Wednesday, October 28, 2009

एक्स के ऐड के पीछे न जाना

किसी भी नए प्रोडेक्ट का भविष्य क्या होगा यह काफी हद तक उसकी एडवरटाइजिंग पॉलिसी पर निर्भर करता है. यदिएडवरटाइजमेंट लोगों के दिलों-दिमाग पर छाने में कामयाब रहा तो प्रोडेक्ट की कामयाबी निश्चित है. यही वजह है कि आजकल कंपनियां अच्छे विज्ञापन की चाहत में पानी की तरह पैसा बहाने से भी गुरेज नहीं करतीं. जहां तक उपभोक्ता की बात है तो उसके फैसले भी काफी हद तक विज्ञापन पर टिके होते हैं, लोग ऐड देखते हैं, उनसे प्रेरित होते हैं और अगले दिन प्रोडेक्ट घर ले आते हैं. लुकलुभावन विज्ञापन से प्रभावित होने से लेकर उत्पाद के खरीदने तक कंयुमर विश्वास की इसडोर में बंध जाता है कि जैसा दिखाया गया है वैसा तो होगा ही.

लेकिन अक्सर दिखाने और होने में जमीन आसमान का अंतर होता है. प्रोडेक्ट को जिस तरह से प्रचारित-प्रसारित किया जाता है, उपयोग के वक्त वो इतना असरकारी साबित नहीं होता. इस बारे में अगर एक सर्वे कराया जाए तो अधिकतर लोगों की राय भी यही होगी. आजकल एक्स इफेक्ट केविज्ञापन टीवी पर बहुत छाए हुए हैं, खासकर युवा वर्ग में इसका काफी क्रेज है. द एक्स इफेक्ट प्रोडेक्ट की प्रमोशन पॉलिसी भी केवल युवावर्ग को आकर्षिक करने की है. इसलिए विज्ञापन के माध्यम से यह बताने की कोशिश की गई है कि इस प्रोडेक्ट के इस्तेमाल से लड़कियां खुद ब खुद आपके पास खिचीं आएंगी, यानी एक्स इफेक्ट के उत्पाद लगाओ और प्लेबॉय बन जाओ. न जाने कितने युवाओं ने इस विज्ञापन से प्रेरित होकर प्रोडेक्ट खरीदा होगा. ऐसा ही एक और विज्ञापन पिछले कुछ दिनों से आना शुरू हुआ है, जिसमें छत पर कपड़े उठाने आई एक युवती सिर्फ इसलिए मदहोश हो जाती है क्योंकि पास की छत पर बैठे युवक ने मनमोहक खुशबू वाला डियोडरेंट लगाया था. इस तरह के विज्ञापनों की तादाद दिन ब दिन बढ़ती जा रही है, कारण इनसे जुड़े उत्पादों की आपार सफलता.

लोग अति महंगे होने के बावजूद इस तरह के प्रोडेक्ट खरीदना पसंद करते हैं जो पल में दुनिया बदलने के ख्वाब दिखाते हैं. विज्ञापन कपंनिया इसके लिए फिल्म स्टार को हायर करती हैं, क्योंकि अपने पसंदीदा और चहेते स्टार की रिकमनडेशन को लोग नकार नहीं पाते. उन्हें लगता है कि अगर जॉन इब्राहिम या ऐशवर्या राय किसी फेयरनेस क्रीम का ऐड कर रहे हैं तो उसमें कुछ न कुछ तो सच्चाई होगी. मगर हकीकत ये है कि विज्ञापनों में आने वाले स्टार निजी जिंदगी में शायद ही कभी उन प्रोडेक्ट को प्रयोग में लाते हों. अभी हाल ही में जिस तरह से एक युवक ने एक प्रतिष्ठित कंपनी की एडवरटाइजिंग पॉलिसी को कोर्ट में चुनौती दी उसके बाद ऐड सेंसरशिप कड़ाई से लागू करने की जरूरत महसूस होने लगी है. दिल्ली के रहने वाले 26 वर्षीय वैभव बेदी पिछले काफी समय से एक्स के प्रोडेक्ट इस्तेमाल कर रहे थे, मगर वो किसी भी लड़की को प्रभावित करने में असफल रहे, बकौल वैभव मैं कॉलेज के वक्त से इसे प्रयोग कर रहा हूं, करीब सात साल तक एक्स प्रोडेक्ट के इस्तेमाल के बाद भी मुझे वैसे परिणाम देखने को नहीं मिले जैसे इसके विज्ञापनों में दिखाए जाते हैं. वैभव ने अब तक इस्तेमाल में लाए सारे एक्स प्रोडेक्ट के खाली डिब्बों को कोर्ट के समक्ष पेश करके उनकी लेबौरट्री जांच की मांग की है. वह इस तरह की एडवरटाइजिंग पॉलिसी को अपने मानसिक उत्पीड़न का कारण मानते हैं. एक्स के विज्ञापन की हू ब हू नकल करने के लिए वैभव बेदी एक्स डियोडरेंट लगाकर अपनी मेड के आगे निवस्त्र तक हो गये लेकिन बदले में उन्हें मार खानी पड़ी. कहने वाले इसे वैभव का पागलपन कह सकते हैं लेकिन इस पागलपन ने उस सच से अवगत कराया है जिस पर अक्सर हमारा ध्यान नहीं जाता.

लोग उत्पाद के संतोषजनक न होने की दशा में भी शांत रहना ही मुनासिब समझते हैं, संभवत: इससे उत्पाद को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने वाली विज्ञापन एजेंसियों के हौसले और बढ़ जाते हैं. क्या इस बात पर गौर करने की जरूरत नहीं है कि जो कुछ ऐड में दिखाया जा रहा है वैसा वास्तव में होता भी है या नहीं. अगर विज्ञापन में एक्स इफेक्ट लगाने के बाद लड़कियां अपने आप खिंची आती हैं तो रियल लाइफ में भी ऐसा होना चाहिए. कायदे में इस तरह के विज्ञापनों पर रोक लगनी चाहिए जो जादुई करिश्मे की बात करते हैं. मौजूदा वक्त में तो ऐसा लगता है जैसा टीवी पर प्रसारित होने वाले विज्ञापनों को लेकर कोई दिशा-निर्देश हैं ही नहीं. अधिकतर विज्ञापनों में अशीलता का पुट इतना यादा है कि परिवार के साथ बैठकर देखना भी मुश्किल हो जाता है. सरकार इस मामले पर अब तक खामोशी अख्तियार किए ही बैठी है, कुछ वक्त पुरुष अंडरगारमेंट के एक निहायत ही भद्दे विज्ञापन पर णरोक जरूर लगाई गई थी लेकिन वो भी अब नए रूप में सामने आ गया है.

जिस तरह से फिल्मों में अशीलता रोकने के लिए सेंसरबोर्ड है और वो अपनी कैंची चलाने में बिल्कुल नरमी नहीं बरतता उसी तरह विज्ञापनों को लेकर भी कुछ कड़े कदम उठाए जाने की जरूरत है. खासकर इस बात पर यादा जोर दिए जाने की आवश्यकता है कोई भी कंपनी अपने उत्पाद के प्रोमोशन के लिए इस तरह के हथकंडे न अपनाए जिन पर खरा उतरना उसके खुद के लिए मुमकिन न हो. एडवरटाइजिंग एजेंसियों के लिए लक्ष्मण रेखा खींची जाना बेहद जरूरी है ताकि वैभव बेदी जैसे मामले सामने आने की नौबत ही न आए. वैभव ने एक तरह से जागरुकता का परिचय दिया है. अगर बाकी लोग भी केवल मनमकोस कर रहने की आदत से बाहर निकलकर आवाज बुलंद करें तो शायद झूठे विज्ञापनों के सहारे मुनाफा कमाने की आस कंपनियों को खासी भारी पड़े. वैभव के मामले में संबंधित कंपनी को नोटिस भी जारी किया गया है, और कंपनी फिलहाल चुप्पी साधे हुए है. हवा का रुख पूरी तरह से कंपनी के विपरीत है, हो सकता है वो ऊल-जुलूल तर्क देकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश भी करे. मगर उसकी दलीलों का कोर्ट पर कितना असर पड़ता है, यह देखने वाली बात होगी. समझदारी इसी में है कि महज विज्ञापनों को देखकर उत्पाद की गुणवत्ता और उसके प्रभाव के बारे में राय कायम नहीं करनी चाहिए.

Saturday, September 19, 2009

अफ्रीकी चीतों को क्या सुरक्षित रख पाएंगे हम

नीरज नैयर
अफ्रीकी चीतों के भारत में पुर्नवास की कवायदें तेज हो गई हैं, विशेषज्ञों ने उन स्थानों का चुनाव कर लिया है जहां इन्हें रखा जाना है. फिलहाल चीतों की सुरक्षा को लेकर मंथन का काम चल रहा है जो संभवत: जल्द ही पूरा हो जाएगा. करीब 40 अफ्रीकी चीते भारत लाने की योजना है, जिन्हें राजस्थान के नेशनल डेजर्ट पार्क जैसलमेर एवं बीकानेर के गजनेर, गुजरात के भाल, बनी-कच्छ तथा नारायण सरोवर, मध्य प्रदेश के कुनो-पालपुर, नरुनदेही और छत्तीसगढ़ के संजय-डिबरू नेशनल पार्क में रखा जाएगा. चीते को रहने के लिए कम से कम एक हजार वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र जरूरी होता है, इस हिसाब से बनी और कच्छ वन्यजीव अभयारण्य को प्राथमिकता दी जा सकती है क्योंकि इनका क्षेत्रफल बाकियों के मुकाबले यादा है. यह निहायत ही अच्छी बात है कि नये मेहमान को लाने से पहले उसकी हिफाजत और सहूलियत के लिए कसरत की जा रही है, सरकारी मशीनरी को ऐसी कसरत करते देखना सुखद है लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या इस सारी कवायद से पुर्नवास के उद्देश्य को प्राप्त किया जा सकता है.


मौजूदा स्थिति को देखकर तो हां में जवाब देना बहुत मुश्किल है. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदरा गांधी ने जिम कार्बेट से बाघ संरक्षण परियोजना की शुरूआत की थी तब से आज तक बाघों के संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जा सके हैं, सरिस्का के बाघ वीहिन होने की खबर ने पूरे देश में प्रोजेक्ट टाइगर सवालिया निशान लगा दिया था, आनन-फानन में कमेटियां बनाई गईं, बाघ सरंक्षण को प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रखा गया, बाघ फंड की राशि बढ़ा दी गई मगर हालात में सुधार नहीं लाया जा सका. न तो शिकारियों पर लगाम लग पाई और न ही संबंधित सरकारी विभागों को इतना मुस्तैद किया जा सका कि बाघों को बचाने में तत्परता दिखा सकें. सरकार की तरफ से बाघ सरंक्षण को भले ही कागजी तौर पर बड़ी-बड़ी रणनीतियां बनाई गईं हों मगर जिस तरह के परिणाम अब तक देखने को मिले हैं उससे तो यह प्रतीत होता है कि बाघों को खत्म होने से बचाना उसके लिए एक पार्ट टाइम काम जैसा बनकर रह गया है , जिसके पूरा होने न होने से कोई खास फर्क नहीं पड़ता. इसका सबसे बड़ा कारण मंत्रालयों से लेकर विभागों तक ऐसे मौका परस्त लोगों की मौजूदगी है जिनके लिए बाघ और उनका सरंक्षण महज पैसा बटोरने का जरिया है. उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं कि बाघ बचें या विलुप्त हो जाएं.

जिन रायों में चीतों को रखने की बात हो रही है उनका खुद का पिछला रिकॉर्ड दागदार रहा है, खासकर राजस्थान और मध्यप्रदेश तो वन्यजीवों के सरंक्षण को लेकर बिल्कुल गंभीर नहीं रहे. देश में बाघों के सफाए की सबसे पहली खबर राजस्थान से ही आई थी. राजस्थान की तरह ही मध्यप्रदेश में भी सरकारी उदासीनता के चलते एक-एक करके बाघ खत्म होते गये. अभी हाल ही में बाघ सरंक्षण के नाम पर चल रहे नाटक का एक और सच सामने आया था, जिसमें मध्यप्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व में एक भी बाघ न होने का खुलासा किया गया था, यहां करीब पांच साल यहां 34 बाघ थे. पन्ना में बाघों की कमी की बातें काफी वक्त से उठ रहीं थी लेकिन सरकारी मशीनरी के नकारेपन ने उन पर गौर करना तक मुनासिब नहीं समझा. सरकार की तरफ से हर बार यही झूठ कहा जाता रहा कि बाघ यहां पूरी तरह सुरक्षित हैं, ताकि बाघ सरंक्षण के नाम पर मिलने वाली मोटी रकम को पचाया जा सके. पन्ना की तरह कान्हा का भी कुछ ऐसा ही हाल है, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने 2002 में जो रिपोर्ट जारी की थी उसमें कान्हा में बाघों की संख्या 131 बताई गई थी लेकिन 2006-07 तक पहुंचते-पहुंचते यह आंकड़ा 89 तक सिमट गया और अब ऐसी आशंका है कि यहां भी यादा बाघ नहीं बचे हैं. बाघ संरक्षण के प्रति सराकर की उदासीनता का आलम ये रहा है कि यहां लंबे समय से खाली पड़े फारेस्ट रेंजर्स के 50 फीसदी पदाें को भरने का प्रयास ही नहीं किया गया. इस बात पर भी ध्यान देने की कोशिश नहीं की गई कि मौजूदा व्यवस्था कितनी चौकस है.


इन दोनों रायों के अलावा गुजरात और छत्तीसगढ़ में भी चीतों को सुरक्षित आशियाना नसीब हो पाएगा इस बात की संभावना काफी क्षीण हैं. नक्सल प्रभावित राय होने के चलते छत्तीसगढ़ के अभयारण्यों में चीतों के पुर्नवास की बात सोचना भी बेमानी होगा, करीब 34000 वर्ग किलोमीटर में फैले यहां के इंद्रावती टाइगर रिजर्व को कभी बाघों के संरक्षण के लिए उपयुक्त माना जाता था मगर अब यहां नक्सलवादियों का कब्जा है. हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि यहां शायद ही कोई बाघा बचा हो, जबकि 2001 की गणना के अनुसार यहां करीब 29 बाघ थे. नक्सलवादी यहां बड़ी आसानी से बाघों का शिकार कर रहे हैं और उन्हें रोकने वाला कोई नहीं, ऐसा नहीं है कि सबकुछ गुपचुप हो रहा है. वन अधिकारी इस बात को भली भांति जानते हैं मगर नक्सलवादियों का खौफ इस कदर है कि वो जंगल में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते. यह नक्सलवादियों के ही खौफ का असर था कि बाघों की ताजा गणना में राय के अभ्यारण्यों को शामिल नहीं किया गया था. अन्य नक्सल प्रभावित रायों की बात करें तों वहां भी ऐसे ही हालात हैं, उडीसा के सिमिलीपाल और बिहार-नेपाल सीमा से लगे वाल्मीकि टाइगर रिजर्वो का हाल बद से बदतर होता जा रहा है. सिमिलीपाल में 2001 में 99 बाघों की गणना कि गई थी पर अब केवल 20 बाघों के होने का ही अनुमान है. ऐसे ही वाल्मीकि में 2001 में 53 के मुकाबले अब सिर्फ 10 बाघ ही बचे हैं. नक्सली गतिविधियों के चलते इन रिजर्वो में संरक्षण अब नामुमकिन सा हो गया है. 1488 वर्ग किलोमीटर में फैले झारखंड की पलामू में 2001 की गणना के मुताबिक 32 बाघ पाए गये थे लेकिन अब इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता. गुजरात के रिजर्वों से भी जब तक बाघों के शिकार की खबरें आती रहती हैं. इसके साथ ही बाघों के सफाए का एक और प्रमुख कारण है अंधविश्वास. यह भावना प्रचुर मात्रा में जनमानस के मस्तिष्क में बैठा दी गई है कि बाघ के अंग विशेष से निर्मित दवाईयां यौन शक्ति बढ़ाने में कारगर हैं. बाघ, मॉनीटर छिपकलियों और भालू के गॉल ब्लेडर के साथ-साथ अब गौरेया का नाम इस कड़ी में जुड़ गया है. पेड़ों पर चहकती मिल जाने वाली गौरेया को पकड़कर कामोत्तेजक के रूप में बेचा जा रहा है. जिसकी वजह से इनके अस्तित्व पर भी संकट मंडराने लगा है.

बाघों के अलावा शिकारियों ने अब तेंदुओं को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया है, 2008 में करीब 141 तेंदुओं का शिकार गया था जबकि 2007 में यह तादाद 124 थी. एक अनुमान के मुताबिक हर साल करीब 150-200 तेंदुए की खाली देश के विभिन्न हिस्सों से बरामद की जाती हैं. दरअसल बाघों की लगतार घटती संख्या से अब तेंदुए की हड्डियों को बाघों की हड्डियों के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है. तेंदुए के अंगों का इस्तेमाल भी दवाओं के लिए किया जाता है जिनकी कीमत बहुत यादा होती है. साथ ही इनकी खोपडी अौर पंजों की भी मांग काफी है. चीन और दक्षिण पूर्व एशियाई देश इनके अवैध व्यापार के बडे क़ेंद्र हैं. तेंदुओं को वन्य जीव जंतु संरक्षण कानून 1972 में भी शामिल किया गया है जो उन्हें कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है लेकिन महज कागजों पर. वन्य जीव विशेषज्ञों की मानें तो तेंदुओं की हत्या की दर वर्तमान में बाघों से कहीं यादा है.अन्य पशु-पक्षियों की तरह गेंडे और हाथियों को भी उसके सींगों के लिए लगातार मारा जाता रहा है, गेंड़ों की तदाद तो पहले से ही कम थी अब हाथियों की संख्या में भी तेजी से कमी आ रही है. कुछ वक्त पहले अंग्र्रेजी समाचार पत्र ने इस संबंध में एक रिपोर्ट भी प्रकाशित की थी, जिसमें बताया गया था कि हाथियों के बारे में भले ही बाघों जैसा ख्याल न आए लेकिन सच ये है कि इनकी संख्या भी घट रही है. कुल मिलाकर कहा जाए तो सरकार की गंभीरता जो उसके विचारों में झलकती है अगर उसका एक प्रतिशत भी काम में झलकता तो शायद चीतों को दूसरे मुल्कों से लाने के बारे में सोचना नहीं पड़ता. लिहाजा मौजूदा वक्त में ये बेहतर होगा कि सरकार चीतों को वहां सुकून से रहने दे और अपने घर में जितने बचे-कुचे वन्यप्राणी हैं उनकी सुरक्षा में मुस्तैदी दिखाए क्योंकि जैसे हालात है वैसे ही चलते रहे तो हमें आने वाले वक्त में न जाने और कितने जीवों को बाहर से लाना पड़ेगा.

Sunday, September 13, 2009

सोच-समझके करें निवेश

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नीरज नैयर
शेयर बाजार में पूंजी लगाने वालाें के लिए मौजूदा वक्त खुशनुमा कहा जा सकता है, सेंसेक्स और निफ्टी दोनों धीरे-धीरे ही सही पर ऊपर की तरफ बढ़ रहे हैं. मंगलवार यानी आठ सितंबर को बाजार खुलते ही सेंसेक्स और निफ्टी इस साल के अब तक के सबसे उच्चतम स्तर पर पहुंच गए, निफ्टी 38.40 अंकों की तेजी के साथ 4800 अंक पार कर गया, जबकि सेंसेक्स 122 की बढ़त लेता हुआ 16139.27 तक जा पहुंचा. बाजार में हर थोड़े अंतराल के बाद इस तरह की बढ़ोतरी निवेशकों का भरोसा कायम रखने के लिए जरूरी है. बाजार ने बीते कुछ समय में बहुत बुरा दौर देखा है, 21-22 हजार के आंकड़े को छूने के बाद जिस तरह से सेंसेक्स ने गोता लगाया था उससे काफी तादाद में निवेशक छिटककर बाजार से दूर चले गये लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता वह फिर लौटने लगे हैं. अब तक अपना हाथ रोककर बैठे नवागान्तुक भी शेयर बाजार के रुख से सहमत होकर निवेश करने लगे हैं, इसी का नतीजा है कि पिछले साल के मुकाबले बाजार इस बार यादा संभला नजर आ रहा है.

2008 में दिवाली के आस-पास बाजार में संन्नाटा पसरा था, लेकिन अब तक जो संकेत मिल रहे हैं उससे कहा जा सकता है कि इस बार की दिवाली अंधकारमय नहीं होगी. शेयर बाजार आज जिस 16 हजार की ऊंचाई पर है, इसका अधारा सही मायनों में देखा जाए तो 18 मई की बढ़त रही, भारतीय शेयर बाजारों के इतिहास में संभवत: पहला मौका था जब बार एक दिन में तीन बार सर्किट लगाए गये. शेयर बाजार में दस प्रतिशत से अधिक की वृध्दि आने पर सर्किट लगाया जाता है. बाजार खुलते ही अप्रत्याशित बढ़त के चलते कारोबार दो घंटे के लिए रोकना पड़ा था इसके बाद 11:55 पर दोबारा शुरू होते ही दोनों प्रमुख सूचकांकों में फिर जबरदस्त तेजी आई. दिन भर में बमुश्किल 10 मिनट की ट्रेडिंग के बाद कुल 17 प्रतिशत बढ़त के साथ कारोबार वहीं रोक देना पड़ा. सेंसेक्स 17.34 प्रतिशत अर्थात 2110.79 अंक उछलते हुए 14254.21 अंकों के स्तर पर जा पहुंचा. निफ्टी ने भी 17.64 फीसदी की बढ़त लेते हुए 4323.15 के स्तर तक दौड़ लगाई. सेंसेक्स में आई ऐतिहासिक तेजी ने निवेशकों को मात्र एक मिनट में 6.5 लाख करोड़ रुपए का फायदा पहुंचाया. हालांकि बाजार को 14000 से 16000 तक पहुंचने में करीब तीन माह का समय लगा जो एक-दो साल पूर्व की रफ्तार के मुकाबले काफी कम है, पर फिर भी यह बढ़त लंबे समय तक छाई खामोशी के गम को कुछ वक्त के लिए दूर करने के लिए काफी है. अगर हम अप्रत्याशित वृध्दि के दौर से पहले की बात करें तो बाजार कछुआ गति से ही बढ़ता था, न कभी उसमें इतना यादा उछाल आता था और न कभी इतनी गिरावट. मगर जब से शार्ट टर्म सट्टेबाजों ने बाजार में दिल खोलकर पैसा लगाना शुरू किया है बाजार में अस्थिरता का संकट अधिक मंडराने लगा है, अक्सर छोटे निवेशक मंदी के दौर में डूबने के डर से बाजार से निकलने की जल्दबाजी में धड़ाधड़ बिकवाली करके बाजार का बैंड बजा देते हैं.

शेयर बाजार का इतिहास रहा है कि जिसने भी बाजार में लंबा टिकने का साहस दिखाया है, मुनाफा भी उसी ने कमाया है. शर्ट टर्म सट्टेबाजों के अलावा बाजार में आने वाले अप्रत्याशित बदलाव का एक और प्रमुख कारण है विदेशी संस्थागत निवेश, विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार में मुनाफा कमाने के इरादे से दिलखोलकर निवेश करते हैं, और जब उन्हें घाटे की आशंका दिखलाई देती है तो फटाफट अपना बोरिया बिस्तर समेटकर बाजार को चौपट कर निकल जाते हैं. दरअसल भारतीय बाजार में विदेशी निवेश को लेकर हमारे यहां कोई गाइडलाइन निर्धारित नहीं है. समय-समय पर कई वित्तीय संस्थान और प्रख्यात उद्योगपति राहुल बजाज भी विदेशी निवेश पर नियंत्रण की बात कहते रहे हैं. कुछ वक्त पहले जब बाजार घड़ाम से गिरा था तब इस दिशा में कठोर कदम उठाने की बातें कही गई थी मगर इतना लंबा समय गुजरने के बाद भी ऐसी कोई खबर सुनने को नहीं मिली है.

सरकार इस बात पर खुश भले ही हो सकती है कि बाजार फिलहाल पल में तोला पल में माशा वाली स्थिति में नहीं है, लेकिन आर्थिक मंदी के दौर में जब दुनिया की सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था यानी अमेरिकी दिवालियापन के हालात से गुजर रहा है, ऐसी स्थिति की कल्पना भी नहीं की जा सकती. असल तस्वीर तो तब नजर आएगी जब मंदी का भूत पूरी तरह से पीछा छोड़ देगा. अभी विदेशी निवेशक खुद घाटे में डूबे हुए हैं, और जब वो खुद को इससे उबरने के हालात में पाएंगे तभी भारत की तरफ रुख करने का साहस दिखा पाएंगे. वैसे देखा जाए तो हाल-फिलहाल का वक्त बाजार में पैसा इनवेस्ट करने के लिए सबसे माकूल है, पर फिर भी अंधाधुन हाथ आजमाने की आदत से अभी बचना चाहिए. बिना सोचे समझे और दूसरों की बातों में आकर पैसा फंसाने का निर्णय लेना जोखिम भरा साबित हो सकता है.

बाजार में यदि सही रणनीति एवं पर्याप्त अध्ययन के साथ उतरा जाए तो नुकसान की संभावना काफी कम रहती है. आजकल कुछ ऐसी वेबसाइट भी मौजूद हैं जो इस दिशा में सही मार्गदर्शन करती हैं, कुछ एक तो अपने गुणा-भाग के आधार पर निवेशकों को यह तक बता रही हैें कि किन शेयरों में निवेश करना फायदेमंद हो सकता है. बिजनेसदुनिया डॉट कॉम के आंकलन इस मामले में काफी सटीक जा रहे हैं. सोच-विचारकर निवेश करने वालों के लिए यह वेबसाइट सहायक सिध्द हो सकती है. फिर भी अंत में यह कहना उचित रहेगा कि किसी भी निर्णय तक पहुंचने से पहले अपने विवेक का इस्तेमाल जरूर करें.

Thursday, September 3, 2009

यहां से कितना आगे जाएगी फुटबॉल

नीरज नैयर
हमारी फुटबॉल टीम ने अपने से कहीं गुना ताकतवर सीरिया को हराकर लगातार दूसरी बार नेहरू कप अपने नाम कर लिया, यह अपने आप में बहुत ही महत्वपूर्ण उपलब्धि है लेकिन इससे भी यादा महत्वपूर्ण है इस मैच को देखने उमड़ी भीड़. गौर करने वाली बात ये है कि लोगों का हुजूम पश्चिम बंगाल के किसी स्टेडियम में नहीं बल्कि दिल्ली के
आंबेडकर स्टेडियम में देखने को मिला. बंगाल में तो फुटबॉल के प्रति लोगों की दीवानगी जगजाहिर है, मगर दिल्ली में ऐसा नजारा देखना थोड़ा आर्श्च्रयजनक प्रतीत होता है.


स्टेडियम के भीतर-बाहर जमा भीड़ के कारण लोगों को अव्यवस्था की शिकायत करने का मौका भी मिला, अमूमन इस तरह की शिकायतें किसी क्रिकेट मैच के दौरान ही सुनने में आती हैं. पूरे मैच के दौरान दर्शक जिस तरह से भारतीय टीम की हौसला अफजाई कर रहे थे उसे देखकर कतई नहीं लग रहा था कि हमारे देश में फुटबॉल को दोयम दर्जे का खेल समझा जाता है. दोयम दर्जे का इसलिए कह सकते हैं क्योंकि इतने सालों बाद भी यह खेल घर की चारदीवारी से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर पूरी तरह अपनी पहचान बनाने में कामयाब नहीं हो पाया है. फुटबॉल के हमारे देश में यूं अलग-थलग पड़े रहने के कई कारण हैं, जिनपर न तो कभी गौर किया गया और न ही कभी गौर करने की जरूरत समझी गई. यूं तो मौजूदा वक्त में कई क्लब मौजूद हैं जो फुटबॉल को जिंदा रखे हुए हैं लेकिन शायद ही लोगों ने जेसीटी फगवाड़ा और मोहन बगान के अलावा किसी तीसरे क्लब का नाम सुना हो.

कम ही लोग इस बात का जानते होंगे कि भारतीय टीम 1950 के वर्ल्ड कप के फाइनल में जगह बनाने में कामयाब हुई थी, 1951 एवं 1961 के एशियन खेलों में उसे गोल्ड मैडिल हासिल हुआ था, 1956 के मेलर्बोन ओलंपिक में वह चौथे स्थान पर रही, और 2007 में नेहरु कप पर कब्जे के बाद 2008 में उसने तजाकिस्तान को 4-1 से हराकर एफसी चैलेंज कप अपने नाम किया. पश्चिम बंगाल को छोड़ दिया जाए तो बमुश्किल एक-दो लोग ही ऐसे होंगे जो फुटबॉल टीम के खिलाड़ियों से परिचित हों. अकेले भाई चुंग भूटिया ही ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्हें यादातर लोग जानते हैं. पिछले दिनों एक टीवी कार्यक्रम में शिरकत करने से उनकी लोकप्रियता का ग्राफ जरूर थोड़ा बहुत बड़ा होगा. लेकिन इसको लेकर उन्हें क्लब के पदाधिकारियों की नाराजगी का भी सामना करना पड़ा. ये बात अलग है कि भाईचुंग ने दबने के बजाए खुलकर अपनी बात रखी और वह उल्टा दबाव बनाने में कामयाब भी रहे, मगर यह घटनाक्रम क्रिकेट और फुटबॉल के बीच के अंतर को बयां करने के लिए काफी है. क्रिकेटर प्रेक्टिस सेशन बीच में छोड़कर विज्ञापनों की शूटिंग में व्यस्त रहते हैं तो भी उनके खिलाफ कुछ नहीं किया जाता, शायद बोर्ड खुद भी खाओ और हमें भी खाने दो की पॉलिसी पर यकीन करता है. कायदे में तो किसी एक खेल की दूसरे के साथ तुलना कतई उचित नहीं है और ऐसा होना भी नहीं चाहिए लेकिन जिस तरह से क्रिकेट के बरगद तले बाकी खेलों की आहूति दी जा रही है उससे तुलनात्मक विश्लेषण की परंपरा का जन्म हुआ है.


क्रिकेट को लेकर हमारे देश में यह तर्क दिया जाता है कि ये खेल लोगों को सर्वाधिक पसंद है और वो इसके अलावा कुछ और देखना ही नहीं चाहते, अगर इस तर्क में तनिक भी सच्चाई होती तो अंबेडकर मैदान पर लोगों की हुजूम न उमड़ता. हकीकत ये है कि काफी हद तक लोग क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों का भी आनंद उठाना चाहते हैं लेकिन प्रोत्साहन की कमी से उन्हें क्रिकेट तक ही सीमित रहना पड़ता है. क्रिकेट के स्वरूप को बदलने और उसे अत्याधिक रोमांचित बनाने के लिए नित नए प्रयोग किए जाते हैं. इंडियान प्रीमियर लीग यानी आईपीएल बीसीसीआई का सफलतम प्रयोग है, हालांकि जी टीवी के मालिक सुभाष चंद्रा को इसका जन्मदाता कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा. सबसे पहले सुभाष चंद्रा ने ही भारत के कैरीपैकर बनते हुए आईसीएल का ऐलान किया था लेकिन बीसीसीआई के पैंतरों के आगे उनकी यह पहल सफल नहीं हो पाई और ललित मोदी ने आईसीएल की तर्ज पर आईपीएल खड़ा कर डाला जो आज कॉर्पोरेट घरानों और खुद बोर्ड के लिए कमाई का सबसे बड़ा जरिया बन गया है. खिलाड़ी भी इसमें करोड़ों-अरबों के वारे-न्यारे कर रहे हैं.

बीसीसीआई के कहने पर ही दूसरे देशों के क्रिकेट बोर्ड ने आईसीएल को मान्यता नहीं दी और वह खडे होनेसे पहले ही लड़खड़ा गया. लेकिन इस तरह का प्रोत्साहन और प्रतिद्वंद्वता का नजारा फुटबॉल में राष्ट्रीय स्तर पर कभी देखने को नहीं मिला. क्रिकेटर जहां अलग-अलग रायों में विभाजित होने के बाद भी राष्ट्रीय स्तर पर एक टीम की तरह दिखाई पड़ते हैं, ऐसा फुटबॉल टीम को देखकर कतई प्रतीत नहीं होता. मौजूदा दौर में तो ऐसा लगता है जैसे फुटबॉल महज अलग-अलग क्लब का ही खेल बनकर रह गया है. जिसके प्रोत्साहन और सुधार का जिम्मा सिर्फ उन क्लबों पर ही है. अगर फुटबॉल फेडरेशन या खेल मंत्रालय इस खेल को राष्ट्रीय स्तरीय खेल की तरह लेते तो शायद इसको ऊपर उठाने के लिए कुछ न कुछ प्रयास जरूर किए जाते.

Thursday, August 13, 2009

महात्मा गांधी, हिंदी और हॉकी में समानता

नीरज नैयर
महात्मा गांधी, हिंदी और हॉकी में एक समानता है, वो ये कि तीनों को ही राष्ट्रीयता से जोड़ा गया है, जैसे महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता का दर्जा दिया गया है, हिंदी को राष्ट्रभाषा और हॉकी को राष्ट्रीय खेल का. पर गौर करने वाली बात ये है कि बावजूद इसके तीनों को वो सम्मान अब तक नहीं मिल पाया है जिसके वो हकदार हैं.

महात्मा गांधी ने मुल्क को आजादी दिलाने के लिए क्या कुछ नहीं किया, दोहराने की शायद जरूरत नहीं. उन्हें एक ऐसे योध्दा के रूप में जाना जाता है जिसने शस्त्र उठाए बिना ही दुश्मन को मैदान छोड़ने पर मजबूर कर दिया. उनके अहिंसक प्रयासों को भारत ही नहीं वरन पूरे विश्व में सराहा जाता है. हालांकि ये बात सही है कि उनके विचारों और सिध्दाताें से कुछ लोग हमेशा असहमत रहे मगर बापू के समर्थन में खड़े होने वाली हजारों की भीड़ ने कभी उन्हें तवाो नहीं दी. पर आज उनके लिए मन में श्रध्दा का भाव रखने वालों को उंगलियों पर गिना जा सकता है. सरकार को भी उनकी याद महज दो अक्टूबर को ही आती है. इसी दिन पार्कों, चौराहों पर धूंल फांक रहीं बापू की प्रतिमाओं को नहलाया-धुलाया जाता है, माल्यार्पण किया जाता है और फिर साल भर के लिए ऐसे ही छोड़ दिया जाता है. देश के राजनीतिज्ञ महात्मा गांधी को नाटकबाज कहकर संबोधित करते हैं. क्या यह आचरण किसी महापुरुष को दिए गये सम्मान का परिचायक है. यदि महात्मा गांधी के नाम के आगे राष्ट्रपिता नहीं जुडा होता तो ऐसे वक्तव्य और उदासीनता फिर भी एकबारगी ना चाहते हुए भी हजम की जा सकती थी. क्योंकि हमारे देश में महापुरुषों के साथ ऐसा ही सलूक किया जाता है. मगर जहां राष्ट्रीयता की बात आती है वहां वाजिब सम्मान तो दिया ही जाना चाहिए.

ऐसा ही हाल हिंदी का भी है, उसे हमारी राष्ट्रभाषा कहा जाता है. कहा जाता है इसलिए कह सकते हैं क्योंकि राष्ट्रीय दर्जे जैसी कोई बात यहां दिखाई नहीं देती. ऐसे मुल्क में जहां हिंदी भाषियों की तादाद सबसे यादा है, वहां अंग्रेजी को सर्वोच्च स्थान पर बैठाया जाता है. आम बोलचाल में भी हिंदी अब पिछड़ती जा रही है. सबसे ताुब की बात को ये है कि जिस सरकार पर हिंदी को मजबूत करने का जिम्मा है वो ही इसे कमजोर बनाने में जुटी है. सरकारी स्तर पर हिंदी को प्रोत्साहित किए जाने वाले कागजी प्रयास भी अब बंद से हो गये हैं. सरकारी कार्यालयों में हिंदी में हर कार्य संभव, हर संभव कार्य हिंदी में जैसी तख्तियां लगाकर फर्ज की इतिश्री कर ली गई है. आलम ये हो चला है कि देश की संसद में भी हिंदी की पूछपरख नहीं है. बहुसंख्य हिंदी आबादी का प्रतिनिधित्वकरने वाले प्रतिनिधि भी राष्ट्रभाषा के इस्तेमाल को तौहीन समझते हैं. अभी कुछ ही रोज पहले जब सदन में चर्चा के दौरान केंद्रीय पर्यावरणमंत्री जयराम रमेश को समाजवादी प्रमुख मुलायम सिंह ने यह याद दिलाया कि वो लंदन की नहीं भारत की संसद में बोल रहे हैं तो उन्होंने अंग्रेजी के बजाए हिंदी में बोलना बेहतर समझा मगर जब बात मेनका गांधी पर आई तो उन्होंने दो टूक शब्दों में हिंदी में बोलने से इंकार कर दिया. अंग्रेजी मौजूदा दौर की जरूरत है इस सच्चाई से मुंह नहीं फेरा जा सकता, पर जहां इसके बिना भी काम चल सकता है वहां तो कम से कम राष्ट्रभाषा के प्रयोग में शर्म महसूस नहीं होनी चाहिए. कुछ एक रायों को छोड़कर बाकी सब जगह के लोग हिंदी समझ-बोल लेते हैं उसके बाद भी संसद में पहुंचने वाले हमारे अधिकतर सांसद अंग्रेजी का मोह नहीं त्याग पाते. इसी वजह से हिंदी भाषी सांसदों के बारे में कहा जाता है कि उन्हें तो हिंदी की बीमारी है. अगर हिंदी को देश में बीमारी के रूप में देखा जाता है तो फिर इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा देने का क्या मतलब, इससे अच्छा तो यही होता कि हिंदी को भी क्षेत्रीय भाषाओं की श्रेणी में रखा जाता. तब शायद इसके तिरस्कार पर यूं मन भारी नहीं होता.

राष्ट्रीयता की तीसरी कड़ी यानी राष्ट्रीयखेल हॉकी भी कुछ अच्छी स्थिति में नहीं है. इसे भी राष्ट्र से जुड़ने की कीमत चुकानी पड़ रही है. इस खेल और इससे जुड़े खिलाड़ियों के साथ हमेशा से ही भेदभाव किया जाता है. उन्हें ना तो राष्ट्रखेल से जुड़ा होने जैसा सम्मान मिल पाता है और ना ही उतनी शौहरत जितनी क्रिकेट में शुरूआती स्तर पर ही मिल जाती है. हॉकी का आज कोई माई-बाप नहीं है. ग्वास्कर, ब्रैडमैन, कपिल देव का नाम अब भी बच्चा-बच्चा बखूबी जानता है मगर ध्यानचंद, केडी सिंह बाबू, अशोक कुमार जैसे नाम अनसुने-अंजाने बनकर रह गए हैं. सही मायनों में देखा जाए तो हॉकी आज गली-मोहल्लों तक ही सीमित रह गई है. चंद रोज पहले पुणे हवाई अड्डे पर हॉकी टीम के खिलाड़ियों के साथ जो बर्ताव हुआ और कुछ वक्त पहले ऑस्ट्रेलिया में उन्हें जो जलालत झेलनी पड़ी, क्या उसके बाद भी हॉकी को राष्ट्र खेल कहा जाना चाहिए. ये बात सही है कि देश में क्रिकेट के चाहने वाले आधिक हैं, हॉकी देखना कम ही लोगों को रास आता है पर इस स्थिति का जिम्मेदार कौन है. हॉकी अपने आप ही तो रसातल में नहीं चली गई, जाहिर है राष्ट्रीयखेल को प्रोत्साहित करने की जिम्मेदारी उठाने वालों ने हाथ पर हाथ धरे रहने के सिवा कुछ नहीं किया. यदि हॉकी को यूं मरने के लिए नहीं छोड़ा गया होता तो संभवत: आज यह इतनी दयनीय स्थिति में नहीं होती. राष्ट्रपिता, राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीयखेल के साथ हमारे देश में जो कुछ हो रहा है उसे देखकर तो यही लगता है कि अगर इनके आगे राष्ट्रीय नहीं लगा होता तो शायद ये यादा सम्मान पा रहे होते.

Sunday, August 2, 2009

हाशमी साहब मकान के लिए मुस्लिम कार्ड क्यों खेला

नीरज नैयर
बॉलीवुड स्टार इमरान हाशमी आजकल सुर्खियों में हैं, वैसे तो अपनी सीरियल किसर की छवि के चलते वो हमेशा ही छाए रहते हैं लेकिन इस बार मामला थोड़ा पेचीदा है. जनाब आशियाना ढूंढ रहे हैं और जिस घर पर उनका दिल अटक गया है वो उन्हें मिल नहीं रहा. ऐसा तो अक्सर आम लोगों के साथ भी होता रहता पर इमरान का आरोप है कि चूंकि वो मुस्लिम हैं, इसलिए उन्हें वो घर नहीं दिया जा रहा है. हाशमी साहब राय के अल्पसंख्यक आयोग में भी शिकायत कर चुके हैं और उन्होंने सोसाइटी के पदाधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है.

हालांकि उनका ये आरोप शायद ही किसी के गले उतरे, इतना बड़ा स्टार, जिसे लाखों लोग पहचानते हों, उसके साथ फोटो खिंचवाना चाहते हों, हाथ मिलाना चाहते हों वो अगर किसी सोसाइटी में रहने की इच्छा जताता है तो ये मुश्किल ही है कोई इस पर आपत्ति करे. और गर कोई आपत्ति करता भी है तो इसके पीछे घर लेने वाले की व्यक्तिगत छवि उसका चालचलन आदि जैसी सामान्य वजह हो सकती हैं. अमूमन अच्छी सोसाइटी में किसी को घर देने से पहले ये सब देखा जाता है. और वैसे भी घर देना न देना सोसाइटी का अपना निजी फैसला है, अगर उन्हें नहीं लगता कि किसी बड़े स्टार का यहां रहना उनके लिए सुविधाजनक होगा तो उन्हें मना करने का पूरा अधिकार है. जिस तरह की भाषा इमरान हाशमी बोल रहे हैं वह अल्पसंख्यक समुदाय के आम लोगों के मुंह से अक्सर सुनते रहते हैं लेकिन बॉलीवुड अभिनेता के मुंह ये सब सुनना थोड़ा अजीब लगता है.
इमरान की तरह कुछ और स्टार भी हैं जो इस तरह के आरोप लगाते रहे हैं, सैफ अली खान ने भी कुछ वक्त पहले कहा था कि मुस्लिम होने की वजह से घर नहीं मिलता, इसीलिए किसी दिक्कत से बचने के लिए मैं सीधा एक मुस्लिम बिल्डर के पास चला गया. सैफ ये भी मानते हैं कि मुंबई में सांप्रदायिक अलगाव एक हकीकत है, और यह समस्या सिर्फ बिल्डिंग सोसायटीज तक ही सीमित नहीं है बल्कि यहां के पूरे समाज में है. यह सभी को पता है कि मुंबई के जुहू और बांद्रा के इलाकों में जमीन और मकान मुसलमानों को नहीं बेचे जाते. मुझे देखकर आश्चर्य होता है कि कुछ लोगों के लिए धर्म कितना मायने रखता है और धर्म को लेकर लोग कितने कट्टर हैं. सच्चाई यह है कि एक गंदी मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है और यही बात इस्लाम पर लागू होती है. सिने अदाकारा एवं समाज सेविका शबाना आजमी ने भी ऐसे ही आरोप लगाए थे, इसके अलावा कई अन्य स्टार भी हैं जो खुद को मुस्लिम होने की वजह से प्रताड़ित महसूस करते हैं. ये बात सही है कि मुंबई के अंधेरी और बांद्रा इलाकों में मुस्लिम कलाकारों को घर खरीदने में हमेशा से दिक्कतें आती रही हैं, कहा जाता है कि सोफी चौधरी को तो मकान खोजने में दो साल लग गए थे, इस दौरान कई बार ऐसा हुआ था कि डील तकरीबन फाइनल हो चुकी थी लेकिन डीलर को जैसे ही पता चला कि सोफी मुस्लिम हैं डील कैंसल हो गई. अरबाज अली खान को बांद्रा के पेरी क्रॉस रोड पर मकान देने से मना कर दिया गया था, इसी तरह से जीनत अमान को जुहू में मकान खरीदने के लिए तकरीबन तीन महीने तक जूझना पड़ा. लेकिन ये भी सही है कि शाहरुख, सलमान जैसे अल्पसंख्य समुदाय से जुड़े कई स्टार बड़े आराम से बिना किसी दिक्कत के साथ मुंबई में रह रहे हैं.

बात थोड़ी चुबने वाली जरूर है पर सच है कि मुस्लिम समुदाय खुद को अपने से अलग समझने की मानसिकता से ग्रस्त है. अगर उनके साथ कुछ गलत होता भी है तो उन्हें यही लगता है कि जाति-धर्म के आधार पर उनके साथ ऐसा हो रहा है, जबकि ऐसा नहीं है. जहां तक घर देने या न देने की बात है तो इस परेशानी से सबको एक न एक दिन दो चार होना पड़ता है, मैं यहां अपनी ही आपबीती का जिक्र करना चाहता हूं, भोपाल जब मैं नौकरी के सिलसिले में गया तो एक अदद कमरा ढूंढने में ही दिन में तारे नजर आ गए. अकेले लड़के को घर देने से यादातर ने साफ मना कर दिया. एक-दो जगह बात बनी भी तो मेरा प्रोफेशन आड़े आ गया. पत्रकारिता से ताल्लुक होने के चलते सबकुछ तय होने के बाद भी गोल-मटोल जवाब देकर चलता कर दिया गया. एक महाश्य से जब मैने फोन पर उनके फ्लैट के संबंध में बात की तो उन्होंने किराया वगैराह सब बता दिया पर जैसे ही उन्हें पता चला कि मैं पत्रकार हूं तो घर की कटी बिजली, टूट-फूट की दुहाई देकर कुछ महीने बाद के लिए मामला लटका दिया. बहरहाल किसी न किसी तरह बाद में घर मिल ही गया, पर सोचने वाली बात है कि मैं मुसलमान तो नहीं था फिर मेरे साथ भी ऐसा क्यों हुआ. जायज सी बात है ये एक आम समस्या है, सबकुछ मकान मालिक पर निर्भर करता है, यदि उसे लगता है कि फिल्म स्टार, पत्रकार आदि के साथ वो तालमेल बिठा लेगा तो कोई दिक्कत नहीं, यहां मुस्लिम होने या ना होने की बात कहां से आ गई. हाशमी साहब और उनके जैसे कलाकारों से मेरा यही निवेदन है कि हर इक बात को जाति-धर्म के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए. और भी लोग हैं, जिन्हें परेशानी होती है पर वो तो कभी इस आधार पर रोना नहीं रोया करते.

Tuesday, July 28, 2009

सिर्फ मुस्लिमों के साथ ही नहीं होती zयादती

नीरज नैयर
बटला हाउस मुठभेड़ का सच सामने आने के बाद भी इस पर उंगली उठाने वालों की आवाज मंद नहीं पड़ी है, उन्हें लगता है कि सरकार और उसका सिस्टम हकीकत पर पर्दा डालने की कोशिश में लगा है. पुलिस मुठभेड़ पर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं और शायद आगे भी उठते रहेंगे क्योंकि उत्तराखंड फर्जी एनकाउंटर जैसी वारदातें उसकी व्यवस्था का अंग बन गई हैं. ऐसे मामलों की लंबी-चौड़ी फेहरिस्त है जिसमें पुलिसवालों ने पदोन्नती या आर्थिक स्वार्थों की पूर्ती के लिए बेगुनाह लोगों को अपराधी बताकर मौत की नींद सुला दिया. मगर इसका मतलब ये कतई नहीं निकाला जाना चाहिए उसकी हर कार्रवाई झूठ पर आधारित होती है. हमारे देश में खासकर मुस्लिम समुदाय को हमेशा से ही शिकायत रही है कि पुलिस उनका उत्पीड़न कर रही है, उसके लोगों को बेवजह आतंकवादी साबित करने में लगी है.

बटला हाउस मुठभेड़ पर हुए बवाल का कारण भी सिर्फ यही है कि वहां मारे गये आतंकी समुदाय विशेष से जुड़े थे, अगर मुठभेड़ में कोई किशोर, घनश्याम या सुधीर नाम वाले लोग मारे जाते तो शायद जांच के बाद भी जांच की मांग नहीं होती. भले ही देश में हिंदुओं की तादाद यादा है मगर मुस्लिम भी कम नहीं. राजनीति से लेकर हर बड़े तबके में उनक प्रतिनिधित्व करने वाले भरे पड़े हैं. इस देश का राष्ट्रपति एक मुस्लिम रह चुका है, उपराष्ट्रपति भी एक मुस्लिम ही हैं. फिर न जाने क्यों ये समुदाय वक्त दर वक्त नाइंसाफी और भेदभाव जैसे शब्द उछालता रहता है, अगर मुस्लिमों के साथ हिंदुस्तान में सौतेला व्यवहार किया जाता तो क्या मुल्क के सर्वोच्च पद पर किसी मुस्लिम का पहुंचना संभव था. भेदभाव-नाइंसाफी और बेफिजुल प्रताडित करने जैसे आरोप सरासर गलत हैं सच तो ये है कि इस समुदाय ने अपने आप को दूसरों के अलग रखने की मानसिकता धारण कर रखी है और वह उससे बाहर निकलना नहीं चाहता. इसलिए उसे अपने कौम वाले के देश विरोधी गतिविधियों में संलिप्त होने के पीछे भी षड़यंत्र दिखाई पड़ता है, उसे लगता है कि उन्हेंबदनाम करने के लिए साजिश रची जा रही है. उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में रहने वाले मुस्लिम तो अपने को सर्वाधिक प्रताड़ित बताते हैं, उन्हें लगता है कि अल्पसंख्यक होने की वजह से ही पुलिस की आतंकवाद से जुड़ी हर कार्रवाई यहीं से शुरू होती है. पर वो भूल जाते हैं कि आजमगढ़ का आतंकवादियों से रिश्ता नया नहीं है, यहां का सरायमीर हमेशा चर्चा में रहा हैं. हाजी मस्तान ने अपनी दो बेटियों की शादी यहां की. दाऊद इब्राहीम के भाई की ससुराल यहीं है और मुबंई के जेल में बंद अबू सलेम का पैतृक गांव भी सरायमीर है. प्रतिबंधित इस्लामी छात्र संगठन सिमी के संस्थापक अध्यक्ष शाहिद बद्र इसी आजमगढ़ जिले के रहने वाले हैं. जामियानगर में पुलिस की मुठभेड़ में मारे गए दोनों संदिग्ध मुस्लिम चरमपंथी सरायमीर के पास ही संजरपुर गांव के रहने वाले थे.

इस मुठभेड़ के बाद पकड़े गए कई और संदिग्ध चरमपंथी भी यहीं आसपास से ताल्लुक रहते हैं. अहमदाबाद और जयपुर बम धमाकों के मास्टर माइंड होने के आरोप में पिछले साल गिरफ्तार मुफ्ती अबुल बशर सरायमीर के करीब बीनापार का रहने वाला है. आजमगढ़ की कुल आबादी 32 लाख के करीब है जिसमें मुसलमानों की हिस्सेदारी सबसे यादा है. आजमगढ़ और इसके आस-पास के इलाके सिमी की कार्यस्थली और शरणस्थली रहे हैं, इस प्रतिबंधित संगठन के कार्यकर्ताओं को पनाह देने वालों की आज भी यहां कोई कमी नहीं है. आजमगढ़ को आतंकवाद की नर्सरी माना जाने लगा है, ऐसे में अगर पुलिस का शक और कार्रवाई यहीं पर केंद्रित होती है तो उसमें गलत क्या है. आमतौर पर भी हम उसी को शक के घेरे में लेकर आते हैं जिसका पिछला रिकॉर्ड सही नहीं रहा, मसलन अगर कोई बच्चा दो बार हमारे घर का शीशा तोड़ चुका है तो तीसरी बार भी हमारा शक उसी पर जाएगा फिर चाहे वह निर्दोष ही क्यों न हो. बटला हाउस मुठभेड़ की जांच में मानवाधिकार आयोग ने यह साफ कर दिया है कि फायरिंग की शुरूआत कमरे के भीतर से हुई और पुलिस दल को आत्मरक्षा में गोलियां चलानी पड़ीं. बटला हाउस के उस कमरे में आतंकी थे या नहीं, और मारे गए लोगों का दिल्ली में हुए बम विस्फोटों में कोई हाथ था या नहीं, इन सवालों पर आयोग ने कोई टिप्पणी नहीं की, उसने अपनी जांच का दायरा सिर्फ यहीं तक सीमित रखा कि पुलिस ने सीधे दरवाजा खुलवाकर बेकसूर लोगों को मार डाला या दोनों तरफ की गोलीबारी में दो युवक मारे गए. इस मुठभेड में दिल्ली पुलिस के इंस्पैक्टर शर्मा भी शहीद हुए थे. जिन लोगों को आयोग की जांच और उसकी विश्वसनीयता पर संदेह हैं उन्हें याद दिलाने की जरूरत है कि वो मानवाधिकार आयोग ही था जिसने गुजरात दंगों की रिपोर्ट में अल्पसंख्यकों के साथ हुई यादतियों को सामने रखा था.

अगर तब उन्हें आयोग, उसकी जांच सही लग रहे थे तो अब वो आयोग पर उंगली कैसे उठा सकते हैं. इसका मतलब तो यही हुआ कि यदि जांच उनकी सोच से इतर है तो उन्हें उसमें खामिया हीं नजर आएंगी. उत्पीड़न जैसे शब्द पुलिस के शब्दकोष में जरूर हैं मगर उनका इस्तेमाल किसी जाति-धर्म विशेष के आधार पर नहीं किया जाता, अमूमन हर समुदाय के लोग कभी न कभी पुलिस की यादतियों से दो-चार होते रहते हैं, देहरादून में फर्जी में मुठभेड़ में मारा गया युवक रणवीर शायद इसका जीता-जागता सुबूत है.