरण के नाम पर मिलने वाली भारी- भरकम रकम का सदुपयोग भी राज्ये नहीं कर पा रहे हैं. पिछले कुछ सालों के दौरान केंद्र से मिले लगभग सात हजार करोड़ रुए में से डेढ़ हजार करोड़ बिना खर्च के पड़े हुए हैं. इस योजना के तहत देश के सभी 13 हजार थानों को सूचना प्रौघोगिकी से लैस करना, पुलिस को अत्याधुनिक हथियार मुहैया करवाना और स्थानीय खुफिया तंत्र मजबूत करना है. लेकि न कुछ सालों से थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद हो रहे धमाके पुलिस आधुनिकीकरण की असलीयत सामने लाने के लिए काफी हैं. केंद्रीय गृहमंत्रालय 2005 से ही इस योजना के तहत जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों का सारा भार खुद ही वहन करता है जबकि अन्य राज्यों को 75 प्रतिशत सहायता देते है, लेकिन राज्यों से अपने हिस्से का 25 जुटाना भी भारी पड़ रहा है. यही वजह है कि हर साल करोड़ों रुपए खर्च नहीं हो पाते. मौजूदा वक्त में आतंकवाद का स्वरूप जितनी तेजी से बदला है उतनी तेजी से राज्य अपने आप को तैयार नहीं कर पाए हैं. पहले आतंकवाद का स्वरूप क्षेत्रिय था पर अब अखिल भारतीय हो गया है. आतंकवादी सुरक्षा व्यवस्था की खामियों की तलाश में एक राज्य से दूसरे राज्य घूमते रहते हैं ताकि उन खामियों का फायदा उठाया जा सके. ऐसे में आतंकवादियों से निपटने के लिए तरीका भी अखिल भारतीय होना चाहिए. राज्य अकेले इस खतरे से अपने बलबूत नहीं निपट सकते. केंद्र सरकार काफी लंबे समय से फेडरल एजेंसी की वकालत कर रही है. जयपुर धामाकों के बाद भूटान यात्रा से लौटते वक्त प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से इसके गठन के संकेत भी दिए थे लेकिन राज्यों की उदासीनता और डर के चलते कुछ नहीं हो सका. केंद्र की तरफ से इस बाबत राज्यों से राय मांगी गई, जिसमें से कुछ ने तो साफ इंकार कर दिया और कुछ अब तक जवाब देने की जहमत नहीं उठा पाए हैं. अमेरिका,रूस,चीन और जर्मनी आदि देशों में आतंकवाद के मुकाबले के लिए फेडरल एजेंसी मौजूद है. शायद तभी आतंकवादी वहां कदम रखने से खौफ खाते हैं. अमेरिका में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद अब तक कोई बड़ी आतंकी वारदात सुनने में नहीं आई. जबकि अमेरिका अलकायदा आदि इस्लामिक आतंकवादी संगठनो के निशाने पर है. लेकिन इस दौरान भारत में न जाने कितने बम फूट चुके हैं. यूपीए की जगह केंद्र में अगर कोई दूसरी सरकार भी होती तो वो भी पोटा को ये ही हश्र करती. क्योंकि अस्तित्व में आने के बाद से ही पोटा के दुरुपयोग की खबरें सामने आना शुरू हो गई थीं. देश में आतंकवाद रोकने के लिए जो कानून हैं वो काफी हैं, जरूरत है तो बस इनको प्रभावी बनाने की. आतंरिक सुरक्षा का जिम्मा राज्यों का मामला होता है, ऐसे में केंद्र चाहकर भी दहशतगर्दो के खिलाफ अभियान नहीं छेड़ सकता. हर वारदात के बाद राज्य सरकारें सारा दोष केंद्र पर मढ़कर खुद को पाक-साफ साबित करने की कोशिश में लग जाती हैं. बेंगलुरु और अहमदाबाद धमाकों के बाद भी यही हो रहा है. मोदी और येदीयुरप्पा को सुरक्षा व्यवस्था दुरुस्त करने की सीख देने के बजाए आडवाणी साहब केंद्र की यूपीए सरकार पर दोषारोपण कर रहे हैं. भाजपा आदि दलों को समझना होगा कि ये वक्त आपसी खुंदक निकालने का नहीं बल्कि मिल बैठकर कारगर रणनीति बनाने का है ताकि फिर कोई आतंकी देश की खुशियों के साथ खिलवाड़ न कर सके.
नीरज नैयर
परमाणु करार के बाद फेडरल एजेंसी को लेकर देश की सियासत गर्माई हुई है. यूपीए सरकार के प्रस्ताव पर अधिकतर राज्य नाक-मुंह सिकोड़े हुए हैं. उनका मानना है कि केंद्र सरकार फेडरल एजेंसी के नाम पर उनके कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप की योजना बना रही है. जबकि असलियत में ऐसा कुछ भी नहीं है. बीते कुछ समय में जिस तरह से आतंकवादी वारदातों में इजाफा हुआ है, उसने राज्य सरकारों की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है. बेंगलुरु धमाकों के वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जिस तरह से आतंकवादियों को ललकार रहे थे अहमदाबाद धामाकों के बाद उनके मुंह से आवाज नहीं निकल रही है. हालात यह हो चले हैं कि देश के विभिन्न क्षेत्रों में हर तीसरे माह सीरियल ब्लास्ट हो रहे हैं, जिनकी जांच पड़ताल तो दूर की बात है इनमें शामिल आतंकी संगठनों के सुराग तक राज्यों की पुलिस नहीं लगा पाई है. पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठनों ने साल 2001 से अब तक विभिन्न वारदातों में करीब 69 बड़े धामाके किए, इनमें से ज्यादातर को अब तक सुलझाया नहीं जा सका है. जांच एजेंसियों ने अधिकतर मामलों में जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा, हिजबुल मुजाहिदी, हूजी और सिमी आदि संगठनों पर ऊंगली उठाई है मगर ऐसे किसी व्यक्ति को पकड़ने में उन्हें सफलता हाथ नहीं लगी है, जो इन मामलों का मास्टरमांइड हो. बावजूद इसके फेडरल एजेंसी की मुखालफत समझ से परे है. रक्षा विशेषज्ञ भी मौजूदा वक्त में एक ऐसी एजेंसी की जरूरत दर्शा चुके हैं जो सीमाओं के फेर में न उलझे. सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह और सी. उदय भास्कर का मानना है कि तमाम इंतजामों के होते हुए आतंकवादी वारदातें समन्वय की कमी को दर्शाती हैं. दो राज्यों की पुलिस में कोई तालमेल नहीं होता, लिहाजा केंद्रीय जांच एजेंसी का होना जरूरी है. ये बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि हमारे देश में आतंकवाद पर भी राजनीति होती है. भाजपा हर धमाके के बाद पोटा का रोना रोने लगी है जबकि इससे इतर भी कुछ सोचा जा सकता है. अमेरिका आदि देशों में भी तो सियासत का रंग यहां से जुदा नहीं है मगर वहां आतंकवाद जैसे मुद्दों पर एक दूसरे की टांग खींचने के बजाए मिलकर काम किया जाता है. अमेरिका ने अलकायदा का नामों निशान मिटाने के लिए इराके के साथ जो किया क्या वो हमारे देश में मुमकिन है? शायद नहीं. राज्य सरकारों अपनी सुरक्षा व्यवस्था की चाहें लाख पीठ थपथपाएं मगर सच यही है कि उनका पुलिस तंत्र अब इस काबिल नहीं रहा कि आतंकवादियों से मुकाबला कर सके. इसमें सुधार अत्यंत आवश्यक है पर राज्य इसके प्रति भी गंभीर नहीं दिखाई देते. केंद्र सरकार से हर साल पुलिस आधुनिकीकरण के नाम पर मिलने वाली भारी- भरकम रकम का सदुपयोग भी राज्ये नहीं कर पा रहे हैं. पिछले कुछ सालों के दौरान केंद्र से मिले लगभग सात हजार करोड़ रुए में से डेढ़ हजार करोड़ बिना खर्च के पड़े हुए हैं. इस योजना के तहत देश के सभी 13 हजार थानों को सूचना प्रौघोगिकी से लैस करना, पुलिस को अत्याधुनिक हथियार मुहैया करवाना और स्थानीय खुफिया तंत्र मजबूत करना है. लेकि न कुछ सालों से थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद हो रहे धमाके पुलिस आधुनिकीकरण की असलीयत सामने लाने के लिए काफी हैं. केंद्रीय गृहमंत्रालय 2005 से ही इस योजना के तहत जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों का सारा भार खुद ही वहन करता है जबकि अन्य राज्यों को 75 प्रतिशत सहायता देते है, लेकिन राज्यों से अपने हिस्से का 25 जुटाना भी भारी पड़ रहा है. यही वजह है कि हर साल करोड़ों रुपए खर्च नहीं हो पाते. मौजूदा वक्त में आतंकवाद का स्वरूप जितनी तेजी से बदला है उतनी तेजी से राज्य अपने आप को तैयार नहीं कर पाए हैं. पहले आतंकवाद का स्वरूप क्षेत्रिय था पर अब अखिल भारतीय हो गया है. आतंकवादी सुरक्षा व्यवस्था की खामियों की तलाश में एक राज्य से दूसरे राज्य घूमते रहते हैं ताकि उन खामियों का फायदा उठाया जा सके. ऐसे में आतंकवादियों से निपटने के लिए तरीका भी अखिल भारतीय होना चाहिए. राज्य अकेले इस खतरे से अपने बलबूत नहीं निपट सकते. केंद्र सरकार काफी लंबे समय से फेडरल एजेंसी की वकालत कर रही है. जयपुर धामाकों के बाद भूटान यात्रा से लौटते वक्त प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से इसके गठन के संकेत भी दिए थे लेकिन राज्यों की उदासीनता और डर के चलते कुछ नहीं हो सका. केंद्र की तरफ से इस बाबत राज्यों से राय मांगी गई, जिसमें से कुछ ने तो साफ इंकार कर दिया और कुछ अब तक जवाब देने की जहमत नहीं उठा पाए हैं. अमेरिका,रूस,चीन और जर्मनी आदि देशों में आतंकवाद के मुकाबले के लिए फेडरल एजेंसी मौजूद है. शायद तभी आतंकवादी वहां कदम रखने से खौफ खाते हैं. अमेरिका में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद अब तक कोई बड़ी आतंकी वारदात सुनने में नहीं आई. जबकि अमेरिका अलकायदा आदि इस्लामिक आतंकवादी संगठनो के निशाने पर है. लेकिन इस दौरान भारत में न जाने कितने बम फूट चुके हैं. यूपीए की जगह केंद्र में अगर कोई दूसरी सरकार भी होती तो वो भी पोटा को ये ही हश्र करती. क्योंकि अस्तित्व में आने के बाद से ही पोटा के दुरुपयोग की खबरें सामने आना शुरू हो गई थीं. देश में आतंकवाद रोकने के लिए जो कानून हैं वो काफी हैं, जरूरत है तो बस इनको प्रभावी बनाने की. आतंरिक सुरक्षा का जिम्मा राज्यों का मामला होता है, ऐसे में केंद्र चाहकर भी दहशतगर्दो के खिलाफ अभियान नहीं छेड़ सकता. हर वारदात के बाद राज्य सरकारें सारा दोष केंद्र पर मढ़कर खुद को पाक-साफ साबित करने की कोशिश में लग जाती हैं. बेंगलुरु और अहमदाबाद धमाकों के बाद भी यही हो रहा है. मोदी और येदीयुरप्पा को सुरक्षा व्यवस्था दुरुस्त करने की सीख देने के बजाए आडवाणी साहब केंद्र की यूपीए सरकार पर दोषारोपण कर रहे हैं. भाजपा आदि दलों को समझना होगा कि ये वक्त आपसी खुंदक निकालने का नहीं बल्कि मिल बैठकर कारगर रणनीति बनाने का है ताकि फिर कोई आतंकी देश की खुशियों के साथ खिलवाड़ न कर सके.
नीरज नैयर
Tuesday, August 19, 2008
तारीफों के शोर में दबी कराह
Dedicated to someone very close to my heart
नीजर नैयर
मुमताज और शाहजहां की बेपनाह मोहब्बत की निशानी ताजमहल आज भी जहन में प्यार की उस मीठी सुगंध को संजोए हुए है. वर्षों से यह इमारत प्यार करने वालों की इबादतगाह रही है. वक्त के थपेड़ों ने भले ही इसके चेहरे की चमक को कुछ फीका कर दिया हो मगर इसके लब आज भी वो तराना गुनगुना रहे हैं. इसकी हंसी इस बात का सुबूत है कि पाक मोहब्बत आज भी जिंदा है. हमारे दिलों-दिमाग पर ताज की यह तस्वीर हमेशा कायम रहेगी मगर अफसोस कि सच इतना हसीन नहीं है. सच तो यह है कि ताजमहल अब बूढा हो चुका है. उसके चेहरे पर थकान झलकने लगी है. वक्त के थपेड़ों में उसकी मुस्कान कहीं खो गई है. आंखों के नीचे पड़ चुके काले धब्बे उसकी उम्र बयां कर रहे हैं. ताज कराह रहा है मगर उसके कराहने का दर्द तारीफों के शोर में दबकर रह गया है.
मुमताज महल की मौत के बाद उसकी यादों को जिंदा रखने का ख्याल जब शाहजहां के जहन में आया तब ताजमहल का जन्म हुआ. तत्कालिन इतिहासकार अब्दुल हमीद लाहौरी ने अपने फारसी ग्रंथ में लिखा था कि मुमताज महल की मृत्यु के बाद उनके मकबरे के लिए आगरा शहर के बाहर यमुना नदी के किनारे एक उपयुक्त स्थान चुना गया. ताजमहल की नीवें जलस्तर तक खोदी गईं और फिर चूने-पत्थरों के गारे से उन्हें भरा गया. यह नीव एक प्रकार के कुओं पर बनाई गई. कुओं की नींव पर बनी इस इमारत की लंबाई 997 फीट, चौड़ाई 373 फीट और ऊंचाई 285 फीट रखी गई. ताजमहल के अकेले गुंबद का वजन ही 12000 टन है. ताजमहल को यमुना के किनारे ही क्यों बनाया गया इसके पीछे भी एक महत्वूर्ण तथ्य है. ताजमहल को यमुना के किनारे ऐसे मोड़ पर निर्मित किया गया जहां शुद्ध जल पूरे साल मौजूद रहता था.
इसके चारों ओर घना जंगल था. परिणामस्वरूप यहां वातावरण निरन्तर नम रहता था और यह नमी, धूल व वायु के किसी भी अन्य प्रदूषण को सोख लेती थी. अगर हम दूसरे शब्दों में कहें तो ताजमहल नमी की एक चादर सी ओढ़े रहता था जो इसे प्राकृतिक दुष्प्रभावों से सुरक्षा प्रदान करती थी. वास्तव में ताजमहल का आंतरिक ढांचा ईंटों की चिनाई से बना है. श्वेत संगमरमर तो केवल इसमें बाहर की ओर लगा है. ताज के निर्माण के लिये विशेष प्रकार की ईंटों का इस्तेमाल किया गया था. ताजमहल का ढांचा आज भी उतना ही मजबूत है जितना कि पहले था. वायु प्रदूषण से ताजमहल के आंतरिक ढांचे को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है. प्रदूषण केवल बाहर के संगमरमर को धूमिल कर रहा है. संगमरमर का क्षेय होना भी अच्छा लक्षण नहीं है. वर्तमान स्थिति की अपेक्षा यमुना पहले बारहों महीने भरी रहती थी. यमुना का पानी एकदम स्वच्छ था और पानी ताजमहल से टकराकर उसका संतुलन बनाए रखता था. इस भरी हुई नदी में ताजमहल का प्रतिबिंब साफ नजर आता था. मानो मुस्करा रहा हो. वर्तमान समय में यमुना का जल स्तर पहले की भांति नहीं रहा है और तो और पानी बहुत ही प्रदूषित हो चला है. रासायनिक कूड़े से युक्त शहर के गंदे नाले यमुना को और प्रदूषित कर रहे हैं. ताजगंज स्थित शमशान घाट के पास से बहने वाले नाले का गंदा पानी यमुना में जहां मिलता है वह स्थान ताजमहल के बहुत करीब है. उस जगह को देखकर यह आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि यमुना को जल प्रदूषण से बचाने के लिए क्या कार्य किये जा रहे हैं. ताजमहल के दशहरा घाट पर यमुना किनारे कूड़े का ढेर सा लगा रहता है, जिसमें पॉलीथिन प्रचुर मात्रा में है. दिन-ब-दिन यमुना का पानी प्रदूषित होता जा रहा है.
यमुना के प्रदूषित पानी से निरन्तर गैसें निकलती रहती हैं. जो ताज को क्षति पहुंचा रही है. जाने माने इतिहासकार प्रोफेसर रामनाथ के एक शोध में यह बात सामने आई थी कि ताजमहल यमुना नदी में धंस रहा है. ताज की मीनारें एक ओर झुक रही हैं. वास्तव में इसे बनाने वाले की कला ही कहा जायेगा तो इतने झुकाव के बाद भी मीनारें अभी तक खड़ी है पर ऐसा कब तक चलेगा यह कहना मुश्किल है. वर्तमान समय में ताजमहल जैसी अमूल्य कृति को ज्यादा खतरा यमुना के प्रदूषित जल से है. ताजमहल को वायु प्रदूषण से हो रही क्षति को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहुत बहस हुई मगर इस पर विचार नहीं किया गया कि इमारत धंस रही है. गौरतलब है कि 1893 में यमुना ब्रिज रेलवे स्टेशन ताज के समीप ही बना था. यहां निरन्तर 60 वर्षों से इंजन धुआं भी छोड़ रहे थे. परन्तु जब 1940 के सर्वेक्षण की रिपोर्ट आई तो नतीजों में कहीं भी धुएं से ताज को होने वाली क्षति का उल्लेख नहीं था. ऐसा इसलिए कि यमुना का शुध्द जल और आसपास की हरियाली वास्तव में ऐसी कोई क्षति होने ही नहीं देते थे. नदी का स्वच्छ जल निरन्तर इसकी रक्षा करता था.
प्रदूषण के चलते आगरे से बहुत सी फैक्ट्रियों को हटा दिया गया मगर इस अहम समस्या पर किसी का ध्यान नहीं गया. हां यह बात एकदम कही है कि 1940 से अब तक के सफर में वायु प्रदूषण के अस्तित्व में भी इजाफा हुआ है. इसे ताज के संगमरमर को क्षति हुई है. इसके चलते आज ताज का श्वेत रंग थोड़ा काला सा हो गया है. जो निश्चित ही इसकी खूबसूरती के लिये घातक है. इसी के चलते कई बार मथुरा रिफाइनरी पर भी सवाल उठाए गए. आगरे से व्यावसायिक इकाइयों को तो हटा दिया गया मगर प्रदूषण की समस्या जस की तस है. भारत की तरफ पर्यटकों को आकर्षित करने में ताजमहल का अपना ही एक अनोखा योगदान है. ताज की इस छवि को हमेशा के लिए बनाए रखने केलिये सही दिशा में शीघ्र ही कार्य करने की जरूरत है. यमुना है तो ताज है यमुना नहीं तो ताज नहीं. इसलिए नदी के प्रदूषित पानी को स्वच्छ करने के प्रयास करने चाहिए. वर्तमान समय में यमुना का पानी कितना शुध्द है यह बताने की शायद जरूरत नहीं है. कुछ ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि नदी का जलस्तर ज्यादा नीचे न जाए. यह समस्या कोई नई नहीं है. कई बार सामने आ चुकी है मगर अफसोस की बात है कि अब तक इसके निपटारे के सार्थक कदम नहीं उठाए गए हैं.
तो नहीं रहता ताज
आज जो ताज हम देख रहे हैं यह शायद होता ही नहीं इसका अस्तित्व कैसे बचा इसके पीछे भी एक अनोखी घटना है. बात उन दिनों की है जब आगरा मुगल साम्राज्य की राजधानी हुआ करता था. अंग्रेजी हुकूमत उन दिनों जोरों पर थी. बंगाल के एक दैनिक अखबार में ताज को बेचने के संबंध में विज्ञापन प्रकाशित हुआ इसको पढ़कर मथुरा निवासी एक व्यापारी ने ताज को महज चंद हजार रु. में अपना बना लिया और सब देखते ही रह गये.
इस बीच एक अंग्रेज अफसर ने ऐसे ही उस व्यापारी से पूछा कि आप इस इमारत का क्या करोगे तो व्यापारी ने जवाब दिया कि जनाब करना क्या है. इसे तुड़वाकर संगमरमर निकाल कर बेच देंगे. जवाब सुनने के पश्चात अफसर से रहा नहीं गया कि इतनी खूबसूरत इमारत को सिर्फ इसके संगमरमर के लिए गिरा दिया जायेगा. अफसर ने वहां से उस व्यापारी को तुरन्त निकालने का आदेश दिया और आखिरकार इस भव्य इमारत का अस्तित्व बच गया. एक अंग्रेज अफसर की वजह से ताज हमारी आंखों के सामने है. मगर इसकी खूबसूरती को कायम रखने के लिए हमारे द्वारा किये जा रहे प्रयासों के बारे में कुछ भी कहना मुश्किल है.

नीजर नैयर
मुमताज और शाहजहां की बेपनाह मोहब्बत की निशानी ताजमहल आज भी जहन में प्यार की उस मीठी सुगंध को संजोए हुए है. वर्षों से यह इमारत प्यार करने वालों की इबादतगाह रही है. वक्त के थपेड़ों ने भले ही इसके चेहरे की चमक को कुछ फीका कर दिया हो मगर इसके लब आज भी वो तराना गुनगुना रहे हैं. इसकी हंसी इस बात का सुबूत है कि पाक मोहब्बत आज भी जिंदा है. हमारे दिलों-दिमाग पर ताज की यह तस्वीर हमेशा कायम रहेगी मगर अफसोस कि सच इतना हसीन नहीं है. सच तो यह है कि ताजमहल अब बूढा हो चुका है. उसके चेहरे पर थकान झलकने लगी है. वक्त के थपेड़ों में उसकी मुस्कान कहीं खो गई है. आंखों के नीचे पड़ चुके काले धब्बे उसकी उम्र बयां कर रहे हैं. ताज कराह रहा है मगर उसके कराहने का दर्द तारीफों के शोर में दबकर रह गया है.
मुमताज महल की मौत के बाद उसकी यादों को जिंदा रखने का ख्याल जब शाहजहां के जहन में आया तब ताजमहल का जन्म हुआ. तत्कालिन इतिहासकार अब्दुल हमीद लाहौरी ने अपने फारसी ग्रंथ में लिखा था कि मुमताज महल की मृत्यु के बाद उनके मकबरे के लिए आगरा शहर के बाहर यमुना नदी के किनारे एक उपयुक्त स्थान चुना गया. ताजमहल की नीवें जलस्तर तक खोदी गईं और फिर चूने-पत्थरों के गारे से उन्हें भरा गया. यह नीव एक प्रकार के कुओं पर बनाई गई. कुओं की नींव पर बनी इस इमारत की लंबाई 997 फीट, चौड़ाई 373 फीट और ऊंचाई 285 फीट रखी गई. ताजमहल के अकेले गुंबद का वजन ही 12000 टन है. ताजमहल को यमुना के किनारे ही क्यों बनाया गया इसके पीछे भी एक महत्वूर्ण तथ्य है. ताजमहल को यमुना के किनारे ऐसे मोड़ पर निर्मित किया गया जहां शुद्ध जल पूरे साल मौजूद रहता था.
इसके चारों ओर घना जंगल था. परिणामस्वरूप यहां वातावरण निरन्तर नम रहता था और यह नमी, धूल व वायु के किसी भी अन्य प्रदूषण को सोख लेती थी. अगर हम दूसरे शब्दों में कहें तो ताजमहल नमी की एक चादर सी ओढ़े रहता था जो इसे प्राकृतिक दुष्प्रभावों से सुरक्षा प्रदान करती थी. वास्तव में ताजमहल का आंतरिक ढांचा ईंटों की चिनाई से बना है. श्वेत संगमरमर तो केवल इसमें बाहर की ओर लगा है. ताज के निर्माण के लिये विशेष प्रकार की ईंटों का इस्तेमाल किया गया था. ताजमहल का ढांचा आज भी उतना ही मजबूत है जितना कि पहले था. वायु प्रदूषण से ताजमहल के आंतरिक ढांचे को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है. प्रदूषण केवल बाहर के संगमरमर को धूमिल कर रहा है. संगमरमर का क्षेय होना भी अच्छा लक्षण नहीं है. वर्तमान स्थिति की अपेक्षा यमुना पहले बारहों महीने भरी रहती थी. यमुना का पानी एकदम स्वच्छ था और पानी ताजमहल से टकराकर उसका संतुलन बनाए रखता था. इस भरी हुई नदी में ताजमहल का प्रतिबिंब साफ नजर आता था. मानो मुस्करा रहा हो. वर्तमान समय में यमुना का जल स्तर पहले की भांति नहीं रहा है और तो और पानी बहुत ही प्रदूषित हो चला है. रासायनिक कूड़े से युक्त शहर के गंदे नाले यमुना को और प्रदूषित कर रहे हैं. ताजगंज स्थित शमशान घाट के पास से बहने वाले नाले का गंदा पानी यमुना में जहां मिलता है वह स्थान ताजमहल के बहुत करीब है. उस जगह को देखकर यह आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि यमुना को जल प्रदूषण से बचाने के लिए क्या कार्य किये जा रहे हैं. ताजमहल के दशहरा घाट पर यमुना किनारे कूड़े का ढेर सा लगा रहता है, जिसमें पॉलीथिन प्रचुर मात्रा में है. दिन-ब-दिन यमुना का पानी प्रदूषित होता जा रहा है.
यमुना के प्रदूषित पानी से निरन्तर गैसें निकलती रहती हैं. जो ताज को क्षति पहुंचा रही है. जाने माने इतिहासकार प्रोफेसर रामनाथ के एक शोध में यह बात सामने आई थी कि ताजमहल यमुना नदी में धंस रहा है. ताज की मीनारें एक ओर झुक रही हैं. वास्तव में इसे बनाने वाले की कला ही कहा जायेगा तो इतने झुकाव के बाद भी मीनारें अभी तक खड़ी है पर ऐसा कब तक चलेगा यह कहना मुश्किल है. वर्तमान समय में ताजमहल जैसी अमूल्य कृति को ज्यादा खतरा यमुना के प्रदूषित जल से है. ताजमहल को वायु प्रदूषण से हो रही क्षति को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहुत बहस हुई मगर इस पर विचार नहीं किया गया कि इमारत धंस रही है. गौरतलब है कि 1893 में यमुना ब्रिज रेलवे स्टेशन ताज के समीप ही बना था. यहां निरन्तर 60 वर्षों से इंजन धुआं भी छोड़ रहे थे. परन्तु जब 1940 के सर्वेक्षण की रिपोर्ट आई तो नतीजों में कहीं भी धुएं से ताज को होने वाली क्षति का उल्लेख नहीं था. ऐसा इसलिए कि यमुना का शुध्द जल और आसपास की हरियाली वास्तव में ऐसी कोई क्षति होने ही नहीं देते थे. नदी का स्वच्छ जल निरन्तर इसकी रक्षा करता था.
प्रदूषण के चलते आगरे से बहुत सी फैक्ट्रियों को हटा दिया गया मगर इस अहम समस्या पर किसी का ध्यान नहीं गया. हां यह बात एकदम कही है कि 1940 से अब तक के सफर में वायु प्रदूषण के अस्तित्व में भी इजाफा हुआ है. इसे ताज के संगमरमर को क्षति हुई है. इसके चलते आज ताज का श्वेत रंग थोड़ा काला सा हो गया है. जो निश्चित ही इसकी खूबसूरती के लिये घातक है. इसी के चलते कई बार मथुरा रिफाइनरी पर भी सवाल उठाए गए. आगरे से व्यावसायिक इकाइयों को तो हटा दिया गया मगर प्रदूषण की समस्या जस की तस है. भारत की तरफ पर्यटकों को आकर्षित करने में ताजमहल का अपना ही एक अनोखा योगदान है. ताज की इस छवि को हमेशा के लिए बनाए रखने केलिये सही दिशा में शीघ्र ही कार्य करने की जरूरत है. यमुना है तो ताज है यमुना नहीं तो ताज नहीं. इसलिए नदी के प्रदूषित पानी को स्वच्छ करने के प्रयास करने चाहिए. वर्तमान समय में यमुना का पानी कितना शुध्द है यह बताने की शायद जरूरत नहीं है. कुछ ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि नदी का जलस्तर ज्यादा नीचे न जाए. यह समस्या कोई नई नहीं है. कई बार सामने आ चुकी है मगर अफसोस की बात है कि अब तक इसके निपटारे के सार्थक कदम नहीं उठाए गए हैं.
तो नहीं रहता ताज
आज जो ताज हम देख रहे हैं यह शायद होता ही नहीं इसका अस्तित्व कैसे बचा इसके पीछे भी एक अनोखी घटना है. बात उन दिनों की है जब आगरा मुगल साम्राज्य की राजधानी हुआ करता था. अंग्रेजी हुकूमत उन दिनों जोरों पर थी. बंगाल के एक दैनिक अखबार में ताज को बेचने के संबंध में विज्ञापन प्रकाशित हुआ इसको पढ़कर मथुरा निवासी एक व्यापारी ने ताज को महज चंद हजार रु. में अपना बना लिया और सब देखते ही रह गये.
इस बीच एक अंग्रेज अफसर ने ऐसे ही उस व्यापारी से पूछा कि आप इस इमारत का क्या करोगे तो व्यापारी ने जवाब दिया कि जनाब करना क्या है. इसे तुड़वाकर संगमरमर निकाल कर बेच देंगे. जवाब सुनने के पश्चात अफसर से रहा नहीं गया कि इतनी खूबसूरत इमारत को सिर्फ इसके संगमरमर के लिए गिरा दिया जायेगा. अफसर ने वहां से उस व्यापारी को तुरन्त निकालने का आदेश दिया और आखिरकार इस भव्य इमारत का अस्तित्व बच गया. एक अंग्रेज अफसर की वजह से ताज हमारी आंखों के सामने है. मगर इसकी खूबसूरती को कायम रखने के लिए हमारे द्वारा किये जा रहे प्रयासों के बारे में कुछ भी कहना मुश्किल है.
Monday, August 4, 2008
िक स क ाम क ा खुफिया तंत्र
बेंगलुरु और अहमदाबाद धमा क ों से उठे विश्वसनीयता पर सवाल
नीरज नैयर
बेंगलुरु और अहमदाबाद में हुए श्रंखलाबद्ध धमाकों के बाद पूरे देश में हाहाकार मचा हुआ है. सियासी दल जहां आतंकवाद की आग में राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगे हैं वहीं खुफिया एजेंसियों की विश्वसनीयता पर भी उंगलिया उठने लगी हैं.महज दो दिन में 29 धमाकों के बाद इस सवाल का जवाब ढूढ़ना आवश्यक हो गया है कि आखिर हमारा खुफिया तंत्र कर क्या रहा है. अन्य देशों केमुकाबले खुफिया सूचनाएं जुटाने वाली एजेंसियां भारत में सबसे ज्यादा हैं. जिन पर अरबों रुपए पानी की तरह बहाया जाता है, बावजूद इसके खुफिया तंत्र इतना जर्जर बना हुआ है किआंतकी बड़ी आसानी से अपना काम कर जाते हैं और किसी को कानों-कान खबर भी नहीं होती. खुफिया एजेंसियों की नाकामियों की लंबी-चौड़ी फेहरिस्त देखकर तो यही लगता है जैसे नौसिखियों के कंधों पर देश की सुरक्षा का जिम्मा हो. खुफिया एजेंसियों द्वारा समय-समय पर जारी की जाने वाली चेतावनी मौसम विभाग की भविष्यवाणियों की तरह ही हो गई है, जिसको न तो संबंधित अधिकारी ही गंभीरता से लेते हैं और न आम आदमी. एजेंसियां बिना किसी सटीक जानकारी के आतंकी हमलों की सूचना वक्त दर वक्त इसलिए उछालती रहती हैं ताकि अनहोनी होने पर वो यह कहकर अपना पल्ला झाड़ सकें कि हमने तो पहले ही आगाह किया था. यूपी, आंध्रप्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक और अब गुजरात में हुए धमाके इस बात का सुबूत हैं कि हमारा खुफिया तंत्र कितनी सक्रीयता से काम कर रहा हैं. इंटेलिजेंस ब्यूरो यानी आई बी भारत की सबसे पुरानी खुफिया एजेंसी है. 1933 में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान अस्तित्व में आई आईबी की कमान आजादी के बाद संजीवनी पिल्लई ने पहले भारतीय निदेशक के रूप में संभाली. तब से अब तक आईबी देश की सुरक्षा से जुड़ी आंतरिक सूचनाओं को जुटाने का काम कर रही है. आईबी में भारतीय पुलिस सेवा और आर्मी के तेज-तर्रार अफसरों को शामिल किया जाता है. बावजूद इसके सटीक सूचनाओं के मामले में इसका दामन खाली ही रहा है.
कुछ ऐसा ही हाल देश की पहली विदेशी खुफिया एजेंसी रिसर्च एनालिसिस विंग यानी रॉ और अन्य एजेंसियों का है. अंतरराष्ट्रीय जासूसी के लिए इंदिरा गांधी सरकार ने 1968 में रॉ का गठन किया. जाने-माने खुफिया अधिकारी आर.एन.कॉव को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई. कॉव के जामने में रॉ ने कई उल्लेखनीय काम किए. दुनिया में इसकी तुलना केजीबी, सीआईए और मोसाद जैसे खुफिया संगठनों में की जाने लगी. लेकिन 1977 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने रॉ को लगभग ठप कर दिया. विदेशों में इसके दफ्तर बंद कर दिए गये, बजट भी बहुत कम कर दिया गया. ऐसा इसलिए क्योंकि देसाई रॉ को इंदिरा गांधी का वफादार संगठन मानते थे. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी के कार्यकाल में भी रॉ को खासी तवाो दी गई.लेकिन बाद की सरकारों ने इसे अपनी प्राथमिकता से निकाल दिया. रॉ की विफलता का दूसरा प्रमुख कारण अधिकारियों का काम के प्रति घटता रुझान भी है. रॉ से जुड़े कुछ अधिकारी स्वयं इस बात को स्वीकारते हैं कि अधिकतर अफसर विदेशों में महज मौज-मस्ती के लिए ही तैनाती करवाते हैं. हाल ही के दिनों में रॉ अधिकारियों की विदेशों में हुस्न के जाल में फंसकर सूचनाएं लीक करने की ढेरों खबरें सामने आई हैं. नेपाल चुनाव के संबंध में भी जांच एजेंसी की नाकामी उजागर हो चुकी है. जयपुर बम धमाकों के वक्त राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार एम.के. नारायण ने भी यह स्वीकारोति की थी कि पूरा खुफिया तंत्र विफल हो गया है. नारायण के बयान को लेकर काफी हो-हल्ला हुआ था. खुफिया तंत्र को मजबूत करने की बातें भी हुर्इं थी मगर हकीकत सबके सामने है. खुफिया एजेंसियों की विफलता की कहानी कोई नई नहीं है, आजादी के बाद से ही ये सिलसिला चला आ रहा है. महात्मा गांधी की हत्या को भी खुफिया एजेंसियों के उन एजेंटों की नाकामी के रूप में देखा गया जो कट्टर हिंदूवादियों पर नजर रख रहे थे. इंदिरा गांधी की हत्या की साजिश तो दिल्ली में ही बनती रही लेकिन खुफिया एजेंसियों को इसकी भनक भी नहीं लगी. राजीव गांधी की हत्या की आशंका की सूचना इस्त्राइली सूत्रों के जरिए फिलिस्तीनी नेता यासिर अराफात ने खुद पत्र लिखकर दी थी, तब भी एजेंसियों ने सरकार को नहीं चेताया. इसी तरह पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या नरसिंह राव सरकार के कार्यकाल में खुफिया एजेंसियोंकी सबसे बड़ी नाकामी मानी जाती है. ऐसे ही कारगिल घुसपैठ, कंधार विमान अपहरण कांड और संसद पर हमला पूरे खुफिया तंत्र की पोल खोलने के लिए काफी है. इसके साथ ही आतंकवादियों के बेखौफ वारदातों को अंजाम देने की एकऔर प्रमुख वजह घटिया पुलिस तंत्र भी है. राज्य सरकारें पुलिस को दुरुस्त करने के नाम पर महज खानापूर्ती के अलावा कुछ नहीं करतीं. पुलिस आधुनिकीकरण के नाम पर सालाना एक हजार करोड़ रुपये खर्च होते हैं बावजूद इसके आतंकी घटनाओं पर लगाम लगाने में पुलिस पूरी तरह नाकाम साबित हो रही है. राज्य सरकारें आधुनिकीकरण की योजना को आगे बढ़ाने की बजाए केंद्र से मिले पैसे का भी पूरा सदुपयोग नहीं कर पा रही ह्रै.
पिछले कुछ वर्षों के दौरान केंद्र से मिले लगभग सात हजार करोड़ रुपये में से डेढ़ हजार करोड़ रुपये बिना खर्च के पड़े हैं. केंद्रीय गृह मंत्रालय वर्ष 2005 से आधुनिकीकरण के लिए जम्मू-कश्मीर व पूर्वोत्तर राज्यों पूरा धन देता है. जबकि बाकी राज्यों को 75 फीसदी धन ही देता है. लेकिन राज्यों को अपने हिस्से का यह 25 फीसदी पैसा जुटाना भारी पड़ रहा है. यही वजह है कि लगभग हर साल इस योजना का बड़ा हिस्सा खर्च नहीं हो पाता है. पुलिस के आधुनिकीकरण के लिए केन्द्र वैसे तो वर्ष 1960 से राज्यों को पैसा देता रहा है. तब केंद्र और राज्य 50:50 फीसदी खर्च वहन करते थे. लेकिन वर्ष 2005 में इसमें संशोधन करके केन्द्र ने अपना हिस्सा 75 फीसदी कर दिया. इस पर भी ज्यादातर राज्य पैसे की कमी का रोना रोते रहते हैं. केन्द्र लगातार कहता रहा है कि राज्यों को अपने यहां 500 लोगों पर एक पुलिस जवान का औसत बनाने के लिए पुलिस की संख्या बढ़ानी चाहिए. अभी यह औसत 699 लोगों पर एक पुलिस जवान ही है. केन्द्र ने वर्ष 2001-02 से 2007-08 तक राज्यों को इस योजना के तहत 6385.23 करोड़ रुपये दिये. लेकिन लगभग सभी राज्य सरकारें अपने हिस्से का पूरा पैसे का उपयोग नहीं कर पाईं. वर्ष 2001 में 191.7 करोड़, 2002 में 277.38 करोड़, वर्ष 2003 में 140.09 करोड़ और वर्ष 2005 में 258.83 करोड़ तथा वर्ष 2006-07 में 335 करोड़ रुपये खर्च नहीं हो पाए. ऐसे में यह कैसे अपेक्षा कि जा सकती है कि आतंकवादी वारदातों पर लगाम लग पाएगी.
भारत क ा खुफिया तंत्र-रिसर्च एवं एनालिसिस विंग यानी रॉ
-इंटेलिजेंस ब्यूरो यानी आईबी
-ऑल इंडिया रेडियो मॉनिटरिंग सर्विस
-ज्वाइंट साइबर ब्यूरो
-सिग्नल्स इंटेलिजेंस निदेशालय
-एविएशन रिसर्च सेंटर
-डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी
-डायरेक्ट्रेट ऑफ मिलिट्री इंटेलिजेंस
-डायरेक्ट्रेट ऑफ नेवेल इंटेलिजेंस
-डायरेक्ट्रेट ऑफ एअर इंटेलिजेंस
अन्य एजेंसियां-डायरेक्ट्रेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस
-एन्फोरर्समेंट डायरेक्ट्रेट
-केंद्रीय ब्यूरो अन्वेक्षण यानी सीबीआई
-नारकोटिक्स ब्रांच
-राज्यों की पुलिस की गुप्तचर शाखाएं.
एिअर इंटेलिजेंस
असफलता क ी प्रमुख घटननाएं-3 जनवरी, 1948, दिल्ली की प्रार्थना सभा में महात्मा गांधी की हत्या.
-31 अक्टूबर, 1984, प्रधानमंत्री निवास के सुरक्षाकर्मियों में सेंध लगाकर इंदिरा गांधी की हत्या.
-दिल्ली में सांसद ललित माकन और महानगर पार्षद अर्जुन दास की खालिस्तानी आतंकवादियों द्वारा दिन दहाड़े हत्या.
-पंजाब में अकाली नेता संत हरचंद सिंह लोंगोंवाला की हत्या.
-तमिलनाडू के श्रीपेरुबुदूर में चुनाव प्रचार के दौरान राजीव गांधी की हत्या.
-छह दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस.
-पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की बम विस्फोट में हत्या.
-कारगिल में पाकिस्तान की घुसपैठ.
-दिल्ली में संसद और लाल किले पर हमला.
-जम्मू-कश्मीर विधानसभा और रघुनाथ मंदिर पर हमला.
-कंधार विमान अपहरण कांड.
-अहमदाबाद में अक्षरधाम मंदिर पर हमला.
-अयोध्या में आतंकवादी हमला.
-मुंबई में लोकल टे्रनों में सिलसिलेवार धमाके.
-दिल्ली में दीवाली से ठीक पहले बम धमाके.
-हैदराबाद और मालेगांव की मस्जिदों के पास धमाके.
-वाराणसी के संकट मोचन मंदिर में बम विस्फोट.
-जयपुर में सिलसिलेवार बम विस्फोट.
नीरज नैयर
नीरज नैयर
बेंगलुरु और अहमदाबाद में हुए श्रंखलाबद्ध धमाकों के बाद पूरे देश में हाहाकार मचा हुआ है. सियासी दल जहां आतंकवाद की आग में राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगे हैं वहीं खुफिया एजेंसियों की विश्वसनीयता पर भी उंगलिया उठने लगी हैं.महज दो दिन में 29 धमाकों के बाद इस सवाल का जवाब ढूढ़ना आवश्यक हो गया है कि आखिर हमारा खुफिया तंत्र कर क्या रहा है. अन्य देशों केमुकाबले खुफिया सूचनाएं जुटाने वाली एजेंसियां भारत में सबसे ज्यादा हैं. जिन पर अरबों रुपए पानी की तरह बहाया जाता है, बावजूद इसके खुफिया तंत्र इतना जर्जर बना हुआ है किआंतकी बड़ी आसानी से अपना काम कर जाते हैं और किसी को कानों-कान खबर भी नहीं होती. खुफिया एजेंसियों की नाकामियों की लंबी-चौड़ी फेहरिस्त देखकर तो यही लगता है जैसे नौसिखियों के कंधों पर देश की सुरक्षा का जिम्मा हो. खुफिया एजेंसियों द्वारा समय-समय पर जारी की जाने वाली चेतावनी मौसम विभाग की भविष्यवाणियों की तरह ही हो गई है, जिसको न तो संबंधित अधिकारी ही गंभीरता से लेते हैं और न आम आदमी. एजेंसियां बिना किसी सटीक जानकारी के आतंकी हमलों की सूचना वक्त दर वक्त इसलिए उछालती रहती हैं ताकि अनहोनी होने पर वो यह कहकर अपना पल्ला झाड़ सकें कि हमने तो पहले ही आगाह किया था. यूपी, आंध्रप्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक और अब गुजरात में हुए धमाके इस बात का सुबूत हैं कि हमारा खुफिया तंत्र कितनी सक्रीयता से काम कर रहा हैं. इंटेलिजेंस ब्यूरो यानी आई बी भारत की सबसे पुरानी खुफिया एजेंसी है. 1933 में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान अस्तित्व में आई आईबी की कमान आजादी के बाद संजीवनी पिल्लई ने पहले भारतीय निदेशक के रूप में संभाली. तब से अब तक आईबी देश की सुरक्षा से जुड़ी आंतरिक सूचनाओं को जुटाने का काम कर रही है. आईबी में भारतीय पुलिस सेवा और आर्मी के तेज-तर्रार अफसरों को शामिल किया जाता है. बावजूद इसके सटीक सूचनाओं के मामले में इसका दामन खाली ही रहा है.
कुछ ऐसा ही हाल देश की पहली विदेशी खुफिया एजेंसी रिसर्च एनालिसिस विंग यानी रॉ और अन्य एजेंसियों का है. अंतरराष्ट्रीय जासूसी के लिए इंदिरा गांधी सरकार ने 1968 में रॉ का गठन किया. जाने-माने खुफिया अधिकारी आर.एन.कॉव को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई. कॉव के जामने में रॉ ने कई उल्लेखनीय काम किए. दुनिया में इसकी तुलना केजीबी, सीआईए और मोसाद जैसे खुफिया संगठनों में की जाने लगी. लेकिन 1977 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने रॉ को लगभग ठप कर दिया. विदेशों में इसके दफ्तर बंद कर दिए गये, बजट भी बहुत कम कर दिया गया. ऐसा इसलिए क्योंकि देसाई रॉ को इंदिरा गांधी का वफादार संगठन मानते थे. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी के कार्यकाल में भी रॉ को खासी तवाो दी गई.लेकिन बाद की सरकारों ने इसे अपनी प्राथमिकता से निकाल दिया. रॉ की विफलता का दूसरा प्रमुख कारण अधिकारियों का काम के प्रति घटता रुझान भी है. रॉ से जुड़े कुछ अधिकारी स्वयं इस बात को स्वीकारते हैं कि अधिकतर अफसर विदेशों में महज मौज-मस्ती के लिए ही तैनाती करवाते हैं. हाल ही के दिनों में रॉ अधिकारियों की विदेशों में हुस्न के जाल में फंसकर सूचनाएं लीक करने की ढेरों खबरें सामने आई हैं. नेपाल चुनाव के संबंध में भी जांच एजेंसी की नाकामी उजागर हो चुकी है. जयपुर बम धमाकों के वक्त राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार एम.के. नारायण ने भी यह स्वीकारोति की थी कि पूरा खुफिया तंत्र विफल हो गया है. नारायण के बयान को लेकर काफी हो-हल्ला हुआ था. खुफिया तंत्र को मजबूत करने की बातें भी हुर्इं थी मगर हकीकत सबके सामने है. खुफिया एजेंसियों की विफलता की कहानी कोई नई नहीं है, आजादी के बाद से ही ये सिलसिला चला आ रहा है. महात्मा गांधी की हत्या को भी खुफिया एजेंसियों के उन एजेंटों की नाकामी के रूप में देखा गया जो कट्टर हिंदूवादियों पर नजर रख रहे थे. इंदिरा गांधी की हत्या की साजिश तो दिल्ली में ही बनती रही लेकिन खुफिया एजेंसियों को इसकी भनक भी नहीं लगी. राजीव गांधी की हत्या की आशंका की सूचना इस्त्राइली सूत्रों के जरिए फिलिस्तीनी नेता यासिर अराफात ने खुद पत्र लिखकर दी थी, तब भी एजेंसियों ने सरकार को नहीं चेताया. इसी तरह पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या नरसिंह राव सरकार के कार्यकाल में खुफिया एजेंसियोंकी सबसे बड़ी नाकामी मानी जाती है. ऐसे ही कारगिल घुसपैठ, कंधार विमान अपहरण कांड और संसद पर हमला पूरे खुफिया तंत्र की पोल खोलने के लिए काफी है. इसके साथ ही आतंकवादियों के बेखौफ वारदातों को अंजाम देने की एकऔर प्रमुख वजह घटिया पुलिस तंत्र भी है. राज्य सरकारें पुलिस को दुरुस्त करने के नाम पर महज खानापूर्ती के अलावा कुछ नहीं करतीं. पुलिस आधुनिकीकरण के नाम पर सालाना एक हजार करोड़ रुपये खर्च होते हैं बावजूद इसके आतंकी घटनाओं पर लगाम लगाने में पुलिस पूरी तरह नाकाम साबित हो रही है. राज्य सरकारें आधुनिकीकरण की योजना को आगे बढ़ाने की बजाए केंद्र से मिले पैसे का भी पूरा सदुपयोग नहीं कर पा रही ह्रै.
पिछले कुछ वर्षों के दौरान केंद्र से मिले लगभग सात हजार करोड़ रुपये में से डेढ़ हजार करोड़ रुपये बिना खर्च के पड़े हैं. केंद्रीय गृह मंत्रालय वर्ष 2005 से आधुनिकीकरण के लिए जम्मू-कश्मीर व पूर्वोत्तर राज्यों पूरा धन देता है. जबकि बाकी राज्यों को 75 फीसदी धन ही देता है. लेकिन राज्यों को अपने हिस्से का यह 25 फीसदी पैसा जुटाना भारी पड़ रहा है. यही वजह है कि लगभग हर साल इस योजना का बड़ा हिस्सा खर्च नहीं हो पाता है. पुलिस के आधुनिकीकरण के लिए केन्द्र वैसे तो वर्ष 1960 से राज्यों को पैसा देता रहा है. तब केंद्र और राज्य 50:50 फीसदी खर्च वहन करते थे. लेकिन वर्ष 2005 में इसमें संशोधन करके केन्द्र ने अपना हिस्सा 75 फीसदी कर दिया. इस पर भी ज्यादातर राज्य पैसे की कमी का रोना रोते रहते हैं. केन्द्र लगातार कहता रहा है कि राज्यों को अपने यहां 500 लोगों पर एक पुलिस जवान का औसत बनाने के लिए पुलिस की संख्या बढ़ानी चाहिए. अभी यह औसत 699 लोगों पर एक पुलिस जवान ही है. केन्द्र ने वर्ष 2001-02 से 2007-08 तक राज्यों को इस योजना के तहत 6385.23 करोड़ रुपये दिये. लेकिन लगभग सभी राज्य सरकारें अपने हिस्से का पूरा पैसे का उपयोग नहीं कर पाईं. वर्ष 2001 में 191.7 करोड़, 2002 में 277.38 करोड़, वर्ष 2003 में 140.09 करोड़ और वर्ष 2005 में 258.83 करोड़ तथा वर्ष 2006-07 में 335 करोड़ रुपये खर्च नहीं हो पाए. ऐसे में यह कैसे अपेक्षा कि जा सकती है कि आतंकवादी वारदातों पर लगाम लग पाएगी.
भारत क ा खुफिया तंत्र-रिसर्च एवं एनालिसिस विंग यानी रॉ
-इंटेलिजेंस ब्यूरो यानी आईबी
-ऑल इंडिया रेडियो मॉनिटरिंग सर्विस
-ज्वाइंट साइबर ब्यूरो
-सिग्नल्स इंटेलिजेंस निदेशालय
-एविएशन रिसर्च सेंटर
-डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी
-डायरेक्ट्रेट ऑफ मिलिट्री इंटेलिजेंस
-डायरेक्ट्रेट ऑफ नेवेल इंटेलिजेंस
-डायरेक्ट्रेट ऑफ एअर इंटेलिजेंस
अन्य एजेंसियां-डायरेक्ट्रेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस
-एन्फोरर्समेंट डायरेक्ट्रेट
-केंद्रीय ब्यूरो अन्वेक्षण यानी सीबीआई
-नारकोटिक्स ब्रांच
-राज्यों की पुलिस की गुप्तचर शाखाएं.
एिअर इंटेलिजेंस
असफलता क ी प्रमुख घटननाएं-3 जनवरी, 1948, दिल्ली की प्रार्थना सभा में महात्मा गांधी की हत्या.
-31 अक्टूबर, 1984, प्रधानमंत्री निवास के सुरक्षाकर्मियों में सेंध लगाकर इंदिरा गांधी की हत्या.
-दिल्ली में सांसद ललित माकन और महानगर पार्षद अर्जुन दास की खालिस्तानी आतंकवादियों द्वारा दिन दहाड़े हत्या.
-पंजाब में अकाली नेता संत हरचंद सिंह लोंगोंवाला की हत्या.
-तमिलनाडू के श्रीपेरुबुदूर में चुनाव प्रचार के दौरान राजीव गांधी की हत्या.
-छह दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस.
-पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की बम विस्फोट में हत्या.
-कारगिल में पाकिस्तान की घुसपैठ.
-दिल्ली में संसद और लाल किले पर हमला.
-जम्मू-कश्मीर विधानसभा और रघुनाथ मंदिर पर हमला.
-कंधार विमान अपहरण कांड.
-अहमदाबाद में अक्षरधाम मंदिर पर हमला.
-अयोध्या में आतंकवादी हमला.
-मुंबई में लोकल टे्रनों में सिलसिलेवार धमाके.
-दिल्ली में दीवाली से ठीक पहले बम धमाके.
-हैदराबाद और मालेगांव की मस्जिदों के पास धमाके.
-वाराणसी के संकट मोचन मंदिर में बम विस्फोट.
-जयपुर में सिलसिलेवार बम विस्फोट.
नीरज नैयर
Sunday, July 27, 2008
क रार पर रार, पता नहीं आधार
नीरज नैयर
हमारे देश में हर अच्छे काम के विरोध की परंपरा सी बन गई है. यहां तक की देश हित के मुद्दे भी इससे अछूते नहीं हैं. आजकल परमाणु करार को लेकर मुल्क में बवाल मचा हुआ है. संसद से लेकर सड़क तक हर कोई यही साबित करने पर तुला है कि करार किया तो देश के लिए अच्छा नहीं होगा. पर क्यों अच्छा नहीं होगा इसका जवाब किसी के पास नहीं. इक्का-दुक्का बड़े नेताओं को छोड़कर अधिकतर तो ये भी नहीं जानते कि परमाणु करार की मुखालफत के पीछे क्या कारण हैं. ऊपर वाले हल्ला मचा रहे हैं इसलिए नीचे वालों का हल्ला मचाना स्वभाविक है.
अभी हाल ही में जब एक खबरिया चैनल ने विरोध करने वाले सांसदों का विरोध ज्ञान जानने की कोशिश की तो अधिकतर को उतने ही नंबर मिले जितने शायद स्कूल के दौरान उन्हें सामान्य ज्ञान का पेपर देते वक्त मिले होंगे. 123 क्या है के जवाब में ज्यादातर बस यही कहते रहे कि हमें सब पता है, हम इसका जवाब संसद में देंगे. एक भी सांसद सीधे तौर पर यह नहीं बता सका कि उनके विरोध का आधार क्या है. कुछ ऐसा ही नजारा उस वक्त देखने को मिला था जब एक चैनल ने राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत को लेकर सांसदों से सवालात किए थे. तब भी सीधे-सीधे जवाब देने के बजाय सांसद साहेबान बगले झांकने में लगे थे. दरअसल वामदल और अन्य विपक्षी पार्टियों को आपत्ति इस बात को लेकर है कि करार हाइड एक्ट के दायरे में आता है. हाइड एक्ट अमेरिका का घरेलू कानून है जिसे दिसंबर 2006 में पारित किया गया था. करार विरोधियों का कहना है कि अमेरिका इसके कुछ प्रावधानों को भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर सकता है. जैसे अगर भविष्य में भारत परमाणु परीक्षण करता है तो अमेरिका को परमाणु ईंधन की आपूर्ति रोकने का अधिकार होगा. इसके साथ ही समझौता रद्द होने की दशा में अमेरिका भारत को दिए गये उपकरणों को वापस मंगा सकता है.
यह एक्ट तकनीक के हस्तांतरण और दोहरे प्रयोग पर भी रोक लगता है. इस प्रकार भारत का संपूर्ण नाभकीय ईंधन चक्र कार्यक्रम खतरे में पड़ जाएगा. विरोध का एक पहलू यह भी है कि अगर भारत ईरान मसले पर अमेरिका के हितों के खिलाफ कोई भी कदम उठाता है तो संधि रद्द कर दी जाएगी. करार विरोधियों की यह चिंताए ठीक हैं मगर इस पर इतना बखेड़ा खड़ा करने की जरूरत नहीं है. क्योंकि भारत संधि में यह बात शामिल करवाने में कामयाब रहा है कि दोनों देशों में किसी प्रकार का विरोध होने पर अंतरराष्ट्रीय कानून के जरिए इसका समाधान निकाला जाएगा. विएना कन्वेशन के अनुच्छेद-27 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कोई भी अंतरराष्ट्रीय संधि आंतरिक कानूनों से मुक्त होगी. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत भी चाहे तो कोई आंतरिक कानून पारित कर सकता है जिसके तहत आयातित की गई कोई भी वस्तु को लौटाना संभव न हो. ऐसे स्थिति में अगर विवाद होगा तो इसका निपटारा अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर ही होगा. सरकार भी अभी हाल ही में इस तरह का कानून अमल में लाने के संकेत दे चुकी है. जहां तक परमाणु परीक्षण की सवाल है तो मसौदे में इस बारे में कुछ भी स्पष्ट तौर पर नहीं कहा गया है. इसकी जगह अनपेक्षित परिस्थिति शब्द का इस्तेमाल किया गया है. मसौदे के तहत इन अनपेक्षित परिस्थितियों में भारत परमाणु परीक्षण कर सकता है लेकिन उसे पहले अमेरिका को सूचित करना होगा. रक्षा विशेषज्ञ सी.उदय भास्कर के मुताबिक इस समझौते से जुड़े 123 एग्रीमेंट की धारा 6 और 14 में यह भी प्रावधान है कि यदि भारत अपनी सुरक्षा जरूरतों को ध्यान में रखकर परीक्षण करता है तो अमेरिका सकारात्मक रुख अपना सकता है.
करार को लेकर हमारे देश में आमतौर पर यही धारणा बन गई है कि चूंकि करार अमेरिका के साथ है इसलिए सबकुछ अमेरिका तक ही सीमित है जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है. डील के अमल में आने के बाद न केवल परमाणु आपूर्तिकर्ता समूहदेशों का नजरीया बदलेगा बल्कि भारत परमाणु संपन्न देशों की जमात में भी शामिल हो जाएगा. करार के बाद भारत को विकसित देशों से नवीनतम परमाणु तकनीक भी हासिल हो जाएगी. अब तक भारत को यह तकनीक देने से विकसित देश साफ इंकार करते रहे हैं. शायद उन्हें इस बात का डर था कि भारत इसका इस्तेमाल सैन्य उदद्श्यों के लिए कर सकता है. डील के अमल में आने से हमें अपने परमाणु रिएक्टरों के लिए यूरेनियम हासिल हो सकेगा. देश में यूरेनियम का उत्पादन रिएक्टरों की संख्या में वृद्धि के अनुरूप नहीं बढ़ा है. इसलिए देसी रिएक्टर आजकल यूरेनियम की जबरदस्त किल्लत से जूझ रहे हैं. बिजली की समस्या जो पहले से ही विकराल रूप धारण किए हुए है आने वाले वक्त में और विकराल हो जाएगी. ऐसे में करार का देश हित में अमल में आना बहुत जरूरी है.
क्या है डील
परमाणु ऊर्जा के नागरिक इस्तेमाल के लिए भारत और अमेरिका के बीच हुए समझौते के बाद परमाणु टेक्नोलॉजी के मामले में किए जा रहे भेदभाव से भारत को आजादी मिलेगी और भारत परमाणु तकनीक की मुख्सधारा में शामिल हो जाएगा. इस डील के कुछ महत्वूर्ण प्रावधान निम्नलिखित हैं:
-अमेरिका भारत को परमाणु ईंधन की आपूर्ति करेगा और अन्य आपूर्तिकर्ता देशों से इसकी पूर्ति करने को कहेगा.
-भारत के 22 रिएक्टरों में से 14 आईएईए की निगरानी में होंगे शेष 8 रिएक्टर निगरानी मुक्त होंगे जिसका भारत सामरिक उद्देश्यों के प्रयोग के लिए इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र होगा.
नीरज नैयर
हमारे देश में हर अच्छे काम के विरोध की परंपरा सी बन गई है. यहां तक की देश हित के मुद्दे भी इससे अछूते नहीं हैं. आजकल परमाणु करार को लेकर मुल्क में बवाल मचा हुआ है. संसद से लेकर सड़क तक हर कोई यही साबित करने पर तुला है कि करार किया तो देश के लिए अच्छा नहीं होगा. पर क्यों अच्छा नहीं होगा इसका जवाब किसी के पास नहीं. इक्का-दुक्का बड़े नेताओं को छोड़कर अधिकतर तो ये भी नहीं जानते कि परमाणु करार की मुखालफत के पीछे क्या कारण हैं. ऊपर वाले हल्ला मचा रहे हैं इसलिए नीचे वालों का हल्ला मचाना स्वभाविक है.
अभी हाल ही में जब एक खबरिया चैनल ने विरोध करने वाले सांसदों का विरोध ज्ञान जानने की कोशिश की तो अधिकतर को उतने ही नंबर मिले जितने शायद स्कूल के दौरान उन्हें सामान्य ज्ञान का पेपर देते वक्त मिले होंगे. 123 क्या है के जवाब में ज्यादातर बस यही कहते रहे कि हमें सब पता है, हम इसका जवाब संसद में देंगे. एक भी सांसद सीधे तौर पर यह नहीं बता सका कि उनके विरोध का आधार क्या है. कुछ ऐसा ही नजारा उस वक्त देखने को मिला था जब एक चैनल ने राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत को लेकर सांसदों से सवालात किए थे. तब भी सीधे-सीधे जवाब देने के बजाय सांसद साहेबान बगले झांकने में लगे थे. दरअसल वामदल और अन्य विपक्षी पार्टियों को आपत्ति इस बात को लेकर है कि करार हाइड एक्ट के दायरे में आता है. हाइड एक्ट अमेरिका का घरेलू कानून है जिसे दिसंबर 2006 में पारित किया गया था. करार विरोधियों का कहना है कि अमेरिका इसके कुछ प्रावधानों को भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर सकता है. जैसे अगर भविष्य में भारत परमाणु परीक्षण करता है तो अमेरिका को परमाणु ईंधन की आपूर्ति रोकने का अधिकार होगा. इसके साथ ही समझौता रद्द होने की दशा में अमेरिका भारत को दिए गये उपकरणों को वापस मंगा सकता है.
यह एक्ट तकनीक के हस्तांतरण और दोहरे प्रयोग पर भी रोक लगता है. इस प्रकार भारत का संपूर्ण नाभकीय ईंधन चक्र कार्यक्रम खतरे में पड़ जाएगा. विरोध का एक पहलू यह भी है कि अगर भारत ईरान मसले पर अमेरिका के हितों के खिलाफ कोई भी कदम उठाता है तो संधि रद्द कर दी जाएगी. करार विरोधियों की यह चिंताए ठीक हैं मगर इस पर इतना बखेड़ा खड़ा करने की जरूरत नहीं है. क्योंकि भारत संधि में यह बात शामिल करवाने में कामयाब रहा है कि दोनों देशों में किसी प्रकार का विरोध होने पर अंतरराष्ट्रीय कानून के जरिए इसका समाधान निकाला जाएगा. विएना कन्वेशन के अनुच्छेद-27 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कोई भी अंतरराष्ट्रीय संधि आंतरिक कानूनों से मुक्त होगी. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत भी चाहे तो कोई आंतरिक कानून पारित कर सकता है जिसके तहत आयातित की गई कोई भी वस्तु को लौटाना संभव न हो. ऐसे स्थिति में अगर विवाद होगा तो इसका निपटारा अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर ही होगा. सरकार भी अभी हाल ही में इस तरह का कानून अमल में लाने के संकेत दे चुकी है. जहां तक परमाणु परीक्षण की सवाल है तो मसौदे में इस बारे में कुछ भी स्पष्ट तौर पर नहीं कहा गया है. इसकी जगह अनपेक्षित परिस्थिति शब्द का इस्तेमाल किया गया है. मसौदे के तहत इन अनपेक्षित परिस्थितियों में भारत परमाणु परीक्षण कर सकता है लेकिन उसे पहले अमेरिका को सूचित करना होगा. रक्षा विशेषज्ञ सी.उदय भास्कर के मुताबिक इस समझौते से जुड़े 123 एग्रीमेंट की धारा 6 और 14 में यह भी प्रावधान है कि यदि भारत अपनी सुरक्षा जरूरतों को ध्यान में रखकर परीक्षण करता है तो अमेरिका सकारात्मक रुख अपना सकता है.
करार को लेकर हमारे देश में आमतौर पर यही धारणा बन गई है कि चूंकि करार अमेरिका के साथ है इसलिए सबकुछ अमेरिका तक ही सीमित है जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है. डील के अमल में आने के बाद न केवल परमाणु आपूर्तिकर्ता समूहदेशों का नजरीया बदलेगा बल्कि भारत परमाणु संपन्न देशों की जमात में भी शामिल हो जाएगा. करार के बाद भारत को विकसित देशों से नवीनतम परमाणु तकनीक भी हासिल हो जाएगी. अब तक भारत को यह तकनीक देने से विकसित देश साफ इंकार करते रहे हैं. शायद उन्हें इस बात का डर था कि भारत इसका इस्तेमाल सैन्य उदद्श्यों के लिए कर सकता है. डील के अमल में आने से हमें अपने परमाणु रिएक्टरों के लिए यूरेनियम हासिल हो सकेगा. देश में यूरेनियम का उत्पादन रिएक्टरों की संख्या में वृद्धि के अनुरूप नहीं बढ़ा है. इसलिए देसी रिएक्टर आजकल यूरेनियम की जबरदस्त किल्लत से जूझ रहे हैं. बिजली की समस्या जो पहले से ही विकराल रूप धारण किए हुए है आने वाले वक्त में और विकराल हो जाएगी. ऐसे में करार का देश हित में अमल में आना बहुत जरूरी है.
क्या है डील
परमाणु ऊर्जा के नागरिक इस्तेमाल के लिए भारत और अमेरिका के बीच हुए समझौते के बाद परमाणु टेक्नोलॉजी के मामले में किए जा रहे भेदभाव से भारत को आजादी मिलेगी और भारत परमाणु तकनीक की मुख्सधारा में शामिल हो जाएगा. इस डील के कुछ महत्वूर्ण प्रावधान निम्नलिखित हैं:
-अमेरिका भारत को परमाणु ईंधन की आपूर्ति करेगा और अन्य आपूर्तिकर्ता देशों से इसकी पूर्ति करने को कहेगा.
-भारत के 22 रिएक्टरों में से 14 आईएईए की निगरानी में होंगे शेष 8 रिएक्टर निगरानी मुक्त होंगे जिसका भारत सामरिक उद्देश्यों के प्रयोग के लिए इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र होगा.
नीरज नैयर
Monday, July 21, 2008
जी-8 सम्मेलन: करोड़ों खर्च नतीजा सिफर
नीरज नैयर
बीते दिनों जापान में खाद्यान्न समस्या, जलवायु परिवहन, और आसमान छूती तेल की कीमतों पर लगाम लगाने का रास्ता खोजने के उद्देश्य से आपोजिट जी-8 सम्मेलन में दुनिया ने सबसे धनी आठ देशों के साथ तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों के जी-5 आउटीच समूह ने भी शिरकत की. तीन दिनों तक चले विचार मंथन में
60 अरब येन यानी करीब 283 मिलियन पाउंड और रुपए में करीबन 2400 करोड़ खर्च किए गये मगर नतीजा वही निकला जिसकी आशंका जताई जा रही थी. ग्लोबल वार्मिंग जैसे अहम मसले पर बात वहीं आकर अटक गई, जहां से शुरू हुई थी. विकासशील देशों ने विकसित देशों के कार्बन उत्सर्जन संबंधी फार्मूले को मानने से इंकार कर दिया और विकसित देश अपनी जिम्मेदारी के लिए कोई भी रूपरेखा तैयार करने से बच निकले. हालांकि सम्मेलन के अंत में 2050 तक ग्रीन हाउस गैसों के प्रभाव को कम करने पर सभी देशों ने सहमति जरूर जताई मगर यह साफ नहीं किया गया है कि पहल कौन करेगा. क्या भारत और चीन अपने विकसित होने के सपने को अधूरा छोड़ेंगे या फिर अमेरिका और ब्रिटेन आगे बढ़कर कोई उदाहरण पेश करेंगे. ऐसी कोई संभावना नजर नहीं आती. महज चर्चा के लिए जितनी भारी भरकम राशि खर्च की गई अगर इतनी राशि गरीबी और भुखमरी की मार झेल रहे अफ्रीका के किसी इलाके में खर्च की जाती तो शायद वहां के लोगों का कुछ भला होता. जी-8 सम्मेलन हर बार किसी पिकनिक की तरह ही रहा है.
जहां दुनिया के बड़े-बड़े नेता मिल बैठकर कुछ देर चर्चा करते हैं, लजीज व्यंजनों का लुत्फ उठाते हैं, ऐशो आराम के बीच तीन दिन गुजारते हैं और फिर वापस अपने-अपने देश लौट जाते हैं. पिछली बार भी जर्मनी में आयोजित जी-8 सम्मेलन में ग्लोबल वार्मिंग पर कोई खास कारगर रणनीति नहीं बन पाई थी. हालांकि सदस्य देशों ने 2050 तक ग्रीन हाउस गैसों में 50 फीसदी कटौती के लक्ष्य पर गंभीरता दिखाई थी लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश के इस अड़ियल रवैये ने की जब तक चीन और भारत जैसे विकासशील देश इस पर सहमत नहीं होते वह रजामंद नहीं होंगे ने सारे प्रयासों पर पानी फेर दिया था. एशिया कार्बन व्यापार के निदेशक के मुताबिक ग्रीन हाउस गैसों में कटौती के लिए जी-8 नेताओं की ओर से स्वच्छ ऊर्जा के जोरदार समर्थन की आशा कर रहे लोगों को निराशा ही हाथ लगी है. जलवायु परिवर्तन के मसले पर ही इंडोनेशिया के बाली में हुए सम्मेलन में भी अमेरिका आदि विकसित देशों की वजह से क्योटो संधि पर बात नहीं बन पाई थी. अमेरिका आदि देश शुरू से ही ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभावों के लिए तेजी से विकास कर रहे भारत और चीन को ही दोषी करार देते आए हैं. वह इस बात को मानने को कतई तैयार नहीं है कि ग्रीन हाउस गैसों में बढ़ोतरी के लिए वो भी बराबर के जिम्मेदार हैं. ग्रीन हाउस गैसे पिछले आठ लाख साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है.
वैज्ञानिक कई बार आगह कर चुके हैं कि अगर अब भी इस दिशा में कठोर कदम नहीं उठाए गए तो परिणाम बहुत ही भयानक होंगे. जलवायु परिवर्तन के साथ ही भुखमरी जैसे विषय पर भी सम्मेलन में कुछ खास नहीं हो पाया. महज एक साल में हालात बद से बदतर हो गए हैं. जून 2007 में कच्चा तेल 70 डॉलर प्रति बैरल था. इस समय ये 150 के आसपास मंडरा रहा है. दस करोड़ में अधिक लोगों पर भुखमरी का खतरा है. कई देशों में तो रोटी के लिए दंगे तक हो रहे हैं. खुद भारत में ही हालात खस्ता हुए पड़े हैैं. पिछले साल यहां मुद्रास्फीति की दर इन दिनों 4.33 थी, जबकि अब यह आंकड़ा 12 पार करने को बेताब है. पिछले चार जी-8 शिखर सम्मेलन आर्थिक मुद्दों के साथ आतंकवाद या पंसद-नापसंद के विषयों पर ही भटकते रहे. इस बार भी महज सहमति बनने के अलावा कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं हो पाया.अगर हर बार भारी-भरकम खर्च के बाद बात महज सहमति तक ही सिमट के रह जाए तो ऐसे सम्मेलनों का क्या फायदा.
क्या है जी-8-दुनिया के सबसे अमीर एवं औद्योगिक देशों का अनौपचारिक संगठन है. ये आठ देश हर साल आम आदमी से जुड़े मसलों पर चर्चा के लिए बैठक करते हैं.
1998 में जुड़ा रूस-इसके सदस्यों में अमेरिका,ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी,जापान,इटली और कनाडा हैं. जबकि रूस को 1998 में आठवें सदस्य के रूप में संगठन में शामिल किया गया.
जी-5 आउटरीच समूह-दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं भारत, ब्राजील,चीन, मेक्सिको एवं दक्षिण अफ्रीका के प्रमुखों को भी इस सम्मेलन में आमंत्रित किया जाता है. इस समूह को जी-5 आउटरीच स्टेट्स कहा जाता है.
क्या है ग्लोबल वामिर्ंग: कारण और उपाय-वैज्ञानिक मानते हैं कि मानवीय गतिविधियां ही ग्लोबल वामिर्ंग के लिए दोषी हैं. ग्लोबल वामिर्ंग या वैश्विक तापमान बढ़ने का मतलब है कि पृथ्वी लगातार गर्म होती जा रही है. विज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले दिनों में सूखा बढ़ेगा, बाढ़ की घटनाएं बढ़ेंगी और मौसम का मिजाज बुरी तरह बिगड़ा हुआ दिखेगा. इसका असर दिखने भी लगा है. ग्लेशियर पिघल रहे हैं और रेगिस्तान पसरते जा रहे हैं. कहीं असामान्य बारिश हो रही है तो कहीं असमय ओले पड़ रहे हैं. कहीं सूखा है तो कहीं नमी कम नहीं हो रही है.वैज्ञानिक कहते हैं कि इस परिवर्तन के पीछे ग्रीन हाउस गैसों की मुख्य भूमिका है. जिन्हें सीएफसी या क्लोरो फ्लोरो कार्बन भी कहते हैं. इनमें कार्बन डाई ऑक्साइड है, मीथेन है, नाइट्रस ऑक्साइड है और वाष्प है.
तो क्या कारण हैं ?-वैज्ञानिक कहते हैं कि इसके पीछे तेजी से हुआ औद्योगीकरण है, जंगलों का तेजी से कम होना, पेट्रोलियम पदार्थों के धुंए से होने वाला प्रदूषण और फ्रिज, एयरकंडीशनर का बढ़ता प्रयोग भी है.
क्या होगा असर?-इस समय दुनिया का औसत तापमान 15 डिग्री सेंटीग्रेड है और वर्ष 2100 तक इसमें डेढ़ से छह डिग्री तक की वृद्धि हो सकती है. एक चेतावनी यह भी है कि यदि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन तत्काल बहुत कम कर दिया जाए तो भी तापमान में बढ़ोत्तरी तत्काल रुकने की संभावना नहीं है. वैज्ञानिकों का कहना है कि पर्यावरण और पानी की बड़ी इकाइयों को इस परिवर्तन के हिसाब से बदलने में भी सैकड़ों साल लग जाएंगे.
रोकने के उपाय- ग्लोबल वामिर्ंग में कमी के लिए मुख्य रुप से सीएफसी गैसों का ऊत्सर्जन कम रोकना होगा और इसके लिए कूलिंग मशीनों का इस्तेमाल कम करना होगा या ऐसी मशीनों का उपयोग करना होगा जिनसे सीएफसी गैसें कम निकलती हैं. औद्योगिक इकाइयों की चिमनियों से निकले वाला धुंआ हानिकारक हैं और इनसे निकलने वाला कार्बन डाई ऑक्साइड गर्मी बढ़ाता है. इकाइयों में प्रदूषण रोकने के उपाय करने होंगे.
नीरज नैयर
बीते दिनों जापान में खाद्यान्न समस्या, जलवायु परिवहन, और आसमान छूती तेल की कीमतों पर लगाम लगाने का रास्ता खोजने के उद्देश्य से आपोजिट जी-8 सम्मेलन में दुनिया ने सबसे धनी आठ देशों के साथ तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों के जी-5 आउटीच समूह ने भी शिरकत की. तीन दिनों तक चले विचार मंथन में
60 अरब येन यानी करीब 283 मिलियन पाउंड और रुपए में करीबन 2400 करोड़ खर्च किए गये मगर नतीजा वही निकला जिसकी आशंका जताई जा रही थी. ग्लोबल वार्मिंग जैसे अहम मसले पर बात वहीं आकर अटक गई, जहां से शुरू हुई थी. विकासशील देशों ने विकसित देशों के कार्बन उत्सर्जन संबंधी फार्मूले को मानने से इंकार कर दिया और विकसित देश अपनी जिम्मेदारी के लिए कोई भी रूपरेखा तैयार करने से बच निकले. हालांकि सम्मेलन के अंत में 2050 तक ग्रीन हाउस गैसों के प्रभाव को कम करने पर सभी देशों ने सहमति जरूर जताई मगर यह साफ नहीं किया गया है कि पहल कौन करेगा. क्या भारत और चीन अपने विकसित होने के सपने को अधूरा छोड़ेंगे या फिर अमेरिका और ब्रिटेन आगे बढ़कर कोई उदाहरण पेश करेंगे. ऐसी कोई संभावना नजर नहीं आती. महज चर्चा के लिए जितनी भारी भरकम राशि खर्च की गई अगर इतनी राशि गरीबी और भुखमरी की मार झेल रहे अफ्रीका के किसी इलाके में खर्च की जाती तो शायद वहां के लोगों का कुछ भला होता. जी-8 सम्मेलन हर बार किसी पिकनिक की तरह ही रहा है.
जहां दुनिया के बड़े-बड़े नेता मिल बैठकर कुछ देर चर्चा करते हैं, लजीज व्यंजनों का लुत्फ उठाते हैं, ऐशो आराम के बीच तीन दिन गुजारते हैं और फिर वापस अपने-अपने देश लौट जाते हैं. पिछली बार भी जर्मनी में आयोजित जी-8 सम्मेलन में ग्लोबल वार्मिंग पर कोई खास कारगर रणनीति नहीं बन पाई थी. हालांकि सदस्य देशों ने 2050 तक ग्रीन हाउस गैसों में 50 फीसदी कटौती के लक्ष्य पर गंभीरता दिखाई थी लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश के इस अड़ियल रवैये ने की जब तक चीन और भारत जैसे विकासशील देश इस पर सहमत नहीं होते वह रजामंद नहीं होंगे ने सारे प्रयासों पर पानी फेर दिया था. एशिया कार्बन व्यापार के निदेशक के मुताबिक ग्रीन हाउस गैसों में कटौती के लिए जी-8 नेताओं की ओर से स्वच्छ ऊर्जा के जोरदार समर्थन की आशा कर रहे लोगों को निराशा ही हाथ लगी है. जलवायु परिवर्तन के मसले पर ही इंडोनेशिया के बाली में हुए सम्मेलन में भी अमेरिका आदि विकसित देशों की वजह से क्योटो संधि पर बात नहीं बन पाई थी. अमेरिका आदि देश शुरू से ही ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभावों के लिए तेजी से विकास कर रहे भारत और चीन को ही दोषी करार देते आए हैं. वह इस बात को मानने को कतई तैयार नहीं है कि ग्रीन हाउस गैसों में बढ़ोतरी के लिए वो भी बराबर के जिम्मेदार हैं. ग्रीन हाउस गैसे पिछले आठ लाख साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है.
वैज्ञानिक कई बार आगह कर चुके हैं कि अगर अब भी इस दिशा में कठोर कदम नहीं उठाए गए तो परिणाम बहुत ही भयानक होंगे. जलवायु परिवर्तन के साथ ही भुखमरी जैसे विषय पर भी सम्मेलन में कुछ खास नहीं हो पाया. महज एक साल में हालात बद से बदतर हो गए हैं. जून 2007 में कच्चा तेल 70 डॉलर प्रति बैरल था. इस समय ये 150 के आसपास मंडरा रहा है. दस करोड़ में अधिक लोगों पर भुखमरी का खतरा है. कई देशों में तो रोटी के लिए दंगे तक हो रहे हैं. खुद भारत में ही हालात खस्ता हुए पड़े हैैं. पिछले साल यहां मुद्रास्फीति की दर इन दिनों 4.33 थी, जबकि अब यह आंकड़ा 12 पार करने को बेताब है. पिछले चार जी-8 शिखर सम्मेलन आर्थिक मुद्दों के साथ आतंकवाद या पंसद-नापसंद के विषयों पर ही भटकते रहे. इस बार भी महज सहमति बनने के अलावा कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं हो पाया.अगर हर बार भारी-भरकम खर्च के बाद बात महज सहमति तक ही सिमट के रह जाए तो ऐसे सम्मेलनों का क्या फायदा.
क्या है जी-8-दुनिया के सबसे अमीर एवं औद्योगिक देशों का अनौपचारिक संगठन है. ये आठ देश हर साल आम आदमी से जुड़े मसलों पर चर्चा के लिए बैठक करते हैं.
1998 में जुड़ा रूस-इसके सदस्यों में अमेरिका,ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी,जापान,इटली और कनाडा हैं. जबकि रूस को 1998 में आठवें सदस्य के रूप में संगठन में शामिल किया गया.
जी-5 आउटरीच समूह-दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं भारत, ब्राजील,चीन, मेक्सिको एवं दक्षिण अफ्रीका के प्रमुखों को भी इस सम्मेलन में आमंत्रित किया जाता है. इस समूह को जी-5 आउटरीच स्टेट्स कहा जाता है.
क्या है ग्लोबल वामिर्ंग: कारण और उपाय-वैज्ञानिक मानते हैं कि मानवीय गतिविधियां ही ग्लोबल वामिर्ंग के लिए दोषी हैं. ग्लोबल वामिर्ंग या वैश्विक तापमान बढ़ने का मतलब है कि पृथ्वी लगातार गर्म होती जा रही है. विज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले दिनों में सूखा बढ़ेगा, बाढ़ की घटनाएं बढ़ेंगी और मौसम का मिजाज बुरी तरह बिगड़ा हुआ दिखेगा. इसका असर दिखने भी लगा है. ग्लेशियर पिघल रहे हैं और रेगिस्तान पसरते जा रहे हैं. कहीं असामान्य बारिश हो रही है तो कहीं असमय ओले पड़ रहे हैं. कहीं सूखा है तो कहीं नमी कम नहीं हो रही है.वैज्ञानिक कहते हैं कि इस परिवर्तन के पीछे ग्रीन हाउस गैसों की मुख्य भूमिका है. जिन्हें सीएफसी या क्लोरो फ्लोरो कार्बन भी कहते हैं. इनमें कार्बन डाई ऑक्साइड है, मीथेन है, नाइट्रस ऑक्साइड है और वाष्प है.
तो क्या कारण हैं ?-वैज्ञानिक कहते हैं कि इसके पीछे तेजी से हुआ औद्योगीकरण है, जंगलों का तेजी से कम होना, पेट्रोलियम पदार्थों के धुंए से होने वाला प्रदूषण और फ्रिज, एयरकंडीशनर का बढ़ता प्रयोग भी है.
क्या होगा असर?-इस समय दुनिया का औसत तापमान 15 डिग्री सेंटीग्रेड है और वर्ष 2100 तक इसमें डेढ़ से छह डिग्री तक की वृद्धि हो सकती है. एक चेतावनी यह भी है कि यदि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन तत्काल बहुत कम कर दिया जाए तो भी तापमान में बढ़ोत्तरी तत्काल रुकने की संभावना नहीं है. वैज्ञानिकों का कहना है कि पर्यावरण और पानी की बड़ी इकाइयों को इस परिवर्तन के हिसाब से बदलने में भी सैकड़ों साल लग जाएंगे.
रोकने के उपाय- ग्लोबल वामिर्ंग में कमी के लिए मुख्य रुप से सीएफसी गैसों का ऊत्सर्जन कम रोकना होगा और इसके लिए कूलिंग मशीनों का इस्तेमाल कम करना होगा या ऐसी मशीनों का उपयोग करना होगा जिनसे सीएफसी गैसें कम निकलती हैं. औद्योगिक इकाइयों की चिमनियों से निकले वाला धुंआ हानिकारक हैं और इनसे निकलने वाला कार्बन डाई ऑक्साइड गर्मी बढ़ाता है. इकाइयों में प्रदूषण रोकने के उपाय करने होंगे.
नीरज नैयर
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