Friday, March 18, 2011

...तो क्या रन बनाना छोड़ दें सचिन

नीरज नैयर
आलोचना करने वाले भी कुत्ते की पूंछ की तरह होते हैं, कितना भी समझाओ, हकीकत से रूबरू कराओ मगर समझने को तैयार ही नहीं होते। क्रिकेट खासकर सचिन तेंदुलकर के मामले में तो इन अलोचकों के मुंह इतने चौड़े हैं कि पूरी की पूरी फुटबॉल भी अंदर चली जाए। सचिन ने विश्वकप के दौ मैंचों में शानदार सैंकड़ा जड़ा, मगर आलोचकों ने उसमें भी आलोचना की वजह ढूंढ ली। 27 फरवरी को इंग्लैंड के खिलाफ मास्टर ब्लास्टर ने 104.34 की औसत से 115 गेंदों में 120 रन बनाए, जिसमें 10 चौके और पांच छक्के शामिल थे। इसके बाद 12 मार्च को दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ तेंदुलकर ने 109.90 की औसत से 101 गेंदों में 111 रन ठोंके, जिसमें 8 चौके और 3 छक्के शामिल हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश इन दोनों ही मैचों में खेल खत्म होते-होते भारत बहुत दयनीय स्थिति में पहुंच गया। इंग्लैंड के साथ तो किसी तरह टाई करवाकर उसने लाज बचा ली, मगर दक्षिण अफ्रीका ने ये मौका भी नहीं दिया। नागपुर में अफ्रीकी खिलाड़ियों ने टीम इंडिया की नाक काटके ही दम लिया। भारत ये मैच 3 विकेट से हारा। इन दोनों हार का ठीकरा वैसे तो फूटना चाहिए था कप्तान बने बैठे महेंद्र सिंह धोनी पर मगर आलोचकों ने सचिन को शिकस्त का सेहरा पहना दिया। इसके पीछे तर्क दिए गए कि सचिन ने जब-जब शतक ठोंके टीम मैच हार गई। अब भला कोई इन आलोचकों से पूछे कि क्या सचिन रन बनाना छोड़ दें, चलिए छोड़ भी दें तो क्या गधे सरीखी बेसुरी तान छेड़ने वाले ये आलोचक खामोशी अख्तियार कर सकेंगे? निश्चित तौर पर नहीं, तेंदुलकर का बल्ला थमते ही ये चीखने लगेगे कि सचिन टीम पर बोझ हैं, उन्हें निकाल देना चाहिए आदि, आदि। सचिन की आलोचना करने वाले कहते हैं कि मास्टर महज अपने लिए खेलते हैं, अर्धशतक या शतक तक पहुंचते-पहुंचते वो संभलकर खेलना शुरू कर देते हैं ताकि रिकॉर्ड बन सके। अव्वल तो इसमें कोई सच्चाई नहीं है और अगर वो ऐसा करते भी हैं तो इसमें बुराई क्या है। नए-नए रिकॉर्ड गढ़ने की महत्वकांक्षा ही इंसान को ऊंचाईयों तक पहुंचाती है, और वैसे भी ये तो इंसानी फितरत है कि सफलता के शिखर तक पहुंचते-पहुंचते वो कदम थोड़ा संभलक रखना शुरू कर देता है। आलोचना करने वाले अगर सचिन की जगह होते तो क्या वो खुद ऐसा नहीं करते। ऐसा कौनसा खिलाड़ी है जो 49 को 50 और 99 को 100 बनते नहीं देखना चाहेगा। चलिए एक बागरी मान भी लिया जाए कि सचिन अपने रिकॉर्ड की लिए खेलते हैं, पर फिर भी खेलते तो हैं। टीम इंडिया का हर खिलाड़ी यदि अपने लिए ही खेलना सीख जाए तो हार-जीत का प्रतिशत आधे से भी कम रह जाएगा। इंसान अपने लिए सबसे अच्छा करने की कोशिश करता है, अगर खिलाड़ियों में एक दूसरे से यादा अच्छी परफॉर्म करने की होड़ हो जाए तो टीम का भला तो अपने आप ही हो जाएगा। सचिन अगर बुरा खेलें तो बुरा कहने में कोई बुराई नहीं, लेकिन अच्छा खेलने के बाद भी उनपर उंगलियां उठाना बीमार मानसिकता का ही उदाहरण है। जिन दोनों मैचों में सचिन ने सेंचुरी लगाई उसमें टीम के बाकी खिलाड़ियों का प्रदर्शन क्या रहा, ये भी गौर करने वाली बात है। इंग्लैंड के साथ मैच में प्रमुख 6 बल्लेबाजों के रनों का कुल योग रहा 197 और दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ यह घटकर रह गया 167। अब जरा इस योग में खिलाड़ियों के योगदान पर नजर डाल लेते हैं, इंग्लैंड के खिलाफ सहवाग ने 35, गंभीर ने 51, युवराज ने 58 पठान ने 14, कोहली ने 8 और धोनी ने 31 रन मारे। जबकि अफ्रीका के खिलाफ सहवाग 73, गंभीर 69, पठान 0, युवराज 12, कोहली 1 और खुद धोनी महज 12 रन बना पाए। यानी दोनों मैचों में सचिन ने मैच विनिंग पारियां खेली, बावजूद इसके टीम अगर नहीं जीत पाई तो इसके गुनाहगार बाकी के खिलाड़ी हैं न कि सचिन। ऐसा सिर्फ हमारे यहां ही हो सकता है कि रन बनाने वाले को अलोचना मिले और वो जो बस अपनी किस्मत का खा रहे हैं, उनको सर-आंखों पर बैठाया जाए। मेरा इशारा यहां महेंद्र सिंह धोनी की तरफ है, कप्तान के तौर पर धोनी ने आखिरी बार यादगार पारी कब खेली, शायद ही किसी को याद होगा। विश्वकप के अब तक के मैचों में उनका प्रदर्शन एक दोयम दर्जे के बल्लेबाज जैसा ही रहा है। दक्षिण अफ्रीका के विरुध्द उनके गलत फैसलों ने सचिन और सहवाग की मेहनत को मटियामेट कर दिया। टीम इंडिया का पहला विकेट 142 पर सहवाग के रूप में गिरा, उसके बाद जब सचिन पवेलियन लौटे तो स्कोर था 267। यानी बाकी के बल्लेबाज सिर्फ 29 रन ही जोड़ पाए। कागजों पर धुरंधर कहे जाने वाले बल्लेबाज इतनी अच्छी स्थिति में भी यदि घुटने टेक दें तो इसमें भी सचिन का दोष है। जैसे सचिन ने सबको कहा हो कि यादा मत खेलना। सचिन की आलोचना नहीं बल्कि उनकाउदाहरण पेश करने चाहिए, 35 की उम्र में भी यह बल्लेबाज टीम के युवाओं पर भारी पड़ रहा है। सचिन तेंदुलकर महज क्रिकेट खेलते नहीं बल्कि उसे जीते हैं। खेल के प्रति उनका कमिटमेंट उनके हर शॉट में नजर आता है। मास्टर ब्लास्टर ने वनड़े में 48 और टेस्ट मैचों में 51 शतक जमाए हैं। अब तक कुल 13 बार ऐसा हुआ है जब सचिन ने शतक बनाया और टीम मैच हार गई। ये भी एक तरह से रिकॉर्ड है, सचिन के अलावा वेस्टइंडीज के क्रिस गेल भी ऐसे दूसरे नंबर के बल्लेबाज हैं जिनके 9 शतक टीम के काम नहीं आए। 48 में से अगर 13 घटा भी दिए जाएं तो भी 35 बचते हैं, क्या ये आंकड़ा सचिन की तारीफ करने के लिए काफी नहीं। तेंदुलकर की आलोचना करने वालों को इस बात पर भी ऐतराज है कि उन्हें क्रिकेट का भगवान क्यों कहा जाता है, और यदि कहा जाता है तो वो हर मैच क्यों नहीं जिता पाते। विरोध करने का ये बहुत ही बेतुका सा तर्क है, सचिन को भगवान की उपाध्दि उनके खेल के प्रति समपर्ण और अतुल्य प्रदर्शन की बदौलत मिली है। लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि पौराणिक कथाओं की तरह वो कोई दैव्य रूप हैं जो हाथ घुमाएंगे और हर बॉल बाउंड्री पार कर जाएगी। वो भी हाड़-मांस का इंसान है, दर्द और थकान उसे भी होती है। सचिन मैदान पर अपना सौ प्रतिशत देने में विश्वास रखते हैं, लेकिन कभी-कभी उनका बल्ला भी साथ नहीं देता और ऐसा हर इंसान के साथ होता है। खैर आलोचना करने वालों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, उनका काम तो हर अच्छी चीज में बुराई ढूंढना है। सचिन चाहे कितना भी अच्छा क्यों न खेल लें उनकी आलोचना करने वाले अपना मुंह खोलते रहेंगे। जिस तरह कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं हो सकती, उसी तरह सचिन की आलोचना करने वाले भी नहीं सुधर सकते।

Monday, February 28, 2011

बाबा रामदेव की संपत्ति पर संशय लाजमी है

घपले-घोटालों की चर्चां के बीच आजकल एक और खबर सुर्खियों में है, वो है बाबा रामदेव और कांग्रेस की जुबानी जंग। इस जंग की सही मायनों में शुरूआत हुई कांग्रेस सांसद निनोंग एरिंग णके बयान से। अरुणाचल के सांसद साहब बाबा की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम से इस कदर आहत हुए कि उन्होंने अपशब्द तक कह डाले। बाबा की मानें तो एरिंग ने एंग्री यंगमैन की भूमिका उन्हें ब्लडी इंडियन और न जाने क्या-क्या कहा। सांसद महोदय ने बाबा को धमकी भी दी कि अगर उन्होंने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान बंद नहीं किया तो गंभीर नतीजे भुगतने होंगे। गंभीर नतीजों से उनका इशारा किस तरफ था ये तो वही बता सकते हैं, लेकिन इस तरह की भाषा एक सांसद के मुंह से अच्छी नहीं लगती। जिम्मेदार पद पर काबिज होने के बाद अपनी जिम्मेदारी समझना हमारे नेता पता नहीं कब सीखेंगे। वैसे देखा जाए तो राजनीति में सफलता के लिए बदजुबानी और दबंगई आजकल मूलमंत्र बन गए हैं। जो जितना बड़ा दबंग, वो उतना ही बड़ा नेता। यही वजह है कि संसद तक पहुंचने वाले माननीयों में आपराधिक छवि वालों की भी अच्छी-खासी तादाद होती है। खैर ये एक अगल मामला है, हम अपने मूल मुद्दे पर लौटते हैं। एरिंग द्वारा शुरू की गई जुबानी जंग को और तीखा बनाया शब्दबाणों के लिए मशहूर हो चुके दिग्विजय सिंह ने। दिग्गी राजा ने रामदेव को संपत्ति के खुलासे की चुनौती दी, इसके जवाब में बाबा ने भी गांधी-नेहरू परिवार को निशाना बनाया।

कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की दूसरों पर कटाक्ष करना आदत सी बन चुकी है। कुछ दिनों पहले तक वो भगवा आतंकवाद के नाम पर भाजपा और संघ को घेरे हुए थे, और अब योगगुरु को उनका नया टारगेट हैं। ऐसा लगता है जैसे कांग्रेस ने उन्हें इसी काम के लिए रखा हुआ है कि जब भी कोई सरकार की तरफ ढ़ेढी निगाह करे बस बरस पड़ो। रामदेव कुछ समय से कालेधन और भ्रष्टाचार को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। उन्होंने तो संकेत दिए हैं कि उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव से वो अपनी राजनीतिक पारी शुरू कर सकते हैं। संभव है कि इसी के चलते वो दिग्गी की आंखों की किरकिरी बने हुए हों। दिग्गी राजा का सवाल है कि आखिर बाबा के पास इतने दौलत आई कहां से? भले ही कांग्रेस महासचिव की ये सवाल विशुध्द राजनीति से प्रेरित हों, पर सवाल तो हैं। बाबा के बारे में कहा जाता है कि वो एक जमाने में साइकिल से चलते थे और ये जमाना यादा पुराना भी नहीं है। अखाड़ा परिषद के बाबा हठ योगी ने हाल ही में कहा था कि रामदेव के पास साइकिल का पंचर बनवाने के पैसे नहीं थे। पर योगगुरु आज हेलीकॉप्टर से सफर करते हैं। उनका खुद का आइलैंड भी है, जिसकी कीमत 20 लाख स्टर्लिंग पाउंड है। बाबा के आश्रमों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। हरिद्वार से लेकर अरावली की पहाड़ियों और स्कॉटलैंड तक में बाबा के आश्रम हैं। उनका ट्रस्ट दुनिया भर में अपने उत्पाद बेचता है। णखबरों की अगर मानें तो करीब तीन साल पहले रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव ने खुद स्वीकारा था कि उनका सालाना करोबार एक लाख करोड़ का होने वाला है। कहा तो ये भी जाता है कि पंताजलि योग की शाखाएं ब्रिटेन, अमेरिका, थाइलैंड, नेपाल, दक्षिण अफ्रीका और दुबई तक में खुल गई हैं। आठ सौ बीघा में बने पंतजलि योग ग्राम में फाइव स्टार संस्कृति वाला पंचकर्म सेंटर है। इसके साथ ही पंतजलि में गोशाला की स्थापना की गई है, बाबा के पास करीब 500 गाये हैं, जिनमें विदेशी नस्लों की तादाद सबसे यादा है। बाबा ने 2009 में हरिद्वार में 125 एकड़ खेती की जमीन पर एक कंपनी की शुरूआत की थी।

रामदेव के इस मेगा फूड पार्क की कुल लागत 500 करोड़ रुपए आने का अनुमान है। पहले चरण में 250 करोड़ रुपए की लागत आई जबकि दूसरे चरण ढाई सौ करोड़ की लागत का अनुमान है। बाबा आज के वक्त में किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं, देश से लेकर विदेशों तक में उनके सैकड़ों भक्त हैं। इस बात में कोई दोराय नहीं कि उन्होंने फिर से योग को जीवित किया है, लेकिन सिर्फ योग के सहारे इतनी तेजी से संपत्ति अर्जित करना संदेह तो पैदा करता ही है। बाबा की संपत्ति को लेकर सवाल सिर्फ दिग्विजय सिंह ने ही नहीं किया है कुछ दूसरे संगठन भी इसका खुलासा चाहते हैं। दरअसल बाबा राजनीतिज्ञों के साथ-साथ कई संगठनों के निशाने पर हैं, इसकी मूल वजह है उनका योग के अलावा दूसरे क्षेत्रों में हस्तक्षेप। एक जमाने में लालू प्रसाद यादव रामदेव के मुरीद थे, मगर आज वो उनकी मुखालफत करने से पीछे नहीं हटते। कुछ वक्त पहले लालू ने कहा था, रामदेव खुद को अच्छा साबित करने के लिए देश के हर नेता की आलोचना करते हैं, वो बौरा गए हैं। राजद प्रमुख तो यहां तक कह गए थे कि अगर हमने बाबा को नहीं बचाया होता तो वो बहुत पिटे होते। लालू जैसी खीज दूसरे नेताओं की भी है। पूर्व स्वास्थ्यमंत्री अंबूमणि रामदेव से लेकर सीपीएम नेता वृंदा करात तक बाबा से खार खाए बैठे हैं। वृंदा करात ने आरोप लगाया था कि रामदेव आयुर्वेद दवाओं में हड्डियों का प्रयोग करते हैं। योग से कैंसर मिटाने के दावे को लेकर बाबा का अंबूमणि से विवाद खूब चर्चा में रहा था। हाल ही में समलैंगिकता के मुद्दे पर उनका बॉलिवुड अभिनेत्री सेलीना जेटली से टकराव हुआ, ये बात सही है कि दूसरे नागरिकों की तरह बाबा को भी अपना मत रखने का हक है। लेकिन उन्हें संवेदनशील मुद्दों को छेड़ते वक्त थोड़ा सावधानी से काम लेना चाहिए। वैसे ये सोचने वाली बात है कि एक जमाने में कांग्रेस के करीबी कहे जाने वाले बाबा अचानक से कांग्रेस विरोधी कैसे हो गए। 2009 में जब बाबा ने अपना फूड पार्क बनाया था तो उसके लिए सरकार से ही सहायता मिली थी।

खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय ने बाबा को 50 करोड़ रुपए का अनुदान दिया था। और तो और केंद्रीय रायमंत्री सुबोधकांत सहाय के गृहक्षेत्र रांची में भी एक फूड पार्क की आधारशिला रखी गई थी, जिसमें बाबा सरकार के सहयोगी थे। उस दौरान बाबा की संघ और विहिप से दूरी भी साफ तौर पर देखी जा सकती थी। रामदेव ने संघ समर्थित बैठकों तक में जाना बंद कर दिया था। बहरहाल अब दोनों एक दूसरे पर तीर ताने खड़े हैं, बाबा की संपत्ति को लेकर जो संशय है उसका समाधान होना चाहिए। लेकिन इसके पीछे राजनीति उचित नहीं। जिस तरह से कांग्रेस सांसद बाबा के खिलाफ लामबंद हैं, उसमें साफ तौर पर सियासत नजर आ रही है। रामदेव यदि कालेधन का मुद्दा उठा रहे हैं तो उससे कांग्रेसियों को मिर्ची नहीं लगनी चाहिए। जिस तरह का रवैया दिग्विजय सिंह और निनोंग एरिंग ने अपनाया है उससे उनका खुद का और कांग्रेस का ही नुकसान है।

Wednesday, February 2, 2011

इच्छामृत्यु क्यों न हो कानूनी

नीरज नैयर
कुछ वक्त पहले गुजारिश नाम की एक फिल्म आई थी। रितिक रोशन और ऐश्वर्या राय अभीनीत यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर तो कुछ खास नहीं कर पाई, लेकिन इसके लंबे वक्त से चला आ रही इच्छामृत्यु या यूथनेशिया की चर्चा को एक बार फिर से गर्म कर दिया। फिल्म में रितिक ने एक जादूगर का किरदार निभाया है जो बाद में लकवे का शिकार हो जाता है। चलने-फिरने में पूरी तरह असमर्थ यह जादूगर अदालत से इच्छामृत्यु की गुहार लगाता है, जिसे बार-बार ठुकरा दिया जाता है। परिवार के अलावा कोई भी इस फैसले में उसका साथ नहीं देता। हालांकि दर्द के सैलाब के बीच ऐश्वर्या के रूप में उसे जिंदगी जीने का एक बहाना मिल जाता है, बाकी हिंदी फिल्मों की तरह काफी हद तक इस फिल्म का अंत भी खुशनुमा ही रहा। लेकिन, हकीकत में जिंदगी के सताए हुए लोगों की जिंदगी का अंत शायद इतना अच्छा नहीं होता। हाल ही में बलात्कार की शिकार एक महिला ने सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु की गुहार लगाई है। यह महिला पिछले 36 सालों से दिमागी तौर पर मृत है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो एक जिंदा लाश। अरुणा नाम की इस महिला के साथ 1973 में बलात्कार किया गया। पेशे से नर्स अरुणा को अस्पताल में सफाई कर्मचारी ने क्रूरता और दरिंदगी की सारी हदें पार करते हुए हवस का शिकार बनाया, अरुणा के गले में जंजीर डालकर उसे पलंग से बांधा गया, उसके शरीर को भूखे भेड़िए की तरह नोचा गया। इस घटना के बाद से अरुणा की जिंदगी बिस्तर पर पड़ी पत्थर की मूर्ति की माफिक बनकर रह गई है, फर्क बस इतना है कि इस मूर्ति में जान है। अब सवाल ये उठता है कि क्या इस याचिका को भी गुजारिश के जादूगर की याचिका की तरह खारिज कर दिया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका 2009 में आई थी, कोर्ट ने अब इस मुद्दे पर अटॉर्नी जनरल से राय मांगी है। साथ ही अदालत ने तीन डॉक्टरों की एक टीम भी गठित की है, जो अरुणा की दशा पर रिपोर्ट सौपेंगी। भारत में इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता नहीं है, इस लिहाज से इस बात की संभावना बेहद कम है कि सुप्रीम कोर्ट कोई नजीर पेश करेगा। एक ऐसा व्यक्ति जिसने अपनी जिंदगी के तीन दशक बिस्तर पर पड़े-पड़े गुजार दिए हों, उसे जिंदा रखना क्या उसके साथ अन्याय नहीं होगा। जो पहले से ही मर चुका हो, उसे फिर से मौत देना मौत की रस्म अदायगी से यादा और क्या हो सकता है। वैसे ये कोई पहला मामला नहीं है, जिदंगी से मात खाने वाले बहुत से लोग अपनी मर्जी से दुनिया छोड़ने की मांग कर चुके हैं। दो साल पहले उत्तर प्रदेश के एक व्यक्ति ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर अपने बच्चों के लिए इच्छामृत्यु मांगी थी। 10 से 16 साल की उम्र के यह बच्चे अपने पैरों पर खड़े होने तक में असमर्थ थे, उनके शरीर के अधिकतर अंगों (खासकर गर्दन के नीचे के) ने काम करना बंद कर दिया था। 2008 में हिमाचल प्रदेश की एक इंजीनियर ने दुनिया छोड़ने की इच्छा जाहिर की थी। सीमा नाम की इस इंजीनियर ने अपनी जिंदगी के 13 अनमोल साल एक कमरे में ही गुजार दिए। उसके शरीर के अधिकतर अंग अर्थराइटिस से ग्रस्त थे, कंधे, कोहनी और कमर के नीचे का हिस्सा पूरी तरह निष्क्रीय बन गया था। सीमा ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट से लेकर मुख्यमंत्री तक गुहार लगाई। ऐसे ही 2004 में एक मां ने अपने 24 साल के बेटे के लिए मौत मांगी थी, ताकि उसके अंगों को दान किया जा सके। शतरंज खिलाड़ी वेंकटेश की जिंदगी लाइफ सपोर्ट सिस्टम के सहारे चल रही थी, डॉक्टर तक उसके ठीक होने की उम्मीद छोड़ चुके थे। इन सारे मामलों में जिंदगी मौत से भी यादा बदतर है , ये लोग यादा जीए तो ताउम्र सिर्फ जिंदगी को कोसते रहेंगे।

मौत का इंतजार करना दुनिया में शायद सबसे कठिन काम है, और ये लोग इसी इंतजार से गुजर रहे हैं। ऐसे में इन्हें जिंदगी से मुक्ति क्यों नहीं मिलनी चाहिए। निश्चित तौर पर कोर्ट के साथ-साथ ऐसे बहुत से लोग होंगे जो कभी भी यूथनेशिया के लिए तैयार नहीं होंगे। इसके पीछे कई कारण हैं, सबसे पहला तो यही कि अगर इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता मिल गई तो इसके दुरुपयोग की आशंका हमेशा बनी रहेगी। इसके अलावा हर वो व्यक्ति जो नाकामयाबी और नकरात्मकता के दौर से गुजर रहा है, इच्छामृत्यु उसके लिए छुटकारे का आसान साधन बन जाएगी। दुनिया के कुछ मुल्कों में यूथनेशिया को कानूनी मान्यता प्रदान की गई है, जिनमें नीदरलैंड, नोर्वे, स्वीडन, फिनलैंड, बेल्जियम, लैक्समबर्ग, अल्बानिया, हॉलैंड, स्वीट्जलैंड, थाईलैंड और अमेरिका के उत्तरप्रश्चिम में स्थित ओरेजन शामिल हैं। इनमें हॉलैंड का रिकॉर्ड सबसे यादा खराब है। आंकड़ों पर यदि विश्वास किया जाए तो 1990 में यहां इच्छामृत्यु के नाम पर करीब 1030 मरीजों को बिना उनकी सहमति के मौत की नींद सुला दिया गया। वहीं, तकरीबन 22,500 मरीजों की मौत लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाए जाने से हुईं। ये आंकड़े इच्छामृत्यु की वकालत करने वाले कदमों को पीछे खींचने की ताकत रखते हैं, मगर इसके बावजूद यह एक ऐसा गंभीर विषय है जिसके बारे में विचार किए जाने की जरूरत है। सिर्फ इसलिए कि यूथनेशिया को कानूनी जामा पहनाने पर उसके दुरुपयोग की आशंका बढ़ जाएगी, उन लोगों को जिंदा रखकर तड़पने नहीं दिया जा सकता जिनकी पूरी जिंदगी दूसरों पर बोझ बन जाए। इच्छामृत्यु को लेकर हमारे देश में लंबे समय से बहस चली आ रही है, लेकिन इस बहस का अब तक कोई नतीजा नहीं निकला है। समय के साथ बदलाव जरूरी हो जाते हैं, इसलिए इस मुद्दे पर बदलाव की दिशा में भी कदम आगे बढ़ाए जाने चाहिए।

इसके साथ-साथ हमारे कानूनी ढंाचे में बहुत कुछ ऐसा है जिसमें बदलाव की जरूरत है, हमारे यहां खुदकुशी की कोशिश करने वाले पर मुकदमा चलाया जाता है। यानी जो बेचारा जिंदगी से आजिज आकर मौत को आलिंगन करने में असफल रहा हो उसे कानून पचड़ों में उलझाकर जीते-जी मारने का पूरा बंदोबस्त किया गया है। क्या वास्तव में इसकी कोई जरूरत है। कानून के जानकर इसके समर्थन में बहुत से कारण गिना सकते हैं, पर मुझे व्यक्तिगत तौर पर ऐसा लगता है कि जब हमें जिंदगी की दूसरे फैसले लेने का अधिकार है तो फिर हम कब दुनिया को अलविदा कहेंगें यह भी हमें ही तय करने दिया जाए। वैसे भी खुदकुशी जैसा कदम उठाना या मौत की मांग कोई ऐसा ही व्यक्ति कर सकता है जिसके लिए जिंदगी के कोई मायने नहीं बचे हों, तो फिर उसे जबरदस्ती जिंदा रहने को मजबूर करना कहां तक जायज है। इस बारे में न केवल गौर करने की बल्कि इससे आगे बढ़ने की भी जरूरत है।

Thursday, January 13, 2011

एक तेंदुए का एनकाउंटर

नीरज नैयर
आमतौर पर पुलिस अपराधियों का एनकांउटर करती है, लेकिन महाराष्ट्र में एक तेंदुए का एनकाउंटर किया गया। पुलिस के बहादुर जवानों ने तेंदुए पर इतनी पास से गोलियां बरसाईं कि उसे बचने का कोई मौका नहीं मिला। इस लाइव एनकाउंटर को देखने के लिए भारी तादाद में भीड़ मौजूद थी, और शायद यादातर लोग तेंदुए की मौत चाहते थे। तेंदुए का कसूर बस इतना था कि वो भूलवश रिहायशी इलाके में घुसकर घबराहट में इंसान को घायल कर बैठा। अपनी जान को खतरा देख जब इंसान दूसरे की जान लेने से नहीं चूकता तो फिर ये तो जानवर था। उससे इतनी समझ की उम्मीद भला कैसे की जा सकती है कि वो हमला करने के बजाए चुपचाप निकल जाता। और अगर वो ऐसा करने की सोचता भी तो क्या करने दिया जाता। क्या इंसान उसे रिहाइशी इलाके में आने का दंड दिए बिना जाने देता? जंगली जानवरों को इंसानों की बस्ती में आने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है, कुछ एक ही किस्मत वाले होते हैं जो सुरक्षित जंगल तक पहुंच पाते हैं। हाल ही में गुवाहाटी में एक बीमार हाथी के बच्चे को इंसानों की क्रूर भीड़ ने महज इसलिए मार डाला कि वो गलती से खेत का रुख कर बैठा था। बेजुबान की इस छोटी सी गलती पर इंसान इतना हैवान बन बैठा कि लाठी-डंडों से मासूम को तब तक पीटा गया जब तक उसने दम नहीं तोड़ दिया। दरिंदगी के इस खेल को वन विभाग और पुलिस के अधिकारी तमाशबीन बने देखते रहे, किसी ने भी हाथी की चिंघाड़ के दर्द को समझने का प्रयास नहीं किया। अगर वन अमला और पुलिसवाले चाहते तो हाथी के बच्चे को बचाया जा सकता था, लेकिन शायद उन्हें भी वो मासूम बच्चा कुसूरवार नजर आ रहा था। ऐसे ही गत 13 जनवरी को भुवनेश्वर मेें ग्रामीणों ने एक तेंदुए को न सिर्फ मौत के घाट उतारा बल्कि शव के साथ जुलूस निकालकर अपनी वीरता का परिचय भी दिया। दरअसल मैदान में खेलने पहुंचे बच्चों ने वहां तेंदुए को देखा और इसकी जानकारी उन्होंने गांव वालों को दी, इसपर हैवानियत का चोला ओढ़े गांववालों ने तेंदुए को बेदर्दी से तड़पा तड़पाकर मार डाला। गांववाले वनविभाग को भी सूचना दे सकते थे, मगर उन्होंने बेजुबान की जान लेना यादा बेहतर समझा। मनुष्य को संवेदनशील कहा जाता है, लेकिन यह कैसी संवेदनशीलता है जिसमें बेजुबानों को बेदर्दी से मारा जा रहा है। कभी मुनाफे के लिए तो कभी अपना वर्चस्व कायम करने के लिए। तेंदुए या बाघ हम तक नहीं पहुंचें, हमने ही उनके घर उजाड़कर वहां रहना शुरू कर दिया है।

विकास के नाम पर कट रहे जंगल
विकास के नाम पर घने जंगल छितरे किए जा रहे हैं, जानवरों का आशियाना हर रोज सिकुड़ता जा रहा है। भोजन-पानी की उपलब्धता लगातार सीमित होती जा रही है, बावजूद इसके अगर मूक जानवर भूले-भटके कभी रहवासीइलाकों में पहुंच जाए तो उसे मार डाला जाता है। संवेदनशीलता की ऐसी परिभाषा केवल मनुष्य ही गढ़ सकता है। ये कहां का इंसाफ है कि हम अत्याचार करते रहें और अत्याचार सहने वाला जब अपने बचाव में वार करे तो एकजुट होकर उसे मार डाला जाए। कुछ वक्त पहले यूपी में एक बाघ को आदमखोर बताकर मार गिराया गया, और चंद रोज पहले गुजरात के सूरत में एक तेंदुए की मौत का फरमान सुनाया गया है। तेंदुए को मारने के लिए हथियारों से लैस वनविभाग के कर्मचारी जंगलों को छान रहे हैं। हो सकता है कि यूपी के बाघ की तरह इस तेंदुए को भी मौत नसीब हो। ये भी हो सकता है कि इस तेंदुए की जगह किसी दूसरे को मार डाला जाए, सारे तेेंदुए लगभग एक जैसे दिखते हैं, उनके नाम-पते तो होते नहीं कि पहचाना जा सके। इस तेंदुए या उस बाघ ने जो कुछ भी किया वो अनापेक्षित था, उसने किसी प्रतिशोध में नहीं बल्कि हड़बड़ाहट और आत्मरक्षा में इंसान पर हमला बोला। जब खून करने वाले इंसान को आदमखोर घोषितकर उसकी मौत का फरमान जारी नहीं किया जाता तो फिर इन मूक जानवरों के साथ ऐसा क्यों किया जा रहा है। क्या इन्हें मनुष्य की माफिक जीने का हक नहीं। मनुष्य अपने खिलाफ हुए अत्याचार की आवाज उठा सकता है, लेकिन ये जानवर जाएं तो कहां जाएं। इनके लिए न तो कोई अदालत है, और न कोई सुनने वाला। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि एक तरफ हम इन जानवरों को बचाने के लिए पानी की तरह पैसा बहाए जा रहे हैं और दूसरी तरफ अपने ही हाथों से इन्हें मौत के घाट उतार रहे हैं।

130 तेंदुओं की मौत
पिछले साल करीब 130 तेंदुए मारे गए, जबकि गैर सरकारी संगठन ये आंकड़ा 240 के ऊपर बता रहे हैं। इस दौरान तकरीबन 17 तेंदुए मनुष्य से टकराव की भेंट चढ़े, 19 सड़क हादसों में मारे गए और लगभग आठ को वन विभाग ने मार गिराया। बाकी संभवत: शिकारियों का शिकार बने। 2009 में करीब 160 तेंदुओं का शिकार किया गया, जबकि 2008 में यह संख्या 157 थी। 2007 की गणना के मुताबिक देश में महज 2300 तेंदुए ही बचे हैं, और बाघों की संख्या इससे काफी कम 1100 के आसपास है। लेकिन असल आंकड़ा निश्चित तौर पर इससे काफी कम होगा। पिछले कुछ वक्त से बाघ, तेंदुए की मौतों की संख्या में काफी तेजी देखी गई है, तेंदुए की बात करें तो लगभग हर रोज कहीं न कहीं से इसकी मौत की खबर सुनने को मिल जाती है। जिसमें मनुष्य से टकराव की घटनाएं यादा हैं (शिकार छोड़कर)।

बर्बरता का खेल
वैसे मूक जानवरों के साथ बर्बरता केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, दुनिया के बाकी हिस्सों में भी कमोबश ऐसा ही हो रहा है। इंडोनेशिया में इन दिनों जंगलों की कटाई चल रही है, जिसका असर यहां रहने वाले आरंगुटान प्रजाति के बंदरों पर सबसे यादा पड़ा है। इंसानों की हैवानियत का आलम ये है कि इन बंदरों को चुन-चुनकर या तो मारा जा रहा है या उन्हें जंजीरों में जकड़कर अपने मनोरंजन के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। मनुष्य की यह निर्दयता जानवरों का अस्तित्व समाप्त कर रही है, अगर सबकुछ ऐसे ही चलता रहा तो आने वाले दिनों में न तो जंगल रहेंगे और न उसमें रहने वाले जानवर। फिर न कोई तेंदुआ रिहायशी इलाके का रुख करेगा, फिर न कोई बाघ आदमखोर घोषित किया जाएगा। अब ये हमें सोचना है कि हम कैसा कल चाहते हैं।

Sunday, December 26, 2010

सचिन की आलोचना और आलोचकों का तर्क

नीरज नैयर
सचिन तेंदुलकर एक ऐसा नाम है जिसके साथ तारीफों से यादा आलोचनाएं जुड़ती रहीं। सचिन जैसे-जैसे सफलता के शिखर पर चढ़ते गए आलोचना करने वालों के मुंह और चौड़े होते गए। अभी हाल ही में जब इस लिटिल मास्टर ने टेस्ट मैचों में शतकों का पचासा पूरा किया तब भी आलोचना करने वालों के मुंह बंद नहीं हुए। इस बार भी तर्क वहीं पुराना था, सचिन महज रिकॉर्ड के लिए खेलते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि टीम इंडिया को दक्षिण अफ्रीका से पहले टेस्ट में पारी और 25 रनों से हार का सामना करना पड़ा। हालांकि टीम में 10 खिलाड़ी और भी थे, लेकिन उनके चलने न चलने पर किसी ने सवाल नहीं उठाया। वैसे सचिन पर सवाल उठाना उनकी विश्वसनीयता को और पुख्ता करता है। जिससे सबसे यादा उम्मीदें होती हैं, उसी से करिश्मे अपेक्षाएं की जाती हैं। मगर इसका ये मतलब नहीं होना चाहिए कि अपेक्षाओं के पूरा न होने की स्थिति में क्षमताओं पर ही संदेह प्रकट किया जाए। सचिन तेंदुलकर के हजारों-करोड़ों प्रशंसकों के साथ ऐसे लोगों की जमात भी कम नहीं है जो हर पल सवाल उठाते हैं कि सचिन अहम मौकों पर क्यों असफल हो जाते हैं। दरअसल सचिन आम इंसान न रहकर लोगों के लिए रन बनाने की मशीन बन गए हैं, और जब इस मशीन के बल्ले से रन नहीं निकलते तो आलोचनाओं का दौर शुरू हो जाता है। हालांकि आलोचना करने वालों के पास अपनी बातों को सही साबित करने का कोई ठोस आधार नहीं है।

चंद मौकों को छोड़ दिया जाए तो क्रिकेट की दुनिया ये भगवान हर मोड़ पर अपनी श्रेष्ठता सिध्द करता आया है। जो लोग ये बोलते हैं कि सचिन अहम मुकाबलों में कोई कमाल नहीं कर पाते, वो शायद इतिहास से अंजान है या फिर जानबूझ कर अंजान बने बैठे हैं। 1990-91 का एशिया कप, 1994-95 की विल्स वर्ल्ड सीरिज, 1997-1998 का कोका कोला कप, सिंगर-अकाई कप, इंडिपेंडस कप, 1998-99 की चैम्पियन्स ट्रॉफी, 2007-08 में खेली गई सीबी ट्राई सीरिज, कॉम्पैक कप और टाइटन कप के फाइनल में सचिन के शानदार प्रदर्शन को कैसे भूला जा सकता है। कोका कोला कप में तेंदुलकर ने 131 गेंदों में 134 रनों की पारी खेली थी, ऐसे ही अकाई कप में 128, चैम्पियंस ट्रॉफी में 121, सीबी ट्राई सीरिज में 117, कॉम्पैक कप में 138, इंडिपेंडस कप में 95, टाइटप कप में 67, विल्स सीरिज में 66 रन और एशिया कप के फाइनल में 70 गेंदों में 53 रन बनाए थे। कुछ ऐसे ही 1998 में खेले गए मिनी वर्ल्ड कप के क्वार्टर फाइनल में सचिन ने ऑस्ट्रेलिया के विरुध्द 141 रन और पांच विकेट लेकर टीम को जीत दिलाई थी। क्रिकेट देखने वाले हर शख्स को धूल भरी आंधी के बीच शारजहां कप का वो मैच जरूर याद होगा जिसमें तेंदुलकर ने 131 गेंदों में 141 रनों की तूफानी पारी खेलकर अपने बूते भारत को फाइनल में पहुंचाया।

इस मैच का सबसे अफसोसजनक हिस्सा था सचिन का आऊट होना, अफसोसजनक इसलिए क्योंकि लिटिल मास्टर के पवेलियन लौटने के बाद टीम के बाकी खिलाड़ी जीत के लिए चंद रन भी नहीं जुटा सके। इस मैच में सचिन को गिलक्रिस्ट ने विकेटों के पीछे लपका, लेकिन उन्होंने खुद ने इसकी अपील नहीं की और न ही अंपायर ने उन्हें आऊट दिया फिर भी खेल भावना का परिचय देते हुए सचिन स्वयं चले गए। यहां गौर करने वाली बात ये है कि अगर वो महज रिकॉर्ड के लिए खेलते तो क्या ऐसा कर पाते, जबकि वो 150 से महज 9 कदम दूर थे। 1999 में पाकिस्तान के खिलाफ टेस्ट मैच में सचिन ने कमर पर बर्फ का बैग लागाकर और दवाईयां खाकर मोर्चा संभाला, लेकिन जब वो आऊट हुए तो उनकी जमकर आलोचना की गई। क्योंकि हमारे दूसरे खिलाड़ी बचे हुए 16 रन भी नहीं बना सके। इसी तरह 2007 में वेस्टइंडीज के साथ मैच में 85 पर होने के बाद भी सचिन धोनी को स्ट्राइक देते रहे और आखिरी गेंद पर अपना शतक पूरा किया। क्या इतने सब के बाद भी कहा जा सकता है कि सचिन अहम मौकों पर असफल रहे या वो टीम के बजाए महज अपने रिकॉर्ड बनाने के लिए खेले। किसी गलती पर आलोचना करने में कोई बुराई नहीं है लेकिन हर बात पर आलोचना एक तरह की बीमारी है। और भारत जहां क्रिकेट को धर्म के रूप में देखा जाता है, इस बीमारी से पीड़ितों की कोई कमी नहीं है। सचिन को अगर क्रिकेट का भगवान कहा जाता है तो इसके पीछे सिर्फ उनके रिकॉर्ड ही नहीं मैदान के अंदर और बाहर सौम्य, विनम्र एवं मृदुभाषी व्यक्ति की छवि भी है।

एक बात जो हर इंसान को उनसे सीखने की जरूरत है वो ये कि सचिन चुनौती और आलोचनाओं का जवाब मुंह से नहीं बल्कि अपने बल्ले से देना पसंद करते है। उनके प्रदर्शन के आगे कोई भी आलोचना यादा देर तक नहीं टिक सकती। बीच में एक वक्त ऐसा भी आया जब अलोचकों ने उन्हें क्रिकेट से सन्यास लेने तक का मशवरा दे डाला, लेकिन सचिन ने बिना बोले इन सबका का जवाब बेहतरीन अंजाद में दिया। सचिन में एक अजीब सी जीवटता है जो उन्हें दूसरों के अलग बनाती है, और शायद उनकी सफलता की वजह है। सचिन आज भी जब क्रीज पर उतरते हैं तो उनके लिए व्यक्तिगत रिकॉर्ड से यादा तिरंगे की शान बनाए रखना यादा मायने रखता है। वो सचिन तेंदुलकर ही थे जिन्होंने अपने व्यक्तिगत दर्द को दरकिनार करते हुए पिछले विश्व कप में भारत की झोली में कई जीतें डाली। अगर सचिन महज अपने लिए खेलते तो पितृशोक की खबर सुनने के बाद विश्व कप छोड़कर भारत लौट आते। मुझे और मेरे जैसे बहुत से लोगों को सचिन और उनका खेल पसंद है, लेकिन इसे अंधभक्ति नहीं कहा जा सकता। सचिन आज जिस मुकाम पर हैं वो उन्होंने खुद ही हासिल किया है, उन्हें यदि क्रिकेट का भगवान कहा जाता है तो वो जगह उन्होंने कई साल मैदान पर पसीना बहाकर कमाई है। क्रिकेट की दुनिया में भारत ने जो ऊंचाईयां छुई हैं उनमें सचिन का योगदान सबसे यादा है। सचिन रमेश तेंदुलकर की आलोचना करने वाले आखिर कैसे इन तथ्यों को नजरअंदाज कर सकते हैं, कैसे।

Tuesday, December 14, 2010

जांच क्या कि हंगामा हो गया

नीजर नैयर
अमेरिकी हवाई अड्डे पर भारतीय राजदूत मीरा शंकर की तलाशी क्या हुई दिल्ली में बैठे राजनीतिक दलों को हो-हल्ला मचाने का मौका मिल गया। भाजपा ने तो लगे हाथ रैली भी निकाल डाली। सियासी पार्टियां इस मुद्दे पर भी सरकार को घेर रही हैं, जैसे सरकार ने खुद अमेरिकी अधिकारियों से कहा हो कि मीरा की तलाशी ली जाए। हां, वो इस बात पर जरूर सरकार को घेर सकती हैं कि केंद्र सरकार अमेरिका से किस लहजे में नाराजगी व्यक्त करती है। वैसे प्रकरण के सामने आने के तुरंत बाद विदेशमंत्रालय ने थोड़ी बहुत गर्जना जरूर की, और इसका त्वरित असर भी देखने को मिला। अमेरिकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने स्वयं खेद व्यक्त करते हुए भरोसा दिलाया कि इस घटना की पुर्नवृत्ति नहीं होगी। हालांकि, अमेरिका ने ये भी साफ किया कि जो कुछ भी हुआ वो कानून के मुताबिक हुआ। अमेरिका के ट्रांसपोर्ट सिक्यूरिटी असोसिएशन (टीएसए)के तहत राजनयिकों को तलाशी में छूट नहीं दी जाती। दरअसल मीरा शंकर ने भारतीय पारंपरिक परिधान यानी साड़ी पहनी हुई थी, और टीएसए के मुताबिक तलाशी के कारणों में ढेर सारे कपड़े पहनना भी शामिल है। अब ऐसे देखा जाए तो साड़ी और बुर्के में फर्क केवल इतना ही है कि एक में चेहरा दिखता है और दूसरे में नहीं। मीरा शंकर के साथ जो गलत हुआ वो ये कि राजनयिक जैसे ओदे पर होने के बाद भी पारदर्शी बाक्स में ले जाकर उनकी हाथों से तलाशी ली गई। जबकि एयरपोर्ट अधिकारियों को दिए दिशा-निर्देशों में यह साफ किया गया है कि यदि कोई यात्री सबके सामने तलाशी नहीं देना चाहता तो उसकी जांच गोपनीय तौर पर होनी चाहिए। मीरा कुमार के साथ दूसरे कुछ अधिकारी भी, लेकिन उन्हें भी अनसुना कर दिया गया। वैसे ये कोई पहला मौका नहीं, जब अमेरिका में उच्च दर्जा प्राप्त भारतीयों को इस तरह की जांच से गुजरना पड़ा हो। पिछले साल बॉलिवुड स्टार शाहरुख खान को न्यूयार्क के लिबर्टी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर सिर्फ इसलिए रोककर पूछताछ की गई, क्योंकि उनके नाम के आगे खान जुड़ा था। इसी साल नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल से शिकागो के ओ हेयर अड्डे पर पूछताछ की गई।

इस पूछताछ की वजह इतनी थी उनका नाम और जन्मतिथि उस शख्स से मेल खा रही थी, जो अमेरिका की वॉच लिस्ट में था। इससे पीछे चलें तो राजग सरकार में रक्षामंत्री रहे जार्ज फर्नांडीस को भी अमेरिकी एयरपोर्ट पर तलाशी से गुजरना पड़ा था, और जैसा मुझे याद है उनके तो कपड़े उतरवाकर तलाशी ली गई थी। वो घटना निश्चित तौर पर अप्रत्याशित और चौंकाने वाली थी, एक रक्षामंत्री के साथ इस तरह का व्यावहार करना कहीं से उचित नहीं माना जा सकता। लेकिन इसके बाद की जो घटनाएं हैं, उन पर इतना हो-हल्ला मचाना बिल्कुल ही जायज नहीं लगता। शाहरुख खान को बेशक भारत में स्पेशल ट्रीटमेंट दिया जाता हो, उन्हेंसुरक्षा जांच जैसे झंझटों से मुक्त रखा जाता हो मगर दूसरे मुल्कों से तो ये अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वो भी वैसे ट्रीटमेंट दें। बॉलीवुड स्टार के लिए अमेरिका अपने सुरक्षा नियमों में तो बदलाव नहीं कर सकता। 911 के बाद अमेरिकी बहुत यादा सतर्क हो गए हैं, इसमें कोई दोराय नहीं कि इस सतर्कता से अमेरिकी आवाम को भी कई बार परेशानी का सामना करना पड़ता है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि उस एक आतंकी हमले के बाद दहशतगर्द अमेरिका की तरफ आंख उठाने तक ही हिमाकत नहीं कर पाए हैं। अमेरिका पर हमला करने वाले अल कायदा के आतंकवादी थे, जो मूलरूप से मुसलमान थे। इसलिए अगर किसी नाम के आगे खान जुड़ा देखकर वो अति सतर्क हो जाते हैं तो इस पर बवाल मचाने वाली क्या बात है। शाहरुख खान यदि इस घटना को सामान्य तौर पर लेते तो इतना हंगामा मचता ही नहीं। इसी तरह प्रफुल्ल पटेल की बात करें तो, वो गलतफहमी का शिकार हुए। अगर उनका नाम और जन्मतिथी किसी वांछित अपराधी से मेल खाता है और जांच अधिकारियों ने उनसे कुछ सवालात पूछ लिए तो मुझे नहीं लगता कि इसमें अपमान जैसी कोई बात है। उल्टा हमें इससे सीख लेना चाहिए कि अमेरिकी अधिकारी सुरक्षा के मुद्दे पर रुतबे के दबाव में नहीं आते। अब सवाल करने वाले पूछ सकते हैं कि क्या अमेरिकी नेताओं के साथ भी होता होगा, इसका जवाब काफी हद तक हां में है। अमेरिका में जिन लोगों को सुरक्षा जांच में छूट मिली है उनकी फेहरिस्त हमारी तरह इतनी लंबी नहीं है। हमारे यहां तो एक अदना सा नेता भी रुबाब झाड़ने से पीछे नहीं हटता।

दूसरी बात अपने देश के नेताओं को सब पहचानते हैं, अगर अमेरिकी अधिकारी अपने अफसरान को कुछ रियायत देते भी हैं तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता। कायदे में होना यही चाहिए कि जब आम आदमी को सुरक्षा के झंझावत से गुजरना पड़ता है तो वीवीआई भी इंसान ही हैं। और वैसे भी सुरक्षा नियम सबको सुरक्षित रखने के लिए ही बनाए जाते हैं। भारतीयों में समस्या ये है कि ऊंचे पद पर पहुंचने के साथ ही उनका अहम ऊंचा उठने लगता है। भारत में उन्हें सुविधाएं मिलती हैं उनके वो आदी हो जाते हैं और जब उनसे आम इंसान की तरह व्यवहार किया जाता है तो उनके अहम को चोट लग जाती है। बड़क्पपन जैसी कोई चीज हमारे अंदर बची ही नहीं है, हमारे नेताओं को अभिनेताओं को कम से कम इस मामले में तो अमेरिकियों का कायल होना चाहिए कि उनकी प्राथमिकता में राष्ट्र सुरक्षा सबसे पहले है। इस मामले में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का कोई जवाब नहीं, गत साल इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर अमेरिका की काँटिनेंटल एयरलाइंस के अधिकारियों ने कलाम साहब को जहाज में सवार होने से पहले पूरी सुरक्षा जांच से गुजारा। जबकि प्रोटोकाल के तहत भारत में उन्हें इस तरह की जांच से छूट मिली हुई है। इसके पीछे एयरलाइंस का तर्क था कि उन्हें आदेश हैं कि किसी को भी बिना तलाशी के सवार न होने दिया जाए।

इस तलाशी को लेकर एयरपोर्ट से संसद तक बहुत बवाल मचा, कई सांसदों ने तो उस एयरलाइंस का लाइसेंस तक रद्द करने की सिफारिश कर डाली। लेकिन कलाम साहब ने अपने मुंह से ऊफ तक नहीं किया। यह घटना 24 अप्रैल की थी, जबकि इसका खुलासा जुलाई में हुआ और वो किसी तीसरे ने इस पर प्रकाश डाला कलाम साहब ने नहीं। अफसोस की बात है कि हमारे नेता पूर्व राष्ट्रपति तक से प्रेरण नहीं ले सके। मीरा शंकर की जगह अगर अब्दुल कलाम होते तो गुस्से में ये नहीं बोलते कि अब यहां नहीं आएंगे। निश्चित तौर पर हर व्यक्ति एक जैसा नहीं हो सकता, लेकिन किसी दूसरे के अच्छे गुणों को तो ग्रहण किया ही जा सकता है। मीरा शंकर के मामले में जो गलत है केवल उसी पर विरोध जताया जाना चाहिए। सुरक्षा जांच से गुजरने में कोई बडा व्यक्ति छोटा नहीं हो जाता। सच कहा जाए तो हम भारतीयों को हर छोटी बात को खींचकर बड़ा करने की बीमारी है, फिर चाहे वही उच्च पदों पर आसीन व्यक्ति हो या आम आदमी। जब तक हम जरूरी और गैर जरूरी में फर्क करना नहीं सीख लेते इस तरह की घटनाओं पर हो-हल्ला करते रहेंगे।

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जांच क्या कि हंगामा हो गया

नीजर नैयर
अमेरिकी हवाई अड्डे पर भारतीय राजदूत मीरा शंकर की तलाशी क्या हुई दिल्ली में बैठे राजनीतिक दलों को हो-हल्ला मचाने का मौका मिल गया। भाजपा ने तो लगे हाथ रैली भी निकाल डाली। सियासी पार्टियां इस मुद्दे पर भी सरकार को घेर रही हैं, जैसे सरकार ने खुद अमेरिकी अधिकारियों से कहा हो कि मीरा की तलाशी ली जाए। हां, वो इस बात पर जरूर सरकार को घेर सकती हैं कि केंद्र सरकार अमेरिका से किस लहजे में नाराजगी व्यक्त करती है। वैसे प्रकरण के सामने आने के तुरंत बाद विदेशमंत्रालय ने थोड़ी बहुत गर्जना जरूर की, और इसका त्वरित असर भी देखने को मिला। अमेरिकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने स्वयं खेद व्यक्त करते हुए भरोसा दिलाया कि इस घटना की पुर्नवृत्ति नहीं होगी। हालांकि, अमेरिका ने ये भी साफ किया कि जो कुछ भी हुआ वो कानून के मुताबिक हुआ। अमेरिका के ट्रांसपोर्ट सिक्यूरिटी असोसिएशन (टीएसए)के तहत राजनयिकों को तलाशी में छूट नहीं दी जाती। दरअसल मीरा शंकर ने भारतीय पारंपरिक परिधान यानी साड़ी पहनी हुई थी, और टीएसए के मुताबिक तलाशी के कारणों में ढेर सारे कपड़े पहनना भी शामिल है। अब ऐसे देखा जाए तो साड़ी और बुर्के में फर्क केवल इतना ही है कि एक में चेहरा दिखता है और दूसरे में नहीं। मीरा शंकर के साथ जो गलत हुआ वो ये कि राजनयिक जैसे ओदे पर होने के बाद भी पारदर्शी बाक्स में ले जाकर उनकी हाथों से तलाशी ली गई। जबकि एयरपोर्ट अधिकारियों को दिए दिशा-निर्देशों में यह साफ किया गया है कि यदि कोई यात्री सबके सामने तलाशी नहीं देना चाहता तो उसकी जांच गोपनीय तौर पर होनी चाहिए। मीरा कुमार के साथ दूसरे कुछ अधिकारी भी, लेकिन उन्हें भी अनसुना कर दिया गया। वैसे ये कोई पहला मौका नहीं, जब अमेरिका में उच्च दर्जा प्राप्त भारतीयों को इस तरह की जांच से गुजरना पड़ा हो। पिछले साल बॉलिवुड स्टार शाहरुख खान को न्यूयार्क के लिबर्टी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर सिर्फ इसलिए रोककर पूछताछ की गई, क्योंकि उनके नाम के आगे खान जुड़ा था। इसी साल नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल से शिकागो के ओ हेयर अड्डे पर पूछताछ की गई।

इस पूछताछ की वजह इतनी थी उनका नाम और जन्मतिथि उस शख्स से मेल खा रही थी, जो अमेरिका की वॉच लिस्ट में था। इससे पीछे चलें तो राजग सरकार में रक्षामंत्री रहे जार्ज फर्नांडीस को भी अमेरिकी एयरपोर्ट पर तलाशी से गुजरना पड़ा था, और जैसा मुझे याद है उनके तो कपड़े उतरवाकर तलाशी ली गई थी। वो घटना निश्चित तौर पर अप्रत्याशित और चौंकाने वाली थी, एक रक्षामंत्री के साथ इस तरह का व्यावहार करना कहीं से उचित नहीं माना जा सकता। लेकिन इसके बाद की जो घटनाएं हैं, उन पर इतना हो-हल्ला मचाना बिल्कुल ही जायज नहीं लगता। शाहरुख खान को बेशक भारत में स्पेशल ट्रीटमेंट दिया जाता हो, उन्हेंसुरक्षा जांच जैसे झंझटों से मुक्त रखा जाता हो मगर दूसरे मुल्कों से तो ये अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वो भी वैसे ट्रीटमेंट दें। बॉलीवुड स्टार के लिए अमेरिका अपने सुरक्षा नियमों में तो बदलाव नहीं कर सकता। 911 के बाद अमेरिकी बहुत यादा सतर्क हो गए हैं, इसमें कोई दोराय नहीं कि इस सतर्कता से अमेरिकी आवाम को भी कई बार परेशानी का सामना करना पड़ता है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि उस एक आतंकी हमले के बाद दहशतगर्द अमेरिका की तरफ आंख उठाने तक ही हिमाकत नहीं कर पाए हैं। अमेरिका पर हमला करने वाले अल कायदा के आतंकवादी थे, जो मूलरूप से मुसलमान थे। इसलिए अगर किसी नाम के आगे खान जुड़ा देखकर वो अति सतर्क हो जाते हैं तो इस पर बवाल मचाने वाली क्या बात है। शाहरुख खान यदि इस घटना को सामान्य तौर पर लेते तो इतना हंगामा मचता ही नहीं। इसी तरह प्रफुल्ल पटेल की बात करें तो, वो गलतफहमी का शिकार हुए। अगर उनका नाम और जन्मतिथी किसी वांछित अपराधी से मेल खाता है और जांच अधिकारियों ने उनसे कुछ सवालात पूछ लिए तो मुझे नहीं लगता कि इसमें अपमान जैसी कोई बात है। उल्टा हमें इससे सीख लेना चाहिए कि अमेरिकी अधिकारी सुरक्षा के मुद्दे पर रुतबे के दबाव में नहीं आते। अब सवाल करने वाले पूछ सकते हैं कि क्या अमेरिकी नेताओं के साथ भी होता होगा, इसका जवाब काफी हद तक हां में है। अमेरिका में जिन लोगों को सुरक्षा जांच में छूट मिली है उनकी फेहरिस्त हमारी तरह इतनी लंबी नहीं है। हमारे यहां तो एक अदना सा नेता भी रुबाब झाड़ने से पीछे नहीं हटता।

दूसरी बात अपने देश के नेताओं को सब पहचानते हैं, अगर अमेरिकी अधिकारी अपने अफसरान को कुछ रियायत देते भी हैं तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता। कायदे में होना यही चाहिए कि जब आम आदमी को सुरक्षा के झंझावत से गुजरना पड़ता है तो वीवीआई भी इंसान ही हैं। और वैसे भी सुरक्षा नियम सबको सुरक्षित रखने के लिए ही बनाए जाते हैं। भारतीयों में समस्या ये है कि ऊंचे पद पर पहुंचने के साथ ही उनका अहम ऊंचा उठने लगता है। भारत में उन्हें सुविधाएं मिलती हैं उनके वो आदी हो जाते हैं और जब उनसे आम इंसान की तरह व्यवहार किया जाता है तो उनके अहम को चोट लग जाती है। बड़क्पपन जैसी कोई चीज हमारे अंदर बची ही नहीं है, हमारे नेताओं को अभिनेताओं को कम से कम इस मामले में तो अमेरिकियों का कायल होना चाहिए कि उनकी प्राथमिकता में राष्ट्र सुरक्षा सबसे पहले है। इस मामले में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का कोई जवाब नहीं, गत साल इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर अमेरिका की काँटिनेंटल एयरलाइंस के अधिकारियों ने कलाम साहब को जहाज में सवार होने से पहले पूरी सुरक्षा जांच से गुजारा। जबकि प्रोटोकाल के तहत भारत में उन्हें इस तरह की जांच से छूट मिली हुई है। इसके पीछे एयरलाइंस का तर्क था कि उन्हें आदेश हैं कि किसी को भी बिना तलाशी के सवार न होने दिया जाए।

इस तलाशी को लेकर एयरपोर्ट से संसद तक बहुत बवाल मचा, कई सांसदों ने तो उस एयरलाइंस का लाइसेंस तक रद्द करने की सिफारिश कर डाली। लेकिन कलाम साहब ने अपने मुंह से ऊफ तक नहीं किया। यह घटना 24 अप्रैल की थी, जबकि इसका खुलासा जुलाई में हुआ और वो किसी तीसरे ने इस पर प्रकाश डाला कलाम साहब ने नहीं। अफसोस की बात है कि हमारे नेता पूर्व राष्ट्रपति तक से प्रेरण नहीं ले सके। मीरा शंकर की जगह अगर अब्दुल कलाम होते तो गुस्से में ये नहीं बोलते कि अब यहां नहीं आएंगे। निश्चित तौर पर हर व्यक्ति एक जैसा नहीं हो सकता, लेकिन किसी दूसरे के अच्छे गुणों को तो ग्रहण किया ही जा सकता है। मीरा शंकर के मामले में जो गलत है केवल उसी पर विरोध जताया जाना चाहिए। सुरक्षा जांच से गुजरने में कोई बडा व्यक्ति छोटा नहीं हो जाता। सच कहा जाए तो हम भारतीयों को हर छोटी बात को खींचकर बड़ा करने की बीमारी है, फिर चाहे वही उच्च पदों पर आसीन व्यक्ति हो या आम आदमी। जब तक हम जरूरी और गैर जरूरी में फर्क करना नहीं सीख लेते इस तरह की घटनाओं पर हो-हल्ला करते रहेंगे।

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