Monday, March 15, 2010

हुसैन के साथ जो हुआ अच्छा हुआ

नीरज नैयर

हमेशा चर्चा में रहने वाले चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन एक बार फिर चर्चा में हैं। लेकिन इस बार चर्चा का मुद्दा थोड़ा अलग है। मकबूल साहब ने भारतीय का चोला उतारकर अब कतर की नागरिकता हासिल कर ली है। वो पिछले काफी समय से निर्वासित सा जीवन बिता रहे थे। भारत सरकार ने उन्हें सुरक्षा की गारंटी भी दी मगर हुसैन वापसी की हिम्मत नहीं जुटा पाए। देश के तमाम बुध्दिजीवी और चित्रकार हुसैन के इस कदम पर आहत और आक्रोशित हैं। आहत इसलिए की एक महान चित्रकार का साथ उनसे छूट गया और आक्रोशित इसलिए कि चंद हिंदुवादी संगठनों के अमानवीय कृत्यों ने मकबूल साहब को इतना बड़ा फैसला लेने के लिए मजबूर कर दिया। हुसैन के समर्थकों का मानना है कि वो रंगों और रेखाचित्रों के चित्रकार हैं। उनके यहां नख-शिख चित्रण नहीं होता, आमतौर पर वह चेहरा भी नहीं बनाते। जिस चित्र को लेकर इतना विवाद उठा वो भी एक रेखाचित्र था। साफ है कि नगनता हुसैन में नहीं बल्कि उसका विरोध करने वालों की आंखों में है। वो ये तर्क भी देते हैं कि जब मंदिरों की दीवारों पर मिथुन चित्रकारी मिलती हैं,

शिव-पार्वती के प्रेम संबंधों का बखान किया जाता है, श्रीकृष्ण की रास लीलाओं पर आनंदित हुआ जाता है तो फिर एक चित्रकार की भावनाओं पर इतना हंगामा क्यो मचाया गया। यह बात सही है कि हमारे देश में अभिव्यक्ति की स्वत्रंता है, लेकिन जब यह स्वतंत्रा किसी समुदाय विशेष की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का कारण बन जाए तो बवाल मचना लाजमी है। हुसैन का समर्थन करने वालों को जरा चित्रकारी का चश्मा उतारकर उनके द्वारा बनाई गईं कला-कतिृयों पर भी गौर फरमाना चाहिए। मकबूल फिदा हुसैन के निशाने पर हिंदू धर्म के अराध्य ही रहे, उन्होंने देवी-देवताओं के तमाम नगन चित्र बनाएं। भारतीयता की बात करने वाले हुसैन ने तो भारत माता को भी नहीं बख्शा, उनका भी बेहद आपत्तिजन चित्रण कर डाला। हुसैन साहब खुद को धर्मनिरपेक्ष कहते हैं, यदि वास्तव में ऐसा होता तो उनकी कूंची कभी इस्लाम या ईसायत के खिलाफ क्यों नहीं चली। सच यही है कि हुसैन ने अपनी चित्रकारी से लाखों-करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं को आहत किया। उन्होंने अपने फूहड़ चित्रों को लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचने का जरिया बनाया। लिहाजा हुसैन के कदम के लिए हिंदुवादी संगठनों को दोषी हरगिज नहीं ठहराया जा सकता। केवल भारत ही नहीं, जहां कहीं भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई गई, वहां दंगे भड़के,

विरोध-प्रदर्शन हुए। डेनमार्क में छपे हजरत मुहम्मद साहब के कार्टूनों को भला कौन भूल सकता है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर छापे गए इन काटूनों ने समूचे विश्व में मुस्लिम समुदाय को उद्देलित कर दिया। कार्टून बनाने वाले के खिलाफ फतवा जारी किया गया, उसके सिर पर ईनाम रखा गया। अभी हाल ही में जूता बनाने वाली कंपनी प्यूमा पर धार्मिक भावानाओं से खिलवाड़ का आरोप लगाते हुए मुस्लिम समुदाय ने उसके खिलाफ भी मोर्चा खोला। जब इस सब को जायज ठहराया जा सकता है तो, हुसैन के विरोध पर आपत्ति क्यों। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने तो यहां तक कहा कि उनका संगठन हुसैन के वापसी के खिलाफ नहीं, बस उन्हें लोगों की भावनाएं आहत करने के लिए माफी मांगनी होगी। हुसैन ने कतर की नागरिकता ग्रहण करने के बाद जो बयान दिया उसका जिक्र करना यहां जरूरी है। उन्होंने कहा,

'भारत ने मेरा बहिष्कार किया, मेरी कला और आत्म अभिव्यक्ति पर हमला किया गया। मुझे दुख है कि मैं भारत छोड़ रहा है, लेकिन जब संघ परिवार ने मुझ पर हमला किया तो सरकार चुप रही। ऐसे में मैं कैसे वहां रह सकता हूं। ' मकबूल साहब का यह कहना बिल्कुल सही है कि सरकार चुप रही, लेकिन हमले को लेकर नहीं बल्कि उनकी चित्रकारी को लेकर। अगर उनके आपत्तिजनक चित्रों पर सरकार की तरफ से सख्त रुख अपनाया जाता तो शायद बात इतनी बढ़ती ही नहीं। सरकार का भी फर्ज बनता है कि वो धार्मिक उन्माद फैलाने वाले कारकों को आकार न लेने दे। जहां तक बात हमले की है तो वो हुसैन साहब की कला पर नहीं वरन उनके ग़लत विचारों पर था। कलाकारों के प्रति हमारे देश में आदर और सम्मान का जो भाव है उस पर उंगली नहीं उठाई जा सकती। मकबूल फिदा हुसैन आज जिस मुकाम पर हैं वो उन्होंने भारत में ही हासिल किया है, इसलिए ये कहना कि भारत ने उनका बहिष्कार किया, किसी के लिए भी स्वीकार्य नहीं होगा। ऐसा नहीं है कि हुसैन ने महज एकाध बार विवादित चित्रों का चित्रण किया, वो बार-बार वहीं सब दोहराते रहे। 1990 में पहली बार धार्मिक भवनााओं को भड़काने वाले उनके चित्र आम जनता के सामने आए, हालांकि ये बात अलग है कि उन्होंने ये चित्र 1970 में बनाए थे। इसके बाद 6 जनवरी 2006 को एक पत्रिका में भारत माता को लेकर उनकी अभद्र पेंटिंग प्रकाशित हुई। हुसैन ने बवाल के बाद माफी मांगी और चित्र वापस लेने का वादा भी किया,

मगर वादा निभाया नहीं। थोड़े वक्त बाद ही उनकी आधिकारिक वेबसाइट पर यह तस्वीर चस्पा कर दी गई। इससे साफ है कि चित्रकार साहब स्वयं विवादों में घिरे रहना चाहते थे। भारत एक संस्कृति प्रधान देश हैं, हमारी कुछ मान्यताएं है, धार्मिक भावनाए हैं। उनके साथ खिलवाड़ की स्थिति में जनमानस के आक्रोश को अव्यवहारिक या अमर्यादित कतई नहीं ठहराया जा सकता। हो सकता है कि विश्व हिंदूं परिषद, आरएसएस या शिवसेना के विरोध का तरीका कुछ गलत रहा हो मगर विरोध के कारण को गलत नहीं कहा जा सकता। सिर्फ हिंदुवासी संगठन ही नहीं आम हिंदुओं में भी हुसैन के चित्रों को लेकर रोष है, बस फर्क केवल इतना है कि वो सार्वजनिक तौर पर इसका प्रदर्शन नहीं करते। मकबूल फिदा हुसैन अब कतर के नागरिक बन गए हैं, तो क्या वो अपनी भावनाओं को वैसी ही उड़ान दे पाएंगे जैसी भारत में दिया करते थे। क्या वो अपनी रचनात्मकता का प्रदर्शन इस्लामी नायकों के साथ करेंगे? अगर वो ऐसा करते हैं तो उनके विरोध की कोई गुंजाइश ही नहीं बचेगी, लेकिन ऐसा वो कर पाएंगे इस बात की संभावना दूर-दूर तक दिखलाई नहीं देती। केवल भारत ही ऐसा देश है जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इतनी स्वतंत्रता मिल सकती है। सलमाल रश्दी की सैटनिक वर्सिस और तस्लीमा नसरीन की लाा पर क्या बवाल नहीं हुआ, भले ही इन दोनों ने कितना भी सच लिखा हो मगर उससे भावनाएं तो आहत हुई ही। तस्लीमा लंबे समय से भारत में निर्वासित जीवन बिता रही हैं। अभी हाल ही में उनके एक लेख जिसमें उन्होंने मुहम्मद साहब को बुर्के के खिलाफ बताया था को लेकर कर्नाटक में मुस्लिम धर्मावलंबियों ने हिंसक प्रदर्शन किए,

स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कर्फ्यू तक लगाना पड़ा। हालांकि तस्लीमा इस लेख को अपना मामने से इंकार कर रही हैं। तस्लीमा नसरीन ने अपने लेखों में इस्लाम की कार्यपध्दति की आलोचना की, वो एक महिला की हैसीयत से उसमें बदलाव की पक्षधर हैं। लेकिन उन्होंने कभी इस्लामिक धर्म गुरुओं का अशील व्याख्यान नहीं किया। बावजूद इसके उन्हें अपना वतन छोड़ना पड़ा। मकबूल साहब ने तो धर्म पर ही अशीलता की कूंचियां चलाई तो फिर उनके प्रति प्रेमभाव और सम्मान कैसे कायम रह सकता है। मकबूल फिदा हुसैन अपनी आदत और कृत्यों से अच्छी तरह वाकिफ हैं, उन्हें इल्म है कि वो पुन: वही सब दोहराए बिना नहीं रह पाएंगे, इसलिए उन्होंने कतर में पनाह लेना बेहतर समझा। एक चित्रकार के तौर पर हुसैन का समर्थन करने में कोई बुराई नहीं, लेकिन जो कुछ उन्होेंने किया उसको सही करार देना सरासर गलत है।

Thursday, March 4, 2010

भारत-पाक संबंध: चेतन भगत के विचार व्यवहारिक नहीं

नीरज नैयर
चेतन भगत बहुत ही काबिल उपन्यासकार हैं। वन नाइट एट कॉल सेंटर में उन्होंने प्यार के उतार-चढ़ाव और पेशे की मजबूरी को बहुत अच्छे ढंग से रेखांकित किया था। टू स्टे्टस में भी उन्होंने लव और मैरिज के बीच के फासले को मिटाने की जद्दोजहद को बेहतरीन तरीके से पाठकों के सामने पेश किया। उनके दूसरे उपन्यास भी वाह-वाही लूटने में सफल रहे , फाइव पाइंट समवन का नाम थ्री इडियट्स से उठे विवाद के बाद हर किसी की जुबान पर चढ़ा हुआ है।

चेतन के लेख भी आजकल विभिन्न अखबारों में देखने को मिल जाया करते हैं, कुछ दिन पहले हिंदी-अंग्रेजी को लेकर उनका एक लेख पढ़ने को मिला। जिसमें उन्होंने खूबी के साथ अग्रेजी की महत्ता को सरल शब्दों में सबके सामने रखा। निश्चित तौर पर चेतन की लेखनी युवावर्ग के लिए प्रेरणास्त्रोत का काम कर सकती है, मगर भारत-पाकिस्तान संबंध जैसे गंभीर मुद्दों पर उनमें थोड़ी अपरिपक्वता नजर आ ही जाती है। हाल ही में एक प्रतिष्ठित अखबार ने चेतन भगत का भारत-पाक रिश्तों को लेकर लिखा लेख प्रकाशित किया, जिसका शीर्षक था 'शांति का मतलब प्रेम नहीं'। लेख के माध्यम से चेतन ने कहने का प्रयास किया कि भारत द्वारा पाकिस्तान को बातचीत के लिए आमंत्रित करने में कोई बुराई नहीं। वो मानते हैं कि दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने के लिए भारत को प्रयास करते रहने चाहिए।


इस बात में कोई दो राय नहीं कि अमन-शांति के माहौल में नफरत के बीज बोने वालों के लिए कोई जगह नहीं होगी, दोनों मुल्कों का आवाम वर्तमान की अपेक्षा यादा सुखी और खुशहाल नजर आएगा। विकास सिर्फ सैन्य ताकत बढ़ाने तक ही सीमित नहीं रहेगा, उसका असर छोटे से गांव से लेकर गगनचुंबी इमारतों वाले शहरों में भी दिखाई देगा। मगर ्सवाल ये यह उठता है कि क्या ऐसा संभव है? भारत के विभाजन से लेकर अब तक पाकिस्तान के साथ हम एकतरफा रिश्ते निभाते आए हैं। विदेश नीति में भी मोहब्बत की तरह एकतरफा रिश्ते कष्टदायक ही होते हैं और ये बात वक्त वक्त पर हमें महसूस भी होती रही है। जब एक तरफा मोहब्बत का अंत जुर्म की अंधेरी गालियों में जाकर होता है तो फिर कैसे उम्मीद लगाई जा सकती है कि पाकिस्तान हमारी अच्छाइयों का सिला अच्छाई के साथ देगा। चेतन मानते हैं कि जब तक पड़ोस में स्थिर लोकतंत्र नहीं आता, तब तक उससे शांति की आस नहीं लगाई जा सकती, इसलिए भारत को पाकिस्तान में लोकतंत्र के लिए अभियान चलाना चाहिए।


उनकी सोच है कि इससे हम उन पाकिस्तानियों का समर्थन हासिल कर सकेंगे जो लोकतांत्रिक सरकार चाहते हैं। लोकतंत्र के प्रति भारत का खुला समर्थन पाक सेना को कमजोर करेगा और पाकिस्तानियों में भारत की छवि सुधरेगी। चेतन की इस नसीहत का सीधा सा मतलब है कि नई दिल्ली इस्लामाबाद के अंदरूनी मामलों में अंदर तक दखल दे, लेकिन इसके परिणाम कितने भयानक हो सकते हैं चेतन ने शायद उनपर गौर करना मुनासिब नहीं समझा। कुछ साल पहले जब म्यांमार में पेट्रो मूल्य वृध्दि को लेकर बौध्द भिक्षुओं और जुंटा सरकार के बीच खूनी खेल शुरू हुआ था तब भीबुध्दिजीवियों द्वारा भारत को दखलंदाजी करने की नसीहतें दी गई थीं। उन दिनों शायद ही कोई ऐसा अखबार रहा होगा जिसमें बड़े-बड़े लेखकों के समझाइश भरे लेख न प्रकाशित हुए हों। लेकिन सरकार ने उस वक्त खामोशी अख्तियार करके बिल्कुल वाजिब निर्णय लिया। म्यांमार के साथ हमारी पूर्वात्तर की सीमा जुड़ती है, कई बार ऐसा देखने में आया कि भारत से नाराजगी प्रकट करने के लिए जुंटा सरकार ने नई दिल्ली विरोधियों को घुसपैठ करने के लिए आजाद छोड़ दिया।


ऐसी स्थिति में यदि भारत दखलंदाजी करने की कोशिश करता तो उसे देश हित में नुकसान उठाने पड़ते। पाकिस्तान में भी किसी तरह का अभियान चलाने का मतलब है कि उग्रवादी संगठनों को पूरी तरह से अपने खिलाफ कर लेना। वर्तमान में पाक में जो सरकार है वो लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुनकर ही आई है, जनता ने रिकॉर्ड मतों से पीपीपी के सिर जीत का सेहरा बांधा था। इस सरकार ने अपने शुरूआती दौर में जब थोड़ी बहुत स्थिरता दिखाई दे रही थी तब भी ऐसा कौनसा तीर मार लिया जो हमें लोकतंत्र का अलख जगाने के लिए प्रेरित करे। पाकिस्तान में लोकतंत्र के पैरोकार हों या उसकी मुखालफत करने वाले, हर किसी के लिए भारत दुश्मनों की फेहरिस्त में सबसे पहले आता है। वहां के नेता भारत विरोधी नारे लगा-लगाकर ही सड़क से संसद तक का सफर तय करते हैं। ऐसे में वहां अपने लिए समर्थन की बात सोचना भी बेमानी होगा। जहां तक बात रही पाक से रिश्ते रखने की तो इसकी पहल अब उसे ही करने देनी चाहिए, आखिर संबंधों में बेहतरी का फायदा दोनों देशों को ही मिलेगा।


आखिर ऐसा कब तक चलता रहेगा कि हम ही शांति का पैगाम भी लेकर जाएं और बदले में हमें ही जख्म भी खाएं। जिस तरह ताली एक हाथ से नहीं बजती, उसी तरह रिश्तों में घनिष्ठता भी एकतरफा पहल से नहीं आ सकती। पाक को भी आगे बढ़कर इस बात का सुबूत देना होगा कि वो शांति और अमन का पक्षधर है, यदि वो ऐसा नहीं करता तो फिर उसके आगे-पीछे घूमकर उसे मनाने का क्या मतलब। पुणे ब्लास्ट में पाकिस्तानी संलिप्त्तता सामने आ चुकी है, सरकार भी इस बात को मानती है कि हमले के तार सीमा पार से जुड़े हैं। इस सब के बाद भी क्या पाक को करीब लाने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए, इसका जवाब वो लोग शायद यादा अच्छे से दे सकते हैं जिनके अपने आतंकवादी हमलों में मारे गए। मुंबई हमले के दोषियों के खिलाफ उसने अब तक कोई कदम नहीं उठाया, उल्टा उनके सरंक्षण में जरूर लगा रहा।


मौजूदा दौर में पाक को करीब लाने के बजाए उससे दूरी बनाए रखना ही बेहतर है, और शायद आवाम का भी यही फैसला होगा। चेतन ने अपने लेख में आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया है कि शांति के प्रयास करना क्यों जरूरी है। उनके मुताबिक दोनों मुल्कों का संयुक्त रक्षा बजट करीब 40 अरब डॉलर है, जिसमें से तीन चौथाई से भी अधिक खर्च भारत करता है। यदि शांति के प्रयासों से सैन्य खर्चों में कटौती होती है तो क्या इससे शांति का आर्थिक महत्व साबित नहीं होता। एक बारगी मान भी लिया जाए कि पाकिस्तान से रिश्ते मधुर हो गए हैं तो भी यह सोचना गलत होगा कि रक्षा बजट की राशि को विकास में लगाया जाएगा। भारत के लिए सिर्फ पाक ही चुनौती नहीं है, चीन उसकी परेशानियों को हर रोज बढ़ा रहा है। चीन के मुकाबले में खड़े रहने के लिए रक्षा बजट में हर साल इजाफा ही किया जाएगा, कमी नहीं। चेतन भगत ने अपने लेख के दूसरे पैरा में कहा है कि अगर पाकिस्तान के साथ शांति बनाए रखने से भारतीयों को बेहतर जीवन मिलता है तो क्यों न इस विकल्प को आजमाया जाए। यहां चेतन को थोड़ा चिंतिन करने की जरूरत है कि हमारे अब तक के किए गए शांति के प्रयासों से भारतीयों का जीवन कितना बेहतर बना।


अगर 1993 के मुंबई ब्लास्ट के बाद ही भारत सरकार ने सख्त कदम उठाते हुए पाक से रिश्तों का इंतकाल कर दिया होता तो शायद उसके बाद हर थोड़े अंतराल में यूं धमाके नहीं होते। पाक को शह एक तरह से हमारी उदारवादी आदतों की वजह से ही मिलती रही। वह जानता है कि भारत लंबे समय तक उससे नाक-मुंह सिकोड़ कर नहीं बैठा रह सकता। एक बार फिर ये बात साबित हो ही गई। मुंबई हमले के बाद हमने जिस तरह का सख्त रवैया अपनाया उसमें वक्त के साथ-साथ नरमी इस हद तक आ गई कि खुद आगे बढ़कर पड़ोसी को बातचीत का न्यौता दे आए। भारत के इस फैसले को पाकिस्तान में घुटने टेकने के तौर पर लिया जा रहा है। प्रधानमंत्री गिलानी से लेकर राष्ट्रपति जरदारी तक सब इसे पाक की कूटनीतिक जीत मानकर चल रहे हैं। दोनों मुल्कों में दोस्ती होते देखने की हसरत शिवसेना जैसी कट्टरवादी पार्टी में भी होगी मगर इसके लिए आवाम की जिदंगी को दाव पर नहीं लगाया जा सकता।


चेतन भगत के विचार बहुत ही अच्छे हैं मगर उन्हें व्यवहारिक तौर पर नहीं अपनाया जा सकता, खासकर पाकिस्तान के साथ तो बिल्कुल नहीं। सरकार को चाहिए कि वो जनभावना का आदर करते हुए पाक से निश्चित दूरी बनाए रखे, क्योंकि उसका करीब आना हमारे लिए ही नुकसानदायक ही साबित होता है। दोनों मुल्कों के बीच रिश्तों की नींव पूरी तरह से खोकली पड़ चुकी है, जब तक पाक उसे विश्वास और भरोसे के मिश्रण से भरने के बारे में नहीं सोचता हमें भी खामोशी से खड़े रहना चाहिए। बात यहां अहम की नहीं, देश और जनता के हित ही है सरकार के साथ-साथ चेतन को भी इस बारे में सोचना चाहिए।

Monday, February 22, 2010

मुंबई की महाभारत: दुर्योध्न, धृतराष्ट्र और गांधारी

नीरज नैयर

मुंबई में महाभारत का नया अध्याय शुरू हो गया है, इस बार दुर्योध्न के रूप में बाल ठाकरे ने री-एंट्री मारी है। इससे पहले उनके भतीजे राज ठाकरे इस किरदार में नजर आ चुके हैं। बीच-बीच में उध्दव ठाकरे भी खुद को दुर्योध्न साबित करने की कोशिशें करते रहते हैं, ये बात अलग है कि उन्हें उतनी पब्लिसिटी नहीं मिल पाती। देखा जाए तो मुंबई एक तरह से ठाकरे परिवार की रणभूमि हो गई है, कभी चाचा-भतीजा मिलकर गैरमराठियों के साथ पांडवाें जैसा बर्ताव करते हैं तो कभी आमने-सामने आकर अपनी शक्ति का अहसास कराते हैं। महाभारत में तो पांडवों के उध्दार के लिए श्रीकृष्ण मौजूद थे, मगर इस कलयुग में उत्तर भारतीयों की रक्षा के लिए कोई नहीं कृष्ण नहीं है। राय सरकार सबकुछ जानते हुए भी गांधारी की तरह आंखों पर पट्टी बांधकर बैठी है, और केंद्र सरकार ने धृतराष्ट्र का रूप अख्तियार कर लिया है। अब ऐसे में कौरवों की जीत होना स्वभाविक है, इसलिए वो हर बाजी जीतते जा रहे हैं। मुंबई की महाभारत में ताजा अध्याय शाहरुख खान के उस बयान को लेकर सुर्खियों में आया जिसमें उन्होंने पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ियों के आईपीएल में न चुने जाने पर दुख जाहिर किया। वैसे ये बात सोचने वाली है कि अगर शाहरुख को इतना ही दुख था तो उन्होंने अपनी टीम के लिए पाक खिलाड़ियों को क्यों नहीं चुना, चुन लेते तो इतना सब होता ही नहीं। खैर जो नियति में लिखा है वो तो होना ही है, नियति में लिखा था कि वृध्दावस्था में पहुंच चुके बाल ठाकरे युवा दुर्योध्न का किरदार निभाएंगे सो निभा रहे हैं। सीनियर दुर्योध्न को किसी शकुनी की जरूरत नहीं, वो अपने पासे खुद ही फेंकने में विश्वास रखते हैं। इसलिए उन्होंने शाहरुख के बयान के तुरंत बाद बिना कोई पल गंवाए भागवाधारी सैनिकों को उत्पात मचाने का आदेश दे डाला। हर बार की तरह सैनिकों ने कुछ कांच तोड़े, पोस्टर जलाए, नारेबाजी की और जता दिया कि कलयुग में सिर्फ कौरवों की चलती है। इस महाभारत में सबसे अनोखी और अच्छी घटना ये रही है कि गांधारी बनी राय सरकार ने पहली दफा दुर्योध्न के खिलाफ कदम उठाने का प्रयास किया, लेकिन अफसोस की बात ये रही कि उसका यह कदम अच्छाई-बुराई को ध्यान में रखकर नहीं बल्कि राजनीतिक नफे-नुकसान का आकलन कर उठाया गया। एक फिल्म के लिए सरकार जितनी मशक्कत करती नजर आई, अगर उसका एक फीसदी भी उत्तरभारतीयों को राज के कहर से बचाने के लिए किया जाता तो निश्चित तौर पर जूनियर ठाकरे कभी दुर्योध्न जैसी हैसीयत हासिल नहीं कर पाता। जिस वक्त राज ठाकरे के गुंडे उत्तर भारतीयों, बिहारियों को चुन-चुनकर निशाना बना रहे थे, राय सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी थी। दरअसल भतीजे को ताकतवर बनाकर कांग्रेस और एनसीपी चाचा की राजनीतिक जमीन हथियाना चाहते थी और वो काफी हद तक उसमें कामयाब भी हुए। इस बार के विधानसभा चुनाव में शिवसेना को काफी नुकसान उठाना पड़ा, इस नुकसान के पीछे कांग्रेस-एनसीपी नहीं बल्कि राज ठाकरे की पार्टी मनसे रही। उसने शिवसेना के गढ़ माने जाने वाले इलाकों में सीट हासिल की। हालांकि राज को कोई यादा बड़ी सफलता नहीं मिल सकी, मगर उसने चाचा का खेल जरूर खराब कर दिया। कहा जा रहा है कि ठाकरे और शाहरुख के बीच के विवाद में राज के कूदने के पीछे भी कांग्रेस का हाथ है। ये सोच कर तााुब होता है कि एक राय सरकार के लिए लोगों की जान से यादा फिल्म की रिलीज महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि सीनियर ठाकरे की जगह जूनियर ठाकरे ही दुर्योध्न की भूमिका में होते तो न तो धृतराष्ट्र अपनी आदत बदलता और न गंधारी आंखों से पट्टी हटाती। केंद्र सरकार ने भी इस बार मुंबई की महाभारत में यादा रुचि दिखाई, राहुल गांधी सीनियर दुर्योध्न की धमकी को हवा में उड़ाते हुए मुंबई में जमकर घूमें। उन्होंने एटीएम से पैसे निकाले, लोकल ट्रेन में सफर किया और देशवासियों को बताने का प्रयास किया कि मुंबई सबकी है। दूसरे दिन मुल्क भर के मीडिया ने उन्हें अर्जुन की संज्ञा दे डाली, उनके ट्रेन के सफर को चक्रव्यूह तोड़ने जैसा करार दिया। मुंबई सबकी है राहुल इस बात को आसानी से कह सकते हैं, राहुल क्या एक आम आदमी भी इतनी सुरक्षा के बीच सीना चौड़ाकर दंभ से कह सकता है कि मुंबई उसकी जागीर है। क्या कांग्रेस का यह अर्जुन आम उत्तर भारतियों की तरह मुंबई जाकर इस तरह की बातें कर सकता है, शायद नहीं। शाहरुख खान को कांग्रेस का करीबी माना जाता है, और कांग्रेस इस कोशिश में भी लगी है कि बॉलिवुड के नायक को बॉक्स आफिस की जगह सियासत के अखाड़े में कैश करवाया जाए। इसलिए उनकी फिल्म को आम आदमी से यादा सुरक्षा मिलनी ही थी। राय के मुख्यमंत्री अशोक चाह्वाण खुद इस मामले को बारीकि से देख रहे थे, फिल्म के प्रदर्शन में बाधा बनने वालों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किए जाने की चेतावनी दी गई थी। अब ऐसे में फिल्म को धमाकेदार शुरूआत मिलना जायज है। टिकट खिड़की पर माई नेम इज खान की सफलता को मीडिया में ठाकरे की हार के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, महाभारत में दुर्योध्न की हार में धृतराष्ट्र की कोई भूमिका नहीं थी लेकिन कलयुग में धृतराष्ट्र और गांधारी ने मिलकर दुर्योध्न को शिकस्त दी है। इसलिए ये खबर बनती है, मगर इस खबर के बनने के पीछे की कहानी को प्रमुखता देना भी मीडिया का कर्तव्य बनता है। हर कोई ठाकरे बनाम शाहरुख की जंग के उतार-चढ़ाव को दिखाता रहा, पढ़ाता रहा लेकिन किसी ने राय और केंद्र सरकार के हृदय परिवर्तन पर फोकस करने की जरूरत नहीं समझी। यह भी खबर बननी चाहिए थी कि जो सरकार बेकसूर लोगों को प्रताड़ित होते देख सकती है, वह फिल्म के पोस्टर फड़ते क्यों नहीं देख पाई। अगर सत्ता में बैठे लोग कानून व्यवस्था दुरुस्त रखने को इतनी ही तवाो देते हैं तो उन्हें राज ठाकरे को भी रोकना चाहिए था, उसे भी नकेल पहनानी चाहिए थी। यह निहायत ही शर्मनाक है राजनीतिज्ञ भोले-भाले लोगों के शव पर बैठकर राजनीति कर रहे हैं। महाभारत के इस अध्याय ने न सिर्फ धृतराष्ट्र और गांधारी बने बैठी सरकारों की असलीयत उजागर की है, बल्कि मीडिया की पथभ्रमिता पर भी प्रकाश डाला है। यह हर मायने में अच्छी बात है कि सरकार ने ठाकरे के मंसूबों को चकनाचूर कर दिया, लेकिन यह और भी अच्छी होती अगर राज के संबंध में भी ऐसे ही कदम उठाए होते। महज राजनीतिक हित साधने के लिए राज ठाकरे को खुलेआम कुछ भी करने की आजादी देना कहां तक जायज है। यह सवाल सरकार से पूछे ही जाने चाहिए।

मुंबई की महाभारत: दुर्योध्न, धृतराष्ट्र और गांधारी

नीरज नैयर

मुंबई में महाभारत का नया अध्याय शुरू हो गया है, इस बार दुर्योध्न के रूप में बाल ठाकरे ने री-एंट्री मारी है। इससे पहले उनके भतीजे राज ठाकरे इस किरदार में नजर आ चुके हैं। बीच-बीच में उध्दव ठाकरे भी खुद को दुर्योध्न साबित करने की कोशिशें करते रहते हैं, ये बात अलग है कि उन्हें उतनी पब्लिसिटी नहीं मिल पाती। देखा जाए तो मुंबई एक तरह से ठाकरे परिवार की रणभूमि हो गई है, कभी चाचा-भतीजा मिलकर गैरमराठियों के साथ पांडवाें जैसा बर्ताव करते हैं तो कभी आमने-सामने आकर अपनी शक्ति का अहसास कराते हैं।

महाभारत में तो पांडवों के उध्दार के लिए श्रीकृष्ण मौजूद थे, मगर इस कलयुग में उत्तर भारतीयों की रक्षा के लिए कोई नहीं कृष्ण नहीं है। राय सरकार सबकुछ जानते हुए भी गांधारी की तरह आंखों पर पट्टी बांधकर बैठी है, और केंद्र सरकार ने धृतराष्ट्र का रूप अख्तियार कर लिया है। अब ऐसे में कौरवों की जीत होना स्वभाविक है, इसलिए वो हर बाजी जीतते जा रहे हैं।

मुंबई की महाभारत में ताजा अध्याय शाहरुख खान के उस बयान को लेकर सुर्खियों में आया जिसमें उन्होंने पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ियों के आईपीएल में न चुने जाने पर दुख जाहिर किया। वैसे ये बात सोचने वाली है कि अगर शाहरुख को इतना ही दुख था तो उन्होंने अपनी टीम के लिए पाक खिलाड़ियों को क्यों नहीं चुना, चुन लेते तो इतना सब होता ही नहीं। खैर जो नियति में लिखा है वो तो होना ही है, नियति में लिखा था कि वृध्दावस्था में पहुंच चुके बाल ठाकरे युवा दुर्योध्न का किरदार निभाएंगे सो निभा रहे हैं। सीनियर दुर्योध्न को किसी शकुनी की जरूरत नहीं, वो अपने पासे खुद ही फेंकने में विश्वास रखते हैं। इसलिए उन्होंने शाहरुख के बयान के तुरंत बाद बिना कोई पल गंवाए भागवाधारी सैनिकों को उत्पात मचाने का आदेश दे डाला। हर बार की तरह सैनिकों ने कुछ कांच तोड़े, पोस्टर जलाए, नारेबाजी की और जता दिया कि कलयुग में सिर्फ कौरवों की चलती है। इस महाभारत में सबसे अनोखी और अच्छी घटना ये रही है कि गांधारी बनी राय सरकार ने पहली दफा दुर्योध्न के खिलाफ कदम उठाने का प्रयास किया, लेकिन अफसोस की बात ये रही कि उसका यह कदम अच्छाई-बुराई को ध्यान में रखकर नहीं बल्कि राजनीतिक नफे-नुकसान का आकलन कर उठाया गया।

एक फिल्म के लिए सरकार जितनी मशक्कत करती नजर आई, अगर उसका एक फीसदी भी उत्तरभारतीयों को राज के कहर से बचाने के लिए किया जाता तो निश्चित तौर पर जूनियर ठाकरे कभी दुर्योध्न जैसी हैसीयत हासिल नहीं कर पाता। जिस वक्त राज ठाकरे के गुंडे उत्तर भारतीयों, बिहारियों को चुन-चुनकर निशाना बना रहे थे, राय सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी थी। दरअसल भतीजे को ताकतवर बनाकर कांग्रेस और एनसीपी चाचा की राजनीतिक जमीन हथियाना चाहते थी और वो काफी हद तक उसमें कामयाब भी हुए। इस बार के विधानसभा चुनाव में शिवसेना को काफी नुकसान उठाना पड़ा, इस नुकसान के पीछे कांग्रेस-एनसीपी नहीं बल्कि राज ठाकरे की पार्टी मनसे रही। उसने शिवसेना के गढ़ माने जाने वाले इलाकों में सीट हासिल की। हालांकि राज को कोई यादा बड़ी सफलता नहीं मिल सकी, मगर उसने चाचा का खेल जरूर खराब कर दिया। कहा जा रहा है कि ठाकरे और शाहरुख के बीच के विवाद में राज के कूदने के पीछे भी कांग्रेस का हाथ है। ये सोच कर तााुब होता है कि एक राय सरकार के लिए लोगों की जान से यादा फिल्म की रिलीज महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि सीनियर ठाकरे की जगह जूनियर ठाकरे ही दुर्योध्न की भूमिका में होते तो न तो धृतराष्ट्र अपनी आदत बदलता और न गंधारी आंखों से पट्टी हटाती। केंद्र सरकार ने भी इस बार मुंबई की महाभारत में यादा रुचि दिखाई, राहुल गांधी सीनियर दुर्योध्न की धमकी को हवा में उड़ाते हुए मुंबई में जमकर घूमें। उन्होंने एटीएम से पैसे निकाले, लोकल ट्रेन में सफर किया और देशवासियों को बताने का प्रयास किया कि मुंबई सबकी है। दूसरे दिन मुल्क भर के मीडिया ने उन्हें अर्जुन की संज्ञा दे डाली, उनके ट्रेन के सफर को चक्रव्यूह तोड़ने जैसा करार दिया। मुंबई सबकी है राहुल इस बात को आसानी से कह सकते हैं, राहुल क्या एक आम आदमी भी इतनी सुरक्षा के बीच सीना चौड़ाकर दंभ से कह सकता है कि मुंबई उसकी जागीर है। क्या कांग्रेस का यह अर्जुन आम उत्तर भारतियों की तरह मुंबई जाकर इस तरह की बातें कर सकता है, शायद नहीं। शाहरुख खान को कांग्रेस का करीबी माना जाता है, और कांग्रेस इस कोशिश में भी लगी है कि बॉलिवुड के नायक को बॉक्स आफिस की जगह सियासत के अखाड़े में कैश करवाया जाए। इसलिए उनकी फिल्म को आम आदमी से यादा सुरक्षा मिलनी ही थी। राय के मुख्यमंत्री अशोक चाह्वाण खुद इस मामले को बारीकि से देख रहे थे, फिल्म के प्रदर्शन में बाधा बनने वालों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किए जाने की चेतावनी दी गई थी। अब ऐसे में फिल्म को धमाकेदार शुरूआत मिलना जायज है। टिकट खिड़की पर माई नेम इज खान की सफलता को मीडिया में ठाकरे की हार के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, महाभारत में दुर्योध्न की हार में धृतराष्ट्र की कोई भूमिका नहीं थी लेकिन कलयुग में धृतराष्ट्र और गांधारी ने मिलकर दुर्योध्न को शिकस्त दी है। इसलिए ये खबर बनती है, मगर इस खबर के बनने के पीछे की कहानी को प्रमुखता देना भी मीडिया का कर्तव्य बनता है। हर कोई ठाकरे बनाम शाहरुख की जंग के उतार-चढ़ाव को दिखाता रहा, पढ़ाता रहा लेकिन किसी ने राय और केंद्र सरकार के हृदय परिवर्तन पर फोकस करने की जरूरत नहीं समझी। यह भी खबर बननी चाहिए थी कि जो सरकार बेकसूर लोगों को प्रताड़ित होते देख सकती है, वह फिल्म के पोस्टर फड़ते क्यों नहीं देख पाई। अगर सत्ता में बैठे लोग कानून व्यवस्था दुरुस्त रखने को इतनी ही तवाो देते हैं तो उन्हें राज ठाकरे को भी रोकना चाहिए था, उसे भी नकेल पहनानी चाहिए थी। यह निहायत ही शर्मनाक है राजनीतिज्ञ भोले-भाले लोगों के शव पर बैठकर राजनीति कर रहे हैं। महाभारत के इस अध्याय ने न सिर्फ धृतराष्ट्र और गांधारी बने बैठी सरकारों की असलीयत उजागर की है, बल्कि मीडिया की पथभ्रमिता पर भी प्रकाश डाला है। यह हर मायने में अच्छी बात है कि सरकार ने ठाकरे के मंसूबों को चकनाचूर कर दिया, लेकिन यह और भी अच्छी होती अगर राज के संबंध में भी ऐसे ही कदम उठाए होते। महज राजनीतिक हित साधने के लिए राज ठाकरे को खुलेआम कुछ भी करने की आजादी देना कहां तक जायज है। यह सवाल सरकार से पूछे ही जाने चाहिए।

Wednesday, February 10, 2010

इन बातों पर गौर करें गडकरी

नीरज नैयर
नितिन गडकरी के आने के बाद भाजपा में कुछ बदलाव महसूस किए जा रहे हैं, मसलन पार्टी अब संघवादी विचारधारा की तरफ पूरी तरह लौटने पर विचार कर रही है। उसे पर्यावरण की चिंता भी सताने लगी है, इंदौर में पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में यह चिंता साफ तौर पर देखी जा सकती है। अधिवेशन के दौरान 90 एकड़ में निर्मित कुशाभाऊ ठाकरे ग्राम में पेट्रोल-डीजल के वाहनों के इस्तेमाल पर रोक लगाई गई है। कुल मिलाकर इस अधिवेशन को इको फ्रेंडली अधिवेशन कहा जा सकता है, पार्टिजन के रुकने की व्यवस्था टेटों में की गई है,

हालांकि आम टेट से ये काफी अलग होंगे। इनमें अत्याधुनिक सुविधाओं की कोई कमी नहीं होगी। इस तरह के बदलाव से पार्टी अपनी बदलती छवि का संदेश जन-जन तक पहुंचाना चाहती है। देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी अगर पर्यावरण को लेकर जागरुकता का परिचय दे रही है तो ये बहुत ही अच्छी बात है। अब तक इस मुद्दे पर सिर्फ बातें ही होती रही हैं। मंत्रालयों में बैठकर बड़े-बड़े संदेश देने वाले नेताओं ने कभी इस दिशा में खुद को एक उदाहरण के तौर पर पेश करने की कोशिश नहीं की। उन्हें बस आम आदमी से सुख-सुविधाओं में कटौती का वचन चाहिए। अगर वो खुद आगे आकर अपनी सुविधाओं में कटौती का फैसला करते तो जनता का एक हिस्सा उनका अनुसरण करने पर विचार जरूर करता। भाजपा अध्यक्ष ने इस तरह की जो पहल की हो, उसे वो आगे भी बनाए रखें तो पार्टी कुछ न कुछ अटेंशन तो जरूर हासिल करेगी। मौजूदा वक्त में भाजपा की हालत समाजवादी पार्टी जैसी हो गई है, जिसे हर मोर्चे पर विफलता का सामना करना पड़ रहा है। लोकसभा चुनाव में भाजपा के पास जीतने के तमाम कारण थे, लेकिन फिर भी उसे शिकस्त का सामना करना पड़। मुंबई हमले के बाद आवाम में जो गुस्सा था उसे भाजपा कैश नहीं करवा सकी,

इसका कारण कुछ और नहीं बल्कि एक पार्टी के तौर पर उसकी खंडित छवि थी। एकजुटता पार्टी से एक-एक करके टूट चुकी है, हर कोई अपने ही हिसाब से चला जा रहा है। उमा भारती को अनुशासनहीनता के चलते पार्टी से बाहर किया गया था, अगर वैसी ही कार्रवाई दूसरों के खिलाफ की जाती तो अब तक पार्टी खाली हो गई होती। बड़े कद के नेता दो खेमों में विभाजित हैं, वो एक दूसरे को समझने और पार्टी हित के बारे में सोचने की शक्ति लगभग खो चुके हैं। राजनाथ सिहं जैसा मजबूत छवि वाला नेता भी विभाजन की दीवार को नहीं पाट पाया। अब ये दारोमदार सौम्य छवि वाले नितिन गडकरी पर है, गडकरी के लिए सबको पार्टी की छतरी के नीचे लेकर आना बहुत ही मुश्किल काम होगा। पर यदि वो ऐसा करने में कामयाब रहे तो भाजपा के दिन बहुरने में देर नहीं लगेगी। कांग्रेस चाहे लाख दावे करे मगर सच यही है कि जनता उसके शासनकाल में खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है। खासकर आम आदमी तो पूरी तरह से टूट चुका है। 'कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ' नारे की हवा तो यूपीए के पहले कार्यकाल में ही निकल गई थी, और रही सही कसर दोबारा सरकार बनने के बाद पूरी हो गई। महंगाई एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर मनमोहन सिंह से लेकर सोनिया गांधी तक नाकाम साबित हुए। जिस सरकार में अर्थशास्त्रियों की फौज हो, उसका बढ़ते दामों पर नियंत्रण न रहना दर्शाता है कि वो इस पर संजीदा नहीं है। है। यूपीए सरकार के पिछले पांच साल और अब के कुछ महीनों में महंगाई दर बेतहाश बढ़ी है, इसका कारण सरकार की गलत नीतियां रहीं। गलत समय पर गलत कदम उठाकर कांग्रेस नीत केंद्र सरकार ने आम आदमी का बोझ कम करने के बजाए उसपर इतना भार लाद दिया कि वो सीेधे खड़े होने का सपना भी न देख पाए। इतने सब के बाद भी सरकार के मंत्री ऊल-जुलूल बयानबाजी से बाज नहीं आते, जो खासकर कृषिमंत्री शरद पवार तो शायद ये भूल ही चुके हैं कि उलना काम क्या है। वो हर वक्त खिसियानी बिल्ली की तरह खंबा नोंचने को तैयार रहते हैं। कुछ वक्त पहले उन्होंने चीनी के बढ़ते दामों पर खीजते हुए कहा था कि 'मैं योतिषी नहीं हूं जो बता सकूं की चीनी के दाम कब नीचे आएंगे' और अब वो इसके लिए प्रधानमंत्री तक को दोषी ठहराने में लगे हैं। यूपीए सरकार ने अब तक पेट्रोलियम पध्दार्थों के दामों में कई बार वृध्दि की,

लेकिन दाल, आटा, सब्जी जैसी खाद्यय सामग्री के मूल्यों में अनावश्यक आई तेजी को कम करने के बारे में एक बार भी नहीं सोचा। सत्ता में आते ही कांग्रेस ने साफ कर दिया कि वो सब्सिडी को पूरी तरह खत्म करना चाहती है, मनमोहन सिंह ने कहा था कि सब्सिडी में खर्च की जाने वाली रकम को बच्चों की शिक्षा जैसे कामों पर लगाया जाएगा। पर शायद वो भूल गए कि अगर घर में खाने को ही नहीं होगा तो बच्चे क्या खाक तामील हासिल करेंगे। यदि भाजपा लोकसभा चुनाव के वक्त अंदरूनी कलह से नहीं गुजर रही होती तो उसकी जीत सुनिश्चित थी। हम एक ऐसे व्यक्ति को अपना नेता कैसे चुन सकते हैं जो अपने घर के झगड़ों ही नहीं सुलझा पा रहा। जनता के पास विकल्प बहुत सीमित हैं, या कहें कि उसके पास विकल्प हैं ही नहीं। गडकरी को इन मुद्दों पर गंभीरता से विचार करने और इनका हल खोजने की जरूरत है। कांग्रेस में भले ही युवाओं की टीम हो मगर भाजपा को युवा सोच पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है, सबसे पहले तो उसे युवाओं की भावनाओं को समझने और उसके अनुरूप काम करने की रणनीति पर विचार करना चाहिए। ऐसा तभी हो सकता है कि जब गडकरी किसी युवा को सलाहकार के रूप में नियुक्त करें। मेंगलौर जैसी घटनाएं और वलेंटाइन डे के विरोध का तरीका भाजपा को युवाओं से दूर ले जाने में अहम किरदार निभाता है। यदि भाजपा अध्यक्ष गडकरी पार्टी की छवि को लेकर सर्वे कराएं तो सबसे यादा शिकायत युवाओं को इसी मुद्दे पर होगी। वैसे पार्टी के इतिहास के हिसाब से देखा जाए तो अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजने वाले गडकरी अभी खुद भी युवा हैं, पर फिर भी उन्हें किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत है जो युवाओं से जुड़े मुद्दे की बारीकियों पर उनका ध्यान आकर्षित करा सके। राहुल गांधी इस वक्त सही काम कर रहे हैं, स्कूल-कॉलेजों में जाकर वो युवाओं को पार्टी का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित करने में लगे हैं। उनके इस अभियान का व्यापक असर भी देखने को मिल रहा है, मगर यह असर सार्थक परिणाम में तब तक तब्दील नहीं हो सकता जब तक कांग्रेस किसी ऐसे युवा को फ्रंट लाइन में नहीं लाती जिसको राजनीति विरासत में न मिली हो। अब तक कांग्रेस में जितने भी युवा हैं पार्टी में उनका दाखिला खुद के बल बूते नहीं हुआ। भाजपा कांग्रेस की इस कमजोरी को अपनी ताकत के रूप में अपना सकती है। नितिन गडकरी को पूरा फोकस युवाओं पर करना चाहिए, साथ ही उन्हेंं खुद को पार्टी से बड़ा समझने वाले नेताओं पर भी लगाम लगाने के बारे में सोचना चाहिए। अगर गडकरी ऐसा करने में सफल रहे तो भाजपा को पुरानी लय में वापस आने से कोई नहीं रोक सकता।

Saturday, January 30, 2010

कहीं गुम हो गई है देशभक्ति

नीरज नैयर
देश का 60वां गणतंत्र दिवस हर बार की तरह आया और खामोशी से चला गया। खामोशी इसलिए कि उल्लास और उत्साह का शोर महज स्कूलों, परेड ग्राउंड और मुल्क की राजधानी दिल्ली के एक खास हिस्से में सुनाई दिया। 15 अगस्त और 26 जनवरी की तैयारी हर साल स्कूलों से शुरू होकर परेड ग्राउंड्स में खत्म हो जाती है। इसके समापन पर एक शानदार जलसा होता है, जिसमें मंत्री, संतरी, अधिकारी और मुट्ठी भर भीड़ पहुंचती है। झंडावंदन किया जाता है, सलामी ली जाती है और थोड़ी ही देर में सबकुछ समान्य हो जाता है। देश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस जलसे में खुद को शरीक नहीं करता, अगली सुबह उसे ये भी याद नहीं रहता कि बीती रात देश ने किस मुकाम को छुआ है। हां उसे इतना याद जरूर रहता है कि सालाना जलसे की छुट्टी में उसके व्यक्तिगत कामों की लिस्ट में क्या छूट गया।
यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए कि हम राष्ट्रीय पर्वों को मनाने की महज रस्मअदायगी भर कर रहे हैं, और आम जनता ने इस रस्मअदायगी का ठेका भी सरकार और उसके नुमाइंदों पर छोड़ रखा है। 26 जनवरी या 15 अगस्त को राष्ट्रध्वज फैहरे या न फैहरे, देशभक्ति के गीत गाय जाएं या न गाय जाएं हमें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। हमारा सरोकार सिर्फ छुट्टी और उसके उपयोग तक सीमित होकर रह गया है। यह निहायत ही संवेदनशील और सोचनीय मु्द्दा है कि जिस दिन हर भारतीय को एक साथ खड़े होकर राष्ट्रीय पर्व का हिस्सा बनना चाहिए उस दिन आधे से यादा लोग चादर तानकर क्यों सो रहे होते हैं। इसे बदलाव का एक चक्र कहा जा सकता है, पहले स्थिति ऐसी बिल्कुल नहीं थी। यादा पीछे तो मैं नहीं जा सकता, पर अपने 28 साल के सफर में मैंने इस जोश को ठंडा होते देखा है। बचपन के दिनों में जब थोड़ी बहुत समझ आ जाती है, तब मैं और मेरे भाई बहन जितनी तैयारी होली के लिए किया करते थे, उससे कहीं यादा गणतंत्र दिवस या पंद्रह अगस्त के लिए करते थे। हम कई दिनों पहले से ही पैसे इकट्ठा करना शुरू कर दिया करते थे ताकि झंडा बनाने के लिए कपड़ा खरीदा जा सके। पॉकेट मनी के नाम पर कुछ खास मिलता नहीं था, सो रेडीमेट झंडे खरीदने के बारे में सोचते भी नहीं थे, और प्लास्टिक का झंडा लगाना हमें मंजूर नहीं था। कपड़े को तिरंगे में तब्दील करने का काम मैं खुद किया करता था, हो सकता है कि उन दिनों राष्ट्रध्वज की शान में हमसे कुछ कमी रह गई हो मगर हमारी भावना कभी वैसी नहीं रही।
हमारा झंडावंदन दिल्ली में तिरंगा लहराने के बाद ही होता था, क्योंकि आंख खुलने के साथ ही कदम टीवी का स्विच ऑन करने की तरफ बढ़ लिया करते थे, परेड देखने के लिए। टीवी में रिमोट न होने का मलाल भी खूब होता था, पर मलाल में फंसकर हम परेड का एक भी पल गंवाना नहीं चाहते थे। परेड के वक्त जब प्रधानमंत्री सलामी ले रहे होते हमारा नाश्ता बिस्तर पर बैठे-बैठे ही चल रहा होता। उस वक्त ब्रश करने जाना दुनिया का सबसे बुरा काम लगता, क्योंकि उस थोड़े वक्त के लिए हमें टीवी से नजरें हटाना पड़तीं। ध्वजारोहण के लिए हम छत के ऊपर बने छोटे से कमरे की छत का चुनाव करते, हालांकि वहां तक पहुंचने के लिए सीड़ियां नहीं हुआ करती थीं। फिर भी दीवार से बाहर निकल रहीं ईंटों और लोहे की ग्रिल को सहारा बनाकर छत पर पहुंचते, तिरंगा लहराते, उसे सलामी देते और नीचे उतर आते। नीचे उतरने के बाद लहराते तिरंगे को देखकर जो खुशी मिलती उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। पूरी कॉलोनी में सिर्फ मंदिर को छोड़कर जहां वरिष्ठ नागरिकों द्वारा ध्वजारोहण किया जाता था, हमारे घर की छत पर तिरंगा शान से लहराता। सूरज ढलने से पहले ही हम तिरंगे को उतारकर तय बनाकर अलमारी में रख दिया करते और दूसरे दिन फिर उसी स्थान पर लगा दिया करते। हमारा गणतंत्र या स्वतंत्रता दिवस दूसरों की अपेक्षा एक-दो हफ्ते यादा ही चलता।
अगर उस वक्त तिरंगे को रात में फैहराने की छूट होती तो निश्चित ही दूधिया रोशनी हम उसे फैहराया करते। गणतंत्र दिवस समारोह में जाने की मेरी बचपन से दिली इच्छा रही, जिसको मैं स्कूल में होने वाले कार्यक्रमों से पूरी करता रहा। शायद उस वक्त मैं 10वीं क्लास में था। 15 अगस्त के दिन जब कॉलोनी के दोस्त सुबह-सुबह क्रिकेट खेलने में मशगूल थे, मैं स्कूल में होने वाले कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए तैयार हो रहा था, मेरे भाई ने लाख समझाया कि भई स्कूल में कुछ खास नहीं होगा। जाकर पछताना ही पड़ेगा, मगर मैंने उसके एक न सुनी और हम दोनों स्कूल पहुंच गए। हमारे स्कूल का नाम था राजा बलवंत सिंह इंटर कॉलेज, शायद इसीलिए वो समझते थे कि यहां आने वाला हर बच्चा किसी राजा की तरह ही योध्दा होगा। ग्राउड में हम सारे छात्रों को कतार में खड़ा कर दिया गया, सूरज देवता उस दिन बिल्कुल भी मेहरबान नहीं थे। सुबह से ही धूप अपने पूरे शबाब पर थी, हम कड़ी धूप में मुख्य अतिथि के इंतजार में तकरीबन 50-60 मिनट खड़े रहे। इसके बाद धूप के आगे छात्रों का धैर्य जवाब देने लगा, कुछ छात्र गिरने लगे, कुछ जानबूझ कर जूत के फीते खोलते और फिर उन्हें बांधने के बहाने चंद मिनटों के लिए बैठ जाते। मेरा भाई उस वक्त मुझे क्रोध भरी निगाहों से देख रहा था, मैं बिन बोले ही उसके अल्फाज समझ सकता था। खैर, हमारे गिरने से पहले ही मुख्य अतिथि आए, झंडावंदन हुआ। लहराते झंडे को देखकर 60 मिनट तक खड़े रहने को दर्द पलभर में ही काफुर हो गया।
मुख्य अतिथि के हाथ से दो-दो लड्डू मिले जिसे खाते हुए हम स्कूल से बाहर निकल आए। उन दिनों राष्ट्रीय पर्व पर स्कूलों में विद्यार्थियों को दो-दो लड्डू दिए जाते थे। हिंदी मीडियम स्कूलों में तो यही आलम था, इंगलिश मीडियम के बारे में कुछ कह नहीं सकता, हो सकता है वहां कुछ अलग होता हो। स्कूल से घर तक साइकिल चलाने की जिम्मेदारी मेरे भाई ने मुझे सौंपी। अब ये स्कूल लाने का दंड था या कुछ और, मैंने समझे बिना ही हामीं भर दी। क्योंकि मैं जानता था कि न चाहते हुए भी उसे मेरी वजह से यहां आना पड़ा और धूप में 60 मिनट खड़े होने की सजा झेलनी पड़ी। उस वक्त हमारे पास रेंजर साइकिल हुआ करती थी, दिखने में स्टाइलिश थी इसलिए हमने पहली नजर में ही उसे पसंद कर लिया था। मगर चौडे टायरों की वजह से दो लोगों को बिठाकर उसे चलाना बड़ा परिश्रम वाला काम था। हम इसी साइकिल पर सवार होकर घर से 9 किलोमीटर दूर स्थित स्टेडियम भी जाया करते थे, उन दिनों बैडमिंटन खेलने का जुनून सवार था। कुछ ओपन टूर्नामेंट जीतने के बाद स्टेडियम में खेलकर आगे बढ़ने का उत्साह भी खूब था, इसलिए थकान कमजोर नहीं कर पाती। स्टेडियम में एंट्री के लिए हमें बहुत पापड़ बेलने पड़े। कोच हमें खिलाने को बिल्कुल तैयार नहीं था, ऐसा नहीं था कि हमारी उससे कोई पुरानी दुश्मनी थी बल्कि वहां तक पहुंचने के लिए किसी रसूख वाले व्यक्ति का सिफारिशी पत्र हमारे पास नहीं था। कोच न नहीं किस्मत ने हमारा साथ जरूर दिया, हमें कुछ सुपर सीनियर खिलाड़ियों का मैच दिखने का मौका मिला।
उस टीम के कप्तान मिस्टर भल्ला के खेल ने हमें बहुत प्रभावित किया, वहां बैठे लोगों के मुंह से उनके व्यवहार के बारे में भी काफी तारीफ सुनने को मिली। उसी वक्त हमने सोच लिया कि शायद मिस्टर भल्ला स्टेडियम में हमारी एंट्री करवा सकें। मैंच के दूसरे दिन किसी तरह पता लगाकर हम उनके घर पहुंच गए, उस वक्त शाम के शायद 6 बज रहे होंगे। उन्होंने बड़े प्यार और सम्मान से हमें बिठाया हमारी बातें सुनी और एक पत्र कोच के नाम हमारे हाथों में थमा दिया। हमने उन्हें धन्यवाद दिया, पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया और अगली शाम स्टेडियम पहुंच गए। कोच को सिफारिशी पत्र थमाया तो उसके मुंह से चाहते हुए भी न नहीं निकल सकी। थोड़े ही वक्त में हमने आउटडोर और इंडोर के बीच के फर्क को समझते हुए अपने को ढाल लिया। भगवान के आशीर्वाद, भल्ला साहब की दुआएं और अपनी मेहनत से हम अच्छा खेलने भी लगे। मगर यादा आगे नहीं बढ़ पाए, कोच का सारा ध्यान महज उन खिलाड़ियों की प्रतिभा निखाकरने में रहता जिनके पीछे उनके पिताजी की करोड़ों की दौलत पड़ी हो। हमारी तरह कुछ और खिलाड़ी भी इसी पीड़ा से ग्रसित थे, बोर्ड की पढ़ाई और कोच के रुखे व्यवहार के चलते हमने स्टेडियम से नाता तोड़ लिया। खिलाड़ी बनने की तमन्ना कोच की वजह से पूरी नहीं हो पाई और सेना में जाने की ख्वाहिश पारिवारिक स्थिति के चलते परवान नहीं चढ़ सकी। उस दौर की परेशानियों को न तो कागज पर और न ही लफ्जों में बयां किया जा सकता है। बस इतना कह सकता हूं कि उन दिनों हर दिन एक जंग की तरह था, और निहत्थे ही उसमें उतरना होता। भले ही सेना में जाने की इच्छा अधूरी रह गई हो मगर देशभक्ति का जबा अब भी कायम है। ये देखकर बेहद अफसोस होता है कि आजकल के बच्चों में वो जोश दुखाई नहीं पड़ता। हर कोई 26 जनवरी और 15 अगस्त को सिर्फ छुट्टी के रूप में मनाना चाहता था। इस गणतंत्र दिवस को मैंने अपने फोन में फीड अनगिनत लोगों को बधाई संदेश भेजा, शाम तक मेरी उंगलियां मोबाइल के की-पेड पर चलती रहीं। लेकिन मेरे पास बधाई का महज एक मैसेज आया वो भी मेरी बहन का।
अगर ये बात दिपावली या नए साल की होती तो शायद मुझे रिटर्न में शुभकामनाएं जरूर मिलती, मगर गणतंत्र दिवस को लोगों ने इस लायक ही नहीं समझा कि उसकी खुशी में अपनी खुशी ढूंढी जा सके। भले ही हमारे देश में भ्रष्टाचार बीमारी की तरह फैल गया हो, देश को चलाने वाले नेता उस भ्रष्टाचार का अंग बन गए हों मगर देश के प्रति हमारी सोच में परिर्वतन कैसे आ सकता है। हम राष्ट्रीय त्योहार का अनादर कैसे कर सकते हैं, इस बारे में गंभीरता से सोचने की जरूरत है। वरना आने वाले वक्त में प्रधानमंत्री भी अपने कार्यालय में बैठकर ही परेड की सलामी लिया करेंगे।

Saturday, January 16, 2010

कब उगेगा उम्मीद का सूरज

नीरज नैयर
भारत में एक काम जो सबसे मुश्किल है, वो है लोगों को उनका कर्तव्य याद दिलाना। उन्हें ये समझाना कि क्या करना चाहिए, क्या नहीं। डू और डू नॉट की लंबी चौडी लिस्ट होने के बाद भी लोग गफलत में रहते हैं। इस गफलत का कारण खुद उनकी सोच और वो आदत है जो उन्हें कुछ करने नहीं देती। जो काम नियमों के खिलाफ है उसे करने में तो लोगों को चमत्कारिक सुख की अनुभूति होती है, उन्हें लगता है जैसे उन्होंने दुश्मन के खेमे में जाकर कोई जीत हासिल की हो। ट्रैफिक नियमों को इसके सबसे उपयुक्त उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है। वाहन चलाने वाले इक्का-दुक्क लोग ही इनका पालन करने में विश्वास रखते हैं, और वो भी तब जब यातायात पुलिस का जवान आसपास कहीं दिखाई दे रहा हो। वरना क्या रेड लाइट, क्या स्टाप लाइन और क्या नो एंट्री। मेरे एक मित्र हैं, जिन्होंने ट्रैफिक नियमों की घाियां उड़ाने में शायद ही कोई कसर छोड़ी हो। उनका मानना है कि नियम तो होते ही तोड़ने के लिए हैं। एक-दो बार बेचारे यातायाता पुलिस के हत्थे चढ़े भी तो अपने पद का रुबाब दिखाकर पाक-साफ निकल आए। वो भी पत्रकारिता से जुडे हैं, और पत्रकार बनने के बाद जैसे नियमों को ताक पर रखने का लाइसेंस मिल जाता है। ऐसे कितने मीडिया वाले होंगे जो दोपहिया वाहन पर चलते वक्त हेलमेट का प्रयोग करते हों, फिर रेड लाइट आदि की तो बात करना ही बेकार है। गाड़ी पर प्रेस लिखवाने मात्र से ही एक अदृश्य शक्ति का संचार होता है, जिसका मुजायरा किसी चौराहे आदि पर अमूमन देखने को मिल जाया करता है। वैसे इस 'प्रेस' नामक शस्त्र का इस्तेमाल महज इससे जुड़ा व्यक्ति ही नहीं करता, उसके परिवारवाले और मित्र मंडली के लिए भी यह कवज साबित होता है। कहीं नियम तोड़ते पकड़े गए तो फट से फोन लगाकर खाकी वर्दीधारी को थमा दिया। ये स्थिति किसी एक शहर या राय की नहीं, कमोबश पूरे मुल्क में यही आलम है। आम जनता को ही लीजिए जहां नो पार्किंग का बोर्ड लगा होगा, गाड़ी वहीं टिकाना इात का विषय बन जाता है। अपने घर में साफ-सफाई करके कूड़ा दूसरे के घर के सामने फेंकना हम भारतीयों का शगल है। पर्यावरण का ख्याल हमने शायद ही कभी किया हो, हां आजकल के बच्चे जरूर ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर जागरुकता फैलाने की कोशिशों में लगे हैं। चंद हफ्ते पहले कुंभकरणी नींद में सोई जनता को जगाने के लिए भोपाल में बच्चों ने पर्यावरण रैली निकाली थी। रैली का प्रतिनिधित्व कर रहीं छात्रा शान और उनके सहयोगियों ने पर्यावरण सुरक्षा के तमाम संदेश दिए लेकिन बाल मन से निकले इन संदेशों पर कितना गौर फरमाया जाएगा ये सब जानते हैं। लोगों को लगता है कि इस तरह की रैलियां महज रस्मआदायगी है मगर वो इनके पीछे के महत्व को नहीं समझ पाते। ये कहना गलत नहीं होगा कि आज देश, समाज और पृथ्वी के प्रति कर्तव्य और जिम्मेदारी का जो थोड़ा बहुत भाव जीवित है, वो सिर्फ बच्चों में है। शायद इसलिए ही वो तरह-तरह से हमें जागरुक करने का प्रयास करते रहते हैं। दरअसल समाज के एक बड़े तबके के अंदर यह सोच घर कर गई है कि 'मेरे अकेले के करने से क्या होगा', ऐसे लोगों के लिए बूंद-बूंद से घड़ा भरने की प्रचलित कहावत एक सीख है मगर कोई इसमें विश्वास करने की पहल नहीं करना चाहता। यही वजह है कि सामजिक कर्तव्य और जिम्मेदारियों के मामले में हमारा दामन खाली का खाली है। ऐसे ही खाली लोगों के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने कुछ कठोर कदम उठाने का मन बनाया है, मसलन शहर में गंदगी फैलाने वालों पर दंड का प्रावधान किया गया है। सार्वजनिक स्थानों पर थूकने पर 100, पेशाब करने पर 250, शौच करने पर 500, अधिसूचित क्षेत्र के बाहर पशुपालन करने पर 1000, सार्वजनिक स्थानों पर रासायनिक अपशिष्ट डालने पर 1000 रुपए जुर्माना वसूला जाएगा। इसके साथ ही नागरिक कर्तव्य चार्टर भी जारी किया गया है, जिसमें स्वयं एवं आस-पास के क्षेत्र की साफ सफाई का समुचित ध्यान रखना, पर्यावरण का पूरा ध्यान रखना, पानी का अनुकूलन उपयोग करना, यातायात नियमों का पालन करना , पार्किंग के लिए नियत स्थल का ही उपयोग करना, सार्वजनिक स्थल एवं शासकीय संपत्तियों पर हो रहे अतिक्रमण की समय पर सूचना देना आदि शामिल हैं। देखा जाए तो यह बहुत ही अच्छी पहल है, लेकिन व्यवहारिक रूप में इसका सफल होना बहुत मुश्किल है। सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान करना पूरी तरह से प्रतिबंधित है, बावजूद इसके धुएं के छल्ले उड़ते देखे जा सकते हैं। कानून के अमल में आने के बाद से अब तक बहुत कम ही ऐसे मामले होंगे जिनमें किसी को दंडित किया गया हो। इस तरह की पहल हमारे देश में महज फाइलों तक ही सिमट कर रह जाती हैं। शुरूआती सख्ती के बाद न तो सरकारी स्तर पर कुछ किया जाता है और न ही लोगों को अपनी जिम्मेदारी का अहसास होता है। हर साल आस्था के नाम पर बड़े पैमाने पर नदी, तालाब और समुद्र को प्रदूषित किया जाता है। यह जानते-समझते हुए भी कि प्रतिमाओं के विसर्जन का पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ता है, हम अपनी धुन से बाहर निकलना नहीं चाहते। तमाम संगठनों ने इसके प्रति जागरुकता फैलाने का प्रयास किया मगर उनके प्रयास कितना रंग लाए हैं इसका अंदाजा हमें दूर्गा पूजा और गणेश चतुर्थी के वक्त हो ही जाता है। ऐसे मामलों में बात फिर वहीं आकर रुक जाती है कि 'मेरे अकेले के करने से क्या होगा'। वैसे हम भारतीयों की एक और आदत है, हमेशा प्रशासन, सरकार और मुल्क को कोसते रहना। मसलन कोई गलत काम हो रहा है तो 'भारत में तो यही सब रह गया है', कहीं गंदगी पड़ी है तो 'प्रशासन नकारा हो गया है', कहीं कुछ ठीक नहीं हो रहा तो 'ये देश कभी सुधर ही नहीं सकता, 'यहां की पुलिस निक्कमी है', 'यहां विदेशों जैसी सुंदरता कभी हो ही नहीं सकती' आदि.. आदि। लेकिन ऐसी बातें करते वक्त हम भूल जाते हैं कि दूसरे देशों में नागरिकों मेंअपने मुल्क को बेहतर बनाने की जो उमंग है, हममें उसका अभाव है। और हम उसे पैदा करना भी नहीं चाहते, क्योंकि अपने कर्तव्य, जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ाकर जीना हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया है। इसलिए मध्यप्रदेश सरकार की अनोखी पहल का भविष्य वर्तमान से धुंधला ही नजर आ रहा है। पर यदि सरकार ने अपनी आदत के विपरीत रुख अपनाया तो शायद कुछ परिवर्तन देखने को मिल सकें। मगर इसे अमल में लाने से पहले कुछ बुनियादी बातों पर गौर करने की जरूरत है, जैसे सार्वजनिक जगहों पर पेशाब और शौच जैसी समस्याओं पर महज दंड लगाकर उसे समाप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए पहले ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए कि किसी को ऐसा करने पर मजबूर न होना पड़े। वैसे जिस दिन भारतीय अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्यों का समझना सीख लेंगे उस दिन ऐसे प्रावधानों की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी, लेकिन उम्मीद का वो सूरज कब उगेगा इस बारे में कुछ भी कहना मुश्किल है।