Saturday, November 27, 2010

ओबामा के दौरे से हमें क्या मिला?

नीरज नैयर
धन्यवाद और जयहिंद जैसे भारी-भरकम शब्द बोलकर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा अपने भारत दौरे को आशाओं के अनुरूप बनाने में सफल रहे। उनकी यात्रा का उद्देश्य मुख्यरूप से मंदी की मार झेल रहे अमेरिका के लिए संजीवीनी लाना था और अरबों के करार के रूप में उन्हें वो हासिल भी हो गया। ओबामा की यात्रा के पहले दिन ही भारतीय और अमेरिकी कंपनियों के बीच करीब 10 अरब डॉलर के बीस समझौते हुए। इन समझौतों के आकार लेने के बाद अमेरिका में 54 हजार नई नौकरियों के रास्ते खुलेंगे। ओबामा से भारत को जो मिला उसमें सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता के समर्थन और प्रतिबंधित तकनीकों के निर्यात पर लगी पाबंदी से मुक्ति का आश्वासन इसके अलावा पाकिस्तान को थोड़ी बहुत फटकार। कुल मिलाकर कहा जाए तो भारत की झोली में केवल आवश्वासन ही आए, जहां तक बात पाकिस्तान को कोसने की है तो उसमें भी ओबामा ने कंजूसी से काम लिया। उन्होंने आतंकवाद के मुद्दे पर पाक के खिलाफ महज उतना ही बोला जितना इस्लामाबाद आसानी से हजम कर सके। अमेरिकी राष्ट्रपति ने तो स्थिर और प्रगतिशील पाकिस्तान को भारत के हित में बता डाला। बकौल ओबामा पाक की स्थिरता सुनिश्चित करने में सबसे यादा दिलचस्पी किसी देश की हो सकती है तो वह भारत है। यदि पाकिस्तान अस्थिर है तो इसका सबसे अधिक नुकसान भारत को ही झेलना होता है। हालांकि संसद को संबोधित करते वक्त उन्होंने जरूर पाकिस्तान के खिलाफ कुछ एक बातें कहीं लेकिन उनमें कड़े शब्दों के इस्तेमाल जैसी कोई बात नजर नहीं आई।

सुरक्षा परिषद में भारत की दावेदारी और तकनीकों के निर्यात पर प्रतिबंध हटाने जैसे मुद्दों पर अमल की कोई समय सीमा नहीं है। वैसे भी सुरक्षा परिषद का विस्तार हाल-फिलहाल तो होने वाला नहीं है, ओबामा खुद भी जानते हैं कि यह रास्ता बहुत टेढ़ा है। शायद इसलिए ही उन्होंने खुलेतौर पर भारत के समर्थन की बात कही। ओबामा ने एक तरह से बुरे दौर से उभरने के लिए भारत का इस्तेमाल किया। तेजी से आगे बढ़ता भारत दुनिया के नक्शे पर एक बिजनेस हब के रूप में उभरा है, चीन से लेकर अमेरिका तक सबकी रुचि नई दिल्ली के साथ यादा से यादा व्यापार बढ़ाने की है। ओबामा भी इसी एजेंडे के साथ भारत आए, उन्होंने अपने एक बयान में कहा भी कि जब मैं वापस जाऊं तो अपने लोगों को बता सकूं की मैं उनके लिए क्या लेकर आया हूं। अपने इस दौरे में ओबामा ने जो एक अच्छी बात करी वो ये कि उन्होंने कश्मीर पर कोई बेफिजुल की बयानबाजी नहीं की, लेकिन सिर्फ इसलिए ओबामा के भारत दौरे को एतिहासिक बता देना नासमझी से यादा कुछ नहीं। ओबामा ने दोनों हाथों से भारत से बटोरा और बदले में आश्वासन थमा गए, बावजूद इसके उनकी यात्रा को भारत के लिए अहम बताने वालों की कमी नहीं है। सरकार का ऐसा करना तो समझ में आता है, मगर मीडिया का ओबामा के प्रति दीवानापन समझ से परे है। अमेरिकी राष्ट्रपति के आने से लेकर जाने तक मीडिया ने उन्हें एक नायक के रूप में पेश किया, देश भर के अखबारात ऐतिहासिक दौरे की खोखली उपलब्धियों से भरे रहे। मसलन, एक प्रमुख हिंदी दैनिक की सुर्खी थी- ओबामा ने किया निहाल। अखबार ने लिखा कि ओबामा ने सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट और पाकिस्तान से आतंकवादी ठिकाने खत्म करने की पैरवी कर खुश किया।

संसद में अपने प्रभावशाली संबोधन से ओबामा ने भारतीयों का दिल जीता। ऐसे ही एक दूसरे अखबार ने जय हिंद, भारत को ओबामा का सलाम नामक शीर्षक से लिखा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने रिश्तों को नई ऊंचाई की राह खोल दी है। एक अंग्रेजी दैनिक ने ओबामा की तारीफों के पुल बांधते हुए लिखा कि ओबामा ने भारत की स्थाई सदस्या की मांग का समर्थन करके सबको अचंभित कर दिया। ऐसा लग रहा था कि ओबामा की उंगलियों पर अंबेडकर और चांदनी चौक जैसी जगहें थीं। भारतीय मीडिया की यही सबसे बड़ी कमजोरी और लाचारी है कि वो भी अमेरिकी मेहमानों के सत्कार में सरकार की तरह पूरी तरह बिछ जाती है, उसे मुद्दों की गहराई में उतरने तक का ख्याल नहीं आता। शायद ही कोई ऐसा अखबार या टीवी चैनल रहा हो जिसने सरकार से ये पूछने की कोशिश की हो कि आखिर ओबामा के दौरे से भारत को सिवाए आश्वासनों के क्या मिला। पाकिस्तान और आतंकवाद पर ओबामा की अधखुली जुबान से साफ है कि ओबामा की नजर में नई दिल्ली से दोस्ती इस्लामाबाद की कीमत पर नहीं हो सकती। मुंबई हमलों के गुनाहगारों को सजा देने की बात करने वाले ओबामा अच्छे से जानते हैं कि पूरी साजिश पाकिस्तान में तैयार की गई। इसके बाद भी वो पाक पर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का दबाव नहीं बना सके। अमेरिका को अफगानिस्तान में बने रहने के लिए पाक का साथ चाहिए, मौजूदा वक्त में पाकिस्तान उसका सबसे बड़ा रणनीतिक साझेदार है। जहां तक भारत का सवाल है तो अमेरिका की नजर में वो केवल आर्थिक जरूरतों को पूरा करने का एक जरिया मात्र है। ओबामा भारत से 54 हजार नौकरियों की जुगाड़ तो कर गए लेकिन उन्होंने आउटसोर्सिंग जैसे मुद्दे पर एक शब्द भी नहीं बोला और न ही हमने उनसे बोलने के लिए कहा। मीडिया ने भी ओबामा की खुमारी में इसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। जबकि कुछ वक्त पहले तक यही मीडिया इस खबर को बढ़ाचढाकर दिखा रहा था। ओबामा की आउटसोर्सिंग विरोधी मुहिम के चलते भारतीय आईटी सेक्टर को काफी नुकसान झेलना पड़ा है। इसके अलावा पाकिस्तान को बदस्तूर जारी अमेरिकी मदद के मुद्दे पर भी भारतीय नेतृत्व कड़ी नाराजगी जाहिर करने में लगभग नाकाम रहा।

ओबामा भारत आने से ठीक पहले ही पाकिस्तान की जेब भरके आए थे। दरअसल भारत की हालत काफी हद तक उन बादलों की तरह है जो गरजते बहुत हैं मगर बरसते नहीं। भारत कई मौकों पर पाक को अमेरिकी रसद पर एतराज जता चुका है, लेकिन जब ओबामा के सामने बैठकर उन्हें सही-गलत का अहसास कराने का मौका आया तो हम महज मेहमाननवाजी में ही उलझे रहे। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, इससे पहले भी कई बार भारतीय नेतृत्व और मीडिया अमेरिका से आने वाले अतिथियों के सम्मान में मूल मुद्दाें को दरकिनार कर चुके हैं। अमेरिकी आते हैं, सम्मान करवाते हैं, भारतीयों को अच्छी लगने वाली कुछ बातें बोलते हैं और अपने के लिए मुनाफे के समझौते कर चलते बनते हैं। बराक हुसैन ओबामा का भारत दौरा अगर किसी के लिए ऐतिहासिक कहा जा सकता है तो सिर्फ और सिर्फ अमेरिका के लिए। भारत की झोली पहले भी खाली थी और अब भी खाली है। ओबामा की यात्रा को भारत के लिए ऐतिहासिक बताने वालों को दिमाग पर थोड़ा सा जोर डालकर जरा सोचने की जरूरत है कि आखिर ओबामा भारत का आश्वासनों के सिवाए क्या देके गए।

Monday, November 1, 2010

ओबामा की यात्रा पर विशेष----हम भारतीय बहुत संतोषी हैं

नीरज नैयर
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा के भारत आने में बस कुछ ही दिन बचे हैं। उनके स्वागत से लेकर लगभग सारी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं, और जो कुछ-एक बची भी हैं वो उनके आने से पहले पूरी हो जाएंगी। ओबामा मुंबई के उसी होटल ताज में रुकेंगे जो पाकिस्तानी आतंकवादियों का निशाना बना था। शायद ये उनकी आतंकवाद के आगे न झुकने वाली सोच को प्रदर्शित करने का एक तरीका है। ओबामा की यात्रा के लिए मुंबई को खासतौर पर सजाया जा रहा है, ताज की खूबसूरती तो पहले से ही कमाल की है, फिर भी ओबामा को कहीं कोई कमी न दिख जाए इसका होटल प्रबंधन ने पूरा ख्याल रखा है। इसके साथ ही कभी न चमकने वाली सड़कों का सूरत-ए-हाल भी बदला जा रहा है। डिवाइडरों को गहरे पीले रंग से रंगा गया है, कि कहीं ओबामा हल्के कलर को देखकर मुंबईवासियों को हल्का न समझ बैठें।

ओबामा के स्वागत से लेकर सुरक्षा तैयारियों में सरकार ने पानी की तरह पैसा बहाया है। उनकी दिल्ली यात्रा के दौरान सुरक्षा के लिए दुनिया की सबसे अत्याधुनिक प्रणाली सी4आई तैनात की जाएगी। इसे लगभग 150 करोड क़ी लागत से इजरायल से मंगाया गया है। संभवत ये पहला मौका है जब भारत में किसी विदेशी अतिथि की सुरक्षा के लिए इसका इस्तेमाल हो रहा है। कुल मिलाकर अमेरिकी राष्ट्रपति की इस यात्रा को यादगार बनाने के लिए सबकुछ किया गया है। सरकार के साथ-साथ मीडिया भी इस दौरे को लेकर उत्साहित है, वैसे उसका उत्साहित होना इसलिए भी लाजमी है क्योंकि इसी मीडिया ने ओबामा की ताजपोशी को जंग जीतने जैसा पेश किया था। देखा जाए तो बराक ओबामा की भारत यात्रा नई दिल्ली के लिए दो मायनों में अहम है, पहली तो यही कि ओबामा अपने पहले कार्यकाल में भारत आ रहे हैं। जबकि बुश और बिल क्लिंटन सेकेंड टर्म में आए थे। दूसरी, ओबामा पहले ऐसे राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं जो भारत दौरे के साथ पाकिस्तान नहीं जाएंगे। इससे पहले जितने भी अमेरिकी प्रेसिडेंटों ने नई दिल्ली का रुख किया वो या तो वाया इस्लामाबाद किया या फिर बाद में पाकिस्तान गए। ओबामा के साथ मुलाकात में जिन मुद्दों पर चर्चा होगी उनमें परमाणु करार, द्विपक्षीय व्यापार, चीन, पाकिस्तान और संयुक्त राष्ट्र में स्थाई सदस्यता शामिल है। इनमें अमेरिकी पसंद के केवल दो ही मुद्दे हैं, परमाणु करार और व्यापार, बाकी भारत की चिंताओं और अपेक्षाओं से जुड़े हैं।

जार्ज डब्लू बुश के कार्यकाल में भारत-अमेरिका के बीच हुईएटमी डील के पूरी तरह अमल में आने का तत्कालीक तौर पर सबसे बड़ा फायदा अगर किसी को होगा तो अमेरिका को। करार के रास्ते अमेरिकी कंपनियां भारत में करोड़ों-अरबों का व्यापार कर मोटा मुनाफा वसूल सकेंगी। ऐसी भी चर्चाएं हैं कि ओबामा कश्मीर पर कुछ फॉर्मूले सुझा सकते हैं, हालांकि अमेरिकी प्रशासन ने इससे इंकार किया है। वैसे कश्मीर पर ओबामा कुछ कहें इसकी संभावना इसलिए भी कम है क्योंकि उनका यह दौरा पूरी तरह से अमेरिकी फायदे पर केंद्रित है यानी करार से होने वाले मुनाफे पर। अमेरिकी प्रतिनिधियों की वैसे भी ये फितरत रही है कि भारत आने के बाद वो भारत को पसंद आने वाली बातें ही करते हैं। कुछ वक्त पहले अमेरिकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने नई दिल्ली में खडे होकर पाकिस्तान के खिलाफ कुछ कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया, और बदले में करोड़ों के एंड यूजर समझौते को सील करवां गईं। ओबामा अपनी यात्रा में निश्चित तौर पर पाकिस्तान को लेकर भारत की चिंताओं पर गंभीरता दिखाएंगे, और ये भी हो सकता है कि वो भारतीय नेतृत्व के चेहरे खिलाने वाला कोई ऐसा बयान दे डालें।

भारतीय बहुत ही संतोषी होते हैं, ओबामा के इतना भर करने से ही खुश हो जाएंगे और भूल जाएंगे कि उन्होंने राष्ट्रपति बनने के बाद से अब तक हमारा क्या-क्या बुरा किया। ओबामा ने भारत को सबसे यादा चोट आउटसोर्सिंग के मुद्दे पर पहुंचाई। अमेरिकी कंपनियों से भारत को मिलने वाले काम के बीच में ओबामा दीवार बनकरखड़े हो गए, उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि जो ेकंपनी गैर अमेरिकियों को नौकरी देगी उसे सालाना मिलने वाली टैक्स छूट से हाथ धोना पड़ेगा। अमेरिका के इस फैसले से भारतीय आईटी उद्योग को काफी नुकसान उठाना पड़ा, अमेरिका की आईटी इंडस्ट्री का आधे से यादा काम भारत या भारतीय प्रोफेशनलों के रास्ते ही होता आया है। ओबामा ने परमाणु करार के रास्ते में रुकावट टालने की भी कुछ कम कोशिश नहीं की, दरअसल ओबामा बगैर परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत किए भारत को छूट दिए जाने के सख्त खिलाफ रहे हैं। हालांकि ये बात अलग है कि वो चाहकर भी करार पर विराम नहीं लगा पाए, क्योंकि ऐसा करने पर उद्योग लॉबी उनके खिलाफ मोर्चो खोल सकती थी। इसके अलावा कश्मीर पर भी वो रह-रहकर भारत की भावनाओं के खिलाफ खिलवाड़ करते रहे, हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर अपने मुंह से कभी कुछ नहीं कहा मगर उनके सहयोगी उनकी जुबान बनते रहे। इसके अलावा पाकिस्तान को लेकर ओबामा ने नई दिल्ली के रुख को कभी महत्व नहीं दिया, भारत आने से पहले भी वो दिल खोलकर पाकिस्तान की झोली भरकर आ रहे हैं। जबकि कई रिपोर्टो में खुलासा हो चुका है कि इस्लामाबाद अमेरिकी मदद का इस्तेमाल भारत के खिलाफ मोर्चा पर लगता है। अमेरिका भले ही जुबानी तौर पर बड़ी-बड़ी बातें करके भारतीय नेतृत्व को विश्वास दिलाने की कोशिश करे कि उसकी नजर में नई दिल्ली का दर्जा पाकिस्तान से ऊपर है, मगर हकीकत इससे पूरी तरह अलग है। दरअसल इराक छोड़ने के बाद अमेरिकी फौजें अफगानिस्तान में मौजूद हैं, और निकट भविष्य में उनके वहां से हटने की संभावना भी नग्णय है।

इस करके अमेरिका को पाक की जरूरत लंबे समय तक पड़ती रहेगी, तो फिर उसके लिए भारत पाक से यादा महत्वपूर्ण कैसे हो सकता है। लेकिन अफसोस की बात है कि इतना सीधा लॉजिक भी भारतीय नेतृत्व को समझ नहीं आता। अमेरिका उल्लू बनाता है और हम बनते रहते हैं। ओबामा के इस दौरे को लेकर भी भारत हद से यादा उत्साहित है। हमारी सरकार किसी बड़े समझौते की उम्मीद लगाए बैठी है, उसे ये भी उम्मीद है कि ओबामा के आने से अशांति फैलाने वाले पड़ोसियों की आवाज थोडी नरम पड़ेगी। मगर ये सारे ख्वाब बराक ओबामा के दिल्ली छोड़ने से पहले ही चकनाचूर हो जाएंगे। पता नहीं क्यों, अमेरिका से आने वाला हर शख्स (सरकार से जुडा हुआ) हमारे लिए आम इंसान से बड़ा हो जाता है। अमेरिकियों से हमारी अपेक्षांए दूसरों से कई गुना यादा रहती हैं, फिर भले ही बार-बार चोट क्यों न पड़ती रहे। ओबामा पहली बार भारत आ रहे हैं, उनका स्वागत जोरदार होना चाहिए, लेकिन इनसब में उम्मीदों और अपेक्षाओं के पहाड़ खड़े करना नादानी के सिवा कुछ नहीं होगा। ण

Thursday, October 28, 2010

शिरडी: एयरपोर्ट से यादा लोकल ट्रांसर्पोटेशन सुधारने की जरूरत

तीर्थस्थलों में शिरडी का अपना एक अलग ही महत्व है, और ये महत्व पिछले थोड़े से वक्त में ही काफी बढ़ गया है। हर रोज तकरीबन 40 से 50 हजार श्रध्दालु सांईबाबा के दर्शन को आते हैं। मुख्य मंदिर के अंदर और बाहर काफी अच्छी व्यवस्थाएं की गई हैं, श्रध्दालुओं के ठहरने के लिए भी बेहतर इंतजाम है। बाबा के दर्शन के साथ-साथ शिरडी में देखने वाला कुछ है तो वो है बोर्ड द्वारा तैयार किया गया नवीन प्रसादालय(डाइनिंग हॉल)। एशिया के इस सबसे बड़े डायनिंग हॉल में एक बार में 5500 लोग बैठकर खाना खा सकते हैं। एक दिन में यहां 100,000 लोगों को भोजन कराने की व्यवस्था है। 7.5 एकड़ में फैले प्रसादालय को 240 मिलियन रुपए की लागत से तैयार किया गया है। शिरडी बोर्ड सालाना तकरीबन 190 मिलियन खाने पर ही खर्च करता है। प्रसादालय में खाने के दो तरह के कूपन मिलते हैं पहला, साधारण जिसके लिए महज 10 रुपए चुकाने होते हैं और दूसरा, वीआईपी जो बस थोड़ा सा महंगा है। डायनिंग हॉल की एक और जो सबसे बड़ी खासियत है वो है साफ-सफाई। सफाई का आलम यहां ये है कि आपको एक मक्खी तक नजर नहीं आएगी। सेवाकार्य में लगे कर्मचारी भी साफ-सुथरे कपड़ों के साथ हाथों में दस्ताने पहनकर प्रसाद वितरित करते हैं। प्रसादालय तक जाने के लिए बोर्ड की तरफ से बस भी चलाई जाती है, लेकिन रास्ता इतनी लंबा भी नहीं है कि बस की जरूरत पड़े। श्रध्दालु अगर चाहें तो पैदल भी जा सकते हैं। थोड़ी बहुत लूट-खसोट जो दूसरे तीर्थस्थलों पर होती है वो यहां भी है, मगर यहां दूसरी जगहों की अपेक्षा व्यवस्थाएं काफी बेहतर हैं सिवाए मंदिर तक पहुंचने के। कोपरगांव स्टेशन से शिरडी तक पहुंचना अपने आप में टेढ़ी खीर है, और ये खीर और भी टेढ़ी हो जाती है अगर आप समूह में नहीं हैं। स्टेशन से शिरडी जाने के लिए मैजिक (बड़े टैम्पो) चलते हैं, जिसका किराया प्रति व्यक्ति 30 रुपए है।

कुछ वक्त पहले तक ये 20 रुपए था। इसके साथ ही प्राइवेट टैक्सियां और ऑटो भी हैं, जो वक्त और सवारी देखकर अपने किराए का मीटर भगाते रहते हैं। शिरडी आने वाले यादातर लोग मैजिक से जाना ही पसंद करते हैं, जायज है एक तो ये सस्ता पड़ता है और दूसरा हर कोई बमुश्किल 30 मिनट के रास्ते के 300-400 रुपए नहीं खर्च नहीं कर सकता। मगर इस सस्ते सफर की सबसे बड़े परेशानी ये है कि एक अकेले व्यक्ति को इसके लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। मतलब अगर आप एक या दो हैं तो मैजिक वाले आपको कोई घास नहीं डालेंगे आपको ही उनके पीछे-पीछे भागना होगा। हो सकता है कि आपको बैठाने के बाद नीचे उतार दिया जाए। मसलन, यदि मैजिक वाले को दो सवारी की जरूरत है और उसे तीन इकट्ठी मिल गईं तो अकेले व्यक्ति को उतरना ही होगा। टांसर्पोटेशन के काम में लगे यादातर लोग मराठी हैं। और इस मराठी लॉबी में काफी एकता है, इसलिए बहसबाजी या बात बढ़ाने से अच्छा उतरना ही होता है। वैसे अकेले सवारी ढूंढने में वक्त बर्बाद करने से भला होगा कि कुछ दूसरे लोगों को जो अकेले हों साथ लेकर चार-पांच सदस्यों का एक ग्रुप बनाया जाए, इसके बाद शायद आपको उतना परेशान न होना पड़े। अहम सवाल बस यहीं से शुरू होता है। शिरडी बोर्ड कमाई के मामले में तिरुपति बालाजी की राह पर है। बोर्ड की सालाना कमाई तकरीबन 200 करोड़ के आसपास है। बीते दिनों बोर्ड ने एयरपोर्ट निर्माण के लिए राय सरकार को 100 करोड़ रुपए की मदद की। बोर्ड के इस फैसले का चौतरफा विरोध भी हुआ, बोर्ड के ट्रस्टी और रायपरिवहन मंत्री के इस कदम पर खुद उनके पिता और भूतपूर्व सांसद बालासाहब ने एतराज जताया। श्रध्दलुओं के एक तबके ने भी इसकी आलोचना की, उनका कहना था कि एयरपोर्ट के लिए 100 करोड़ देने के बजाए बोर्ड इस रकम को गरीबों के उत्थान के लिए खर्च करे। हालांकि बोर्ड का तर्क है कि एयरपोर्ट बनने से शिरडी तक का आवागमन काफी आसान हो जाएगा। ये बात बिल्कुल सही भी है, लेकिन इसका सबसे यादा फायदा किसे मिलेगा इस पर भी गौर करने की जरूरत है। देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा हवाई जहाज से चलने की हैसीयत नहीं रखता, और शिरड़ी पहुंचाने वाले यादातर लोग इसी हिस्से से ताल्लुकात रखते हैं।

एयरपोर्ट बनने से केवल एलीट क्लास को सहूलियत होगी, बोर्ड को अगर आवागमन सुगम बनाना ही था तो पहले उसे कोपरगांव से शिरड़ी तक के लोकल ट्रांसर्पोटेशन को दुरुस्त करने के लिए कुछ कदम उठाने चाहिए थे। इसके लिए जैन समुदाय के तीर्थस्थल महावीरजी का उदाहरण लिया जा सकता है। स्टेशन से मुख्यमंदिर तक के लिए बोर्ड ने बसें संचालित कर रखी हैं। इसके लिए श्रध्दलुओं से कोई किराया भी नहीं लिया जाता, श्रध्दा स्वरूप अगर कोई कुछ दान देना चाहे तो बात अलग है। वैश्ो देवी की ही बात करें तो वहां हेलीकॉप्टर सेवा शुरू होने से पहले दूसरे जरूरी इंतजामों पर ध्यान दिया गया। ये बात अलग है कि आज वहां व्यवसायिककरण कुछ यादा ही हो गया है। 100 करोड एयरपोर्ट के लिए देने के बजाए अगर बोर्ड कुछ बसें चलवा देता तो शायद उसे आलोचनाओं के बजाए तारीफें मिल रही होतीं। शिरडी बोर्ड को सबसे पहले आम श्रध्दलुओं के बारे में सोचना चाहिए था, वो अगर चाहता तो कुछ किराया भी निर्धारित कर सकता था। इससे बसों के संचालन में उसे थोड़ी बहुत मदद भी मिल जाती, इसके बाद यदि हवाई अड्डे के लिए आर्थिक मदद दी जाती तो शायद इतना हल्ला भी नहीं होता। वैसे भी एयरपोर्ट बनवाने का काम राय सरकार है और वो काम कर भी रही थी, बोर्ड यदि 100 करोड नहीं देता तो भी हवाई अड्डा बनता ही।

Friday, September 10, 2010

क्या हो आधुनिकता का पैमाना?

बलात्कार के मामलों में पिछले कुछ वक्त में गजब की तेजी देखने को मिली है। ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि जैसे-जैसे हम विकास की दौड़ में आगे बढ़ते जा रहे हैं, नैतिक मूल्यों का उतनी ही तेजी से पतन होता जा रहा है। पहले कभी-कभी ऐसे किस्से सुनने में आया करते थे मगर अब चोरी-चपाटी जैसे आम खबरों की माफिक हर रोज बलात्कार की घटनाएं खबरों का हिस्सा बनी रहती हैं। कुछ लोग महिलाओं के खिलाफ बढ़ते इस तरह के अपराधों के लिए उनकी अति आधुनिक बनने की होड़ और जरूरत से यादा भडक़ाऊ वस्त्रों को कुसूरवार मानते हैं जबकि कुछ की नजर में इसके लिए पुरुष ही गुनाहगार हैं। ये एक निहायत ही लंबी बहस का मुद्दा है, ऐसी बहस जिसका शायद कभी अंत नहीं हो। उत्तरप्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक ने कुछ साल पहले एक टीवी चैनल पर कहा था कि बुर्के में चलने वाली महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और बलात्कार जैसी घटनाएं कम होती हैं, उनका इशारा शायद यही था कि महिलाओं को अपने पहनावे में बदलाव की जरूरत है। उनके इस बयान की महिलावादी संगठन और तमाम बुध्दिजीवियों ने तीखे शब्दों में आलोचना की थी। वैसे भी ये हमारे यहां का दस्तूर बन चुका है कि जो बात कानों को सुनने में अच्छी न लगे उसकी आलोचना शुरू कर दो, फिर भले ही उसके पीछे की हकीकत कुछ और क्यों न बयां कर रही हो। 70-80 के दशक में बॉलीवुड से निकलने वाली फिल्मों में खूबसूरती को सादगी में बयां किया जाता था, लेकिन अब उत्तेजक परिधान और अंतरंग दृश्यों के बिना कोई भी फिल्म तैयार नहीं होती।

फिल्मों में नायिका के परिधानों की लंबाई जितनी कम होती है उसे उतनी ही आकर्षक माना जाता है, दुर्भाग्य की बात तो ये है कि यही मानसिकता और चलन फिल्मी दुनिया के बाहर भी चल निकला है। फैशनेबल और फूहड़ता के मिश्रण से जो पोशाकें तैयार की जा रही हैं, वो बाजार में धड़ल्ले से बिक रही हैं। छोटे और कटे-फटे कपड़ों की बाजार में मांग भी है और इन्हें महंगे से महंगे दाम में खरीदने वालों की फौज भी। बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घरानों से लेकर स्कूल-कॉलेज तक फैशन की मंडी बन गए हैं। दिल्ली यूनीवसिर्टी इसका सबसे जीवंत उदाहरण हैं, यहां पहुंचने पर स्वयं को यह अहसास दिलाने में काफी वक्त लगता है कि यहां लोग पढ़ने आते हैं। तमाम अखबारात आकर्षक पोशाकों वाली युवतियों के फोटो प्रकाशित कर नए और पुराने ट्रेंड में फर्क समझाने की कोशिश करते हैं। केवल पुरुष ही नहीं कई जानी-मानी महिलाएं भी आजकल के फैशन ट्रेंड को सही नहीं मानतीं, उनकी नजर में फैशनेबल और आधुनिकता केवल कम कपड़े पहनना ही नहीं। बात सही भी है, फैशन का पैमाना आजकल लोवेस्ट जींस और जींस एवं टीशर्ट के बीच कम से कम चार-पांच उंगल के फासलें को माना जाता है। हमारे यहां महिलाएं लंबे वक्त से समानता के अधिकार की बात करती आ रही हैं, आज इतना सब होने के बाद भी उन्हें लगता है कि वो काफी पिछड़ी हैं। पहनावे को लेकर अधिकतर महिलाओं का तर्क होता है, कि जब पुरुषों को अपने हिसाब से कपड़े पहनने की आजादी है तो फिर हम पर रोक-टोक क्यों?यादा वक्त नहीं हुआ जब कुछ विदेशी बालाओं ने टॉपलेस होकर प्रदर्शन किया था, उनका तर्क था कि अगर पुरुष अर्ध्दनग् अवस्था में घूम सकते हैं तो फिर कम क्यों नहीं। सवाल यहां रोकने-टोकने या फिर घूमने-फिरने का नहीं है, सवाल है मर्यादाओं का। महिलाएं यदि टॉपलेस होकर घूमती भी हैं तो उसका खामियाजा कौन भुगतेगा, इस बारे में भी सोचने की जरूरत है। विकृत मानसिकता और अपराधिक प्रवृति वालों की सोच नहीं बदली जा सकती। कानून को कितना भी कठोर क्यों न बना दिया जाए, वो अपराधी को अपराध करने से पूरी तरह नहीं रोक सकता।

इस्लामिक मुल्कों में आंख के बदले आंख, टांग के बदले टांग जैसे कानून हैं, छोटे से अपराध पर वहां सरेआम सजा दी जाती है। बावजूद इसके क्राइम वहां पर भी है। सड़क पर चलते वक्त अपना ध्यान खुद ही रखना पड़ता है, कड़े नियम- कानून सामने से आने वाले ट्रक को किसी राहगीर को रौंदने से नहीं रोक सकते। ठीक इसी तरह से यदि फैशनेबल के पैमाने में थोड़ा सा फेरबदल किया जाए तो इसमें हर्ज ही क्या है। जींस और टीशर्ट के बीच के फासले को खत्म करने पर भी आधुनिकता बरकरार रहेगी, बस इतना ही समझने की जरूरत है। वैसे मानसिकता को विकृत बनाने के पीछे हार्मोंस का भी अहम योगदान होता है। हमारे शरीर में पाए जाने वाले हार्मोंस इनसब में मुख्य भूमिका निभाते हैं। हमें कब क्या करना है यह हमसे यादा हमारे शरीर द्वारा स्त्रावित हार्मोंस को पता होता है। क्योंकि हमारी हर गतिविधि पर इनका नियंत्रण होता है। हमारे शरीर में पाए जाने वाला सेरोटेनिन वह हारमोन है जो सेक्स के मामले में इंसान को अंधा या शर्मिला बना देता है। शरीर में इस हारमोन का स्तर ऊंचा रहना ही उचित होता है क्योंकि नीचा स्तर सुलगते अंगारों को हवा देता देने का काम करता है। सेरेटोनिन का ऊंचा स्तर शांति, प्रसन्नता और संतोष को बढ़ावा देता है। सामान्यतौर पर जब शरीर में सेरेटोनिन का स्तर नीचे गिरने लगता है तो सेक्स करने की इच्छा में तीव्र वृध्दि होने लगती है। हमारे दिमाग पर हमारा संतुलन डगमगाने लगता है। सेक्स इच्छा में अंधे और हिंसक बनकर व्यक्ति किसी भी नीचता तक उतर सकता है। कभी-कभी तो यह हैवानियत बलात्कार जैसे अपराध पर जाकर शांत होती है। जब व्यक्ति में इस हार्मोंस का स्तर नीचे चला जाता है तो उसे सही गलत का अहसास नहीं रहता। ऐसे में अति उत्तेजक परिधान और फिल्मों मे परोसी जा रही अशीलता उसके अंदर के हैवान को और जागृत कर देती है। दूसरे शब्दों में अगर कहें तो बलात्कार जैसी घटनाओं के लिए काफी हद तक इस हार्मोंस का नीचा स्तर भी कुसूरवार है। हार्मोंस की हमारी जिंदगी में और भी कई बदलाव के लिए जिम्मेदार होते हैं। उदाहरण के तौर पर टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन।

इस हार्मोन के चलते पुरुष रिश्तों में शारीरिक संबंधों को यादा तरजीह देते हैं जबकि महिलाओं में भावनात्मक जुड़ाव अधिक होता है। पुरुषों में महिलाओं की अपेक्षा टेस्टोस्टेरॉन का स्तर यादा पाया जाता है और ये हार्मोन शारीरिक संतुष्टि को अधिक महत्व देता है इसी के चलते पुरुष शारीरिक संबंधों में निर्भर रहते हैं। टेस्टोस्टेरॉन अपेक्षाकृत गर्म मौसम में यादा प्रभावी होता है। हालांकि हार्मोंस तो एक अलग मसला है, असल मुद्दा तो है कि आधुनिकता और फैशनेबल बनने का पैमाना क्या होना चाहिए। निश्चित तौर पर कथित बुध्दिजीवियों और महिलावादी संगठनों को ये विचार दकियानूसी और पुरुषवादी मानसिकता से प्रेरित लगेंगे, लेकिन मैं फिर यही कहूंगा इनके पीछे की हकीकत और गहराई को समझने की जरूरत है।

Tuesday, August 24, 2010

आपदा प्रबंधन का कमजोर तंत्र

नीरज नैयर
मुंबई बंदरगाह के पास दो विदेशी जहाजों की टक्कर और उसके बाद पैदा हुई स्थिति ने कई सवालों को जन्म दिया है। सबसे पहला सवाल तो यही है कि आखिर बंदरगाह के इतने नजदीक जहाज कैसे टकरा गए। खुले समुद्र में बीचों-बीच टक्कर की बात तो समझी जा सकती है, लेकिन एक व्यस्त पोर्ट के करीब भिड़त का होना लापरवाही और व्यवस्था की नाकामी को उजागर करता है। एयर टै्रफिक कंट्रोल की तरह समुद्री यातायात के भी नियम-कायदे होते हैं, पर लगता है मुंबई बंदरगाह पर उनका पालन नहीं किया जाता। इन जहाजों की टक्कर से कंपनियों को हुए नुकसान की भरपाई तो बीमा कंपनियां कर देंगी, मगर पर्यावरण को जो नुकसान पहुंचा है उसकी जिम्मेदारी कौन उठाएगा। जो एमएससी चित्रा नामक जहाज डूबने के कगार पर पहुंचा उससे भारी मात्रा में तेल रिसकर समुद्र में बह गया। इसके अलावा कई कीटनाशकों से भरे कंटेनर में पानी में मिल गए। एक मोटे अनुमान के मुताबिक जहाज पर तकरीबन 1219 कंटेनर लदे थे, जिनमें 2262 टन तेल था। और करीब 300 कंटेनर लहरों के साथ बह निकले। इस हादसे के चंद रोज बाद ही समुद्र का पानी और आस-पास के तटों पर तेल का प्रभाव देखने को मिला। कोलाबा के तट पर काफी तादाद में मछलियां मरी पाई गईं। लेकिन इसे महज शुरूआती प्रभाव ही कहा जा सकता है, पर्यावरणविद इसके दूरगामी दुष्परिणामों की तरफ इशारा कर चुके हैं। ये रिसाव समुद्री जीवों के ब्रीडिंग साइकिल को भी प्रभावित करेगा, इसलिए मुंबईवासियों को मछलियों का सेवन न करने की हिदायत दी गई है।

यह घटना सात अगस्त को हुई और यातायात बहाल करने में छह दिन का वक्त लगा। एक जहाज को खाली करने में इतना वक्त और वो भी तब उसमें लदा सामान जानहानी का सबब बन सकता है, बताता है कि हम इस तरह की चुनौतियाें से निपटने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं। टक्कर के बाद शुरूआती तिकड़म एमएससी चित्रा को सीधा करने के लिए लगाई गई, जबकि उस वक्त पहली प्राथमिकता उसमें लदे खतरनाक कंटेनरों को बाहर निकालने की होनी चाहिए थी। इस राहत कार्य की रणनीति ही सही तरीके से तैयार नहीं की गई, अगर हादसा बंदरगाह से बहुत दूर होता तो देरी की बात स्वीकारी जा सकती थी। मगर बंदरगाह से दुर्घटनास्थल की दूरी मुश्किल से 10 किलोमीटर थी। क्या दूसरे बड़े जहाजों को तुरंत मौके पर नहीं पहुंचाया जाना चाहिए था, ये बात सही है कि मार्ग बाधित होने से काम आसान नहीं था मगर फिर भी कुछ न कुछ व्यवस्था तो की ही जा सकती थी। ऐसे मौकों पर अक्सर हेलीकॉप्टर का प्रयोग या तो किया ही नहीं जाता या फिर बहुत देर से उनकी याद आती है। इस मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। अगर समुद्री मार्ग बाधित था तो हवाई मार्ग के सहारे दुर्घटनास्थल पर पहुंचकर राहत कार्य को विद्युतगति देनी चाहिए थी। 1200 कंटेनरों को चित्रा से उठाकर तट तक पहुंचाने में 8-10 हेलाकॉप्टरों को यादा वक्त नहीं लगता, यदि लगता भी तो स्थिति इतनी बुरी नहीं होती जितनी आज है। रिसाव रोकने के लिए भी नीदरलैंड और सिंगापुर से विशेषज्ञों को बुलाना पड़ा। समुद्र के रास्ते भारत का व्यापार लगातार बढ़ रहा है बावजूद इसके इतनी लचर व्यवस्था आपदा प्रबंधन के इंतजामों की पोल खोलती है। हालात ये हैं कि हमें बचाव कार्य के लिए भी दूसरों का मुंह ताकना पड़ रहा है। बात केवल यहीं तक सीमित नहीं है, आमतौर पर भीषण अगि्कांड जैसे मौकों पर भी हमारी मजबूरी सामने आती है। कुछ वक्त पहले कोलकाता के एक व्यस्तम बाजार में लगी आग को बुझाने में फायर फाइटरों को काफी मशक्कतों का सामना करना पड़ा।

तंग रास्ते और पुरानी बसावट के चलते आग ने चंद मिनटों में ही विकराल रूप अख्तियार कर लिया था। जब आग कई मंजिला ऊंची इमारत पर लगी हो तो फायर ब्रिगेड की कई गाड़ियों का पानी भी कम पड़ जाता है। ऐसे वक्त में कोई दूसरी वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की जाती। अधिकतर बड़े देशों में ऐसी स्थिति से निपटने के लिए फायर ब्रिगेड की गाड़ियों के साथ-साथ हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल भी किया जाता है। हेलीकॉप्टर से एक बार में ही काफी मात्रा में पानी निकल सकता है जो दहकती आग को शांत करने में यादा कारगर होता है। निश्चित तौर पर राहत और बचाव कार्य का ये तरीका यादा खर्चीला है मगर ये यादा कारगर भी है। शायद खर्चे के चलते ही इस बारे में अब तक कोई विचार नहीं किया गया। दो-तीन साल पहले राजस्थान में नदी के तेज बहाव में फंसे लोग पर्याप्त मदद के अभाव में एक-एक करके मौत के आगोश में समा गए थे। मीडिया ने इस घटना की लाइव फुटेज घंटों चलाई मगर सरकारी मदद वक्त पर नहीं पहुंची। प्रशासन के लिए एक हेलिकॉप्टर का इंतजाम करना कितना बड़ा काम है ये इस घटना के बाद मालूम चला। अभी हाल ही में पश्चिम बंगाल में र्हुई दो ट्रेन दुर्घटनाओं में राहत और बचाव कार्य हादसे के काफी देर के बाद शुरू हो सका। यदि सही वक्त पर लोगों को बचाने का काम शुरू कर दिया जाता तो बहुत सी जिंगदियों को बचाया जा सकता था। ट्रेन या सड़क हादसों के वक्त यादातर बचाव दल देर से ही पहुंच पाता है, इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं लेकिन कारणों को दूर करने के बारे में हम आखिर कब सोचना शुरू करेंगे? शुक्र है हमारे यहां मैक्सिको की खाड़ी जैसा कुछ नहीं हुआ, अगर बीपी की तरह कोई भारतीय कंपनी ऐसा कुछ कर देती तो शायद रिसाव कभी बंद ही नहीं हो पाता। भले ही अब चित्रा और खलीसिया की टक्कर के लिए उनके कप्तानों को दोषी ठहराने की कवायदों को परवान चढ़ाया जा रहा हो मगर केवल ऐसा करने से ही भविष्य की घटनाओं पर विराम नहीं लगाया जा सकता। दोषियों को दंड मिले ये जरूरी भी है लेकिन मौजूदा व्यवस्था की खामियों को दुरुस्त करना भी उतना ही जरूरी है।

आज डिजास्टर मैनेजमेंट की डिक्शनरी में कुछ नए शब्द जोड़ने की जरूरत है। भले ही देश की अर्थव्यवस्था मजबूती के नए-नए आयाम स्थापित कर रही हो मगर जब तक इन बुनियादी मुद्दों पर हमारी पकड़ मजबूत नहीं होती तब तक सबकुछ बेकार है। जरा सोचके देखिए अगर कल सूनामी जैसी आपदा से हमारा सामना हो जाए तो क्या हम इतने सक्षम हैं कि अपने आप को खड़ा रख सकेंगे, निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में ही होगा। सरकार को आपदा प्रबंधन जैसे गंभीर मुद्दे पर गंभीरता के साथ रणनीति बनाने की जरूरत है और संसाधनों के अभाव को दूर करने की भी ताकि कुछ सौ कंटेनरों को निकालने या आग बुझाने में हमें उतना वक्त ना लगे जितना बर्बादी के लिए काफी होता है।

Thursday, July 29, 2010

हजरत ने तो नहीं कहा, मुझे कुर्बानी चाहिएU

नीरज नैयर
बीते दिनों ऐसे ही सड़क से गुजरते हुए कुछ लोग दिखाई दिए, उन्होंने अपनी बाइक के पिछले हिस्से में एक डंडा फंसाया हुआ था। जिसके दोनों तरफ मुर्गियों को बेतरतीबी से लटकाया गया था। मुर्गियां फड़फड़ा रही थीं, लटके-लटके उनकी आवाज ने भी शायद उनका साथ छोड़ दिया था। चंद पलों के लिए उनकी तड़पन दिखाई देती और फिर ऐसे खामोश हो जातीं जैसे कभी जान थी ही नहीं। थोड़ी ही देर में वो बाइक आंखों से ओझल हो गई, और एक आत्मग्लानी मन में लिए करोड़ों हिंदुस्तानियों की तरह मैं भी आगे बढ़ निकला। ऐसी दुर्दशा तो उस आलू-भिंडी-टमाटर की भी नहीं होती होगी जिसमें कोई जान नहीं होती। पर शायद मांस का व्यापार करने और खाने वालों की नजर में ये जीवित प्राणी निर्जीव वस्तु से भी गया गुजरा स्थान रखते हैं।

क्रूरता के कई मायने हैं और वो कई रूप में हमारे सामने आती है, लेकिन इस क्रूरता को क्या नाम दिया जाए। ये मैं आज तक समझ नहीं पाया हूं। इस वाकये ने कुछ साल पहले एक अखबार में छपी उन तस्वीरों की याद ताजा कर दी है, जिसकी भयावहता आज भी मेरे बदन में सिरहन पैदा कर देती है। वो तस्वीरें ईद के बाद प्रकाशित हुईं थीं। हाथों में धारधार हथियार लिए मुस्लिम समुदाय के लोग एक ऊंट पर प्रहार कर रहे थे, ऊंट के गले से खून की धारा बह रही थी और उसकी आंखों में दर्द का सैलाब उमड़ आया था। वो चीख रहा था मगर उसकी कद्रन कर देने वाली चीख उल्लास के शोर में दब गई थी। उन तस्वीरों को देखकर मेरे मुंह से सबसे पहले बस यही निकला था, आखिर ये कैसा त्योहार। कुर्बानी और बलि के नाम पर बेजुबानों को बेमौत मारा जाता है। मारने
वालों के पास अपने बचाव की तमाम दलीलें है, कोई इसे परवरदिगार का पैगाम कहता है तो कोई देवी का संदेश। लेकिन क्या इन दलीलों की प्रमाणिकता सिध्द की जा सकती है? जो मुस्लिम समुदाय कुर्बानी की बातें करता है वो हजरत मुहम्मद के जीवन से कुछ सीख क्यों नहीं लेता। हजरत साहब ने तो कभी किसी पशु-पक्षी को कष्ट पहुंचाने तक के बारे में भी नहीं सोचा।


बात करीब पंद्रह सौ साल पहले की है, अरब के रेगिस्तान से एक काफिला गुजर रहा था। कुछ दूर चलने के बाद काफिले के सरदार ने उचित स्थान का चुनाव कर रात में पड़ाव डालने का फैसला लिया। काफिले वालों ने ऊंटों पर लदा अपना-अपना सामान उतारा। कुछ देर के आराम के बाद उन्होंने नमाज अता की और खाना पकाने के लिए चूल्हे जलाना शुरू कर दिए। काफिले के सरदार एक चूल्हे के पास पड़े पत्थर पर बैठकर जलती हुई आग को निहारने लगे। अचानक ही उनकी निगाह चूल्हे के नजदीक बने चीटियों के बिल पर गई, जो आग की तपिश से व्याकुल होकर यहां यहां-वहां भागने के लिए रास्ता तलाश रहीं थीं। चीटियों की इस व्याकुलता ने सरदार को भी व्याकुल कर दिया। वो अपनी जगह से उठे और चीखकर बोले, आग बुझाओ, आग बुझाओ। उनके साथियों ने बिना कोई सवाल-जवाब किए तुरंत आग बुझा दी। सरदार ने पानी का छिड़काव कर चूल्हे को ठंडा किया ताकि चीटिंयों को राहत मिल सके। काफिले वालों ने अपना सामान उठाया और दूसरे स्थान की ओर चल निकले। उन चीटिंयों के लिए जिन्हें शायद हमनें कभी जीवित की श्रेणी में रखा ही नहीं होगा, चूल्हे बुझवाने वाले सरदार थे हजरत मुहम्मद। हजरत साहब ने हमेशा प्रेम और शांति का पाठ पढ़ाया। उन्होंने स्वयं कहा कि तुम समस्त जीव-जंतुओं पर दया करो, परमात्मा तुम पर दया करेगा।

सहाबी जाबिर बिन अब्दुल्ला को हजरत मोहम्मद का साथी माना जाता है। उन्होंने कहा है, एक बार हजरत साहब के पास से एक गधा गुजरा, जिसके चेहरे को बुरी तरह दागा गया था और उसके नथुनों से बह रहा खून उसके साथ हुई क्रूरता की कहानी बयां कर रहा था। गधे का दर्द देखकर हजरत साहब दुख और क्रोध में डूब गए, उन्होंने कहा, जिसने भी मूक जानवर को इस अवस्था में पहुंचाया है उसपर धिक्कार है। इस घटना के बाद हजरत मोहम्मद ने घोषणा की कि न तो पशुओं के चेहरे को दागा जाए और न ही उन्हें मारा जाए। याहया इब्ने ने भी हजरत मोहम्मद की करुणा और प्रेमभाव का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है कि एक दिन मैं मोहम्मद साहब के पास बैठा था, तभी एक ऊंट दौड़ता हुआ आया और साहब के सामने आकर बैठ गया। उसकी आंखों से अशु्रधारा बह रही थी। मोहम्मद साहब ने तुरंत मुझसे कहा, जाओ देखो ये किसका ऊंट है और इसके साथ क्या हुआ है। मैं किसी तरह ऊंट के मालिक को को खोजकर ले आया, मोहम्मद साहब ने उससे पूछा, क्या ये ऊंट तुम्हारा है? उसने इसपर अनभिग्ता जताई। उसने कहा, हम पहले इसे पानी ढोने के काम में इस्तेमाल किया करता था, पर अब ये बूढा हो चुका है और काम करने लायक नहीं है। इसलिए हमसब ने मिलकर फैसला लिया है कि इसे काटकर गोश्त बांट लेंगे।

हजरत साहब ने कहा, इसे मत काटो या तो इसे बेच दो या मुझे ऐसे ही दे दो। इसपर उस व्यक्ति ने कहा, जनाब आप इसे बगैर कीमत के ही रख लीजिए। मोहम्मद साहब ने उस ऊंट पर सरकारी निशान लगाया और उसे सरकारी जानवरों में शामिल कर लिया। हजरत ने उस व्यक्ति के लिए धिक्कार कहा है जो किसी जीव को निशाना बनाए। उन्होंने फरमाया है कि अगर कोई व्यक्ति गौंरेया को बेकार मारेगा तो कयामत के दिन वह अल्लाह को फरियाद करेगी कि इसने मुझे कत्ल किया था। हजरत मोहम्मद ने जानवरों से उनकी शक्ति से अधिक काम लेने को भी गलत बताया है। एक बार की बात है हजरत साहब ने देखा कि एक काफिला जाने की तैयारी कर रहा है। काफिले में शामिल एक ऊंट पर इतना बोझ लादा गया कि वो भार के बोझ तले दबा जा रहा था। हजरत साहब ने तुरंत उसका बोझ कम करने को कहा।

इस्लाम में एक चींटी की अकारण हत्या को भी पाप बताया गया है, बावजूद इसके कुर्बानी के नाम पर बेजुबानों को निर्दयीता से मौत के घाट उतार दिया जाता है। हजरत साहब ने कहा था, जिसके मन में दयाभाव नहीं, वह अच्छा मनुष्य नहीं हो सकता। इसलिए दया और सहानुभूति एक सच्चे मुसलमान के लिए जरूरी है। बात सिर्फ मुस्लिम समुदाय तक ही सीमित नहीं है, हिंदू धर्म में भी अंधी आस्था के नाम पर देवी-देवताओं को बलि चढ़ाई जाती है। आस्था और अंधविश्वास के बीच बहुत बड़ा फासला होता है, लेकिन अफसोस की लोग इसे समझना नहीं चाहते। आखिर खून का बोग लगाकर उसे कैसे प्रसन्न किया जा सकता है जो खुद दूसरों को जीवन देता है। जब तक ये बात लोगों को समझ में नही आती, खौफनाक वाकये यूं ही आखों के सामने से गुजरते रहेंगे और हम यूं ही आत्मग्लानी मन में लिए आगे बढ़ते चले जाएंगे।
(प्रदीप शर्मा के aर्तिक्ले के लिए सज्ञान के मुताबिक )

Wednesday, July 21, 2010

पवार की सियासी गुगली

नीरज नैयर
क्रिकेट की रियासत के सबसे ऊंचे सिहांसन पर बैठने के बाद शरद पवार को कृषि मंत्रालय भारी महसूस होने लगा है। उन्हें लगता है कि दो इतनी बड़ी जिम्मेदारियां वो एक साथ नहीं उठा पाएंगे। ये वो ही पवार हैं जो आईसीसी अध्यक्ष बनने से पहले कामकाज के प्रभावित होने की बातों को सिरे से खारिज कर रहे थे। लेकिन कुर्सी संभालते ही अचानक उन्हें आभास हो रहा है कि वो गलत थे। ये बात बिल्कुल सही है कि दो नावों पर सवार होकर नहीं चला जा सकता, मगर ऐसे वक्त में जब देश महंगाई की आग में जल रहा है पवार का क्रिकेट को तवाो देना क्या ये नहीं दर्शाता कि उनके लिए कृषि मंत्रालय पार्ट टाइम जॉब जैसा है। पवार का काम का भार कम करने का आग्रह करना ऐसा लगता जैसे एक कर्मचारी बॉस से अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं की पूर्ति के लिए ऑफिस टाइम में रियायत की मांग कर रहा हो।

पवार कृषि मंत्रालय में रहते हैं या नहीं, इससे आम जनता को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, लेकिन यूपीए सरकार की छवि को इससे बट्टा जरूर लग गया है। बतौर कृषिमंत्री पवार की नाकामयाबियों को लेकर जो बातें सालों से उठती आ रही हैं, उनपर इस पूरे मामले ने एक तरह से मुहर लगाई है। वैसे पवार के इस क्रिकेट प्रेम के हिलोरे मारने के पीछे राजनीतिक कारण भी हैं। वो अच्छे से जानते हैं कि सरकार के तमाम आश्वासनों के बावजूद महंगाई नीचे आने वाली नहीं है। डीजल के दामों में बढ़ोतरी ने सिंचाई का खर्च बढ़ा दिया है और खाद पर सब्सिडी घटाने का असर पहले से ही मौजूद है। साथ ही पेट्रोल-डीजल की कीमतों में इजाफे के बाद से ट्रांपोटर्ेशन चार्ज भी 10 प्रतिशत बढ़ चुका है, ऐसे में कोई महान आशावादी ही होगा जो महंगाई कम होने की आस लगा सकता है। शरद पवार सियासत की दुनिया के मंझे हुए खिलाड़ी हैं।

जिस तरह अपने भार तले दूसरों को कुचलकर वो आईसीसी अध्यक्ष के पद तक जा पहुंचे, वैसे ही महंगाई के जाल में वो किसी दूसरे को उलझाकर दूर से तमाशा देखना चाहते हैं। अब तक महंगाई को लेकर उठने वाली हर उंगली उन्हीं की तरफ होती थी, मगर अब के बाद लोग उन्हें सीधे तौर पर निशाना नहीं बनाएंगे। और इस तरह धीरे-धीरे वो महंगाई के कलंक को भी धो सकेंगे। पवार के कृषि मंत्रालय संभालने के बाद से ही महंगाई अनियंत्रित भागी जा रही है, पिछले कुछ वक्त में ही मुद्रास्फीति की दर ने नए-नए आयाम स्थापित किए हैं। बीते दिनों विपक्षी पार्टियों द्वारा किए गए भारत बंद की सफलता इस बात को दर्शाती है कि आम जनता में सरकार और उसके मंत्रियों के प्रति खासा गुस्सा है। और इस फेहरिस्त में कहीं न कहीं शरद पवार का नाम सबसे पहले है। बतौर कृषिमंत्री आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों को थामने के उपाए करना पवार साहब की जिम्मेदारी बनती थी लेकिन उस दौर में वो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई में अपने विरोधियों को निपटाने में व्यस्त रहे। आम जनता के साथ दिखने के बजाए वो स्टेडियमों में यादा देखे गए। उन्होंने महंगाई की मुश्किलों को जानते हुए भी बांगलादेश दौरे पर भेजी जाने वाली दोयम दर्जे की टीम का चुनाव किया। उनकी जुबान पर आटा-दाल, चावल के भाव से अधिक ललित मोदी जैसों के नाम अधिक रहे। णक्रिकेट से जुड़ा होने के बावजूद उन्होंने महंगाई के मुद्दे पर जनता के साथ जमकर फुटबॉल खेला। वो एक के बाद एक गोल दागते रहे और जनता असहायों की तरह खड़ी खामोशी से सबकुछ देखती रही। पवार को कृषि का एनसाइलोपीडिया कहा जाता है, उनके बारे में प्रसिध्द है कि वो आंखमूंदकर भी बीजों की पहचान बता सकते हैं।

उनकी खुद भी कई शुगर मिल्स हैं। इसलिए ये तो नहीं कहा जा सकता कि समझ के अभाव में वो गलतियों पर गलतियां करते गए। जब शरद पवार को देश के करोड़ों लोगों के पेट भरने की जिम्मेदारी सौंपी गई तब मानसून को लेकर स्थिति इतनी भी खराब नहीं थी कि खाद्य पदार्थों के दामों में आग लग जाए। उन्होंने यदि क्रिकेट के मुकाबले थोड़ा सा ध्यान यहां भी लगाया होता तो महंगाई के बेकाबू होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। अब जब एक गेंद में 20 रन वाली स्थिति पैदा हो गई है तो वो मैदान छोड़कर भागने की फिराक में हैं। बतौर आईसीसी अध्यक्ष उन्हें शोहरत भी मिलेगी और दौलत भी, मगर कृषि मंत्रालय में केवल महजमारी और ताने ही सुनने को मिलेंगे। बकौल शरद पवार वो पिछले कई महीनों से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भार कम करने का आग्रह कर रहे हैं। यानी उन्होंने प्लेटफार्म बनाने का काम बहुत पहले से ही आरंभ कर दिया था। उन्हें इसका इल्म था कि आईसीसी की कमान उनके अलावा किसी और को नहीं मिलने वाली, इसलिए वो सोच-समझकर पत्ते चलते गए और आज अपने हिसाब से वो खेल को आखिरी पड़ाव तक ले आए हैं।

उनकी गुगली ने मनमोहन सिंह को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। एक-दो बार सार्वजनिक मंचों से वो महंगाई के लिए शरद पवार को कुसूरवार ठहरा चुके हैं। मगर अब उनके पास अपना दामन बचाने का कोई मोहरा नहीं होगा। हां, ये हो सकता है कि वो शरद पवार की गुगली को खुद खेलने के बाद रामविलास पासवान को आगे कर दें। ऐसी स्थिति में पवार के माथे से धुला महंगाई का कलंक उनके ऊपर आने के बजाए लोकजनशक्ति पार्टी के खाते में चला जाएगा। मराठा नेता पवार ने महंगाई को अनियंत्रित स्थिति में छोड़कर भले ही जिम्मेदारी से मुहं छिपाकर भागने वाला काम किया है, लेकिन उनका ये फैसला उनके व्यक्तिगत हितों के लिए पूरी तरह अनुकूल है।