Tuesday, December 14, 2010

जांच क्या कि हंगामा हो गया

नीजर नैयर
अमेरिकी हवाई अड्डे पर भारतीय राजदूत मीरा शंकर की तलाशी क्या हुई दिल्ली में बैठे राजनीतिक दलों को हो-हल्ला मचाने का मौका मिल गया। भाजपा ने तो लगे हाथ रैली भी निकाल डाली। सियासी पार्टियां इस मुद्दे पर भी सरकार को घेर रही हैं, जैसे सरकार ने खुद अमेरिकी अधिकारियों से कहा हो कि मीरा की तलाशी ली जाए। हां, वो इस बात पर जरूर सरकार को घेर सकती हैं कि केंद्र सरकार अमेरिका से किस लहजे में नाराजगी व्यक्त करती है। वैसे प्रकरण के सामने आने के तुरंत बाद विदेशमंत्रालय ने थोड़ी बहुत गर्जना जरूर की, और इसका त्वरित असर भी देखने को मिला। अमेरिकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने स्वयं खेद व्यक्त करते हुए भरोसा दिलाया कि इस घटना की पुर्नवृत्ति नहीं होगी। हालांकि, अमेरिका ने ये भी साफ किया कि जो कुछ भी हुआ वो कानून के मुताबिक हुआ। अमेरिका के ट्रांसपोर्ट सिक्यूरिटी असोसिएशन (टीएसए)के तहत राजनयिकों को तलाशी में छूट नहीं दी जाती। दरअसल मीरा शंकर ने भारतीय पारंपरिक परिधान यानी साड़ी पहनी हुई थी, और टीएसए के मुताबिक तलाशी के कारणों में ढेर सारे कपड़े पहनना भी शामिल है। अब ऐसे देखा जाए तो साड़ी और बुर्के में फर्क केवल इतना ही है कि एक में चेहरा दिखता है और दूसरे में नहीं। मीरा शंकर के साथ जो गलत हुआ वो ये कि राजनयिक जैसे ओदे पर होने के बाद भी पारदर्शी बाक्स में ले जाकर उनकी हाथों से तलाशी ली गई। जबकि एयरपोर्ट अधिकारियों को दिए दिशा-निर्देशों में यह साफ किया गया है कि यदि कोई यात्री सबके सामने तलाशी नहीं देना चाहता तो उसकी जांच गोपनीय तौर पर होनी चाहिए। मीरा कुमार के साथ दूसरे कुछ अधिकारी भी, लेकिन उन्हें भी अनसुना कर दिया गया। वैसे ये कोई पहला मौका नहीं, जब अमेरिका में उच्च दर्जा प्राप्त भारतीयों को इस तरह की जांच से गुजरना पड़ा हो। पिछले साल बॉलिवुड स्टार शाहरुख खान को न्यूयार्क के लिबर्टी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर सिर्फ इसलिए रोककर पूछताछ की गई, क्योंकि उनके नाम के आगे खान जुड़ा था। इसी साल नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल से शिकागो के ओ हेयर अड्डे पर पूछताछ की गई।

इस पूछताछ की वजह इतनी थी उनका नाम और जन्मतिथि उस शख्स से मेल खा रही थी, जो अमेरिका की वॉच लिस्ट में था। इससे पीछे चलें तो राजग सरकार में रक्षामंत्री रहे जार्ज फर्नांडीस को भी अमेरिकी एयरपोर्ट पर तलाशी से गुजरना पड़ा था, और जैसा मुझे याद है उनके तो कपड़े उतरवाकर तलाशी ली गई थी। वो घटना निश्चित तौर पर अप्रत्याशित और चौंकाने वाली थी, एक रक्षामंत्री के साथ इस तरह का व्यावहार करना कहीं से उचित नहीं माना जा सकता। लेकिन इसके बाद की जो घटनाएं हैं, उन पर इतना हो-हल्ला मचाना बिल्कुल ही जायज नहीं लगता। शाहरुख खान को बेशक भारत में स्पेशल ट्रीटमेंट दिया जाता हो, उन्हेंसुरक्षा जांच जैसे झंझटों से मुक्त रखा जाता हो मगर दूसरे मुल्कों से तो ये अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वो भी वैसे ट्रीटमेंट दें। बॉलीवुड स्टार के लिए अमेरिका अपने सुरक्षा नियमों में तो बदलाव नहीं कर सकता। 911 के बाद अमेरिकी बहुत यादा सतर्क हो गए हैं, इसमें कोई दोराय नहीं कि इस सतर्कता से अमेरिकी आवाम को भी कई बार परेशानी का सामना करना पड़ता है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि उस एक आतंकी हमले के बाद दहशतगर्द अमेरिका की तरफ आंख उठाने तक ही हिमाकत नहीं कर पाए हैं। अमेरिका पर हमला करने वाले अल कायदा के आतंकवादी थे, जो मूलरूप से मुसलमान थे। इसलिए अगर किसी नाम के आगे खान जुड़ा देखकर वो अति सतर्क हो जाते हैं तो इस पर बवाल मचाने वाली क्या बात है। शाहरुख खान यदि इस घटना को सामान्य तौर पर लेते तो इतना हंगामा मचता ही नहीं। इसी तरह प्रफुल्ल पटेल की बात करें तो, वो गलतफहमी का शिकार हुए। अगर उनका नाम और जन्मतिथी किसी वांछित अपराधी से मेल खाता है और जांच अधिकारियों ने उनसे कुछ सवालात पूछ लिए तो मुझे नहीं लगता कि इसमें अपमान जैसी कोई बात है। उल्टा हमें इससे सीख लेना चाहिए कि अमेरिकी अधिकारी सुरक्षा के मुद्दे पर रुतबे के दबाव में नहीं आते। अब सवाल करने वाले पूछ सकते हैं कि क्या अमेरिकी नेताओं के साथ भी होता होगा, इसका जवाब काफी हद तक हां में है। अमेरिका में जिन लोगों को सुरक्षा जांच में छूट मिली है उनकी फेहरिस्त हमारी तरह इतनी लंबी नहीं है। हमारे यहां तो एक अदना सा नेता भी रुबाब झाड़ने से पीछे नहीं हटता।

दूसरी बात अपने देश के नेताओं को सब पहचानते हैं, अगर अमेरिकी अधिकारी अपने अफसरान को कुछ रियायत देते भी हैं तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता। कायदे में होना यही चाहिए कि जब आम आदमी को सुरक्षा के झंझावत से गुजरना पड़ता है तो वीवीआई भी इंसान ही हैं। और वैसे भी सुरक्षा नियम सबको सुरक्षित रखने के लिए ही बनाए जाते हैं। भारतीयों में समस्या ये है कि ऊंचे पद पर पहुंचने के साथ ही उनका अहम ऊंचा उठने लगता है। भारत में उन्हें सुविधाएं मिलती हैं उनके वो आदी हो जाते हैं और जब उनसे आम इंसान की तरह व्यवहार किया जाता है तो उनके अहम को चोट लग जाती है। बड़क्पपन जैसी कोई चीज हमारे अंदर बची ही नहीं है, हमारे नेताओं को अभिनेताओं को कम से कम इस मामले में तो अमेरिकियों का कायल होना चाहिए कि उनकी प्राथमिकता में राष्ट्र सुरक्षा सबसे पहले है। इस मामले में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का कोई जवाब नहीं, गत साल इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर अमेरिका की काँटिनेंटल एयरलाइंस के अधिकारियों ने कलाम साहब को जहाज में सवार होने से पहले पूरी सुरक्षा जांच से गुजारा। जबकि प्रोटोकाल के तहत भारत में उन्हें इस तरह की जांच से छूट मिली हुई है। इसके पीछे एयरलाइंस का तर्क था कि उन्हें आदेश हैं कि किसी को भी बिना तलाशी के सवार न होने दिया जाए।

इस तलाशी को लेकर एयरपोर्ट से संसद तक बहुत बवाल मचा, कई सांसदों ने तो उस एयरलाइंस का लाइसेंस तक रद्द करने की सिफारिश कर डाली। लेकिन कलाम साहब ने अपने मुंह से ऊफ तक नहीं किया। यह घटना 24 अप्रैल की थी, जबकि इसका खुलासा जुलाई में हुआ और वो किसी तीसरे ने इस पर प्रकाश डाला कलाम साहब ने नहीं। अफसोस की बात है कि हमारे नेता पूर्व राष्ट्रपति तक से प्रेरण नहीं ले सके। मीरा शंकर की जगह अगर अब्दुल कलाम होते तो गुस्से में ये नहीं बोलते कि अब यहां नहीं आएंगे। निश्चित तौर पर हर व्यक्ति एक जैसा नहीं हो सकता, लेकिन किसी दूसरे के अच्छे गुणों को तो ग्रहण किया ही जा सकता है। मीरा शंकर के मामले में जो गलत है केवल उसी पर विरोध जताया जाना चाहिए। सुरक्षा जांच से गुजरने में कोई बडा व्यक्ति छोटा नहीं हो जाता। सच कहा जाए तो हम भारतीयों को हर छोटी बात को खींचकर बड़ा करने की बीमारी है, फिर चाहे वही उच्च पदों पर आसीन व्यक्ति हो या आम आदमी। जब तक हम जरूरी और गैर जरूरी में फर्क करना नहीं सीख लेते इस तरह की घटनाओं पर हो-हल्ला करते रहेंगे।

ण ण

जांच क्या कि हंगामा हो गया

नीजर नैयर
अमेरिकी हवाई अड्डे पर भारतीय राजदूत मीरा शंकर की तलाशी क्या हुई दिल्ली में बैठे राजनीतिक दलों को हो-हल्ला मचाने का मौका मिल गया। भाजपा ने तो लगे हाथ रैली भी निकाल डाली। सियासी पार्टियां इस मुद्दे पर भी सरकार को घेर रही हैं, जैसे सरकार ने खुद अमेरिकी अधिकारियों से कहा हो कि मीरा की तलाशी ली जाए। हां, वो इस बात पर जरूर सरकार को घेर सकती हैं कि केंद्र सरकार अमेरिका से किस लहजे में नाराजगी व्यक्त करती है। वैसे प्रकरण के सामने आने के तुरंत बाद विदेशमंत्रालय ने थोड़ी बहुत गर्जना जरूर की, और इसका त्वरित असर भी देखने को मिला। अमेरिकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने स्वयं खेद व्यक्त करते हुए भरोसा दिलाया कि इस घटना की पुर्नवृत्ति नहीं होगी। हालांकि, अमेरिका ने ये भी साफ किया कि जो कुछ भी हुआ वो कानून के मुताबिक हुआ। अमेरिका के ट्रांसपोर्ट सिक्यूरिटी असोसिएशन (टीएसए)के तहत राजनयिकों को तलाशी में छूट नहीं दी जाती। दरअसल मीरा शंकर ने भारतीय पारंपरिक परिधान यानी साड़ी पहनी हुई थी, और टीएसए के मुताबिक तलाशी के कारणों में ढेर सारे कपड़े पहनना भी शामिल है। अब ऐसे देखा जाए तो साड़ी और बुर्के में फर्क केवल इतना ही है कि एक में चेहरा दिखता है और दूसरे में नहीं। मीरा शंकर के साथ जो गलत हुआ वो ये कि राजनयिक जैसे ओदे पर होने के बाद भी पारदर्शी बाक्स में ले जाकर उनकी हाथों से तलाशी ली गई। जबकि एयरपोर्ट अधिकारियों को दिए दिशा-निर्देशों में यह साफ किया गया है कि यदि कोई यात्री सबके सामने तलाशी नहीं देना चाहता तो उसकी जांच गोपनीय तौर पर होनी चाहिए। मीरा कुमार के साथ दूसरे कुछ अधिकारी भी, लेकिन उन्हें भी अनसुना कर दिया गया। वैसे ये कोई पहला मौका नहीं, जब अमेरिका में उच्च दर्जा प्राप्त भारतीयों को इस तरह की जांच से गुजरना पड़ा हो। पिछले साल बॉलिवुड स्टार शाहरुख खान को न्यूयार्क के लिबर्टी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर सिर्फ इसलिए रोककर पूछताछ की गई, क्योंकि उनके नाम के आगे खान जुड़ा था। इसी साल नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल से शिकागो के ओ हेयर अड्डे पर पूछताछ की गई।

इस पूछताछ की वजह इतनी थी उनका नाम और जन्मतिथि उस शख्स से मेल खा रही थी, जो अमेरिका की वॉच लिस्ट में था। इससे पीछे चलें तो राजग सरकार में रक्षामंत्री रहे जार्ज फर्नांडीस को भी अमेरिकी एयरपोर्ट पर तलाशी से गुजरना पड़ा था, और जैसा मुझे याद है उनके तो कपड़े उतरवाकर तलाशी ली गई थी। वो घटना निश्चित तौर पर अप्रत्याशित और चौंकाने वाली थी, एक रक्षामंत्री के साथ इस तरह का व्यावहार करना कहीं से उचित नहीं माना जा सकता। लेकिन इसके बाद की जो घटनाएं हैं, उन पर इतना हो-हल्ला मचाना बिल्कुल ही जायज नहीं लगता। शाहरुख खान को बेशक भारत में स्पेशल ट्रीटमेंट दिया जाता हो, उन्हेंसुरक्षा जांच जैसे झंझटों से मुक्त रखा जाता हो मगर दूसरे मुल्कों से तो ये अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वो भी वैसे ट्रीटमेंट दें। बॉलीवुड स्टार के लिए अमेरिका अपने सुरक्षा नियमों में तो बदलाव नहीं कर सकता। 911 के बाद अमेरिकी बहुत यादा सतर्क हो गए हैं, इसमें कोई दोराय नहीं कि इस सतर्कता से अमेरिकी आवाम को भी कई बार परेशानी का सामना करना पड़ता है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि उस एक आतंकी हमले के बाद दहशतगर्द अमेरिका की तरफ आंख उठाने तक ही हिमाकत नहीं कर पाए हैं। अमेरिका पर हमला करने वाले अल कायदा के आतंकवादी थे, जो मूलरूप से मुसलमान थे। इसलिए अगर किसी नाम के आगे खान जुड़ा देखकर वो अति सतर्क हो जाते हैं तो इस पर बवाल मचाने वाली क्या बात है। शाहरुख खान यदि इस घटना को सामान्य तौर पर लेते तो इतना हंगामा मचता ही नहीं। इसी तरह प्रफुल्ल पटेल की बात करें तो, वो गलतफहमी का शिकार हुए। अगर उनका नाम और जन्मतिथी किसी वांछित अपराधी से मेल खाता है और जांच अधिकारियों ने उनसे कुछ सवालात पूछ लिए तो मुझे नहीं लगता कि इसमें अपमान जैसी कोई बात है। उल्टा हमें इससे सीख लेना चाहिए कि अमेरिकी अधिकारी सुरक्षा के मुद्दे पर रुतबे के दबाव में नहीं आते। अब सवाल करने वाले पूछ सकते हैं कि क्या अमेरिकी नेताओं के साथ भी होता होगा, इसका जवाब काफी हद तक हां में है। अमेरिका में जिन लोगों को सुरक्षा जांच में छूट मिली है उनकी फेहरिस्त हमारी तरह इतनी लंबी नहीं है। हमारे यहां तो एक अदना सा नेता भी रुबाब झाड़ने से पीछे नहीं हटता।

दूसरी बात अपने देश के नेताओं को सब पहचानते हैं, अगर अमेरिकी अधिकारी अपने अफसरान को कुछ रियायत देते भी हैं तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता। कायदे में होना यही चाहिए कि जब आम आदमी को सुरक्षा के झंझावत से गुजरना पड़ता है तो वीवीआई भी इंसान ही हैं। और वैसे भी सुरक्षा नियम सबको सुरक्षित रखने के लिए ही बनाए जाते हैं। भारतीयों में समस्या ये है कि ऊंचे पद पर पहुंचने के साथ ही उनका अहम ऊंचा उठने लगता है। भारत में उन्हें सुविधाएं मिलती हैं उनके वो आदी हो जाते हैं और जब उनसे आम इंसान की तरह व्यवहार किया जाता है तो उनके अहम को चोट लग जाती है। बड़क्पपन जैसी कोई चीज हमारे अंदर बची ही नहीं है, हमारे नेताओं को अभिनेताओं को कम से कम इस मामले में तो अमेरिकियों का कायल होना चाहिए कि उनकी प्राथमिकता में राष्ट्र सुरक्षा सबसे पहले है। इस मामले में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का कोई जवाब नहीं, गत साल इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर अमेरिका की काँटिनेंटल एयरलाइंस के अधिकारियों ने कलाम साहब को जहाज में सवार होने से पहले पूरी सुरक्षा जांच से गुजारा। जबकि प्रोटोकाल के तहत भारत में उन्हें इस तरह की जांच से छूट मिली हुई है। इसके पीछे एयरलाइंस का तर्क था कि उन्हें आदेश हैं कि किसी को भी बिना तलाशी के सवार न होने दिया जाए।

इस तलाशी को लेकर एयरपोर्ट से संसद तक बहुत बवाल मचा, कई सांसदों ने तो उस एयरलाइंस का लाइसेंस तक रद्द करने की सिफारिश कर डाली। लेकिन कलाम साहब ने अपने मुंह से ऊफ तक नहीं किया। यह घटना 24 अप्रैल की थी, जबकि इसका खुलासा जुलाई में हुआ और वो किसी तीसरे ने इस पर प्रकाश डाला कलाम साहब ने नहीं। अफसोस की बात है कि हमारे नेता पूर्व राष्ट्रपति तक से प्रेरण नहीं ले सके। मीरा शंकर की जगह अगर अब्दुल कलाम होते तो गुस्से में ये नहीं बोलते कि अब यहां नहीं आएंगे। निश्चित तौर पर हर व्यक्ति एक जैसा नहीं हो सकता, लेकिन किसी दूसरे के अच्छे गुणों को तो ग्रहण किया ही जा सकता है। मीरा शंकर के मामले में जो गलत है केवल उसी पर विरोध जताया जाना चाहिए। सुरक्षा जांच से गुजरने में कोई बडा व्यक्ति छोटा नहीं हो जाता। सच कहा जाए तो हम भारतीयों को हर छोटी बात को खींचकर बड़ा करने की बीमारी है, फिर चाहे वही उच्च पदों पर आसीन व्यक्ति हो या आम आदमी। जब तक हम जरूरी और गैर जरूरी में फर्क करना नहीं सीख लेते इस तरह की घटनाओं पर हो-हल्ला करते रहेंगे।

ण ण

Wednesday, December 8, 2010

जेपीसी पर हंगामे का औचित्य

नीरज नैयर
आधुनिकता की सियासत ने राजनीति के मूल्य ही बदलकर रख दिए हैं। कभी गंभीर बहस और लोकहित के फैसलों के लिए पहचाने जाने वाले लोकतंत्र के मंदिर आज अखाड़े में तब्दील हो चुके हैं। बात चाहे संसद की हो या विधानसभाओं की सियासी पार्टियों को एक दूसरे को नीचा दिखाने की इससे मुफीद ागह कोई नहीं लगती। संसद का शीतकालीन सत्र सरकार और विपक्ष की नोंकझोंक की भेंट चढ़ा जा रहा है। जब तक ये लेख प्रकाशित होगा और कुछ दिन हंगामे पर कुर्बान हो चुके होंगे। शीतकालीन सत्र 9 नवंबर से शुरू हुआ था, लोकसभा में पहले दिन जरूर कुछ काम हुआ मगर रायसभा तो पहले दिन से ही नहीं चल पाई। मौजूदा स्थिति ये है कि सत्र समाप्त होने में चंद दिन ही बचे हैं और हंगामा चरम पर है। दरअसल विपक्ष स्पेक्ट्रम और दूसरे तमाम घोटालों की जांच संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी से कराने पर अड़ा है, लेकिन सरकार इसके सख्त खिलाफ है। सरकार का तर्क है कि जब जांच सीबीआई कर रही है तो फिर जेपीसी गठन का सवाल ही नहीं बनता। जेपीसी गठन का सवाल है या नहीं, सवाल ये नहीं है असल सवाल ये है कि आखिर इसको लेकर इतना बवाल क्यों मचाया जा रहा है। विपक्ष क्यों इतना उतारू है और सरकार क्यों इससे इतना बच रही है। ऐसा नहीं है कि इससे पहले कभी जेपीसी का गठन किया ही नहीं गया। संसदीय इतिहास में अब तक चार बार जेपीसी जांच हो चुकी है।

सबसे पहले बोफोर्स कांड को लेकर विपक्ष के लगभग 45 दिनों तक संसद में हंगामे के परिणाम स्वरूप संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया गया था। इसके बाद हर्षद मेहता कांड की जांच जेपीसी से कराई गई, इस मामले में जेपीसी गठन के लिए 17 दिनों तक संसद में गतिरोध बरकरार रहा। केतन मेहता मामले में भी तकरीबन 14 दिनों के हंगामें के बाद जेपीसी जांच को मंजूरी मिल सकी। चौथी जेपीसी शीतलपेय पेप्सी-कोला में कीटनाशकों की रिपोर्ट आने के बाद सरकार ने गठित की। जेपीसी गठन दो तरह से किया जाता है, या तो एक सदन इसका प्रस्ताव रखे और दूसरा उस पर सहमति जताए। या फिर दोनों सदनों के अध्यक्ष आपस में मिलकर इसका फैसला लें। जेपीसी में कितने सदस्य होंगे इसके लिए कोई संख्या निर्धारित नहीं की गई है। हां, इतना जरूर है कि इस समिति में लोकसभा सदस्यों की संख्या रायसभा सदस्यों से दोगुनी होती है। यानी अगर रायसभा के 5 सदस्य समिति का हिस्सा हैं तो लोकसभा सदस्यों की संख्या 10 होगी। जेपीसी के पास जांच के पूरे अधिकार होते हैं, वो मामले की रिपोर्ट तलब कर सकती है। इस संबंध में पूछताछ के लिए सम्मन जारी कर सकती है, सम्मान की तामील न होने पर संबंधित व्यक्ति पर सदन की अवेहलना के तहत कार्रवाई कर सकती है। जेपीसी जांच में एक अच्छी बात सब यही है कि उसे अपनी कार्रवाई के लिए किसी अनुमति का इंतजार नहीं करना पड़ता। इसके अलावा शायद ही कोई फायदा होता हो, क्योंकि अगर होता तो एक न एक मामले में तो दोषियों को सजा मिल गई होती। बोफोर्स कांड में जेपीसी ने 26 अप्रैल 1986 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, लेकिन विपक्ष ने इसके विरोध में बायकॉट किया। कुल मिलाकर नतीजा रहा, सिफर। ऐसे ही हर्षद मेहता कांड में न तो जेपीसी की सारी सिफारिशों को ही माना गया और न ही सरकार ने उन्हें कार्यान्वित किया। कुछ इसी तरह केतन मेहता मामले में भी हुआ, 2002 में सौंपी गई जेपीसी रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। कोला-पेप्सी कांड की जांच के लिए शरद पवार की अध्यक्षता में बनाई गई संयुक्त जांच समिति ने चार फरवरी 2004 को सदन में रखी अपनी रिपोर्ट में शीतलपेय में कीटनाशकों की पुष्टि की मगर उसे सरकार ने कितनी गंभीरता से लिया सब जानते हैं। जेपीसी की सबसे बड़ी खामी ये है कि इसकी जांच सार्वजनिक नहीं होती, जबकि कई मुल्कों में इसमें पारदर्शिता बरती जाती है।

विपक्ष में बैठे दल को जांच के लिए जेपीसी सबसे भरोसेमंद लगती है और सरकार हमेशा से इससे बचना चाहती है। यहां गौर करने वाली बात ये है कि क्या जेपीसी इतनी सक्षम होती है कि बड़े से बड़े घोटालों की पेचीदगी को समझ सके। जेपीसी में महज अलग-अलग दल के राजनीतिक लोगों का जमावड़ा होता है, और हमारी नेताओं की काबलियत जगजाहिर है। जो काम सीबीआई या दूसरी जांच एजेंसी के वो अधिकारी कर सकते हैं जिनका काम ही बड़े से बड़े घोटालों में सिर खपाना, क्या वो हमारे नेता कर सकते हैं। निश्चित तौर पर इसके यादातर जवाब नहीं में मिलेंगे। दरअसल जेपीसी के माध्यम से खुद को पाकसाफ बताने वाले दलों को आरोपों में घिरी पार्टी के अंदरूनी हालात का काफी अच्छे से जायजा लेने का मौका मिल जाता है। और ऐसे में आर्थिक और राजनीतिक हितों के सधने की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। जेपीसी का अब तक का इतिहास बिल्कुल भी अच्छा नहीं रहा है तो फिर विपक्ष का इसके लिए अड़ियल रुख अख्तियार करना समझ से बाहर है, ऐसे ही सरकार का अपने फैसले पर अडिग हो जाना भी आश्चर्यचिकत करने वाला है। सरकार जेपीसी की कीमत पर संसद का कीमती वक्त बर्बाद करे जा रही है। सदन की कार्यवाही पर खर्च होने वाला एक-एक पैसा जनता की जेब से आता है, लेकिन सदन में हंगामा करने वालों को इससे कोई सरोकार नहीं। अच्छा होता अगर सरकार संयुक्त संसदीय समिति से जांच कराने की विपक्ष की मांग को मानकर जनता के सामने अच्छा उदाहरण पेश करती। मौजूदा वक्त में सदन की कार्यवाही बाधित करने के लिए जनता की नजरों में जितना दोषी विपक्ष है उतना ही सत्तापक्ष भी है। ऐसा लगता है जैसे विपक्ष और सरकार मिलकर अरबों के घोटालों का टैक्स जनता के वसूलने का मन बना चुके हैं। स्पेक्ट्रम आदि घोटालों में जितनी रकम जानी थी वो जा चुकी और सब जानते हैं कि दोषियों का बाल भी बांका होने वाला नहीं है, ऐसे जेपीसी को लेकर संसद में जारी गतिरोध जनता के लिए कोड़ में खाज के समान है।

Tuesday, November 30, 2010

बाघ बचाने के लिए इच्छाशक्ति की जरूरत

नीरज नैयर
बाघों की घटती संख्या के बीच बाघ सरंक्षण की कोशिशें भी परवान चढ़ रही हैं। ऐसी कोशिशें सुखद अहसास तो कराती ही हैं साथ ही उम्मीद भी जगाती हैं कि शायद वाली पीढ़ी जंगल में विचरण करते बाघ का दीदार कर सकेगी। दुनिया भर में बाघ जितनी तेजी से गायब हुए हैं उतनी तेजी से तो शायद कुछ और गायब हो ही नहीं सकता। मौजूदा वक्त में खुले जंगल में रहने वाले बाघों की तादाद महज 3000 है, पिछले एक दशक में बाघों की संख्या में 40 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। सबसे यादा बाघ भारत में है, ताजा गणना के मुताबिक हमारे यहां 1400 के आसपास बाघ हैं। हालांकि चीन में बाघों की तादाद को दुनिया भर में सर्वाधिक कहा जा सकता है, लेकिन ये बाघ जंगलों के बजाए पिंजरों में कैद हैं। चीन में बाघ के अंगों की जबरदस्त मांग है, इसी मांग को पूरा करने के लिए फार्मिंग के उद्देश्य से बाघों को दबड़ों में भेज दिया गया। वैसे चीनी सरकार ने बाघों के अंगों से बने उत्पाद पर प्रतिबंध लगा रखा है, जिस वजह से फार्मिंग का धंधा लगभग बंद सा पड़ा हुआ है। लेकिन इस लॉबी के दबरदस्त दबाव के चलते सरकार प्रतिबंध हटाने पर गंभीरता से विचार कर रही है। अगर प्रतिबंध हटता है तो जंगलों में बचे-कुचे बाघ भी दुनिया छोड़ जाएंगे। भारत में हो रहे इस खूबसूरत प्राणी के सफाए में चीन की मांग का बहुत बड़ा हाथ है। दूसरी जगहों की अपेक्षा भारत में शिकारी यादा आसानी से अपने काम को अंजाम दे सकते हैं। शिथिल कानून, कमजोर तंत्र और गैरजिम्मेदाराना सरकारी रवैये की वजह से भारत शिकारियों के लिए स्वर्ग साबित हो रहा है।

स्वयं प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद भी हालात जस के तस हैं, कुछ बदला है तो बस फाइलें रखने वाली अलमारियों का आकार। प्रोजेक्ट टाइगर के नाम पर हर साल करोड़ों-अरबों फूंके जा रहे हैं, लेकिन सरंक्षण जैसी बात कहीं नजर नहीं आती। दूसरे मुल्कों में जहां बाघ बचे हैं वहां भी कमोबश यही स्थिति है, इसी स्थिति से निपटने के लिए रूस के शहर सेंट पीटर्सबर्ग में बीते दिनों एक बैठक आयोजित की गई। 13 देशों के प्रतिनिधियों ने इस बैठक में हिस्सा लिया, बैठक में मुख्य तौर पर बाघ के प्राकृतिक आवास को बचाने, शिकार को रोकने और बचाव अभियान को आर्थिक मदद मुहैया करवाने जैसे विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई। संभवत: ऐसा पहली बार हुआ है कि विश्व के तमाम नेता एक प्रजाति को बचाने के लिए साथ आए। बाघ बचाने को लेकर इतनी सक्रीयता अच्छी बात है, लेकिन इस सक्रीयता के सार्थक परिणाम भी तो निकलने चाहिए। अमूमन बड़ी-बड़ी बैठकों में बड़ी-बड़ी बातें होती हैं, बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं पर वो धरातल पर नहीं उतर पाते। इस बैठक में चीन ने भी शिरकत की, चीन पर बाघ बचाओ अभियान में जुटे लोगों के लिए किसी खलनायक की तरह है। चीनी सरकार दावा करती है कि देश में बाघ अंगों और खाल के गैरकानूनी व्यापार पर लगी पाबंदी का पूरी तरह से पालन हो रहा है। लेकिन इस दावे की हकीकत कई बार सामने आ चुकी है। चीन में बाघ की खाल और अंग हासिल करना उतना ही आसान है, जितना भारत में ड्रग्स जैसे नशीले पदार्थ। चीन इस गैरकानूनी टे्रड का हब है, और ये सबकुछ सरकार के सरंक्षण में ही फल-फूल रहा है। चीनी आर्मी खुद बाघों की खाल और अंगों से बने उत्पाद की सबसे बड़ी उपभोक्ता है। कुछ साल पहले दलाई लामा के आव्हान के बाद जरूर तिब्बत में बाघों की खाल की उसी तरह होली जलाई गई थी जैसे स्वदेशी अपनाओ नारे के बाद भारत में विदेशी कपड़ों की।



णतिब्बतियों ने अपने धर्म गुरू की भावनाओं का आदर करते हुए बाघ से जुड़े उत्पादों का उपयोग पूर्णत: बंद कर दिया था, लेकिन अब सबकुछ पहले की माफिक हो गया है। तिब्बत में सालाना होने वाले पारंपरिक आयोजन में चीनी सैन्य अधिकारियों की मौजूदगी में तिब्बती बाघों की खालों को तन पर लपेटे देखने को मिल सकते हैं। चीन में बाघ की एक पूर्ण खाल की कीमत तकरीबन 20 हजार डॉलर है। इस ट्रेड से जुड़े व्यापारी, ग्राहकों को उनकी मनमुताबिक जगहों पर डिलेवरी तक ही सुविधा उपलब्ध कराते हैं। चीन में बाघ की खाल को शानौ-शौकत का प्रतीक माना जाता है, इसके साथ ही धार्मिक लिहाज से भी चीनी और तिब्बती इनका उपयोग करते हैं। सबसे यादा फार्मेसी क्षेत्र में बाघ के अंगों का इस्तेमाल होता है, कामोत्तेजक दवाई के लिए बाघ की हड्डियां प्रयोग में लाई जाती हैं और चीन में इसका बहुत बड़ा बाजार है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की तरफ से चीनी सरकार को कई बार आईना दिखाया गया मगर उसने हालात बदलने के लिए कुछ नहीं किया। दरअसल बीजिंग के लिए भी बाघों का गैरकानूनी व्यापार कमाई का बहुत बड़ा जरिया है, इसलिए वो इस पर प्रतिबंध का दिखावा तो कर सकता है पर पूर्णत: रोक नहीं लगा सकता। जहां तक बात भारत सरकार की है तो उसके पास इच्छाशक्ति का अभाव है। हमारे यहां नए-नए प्रोजेक्टों को फाइलों से हकीकत में आने बरसों लग जाते हैं। सरिस्का में बाघों के सफाए के बाद से अब तक कई योजनाएं बनाई गईं उनमें से कुछ परवान भी चढ़ी मगर बाघों को बचाने के लिए कुछ नहीं किया जा सका। बाघ सरंक्षण हमारे देश में एक तरह से पार्ट टाइम नौकरी के माफिक हो गया है, सरकार अपने आप को संवेदनशील साबित करने के लिए यह काम किए जा रही है और अधिकारीगण महज अपनी नौकरी बचाने के लिए। यही वजह है कि तमाम तामझाम के बाद भी बाघ बचने के बजाए तेजी से शिकारियों के हत्थे चढ़ते जा रहे हैं। और जो रही सही कसर है वो जंगल में बढ़ती मानवीय गतिविधियों की वजह से पूरी हो रही है।



णमानव बाघ संघर्ष के किस्से अब आम हो चले हैं। जंगलों का सिकुड़ना लगातार जारी है, भोजन-पानी की कम उपलब्धता के चलते बाघ आदि जंगली जानवरी बाहर की ओर रुख करते हैं और मनुष्य के हाथों मारे जाते हैं। बाघ सरंक्षण के लिए सरकार कागज पर लकीरें खींचने के अलावा कुछ नहीं कर पाई है। अगर कागजी कार्रवाई के अलावा कुछ भी किया गया होता तो परिणाम अब तक नजर आने लगते। कुल मिलाकर कहा जाए तो बाघों को बचाने के लिए बड़ी-बड़ी बैठकें करने के बजाए इच्छाशक्ति विकसित करने की जरूरत है। क्या भारत या दूसरे देश इतने भी सक्षम नहीं कि एक प्राणी की जान बचा सकें, बिल्कुल हैं लेकिन इच्छाशक्ति के अभाव के चलते सक्षमता भी नगण्य हो चली है।

Saturday, November 27, 2010

ओबामा के दौरे से हमें क्या मिला?

नीरज नैयर
धन्यवाद और जयहिंद जैसे भारी-भरकम शब्द बोलकर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा अपने भारत दौरे को आशाओं के अनुरूप बनाने में सफल रहे। उनकी यात्रा का उद्देश्य मुख्यरूप से मंदी की मार झेल रहे अमेरिका के लिए संजीवीनी लाना था और अरबों के करार के रूप में उन्हें वो हासिल भी हो गया। ओबामा की यात्रा के पहले दिन ही भारतीय और अमेरिकी कंपनियों के बीच करीब 10 अरब डॉलर के बीस समझौते हुए। इन समझौतों के आकार लेने के बाद अमेरिका में 54 हजार नई नौकरियों के रास्ते खुलेंगे। ओबामा से भारत को जो मिला उसमें सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता के समर्थन और प्रतिबंधित तकनीकों के निर्यात पर लगी पाबंदी से मुक्ति का आश्वासन इसके अलावा पाकिस्तान को थोड़ी बहुत फटकार। कुल मिलाकर कहा जाए तो भारत की झोली में केवल आवश्वासन ही आए, जहां तक बात पाकिस्तान को कोसने की है तो उसमें भी ओबामा ने कंजूसी से काम लिया। उन्होंने आतंकवाद के मुद्दे पर पाक के खिलाफ महज उतना ही बोला जितना इस्लामाबाद आसानी से हजम कर सके। अमेरिकी राष्ट्रपति ने तो स्थिर और प्रगतिशील पाकिस्तान को भारत के हित में बता डाला। बकौल ओबामा पाक की स्थिरता सुनिश्चित करने में सबसे यादा दिलचस्पी किसी देश की हो सकती है तो वह भारत है। यदि पाकिस्तान अस्थिर है तो इसका सबसे अधिक नुकसान भारत को ही झेलना होता है। हालांकि संसद को संबोधित करते वक्त उन्होंने जरूर पाकिस्तान के खिलाफ कुछ एक बातें कहीं लेकिन उनमें कड़े शब्दों के इस्तेमाल जैसी कोई बात नजर नहीं आई।

सुरक्षा परिषद में भारत की दावेदारी और तकनीकों के निर्यात पर प्रतिबंध हटाने जैसे मुद्दों पर अमल की कोई समय सीमा नहीं है। वैसे भी सुरक्षा परिषद का विस्तार हाल-फिलहाल तो होने वाला नहीं है, ओबामा खुद भी जानते हैं कि यह रास्ता बहुत टेढ़ा है। शायद इसलिए ही उन्होंने खुलेतौर पर भारत के समर्थन की बात कही। ओबामा ने एक तरह से बुरे दौर से उभरने के लिए भारत का इस्तेमाल किया। तेजी से आगे बढ़ता भारत दुनिया के नक्शे पर एक बिजनेस हब के रूप में उभरा है, चीन से लेकर अमेरिका तक सबकी रुचि नई दिल्ली के साथ यादा से यादा व्यापार बढ़ाने की है। ओबामा भी इसी एजेंडे के साथ भारत आए, उन्होंने अपने एक बयान में कहा भी कि जब मैं वापस जाऊं तो अपने लोगों को बता सकूं की मैं उनके लिए क्या लेकर आया हूं। अपने इस दौरे में ओबामा ने जो एक अच्छी बात करी वो ये कि उन्होंने कश्मीर पर कोई बेफिजुल की बयानबाजी नहीं की, लेकिन सिर्फ इसलिए ओबामा के भारत दौरे को एतिहासिक बता देना नासमझी से यादा कुछ नहीं। ओबामा ने दोनों हाथों से भारत से बटोरा और बदले में आश्वासन थमा गए, बावजूद इसके उनकी यात्रा को भारत के लिए अहम बताने वालों की कमी नहीं है। सरकार का ऐसा करना तो समझ में आता है, मगर मीडिया का ओबामा के प्रति दीवानापन समझ से परे है। अमेरिकी राष्ट्रपति के आने से लेकर जाने तक मीडिया ने उन्हें एक नायक के रूप में पेश किया, देश भर के अखबारात ऐतिहासिक दौरे की खोखली उपलब्धियों से भरे रहे। मसलन, एक प्रमुख हिंदी दैनिक की सुर्खी थी- ओबामा ने किया निहाल। अखबार ने लिखा कि ओबामा ने सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट और पाकिस्तान से आतंकवादी ठिकाने खत्म करने की पैरवी कर खुश किया।

संसद में अपने प्रभावशाली संबोधन से ओबामा ने भारतीयों का दिल जीता। ऐसे ही एक दूसरे अखबार ने जय हिंद, भारत को ओबामा का सलाम नामक शीर्षक से लिखा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने रिश्तों को नई ऊंचाई की राह खोल दी है। एक अंग्रेजी दैनिक ने ओबामा की तारीफों के पुल बांधते हुए लिखा कि ओबामा ने भारत की स्थाई सदस्या की मांग का समर्थन करके सबको अचंभित कर दिया। ऐसा लग रहा था कि ओबामा की उंगलियों पर अंबेडकर और चांदनी चौक जैसी जगहें थीं। भारतीय मीडिया की यही सबसे बड़ी कमजोरी और लाचारी है कि वो भी अमेरिकी मेहमानों के सत्कार में सरकार की तरह पूरी तरह बिछ जाती है, उसे मुद्दों की गहराई में उतरने तक का ख्याल नहीं आता। शायद ही कोई ऐसा अखबार या टीवी चैनल रहा हो जिसने सरकार से ये पूछने की कोशिश की हो कि आखिर ओबामा के दौरे से भारत को सिवाए आश्वासनों के क्या मिला। पाकिस्तान और आतंकवाद पर ओबामा की अधखुली जुबान से साफ है कि ओबामा की नजर में नई दिल्ली से दोस्ती इस्लामाबाद की कीमत पर नहीं हो सकती। मुंबई हमलों के गुनाहगारों को सजा देने की बात करने वाले ओबामा अच्छे से जानते हैं कि पूरी साजिश पाकिस्तान में तैयार की गई। इसके बाद भी वो पाक पर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का दबाव नहीं बना सके। अमेरिका को अफगानिस्तान में बने रहने के लिए पाक का साथ चाहिए, मौजूदा वक्त में पाकिस्तान उसका सबसे बड़ा रणनीतिक साझेदार है। जहां तक भारत का सवाल है तो अमेरिका की नजर में वो केवल आर्थिक जरूरतों को पूरा करने का एक जरिया मात्र है। ओबामा भारत से 54 हजार नौकरियों की जुगाड़ तो कर गए लेकिन उन्होंने आउटसोर्सिंग जैसे मुद्दे पर एक शब्द भी नहीं बोला और न ही हमने उनसे बोलने के लिए कहा। मीडिया ने भी ओबामा की खुमारी में इसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। जबकि कुछ वक्त पहले तक यही मीडिया इस खबर को बढ़ाचढाकर दिखा रहा था। ओबामा की आउटसोर्सिंग विरोधी मुहिम के चलते भारतीय आईटी सेक्टर को काफी नुकसान झेलना पड़ा है। इसके अलावा पाकिस्तान को बदस्तूर जारी अमेरिकी मदद के मुद्दे पर भी भारतीय नेतृत्व कड़ी नाराजगी जाहिर करने में लगभग नाकाम रहा।

ओबामा भारत आने से ठीक पहले ही पाकिस्तान की जेब भरके आए थे। दरअसल भारत की हालत काफी हद तक उन बादलों की तरह है जो गरजते बहुत हैं मगर बरसते नहीं। भारत कई मौकों पर पाक को अमेरिकी रसद पर एतराज जता चुका है, लेकिन जब ओबामा के सामने बैठकर उन्हें सही-गलत का अहसास कराने का मौका आया तो हम महज मेहमाननवाजी में ही उलझे रहे। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, इससे पहले भी कई बार भारतीय नेतृत्व और मीडिया अमेरिका से आने वाले अतिथियों के सम्मान में मूल मुद्दाें को दरकिनार कर चुके हैं। अमेरिकी आते हैं, सम्मान करवाते हैं, भारतीयों को अच्छी लगने वाली कुछ बातें बोलते हैं और अपने के लिए मुनाफे के समझौते कर चलते बनते हैं। बराक हुसैन ओबामा का भारत दौरा अगर किसी के लिए ऐतिहासिक कहा जा सकता है तो सिर्फ और सिर्फ अमेरिका के लिए। भारत की झोली पहले भी खाली थी और अब भी खाली है। ओबामा की यात्रा को भारत के लिए ऐतिहासिक बताने वालों को दिमाग पर थोड़ा सा जोर डालकर जरा सोचने की जरूरत है कि आखिर ओबामा भारत का आश्वासनों के सिवाए क्या देके गए।

Monday, November 1, 2010

ओबामा की यात्रा पर विशेष----हम भारतीय बहुत संतोषी हैं

नीरज नैयर
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा के भारत आने में बस कुछ ही दिन बचे हैं। उनके स्वागत से लेकर लगभग सारी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं, और जो कुछ-एक बची भी हैं वो उनके आने से पहले पूरी हो जाएंगी। ओबामा मुंबई के उसी होटल ताज में रुकेंगे जो पाकिस्तानी आतंकवादियों का निशाना बना था। शायद ये उनकी आतंकवाद के आगे न झुकने वाली सोच को प्रदर्शित करने का एक तरीका है। ओबामा की यात्रा के लिए मुंबई को खासतौर पर सजाया जा रहा है, ताज की खूबसूरती तो पहले से ही कमाल की है, फिर भी ओबामा को कहीं कोई कमी न दिख जाए इसका होटल प्रबंधन ने पूरा ख्याल रखा है। इसके साथ ही कभी न चमकने वाली सड़कों का सूरत-ए-हाल भी बदला जा रहा है। डिवाइडरों को गहरे पीले रंग से रंगा गया है, कि कहीं ओबामा हल्के कलर को देखकर मुंबईवासियों को हल्का न समझ बैठें।

ओबामा के स्वागत से लेकर सुरक्षा तैयारियों में सरकार ने पानी की तरह पैसा बहाया है। उनकी दिल्ली यात्रा के दौरान सुरक्षा के लिए दुनिया की सबसे अत्याधुनिक प्रणाली सी4आई तैनात की जाएगी। इसे लगभग 150 करोड क़ी लागत से इजरायल से मंगाया गया है। संभवत ये पहला मौका है जब भारत में किसी विदेशी अतिथि की सुरक्षा के लिए इसका इस्तेमाल हो रहा है। कुल मिलाकर अमेरिकी राष्ट्रपति की इस यात्रा को यादगार बनाने के लिए सबकुछ किया गया है। सरकार के साथ-साथ मीडिया भी इस दौरे को लेकर उत्साहित है, वैसे उसका उत्साहित होना इसलिए भी लाजमी है क्योंकि इसी मीडिया ने ओबामा की ताजपोशी को जंग जीतने जैसा पेश किया था। देखा जाए तो बराक ओबामा की भारत यात्रा नई दिल्ली के लिए दो मायनों में अहम है, पहली तो यही कि ओबामा अपने पहले कार्यकाल में भारत आ रहे हैं। जबकि बुश और बिल क्लिंटन सेकेंड टर्म में आए थे। दूसरी, ओबामा पहले ऐसे राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं जो भारत दौरे के साथ पाकिस्तान नहीं जाएंगे। इससे पहले जितने भी अमेरिकी प्रेसिडेंटों ने नई दिल्ली का रुख किया वो या तो वाया इस्लामाबाद किया या फिर बाद में पाकिस्तान गए। ओबामा के साथ मुलाकात में जिन मुद्दों पर चर्चा होगी उनमें परमाणु करार, द्विपक्षीय व्यापार, चीन, पाकिस्तान और संयुक्त राष्ट्र में स्थाई सदस्यता शामिल है। इनमें अमेरिकी पसंद के केवल दो ही मुद्दे हैं, परमाणु करार और व्यापार, बाकी भारत की चिंताओं और अपेक्षाओं से जुड़े हैं।

जार्ज डब्लू बुश के कार्यकाल में भारत-अमेरिका के बीच हुईएटमी डील के पूरी तरह अमल में आने का तत्कालीक तौर पर सबसे बड़ा फायदा अगर किसी को होगा तो अमेरिका को। करार के रास्ते अमेरिकी कंपनियां भारत में करोड़ों-अरबों का व्यापार कर मोटा मुनाफा वसूल सकेंगी। ऐसी भी चर्चाएं हैं कि ओबामा कश्मीर पर कुछ फॉर्मूले सुझा सकते हैं, हालांकि अमेरिकी प्रशासन ने इससे इंकार किया है। वैसे कश्मीर पर ओबामा कुछ कहें इसकी संभावना इसलिए भी कम है क्योंकि उनका यह दौरा पूरी तरह से अमेरिकी फायदे पर केंद्रित है यानी करार से होने वाले मुनाफे पर। अमेरिकी प्रतिनिधियों की वैसे भी ये फितरत रही है कि भारत आने के बाद वो भारत को पसंद आने वाली बातें ही करते हैं। कुछ वक्त पहले अमेरिकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने नई दिल्ली में खडे होकर पाकिस्तान के खिलाफ कुछ कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया, और बदले में करोड़ों के एंड यूजर समझौते को सील करवां गईं। ओबामा अपनी यात्रा में निश्चित तौर पर पाकिस्तान को लेकर भारत की चिंताओं पर गंभीरता दिखाएंगे, और ये भी हो सकता है कि वो भारतीय नेतृत्व के चेहरे खिलाने वाला कोई ऐसा बयान दे डालें।

भारतीय बहुत ही संतोषी होते हैं, ओबामा के इतना भर करने से ही खुश हो जाएंगे और भूल जाएंगे कि उन्होंने राष्ट्रपति बनने के बाद से अब तक हमारा क्या-क्या बुरा किया। ओबामा ने भारत को सबसे यादा चोट आउटसोर्सिंग के मुद्दे पर पहुंचाई। अमेरिकी कंपनियों से भारत को मिलने वाले काम के बीच में ओबामा दीवार बनकरखड़े हो गए, उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि जो ेकंपनी गैर अमेरिकियों को नौकरी देगी उसे सालाना मिलने वाली टैक्स छूट से हाथ धोना पड़ेगा। अमेरिका के इस फैसले से भारतीय आईटी उद्योग को काफी नुकसान उठाना पड़ा, अमेरिका की आईटी इंडस्ट्री का आधे से यादा काम भारत या भारतीय प्रोफेशनलों के रास्ते ही होता आया है। ओबामा ने परमाणु करार के रास्ते में रुकावट टालने की भी कुछ कम कोशिश नहीं की, दरअसल ओबामा बगैर परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत किए भारत को छूट दिए जाने के सख्त खिलाफ रहे हैं। हालांकि ये बात अलग है कि वो चाहकर भी करार पर विराम नहीं लगा पाए, क्योंकि ऐसा करने पर उद्योग लॉबी उनके खिलाफ मोर्चो खोल सकती थी। इसके अलावा कश्मीर पर भी वो रह-रहकर भारत की भावनाओं के खिलाफ खिलवाड़ करते रहे, हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर अपने मुंह से कभी कुछ नहीं कहा मगर उनके सहयोगी उनकी जुबान बनते रहे। इसके अलावा पाकिस्तान को लेकर ओबामा ने नई दिल्ली के रुख को कभी महत्व नहीं दिया, भारत आने से पहले भी वो दिल खोलकर पाकिस्तान की झोली भरकर आ रहे हैं। जबकि कई रिपोर्टो में खुलासा हो चुका है कि इस्लामाबाद अमेरिकी मदद का इस्तेमाल भारत के खिलाफ मोर्चा पर लगता है। अमेरिका भले ही जुबानी तौर पर बड़ी-बड़ी बातें करके भारतीय नेतृत्व को विश्वास दिलाने की कोशिश करे कि उसकी नजर में नई दिल्ली का दर्जा पाकिस्तान से ऊपर है, मगर हकीकत इससे पूरी तरह अलग है। दरअसल इराक छोड़ने के बाद अमेरिकी फौजें अफगानिस्तान में मौजूद हैं, और निकट भविष्य में उनके वहां से हटने की संभावना भी नग्णय है।

इस करके अमेरिका को पाक की जरूरत लंबे समय तक पड़ती रहेगी, तो फिर उसके लिए भारत पाक से यादा महत्वपूर्ण कैसे हो सकता है। लेकिन अफसोस की बात है कि इतना सीधा लॉजिक भी भारतीय नेतृत्व को समझ नहीं आता। अमेरिका उल्लू बनाता है और हम बनते रहते हैं। ओबामा के इस दौरे को लेकर भी भारत हद से यादा उत्साहित है। हमारी सरकार किसी बड़े समझौते की उम्मीद लगाए बैठी है, उसे ये भी उम्मीद है कि ओबामा के आने से अशांति फैलाने वाले पड़ोसियों की आवाज थोडी नरम पड़ेगी। मगर ये सारे ख्वाब बराक ओबामा के दिल्ली छोड़ने से पहले ही चकनाचूर हो जाएंगे। पता नहीं क्यों, अमेरिका से आने वाला हर शख्स (सरकार से जुडा हुआ) हमारे लिए आम इंसान से बड़ा हो जाता है। अमेरिकियों से हमारी अपेक्षांए दूसरों से कई गुना यादा रहती हैं, फिर भले ही बार-बार चोट क्यों न पड़ती रहे। ओबामा पहली बार भारत आ रहे हैं, उनका स्वागत जोरदार होना चाहिए, लेकिन इनसब में उम्मीदों और अपेक्षाओं के पहाड़ खड़े करना नादानी के सिवा कुछ नहीं होगा। ण

Thursday, October 28, 2010

शिरडी: एयरपोर्ट से यादा लोकल ट्रांसर्पोटेशन सुधारने की जरूरत

तीर्थस्थलों में शिरडी का अपना एक अलग ही महत्व है, और ये महत्व पिछले थोड़े से वक्त में ही काफी बढ़ गया है। हर रोज तकरीबन 40 से 50 हजार श्रध्दालु सांईबाबा के दर्शन को आते हैं। मुख्य मंदिर के अंदर और बाहर काफी अच्छी व्यवस्थाएं की गई हैं, श्रध्दालुओं के ठहरने के लिए भी बेहतर इंतजाम है। बाबा के दर्शन के साथ-साथ शिरडी में देखने वाला कुछ है तो वो है बोर्ड द्वारा तैयार किया गया नवीन प्रसादालय(डाइनिंग हॉल)। एशिया के इस सबसे बड़े डायनिंग हॉल में एक बार में 5500 लोग बैठकर खाना खा सकते हैं। एक दिन में यहां 100,000 लोगों को भोजन कराने की व्यवस्था है। 7.5 एकड़ में फैले प्रसादालय को 240 मिलियन रुपए की लागत से तैयार किया गया है। शिरडी बोर्ड सालाना तकरीबन 190 मिलियन खाने पर ही खर्च करता है। प्रसादालय में खाने के दो तरह के कूपन मिलते हैं पहला, साधारण जिसके लिए महज 10 रुपए चुकाने होते हैं और दूसरा, वीआईपी जो बस थोड़ा सा महंगा है। डायनिंग हॉल की एक और जो सबसे बड़ी खासियत है वो है साफ-सफाई। सफाई का आलम यहां ये है कि आपको एक मक्खी तक नजर नहीं आएगी। सेवाकार्य में लगे कर्मचारी भी साफ-सुथरे कपड़ों के साथ हाथों में दस्ताने पहनकर प्रसाद वितरित करते हैं। प्रसादालय तक जाने के लिए बोर्ड की तरफ से बस भी चलाई जाती है, लेकिन रास्ता इतनी लंबा भी नहीं है कि बस की जरूरत पड़े। श्रध्दालु अगर चाहें तो पैदल भी जा सकते हैं। थोड़ी बहुत लूट-खसोट जो दूसरे तीर्थस्थलों पर होती है वो यहां भी है, मगर यहां दूसरी जगहों की अपेक्षा व्यवस्थाएं काफी बेहतर हैं सिवाए मंदिर तक पहुंचने के। कोपरगांव स्टेशन से शिरडी तक पहुंचना अपने आप में टेढ़ी खीर है, और ये खीर और भी टेढ़ी हो जाती है अगर आप समूह में नहीं हैं। स्टेशन से शिरडी जाने के लिए मैजिक (बड़े टैम्पो) चलते हैं, जिसका किराया प्रति व्यक्ति 30 रुपए है।

कुछ वक्त पहले तक ये 20 रुपए था। इसके साथ ही प्राइवेट टैक्सियां और ऑटो भी हैं, जो वक्त और सवारी देखकर अपने किराए का मीटर भगाते रहते हैं। शिरडी आने वाले यादातर लोग मैजिक से जाना ही पसंद करते हैं, जायज है एक तो ये सस्ता पड़ता है और दूसरा हर कोई बमुश्किल 30 मिनट के रास्ते के 300-400 रुपए नहीं खर्च नहीं कर सकता। मगर इस सस्ते सफर की सबसे बड़े परेशानी ये है कि एक अकेले व्यक्ति को इसके लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। मतलब अगर आप एक या दो हैं तो मैजिक वाले आपको कोई घास नहीं डालेंगे आपको ही उनके पीछे-पीछे भागना होगा। हो सकता है कि आपको बैठाने के बाद नीचे उतार दिया जाए। मसलन, यदि मैजिक वाले को दो सवारी की जरूरत है और उसे तीन इकट्ठी मिल गईं तो अकेले व्यक्ति को उतरना ही होगा। टांसर्पोटेशन के काम में लगे यादातर लोग मराठी हैं। और इस मराठी लॉबी में काफी एकता है, इसलिए बहसबाजी या बात बढ़ाने से अच्छा उतरना ही होता है। वैसे अकेले सवारी ढूंढने में वक्त बर्बाद करने से भला होगा कि कुछ दूसरे लोगों को जो अकेले हों साथ लेकर चार-पांच सदस्यों का एक ग्रुप बनाया जाए, इसके बाद शायद आपको उतना परेशान न होना पड़े। अहम सवाल बस यहीं से शुरू होता है। शिरडी बोर्ड कमाई के मामले में तिरुपति बालाजी की राह पर है। बोर्ड की सालाना कमाई तकरीबन 200 करोड़ के आसपास है। बीते दिनों बोर्ड ने एयरपोर्ट निर्माण के लिए राय सरकार को 100 करोड़ रुपए की मदद की। बोर्ड के इस फैसले का चौतरफा विरोध भी हुआ, बोर्ड के ट्रस्टी और रायपरिवहन मंत्री के इस कदम पर खुद उनके पिता और भूतपूर्व सांसद बालासाहब ने एतराज जताया। श्रध्दलुओं के एक तबके ने भी इसकी आलोचना की, उनका कहना था कि एयरपोर्ट के लिए 100 करोड़ देने के बजाए बोर्ड इस रकम को गरीबों के उत्थान के लिए खर्च करे। हालांकि बोर्ड का तर्क है कि एयरपोर्ट बनने से शिरडी तक का आवागमन काफी आसान हो जाएगा। ये बात बिल्कुल सही भी है, लेकिन इसका सबसे यादा फायदा किसे मिलेगा इस पर भी गौर करने की जरूरत है। देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा हवाई जहाज से चलने की हैसीयत नहीं रखता, और शिरड़ी पहुंचाने वाले यादातर लोग इसी हिस्से से ताल्लुकात रखते हैं।

एयरपोर्ट बनने से केवल एलीट क्लास को सहूलियत होगी, बोर्ड को अगर आवागमन सुगम बनाना ही था तो पहले उसे कोपरगांव से शिरड़ी तक के लोकल ट्रांसर्पोटेशन को दुरुस्त करने के लिए कुछ कदम उठाने चाहिए थे। इसके लिए जैन समुदाय के तीर्थस्थल महावीरजी का उदाहरण लिया जा सकता है। स्टेशन से मुख्यमंदिर तक के लिए बोर्ड ने बसें संचालित कर रखी हैं। इसके लिए श्रध्दलुओं से कोई किराया भी नहीं लिया जाता, श्रध्दा स्वरूप अगर कोई कुछ दान देना चाहे तो बात अलग है। वैश्ो देवी की ही बात करें तो वहां हेलीकॉप्टर सेवा शुरू होने से पहले दूसरे जरूरी इंतजामों पर ध्यान दिया गया। ये बात अलग है कि आज वहां व्यवसायिककरण कुछ यादा ही हो गया है। 100 करोड एयरपोर्ट के लिए देने के बजाए अगर बोर्ड कुछ बसें चलवा देता तो शायद उसे आलोचनाओं के बजाए तारीफें मिल रही होतीं। शिरडी बोर्ड को सबसे पहले आम श्रध्दलुओं के बारे में सोचना चाहिए था, वो अगर चाहता तो कुछ किराया भी निर्धारित कर सकता था। इससे बसों के संचालन में उसे थोड़ी बहुत मदद भी मिल जाती, इसके बाद यदि हवाई अड्डे के लिए आर्थिक मदद दी जाती तो शायद इतना हल्ला भी नहीं होता। वैसे भी एयरपोर्ट बनवाने का काम राय सरकार है और वो काम कर भी रही थी, बोर्ड यदि 100 करोड नहीं देता तो भी हवाई अड्डा बनता ही।