Thursday, September 3, 2009
यहां से कितना आगे जाएगी फुटबॉल
हमारी फुटबॉल टीम ने अपने से कहीं गुना ताकतवर सीरिया को हराकर लगातार दूसरी बार नेहरू कप अपने नाम कर लिया, यह अपने आप में बहुत ही महत्वपूर्ण उपलब्धि है लेकिन इससे भी यादा महत्वपूर्ण है इस मैच को देखने उमड़ी भीड़. गौर करने वाली बात ये है कि लोगों का हुजूम पश्चिम बंगाल के किसी स्टेडियम में नहीं बल्कि दिल्ली के
आंबेडकर स्टेडियम में देखने को मिला. बंगाल में तो फुटबॉल के प्रति लोगों की दीवानगी जगजाहिर है, मगर दिल्ली में ऐसा नजारा देखना थोड़ा आर्श्च्रयजनक प्रतीत होता है.
स्टेडियम के भीतर-बाहर जमा भीड़ के कारण लोगों को अव्यवस्था की शिकायत करने का मौका भी मिला, अमूमन इस तरह की शिकायतें किसी क्रिकेट मैच के दौरान ही सुनने में आती हैं. पूरे मैच के दौरान दर्शक जिस तरह से भारतीय टीम की हौसला अफजाई कर रहे थे उसे देखकर कतई नहीं लग रहा था कि हमारे देश में फुटबॉल को दोयम दर्जे का खेल समझा जाता है. दोयम दर्जे का इसलिए कह सकते हैं क्योंकि इतने सालों बाद भी यह खेल घर की चारदीवारी से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर पूरी तरह अपनी पहचान बनाने में कामयाब नहीं हो पाया है. फुटबॉल के हमारे देश में यूं अलग-थलग पड़े रहने के कई कारण हैं, जिनपर न तो कभी गौर किया गया और न ही कभी गौर करने की जरूरत समझी गई. यूं तो मौजूदा वक्त में कई क्लब मौजूद हैं जो फुटबॉल को जिंदा रखे हुए हैं लेकिन शायद ही लोगों ने जेसीटी फगवाड़ा और मोहन बगान के अलावा किसी तीसरे क्लब का नाम सुना हो.
कम ही लोग इस बात का जानते होंगे कि भारतीय टीम 1950 के वर्ल्ड कप के फाइनल में जगह बनाने में कामयाब हुई थी, 1951 एवं 1961 के एशियन खेलों में उसे गोल्ड मैडिल हासिल हुआ था, 1956 के मेलर्बोन ओलंपिक में वह चौथे स्थान पर रही, और 2007 में नेहरु कप पर कब्जे के बाद 2008 में उसने तजाकिस्तान को 4-1 से हराकर एफसी चैलेंज कप अपने नाम किया. पश्चिम बंगाल को छोड़ दिया जाए तो बमुश्किल एक-दो लोग ही ऐसे होंगे जो फुटबॉल टीम के खिलाड़ियों से परिचित हों. अकेले भाई चुंग भूटिया ही ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्हें यादातर लोग जानते हैं. पिछले दिनों एक टीवी कार्यक्रम में शिरकत करने से उनकी लोकप्रियता का ग्राफ जरूर थोड़ा बहुत बड़ा होगा. लेकिन इसको लेकर उन्हें क्लब के पदाधिकारियों की नाराजगी का भी सामना करना पड़ा. ये बात अलग है कि भाईचुंग ने दबने के बजाए खुलकर अपनी बात रखी और वह उल्टा दबाव बनाने में कामयाब भी रहे, मगर यह घटनाक्रम क्रिकेट और फुटबॉल के बीच के अंतर को बयां करने के लिए काफी है. क्रिकेटर प्रेक्टिस सेशन बीच में छोड़कर विज्ञापनों की शूटिंग में व्यस्त रहते हैं तो भी उनके खिलाफ कुछ नहीं किया जाता, शायद बोर्ड खुद भी खाओ और हमें भी खाने दो की पॉलिसी पर यकीन करता है. कायदे में तो किसी एक खेल की दूसरे के साथ तुलना कतई उचित नहीं है और ऐसा होना भी नहीं चाहिए लेकिन जिस तरह से क्रिकेट के बरगद तले बाकी खेलों की आहूति दी जा रही है उससे तुलनात्मक विश्लेषण की परंपरा का जन्म हुआ है.
क्रिकेट को लेकर हमारे देश में यह तर्क दिया जाता है कि ये खेल लोगों को सर्वाधिक पसंद है और वो इसके अलावा कुछ और देखना ही नहीं चाहते, अगर इस तर्क में तनिक भी सच्चाई होती तो अंबेडकर मैदान पर लोगों की हुजूम न उमड़ता. हकीकत ये है कि काफी हद तक लोग क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों का भी आनंद उठाना चाहते हैं लेकिन प्रोत्साहन की कमी से उन्हें क्रिकेट तक ही सीमित रहना पड़ता है. क्रिकेट के स्वरूप को बदलने और उसे अत्याधिक रोमांचित बनाने के लिए नित नए प्रयोग किए जाते हैं. इंडियान प्रीमियर लीग यानी आईपीएल बीसीसीआई का सफलतम प्रयोग है, हालांकि जी टीवी के मालिक सुभाष चंद्रा को इसका जन्मदाता कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा. सबसे पहले सुभाष चंद्रा ने ही भारत के कैरीपैकर बनते हुए आईसीएल का ऐलान किया था लेकिन बीसीसीआई के पैंतरों के आगे उनकी यह पहल सफल नहीं हो पाई और ललित मोदी ने आईसीएल की तर्ज पर आईपीएल खड़ा कर डाला जो आज कॉर्पोरेट घरानों और खुद बोर्ड के लिए कमाई का सबसे बड़ा जरिया बन गया है. खिलाड़ी भी इसमें करोड़ों-अरबों के वारे-न्यारे कर रहे हैं.
बीसीसीआई के कहने पर ही दूसरे देशों के क्रिकेट बोर्ड ने आईसीएल को मान्यता नहीं दी और वह खडे होनेसे पहले ही लड़खड़ा गया. लेकिन इस तरह का प्रोत्साहन और प्रतिद्वंद्वता का नजारा फुटबॉल में राष्ट्रीय स्तर पर कभी देखने को नहीं मिला. क्रिकेटर जहां अलग-अलग रायों में विभाजित होने के बाद भी राष्ट्रीय स्तर पर एक टीम की तरह दिखाई पड़ते हैं, ऐसा फुटबॉल टीम को देखकर कतई प्रतीत नहीं होता. मौजूदा दौर में तो ऐसा लगता है जैसे फुटबॉल महज अलग-अलग क्लब का ही खेल बनकर रह गया है. जिसके प्रोत्साहन और सुधार का जिम्मा सिर्फ उन क्लबों पर ही है. अगर फुटबॉल फेडरेशन या खेल मंत्रालय इस खेल को राष्ट्रीय स्तरीय खेल की तरह लेते तो शायद इसको ऊपर उठाने के लिए कुछ न कुछ प्रयास जरूर किए जाते.
Thursday, August 13, 2009
महात्मा गांधी, हिंदी और हॉकी में समानता
महात्मा गांधी, हिंदी और हॉकी में एक समानता है, वो ये कि तीनों को ही राष्ट्रीयता से जोड़ा गया है, जैसे महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता का दर्जा दिया गया है, हिंदी को राष्ट्रभाषा और हॉकी को राष्ट्रीय खेल का. पर गौर करने वाली बात ये है कि बावजूद इसके तीनों को वो सम्मान अब तक नहीं मिल पाया है जिसके वो हकदार हैं.
महात्मा गांधी ने मुल्क को आजादी दिलाने के लिए क्या कुछ नहीं किया, दोहराने की शायद जरूरत नहीं. उन्हें एक ऐसे योध्दा के रूप में जाना जाता है जिसने शस्त्र उठाए बिना ही दुश्मन को मैदान छोड़ने पर मजबूर कर दिया. उनके अहिंसक प्रयासों को भारत ही नहीं वरन पूरे विश्व में सराहा जाता है. हालांकि ये बात सही है कि उनके विचारों और सिध्दाताें से कुछ लोग हमेशा असहमत रहे मगर बापू के समर्थन में खड़े होने वाली हजारों की भीड़ ने कभी उन्हें तवाो नहीं दी. पर आज उनके लिए मन में श्रध्दा का भाव रखने वालों को उंगलियों पर गिना जा सकता है. सरकार को भी उनकी याद महज दो अक्टूबर को ही आती है. इसी दिन पार्कों, चौराहों पर धूंल फांक रहीं बापू की प्रतिमाओं को नहलाया-धुलाया जाता है, माल्यार्पण किया जाता है और फिर साल भर के लिए ऐसे ही छोड़ दिया जाता है. देश के राजनीतिज्ञ महात्मा गांधी को नाटकबाज कहकर संबोधित करते हैं. क्या यह आचरण किसी महापुरुष को दिए गये सम्मान का परिचायक है. यदि महात्मा गांधी के नाम के आगे राष्ट्रपिता नहीं जुडा होता तो ऐसे वक्तव्य और उदासीनता फिर भी एकबारगी ना चाहते हुए भी हजम की जा सकती थी. क्योंकि हमारे देश में महापुरुषों के साथ ऐसा ही सलूक किया जाता है. मगर जहां राष्ट्रीयता की बात आती है वहां वाजिब सम्मान तो दिया ही जाना चाहिए.
ऐसा ही हाल हिंदी का भी है, उसे हमारी राष्ट्रभाषा कहा जाता है. कहा जाता है इसलिए कह सकते हैं क्योंकि राष्ट्रीय दर्जे जैसी कोई बात यहां दिखाई नहीं देती. ऐसे मुल्क में जहां हिंदी भाषियों की तादाद सबसे यादा है, वहां अंग्रेजी को सर्वोच्च स्थान पर बैठाया जाता है. आम बोलचाल में भी हिंदी अब पिछड़ती जा रही है. सबसे ताुब की बात को ये है कि जिस सरकार पर हिंदी को मजबूत करने का जिम्मा है वो ही इसे कमजोर बनाने में जुटी है. सरकारी स्तर पर हिंदी को प्रोत्साहित किए जाने वाले कागजी प्रयास भी अब बंद से हो गये हैं. सरकारी कार्यालयों में हिंदी में हर कार्य संभव, हर संभव कार्य हिंदी में जैसी तख्तियां लगाकर फर्ज की इतिश्री कर ली गई है. आलम ये हो चला है कि देश की संसद में भी हिंदी की पूछपरख नहीं है. बहुसंख्य हिंदी आबादी का प्रतिनिधित्वकरने वाले प्रतिनिधि भी राष्ट्रभाषा के इस्तेमाल को तौहीन समझते हैं. अभी कुछ ही रोज पहले जब सदन में चर्चा के दौरान केंद्रीय पर्यावरणमंत्री जयराम रमेश को समाजवादी प्रमुख मुलायम सिंह ने यह याद दिलाया कि वो लंदन की नहीं भारत की संसद में बोल रहे हैं तो उन्होंने अंग्रेजी के बजाए हिंदी में बोलना बेहतर समझा मगर जब बात मेनका गांधी पर आई तो उन्होंने दो टूक शब्दों में हिंदी में बोलने से इंकार कर दिया. अंग्रेजी मौजूदा दौर की जरूरत है इस सच्चाई से मुंह नहीं फेरा जा सकता, पर जहां इसके बिना भी काम चल सकता है वहां तो कम से कम राष्ट्रभाषा के प्रयोग में शर्म महसूस नहीं होनी चाहिए. कुछ एक रायों को छोड़कर बाकी सब जगह के लोग हिंदी समझ-बोल लेते हैं उसके बाद भी संसद में पहुंचने वाले हमारे अधिकतर सांसद अंग्रेजी का मोह नहीं त्याग पाते. इसी वजह से हिंदी भाषी सांसदों के बारे में कहा जाता है कि उन्हें तो हिंदी की बीमारी है. अगर हिंदी को देश में बीमारी के रूप में देखा जाता है तो फिर इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा देने का क्या मतलब, इससे अच्छा तो यही होता कि हिंदी को भी क्षेत्रीय भाषाओं की श्रेणी में रखा जाता. तब शायद इसके तिरस्कार पर यूं मन भारी नहीं होता.
राष्ट्रीयता की तीसरी कड़ी यानी राष्ट्रीयखेल हॉकी भी कुछ अच्छी स्थिति में नहीं है. इसे भी राष्ट्र से जुड़ने की कीमत चुकानी पड़ रही है. इस खेल और इससे जुड़े खिलाड़ियों के साथ हमेशा से ही भेदभाव किया जाता है. उन्हें ना तो राष्ट्रखेल से जुड़ा होने जैसा सम्मान मिल पाता है और ना ही उतनी शौहरत जितनी क्रिकेट में शुरूआती स्तर पर ही मिल जाती है. हॉकी का आज कोई माई-बाप नहीं है. ग्वास्कर, ब्रैडमैन, कपिल देव का नाम अब भी बच्चा-बच्चा बखूबी जानता है मगर ध्यानचंद, केडी सिंह बाबू, अशोक कुमार जैसे नाम अनसुने-अंजाने बनकर रह गए हैं. सही मायनों में देखा जाए तो हॉकी आज गली-मोहल्लों तक ही सीमित रह गई है. चंद रोज पहले पुणे हवाई अड्डे पर हॉकी टीम के खिलाड़ियों के साथ जो बर्ताव हुआ और कुछ वक्त पहले ऑस्ट्रेलिया में उन्हें जो जलालत झेलनी पड़ी, क्या उसके बाद भी हॉकी को राष्ट्र खेल कहा जाना चाहिए. ये बात सही है कि देश में क्रिकेट के चाहने वाले आधिक हैं, हॉकी देखना कम ही लोगों को रास आता है पर इस स्थिति का जिम्मेदार कौन है. हॉकी अपने आप ही तो रसातल में नहीं चली गई, जाहिर है राष्ट्रीयखेल को प्रोत्साहित करने की जिम्मेदारी उठाने वालों ने हाथ पर हाथ धरे रहने के सिवा कुछ नहीं किया. यदि हॉकी को यूं मरने के लिए नहीं छोड़ा गया होता तो संभवत: आज यह इतनी दयनीय स्थिति में नहीं होती. राष्ट्रपिता, राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीयखेल के साथ हमारे देश में जो कुछ हो रहा है उसे देखकर तो यही लगता है कि अगर इनके आगे राष्ट्रीय नहीं लगा होता तो शायद ये यादा सम्मान पा रहे होते.
Sunday, August 2, 2009
हाशमी साहब मकान के लिए मुस्लिम कार्ड क्यों खेला
बॉलीवुड स्टार इमरान हाशमी आजकल सुर्खियों में हैं, वैसे तो अपनी सीरियल किसर की छवि के चलते वो हमेशा ही छाए रहते हैं लेकिन इस बार मामला थोड़ा पेचीदा है. जनाब आशियाना ढूंढ रहे हैं और जिस घर पर उनका दिल अटक गया है वो उन्हें मिल नहीं रहा. ऐसा तो अक्सर आम लोगों के साथ भी होता रहता पर इमरान का आरोप है कि चूंकि वो मुस्लिम हैं, इसलिए उन्हें वो घर नहीं दिया जा रहा है. हाशमी साहब राय के अल्पसंख्यक आयोग में भी शिकायत कर चुके हैं और उन्होंने सोसाइटी के पदाधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है.
हालांकि उनका ये आरोप शायद ही किसी के गले उतरे, इतना बड़ा स्टार, जिसे लाखों लोग पहचानते हों, उसके साथ फोटो खिंचवाना चाहते हों, हाथ मिलाना चाहते हों वो अगर किसी सोसाइटी में रहने की इच्छा जताता है तो ये मुश्किल ही है कोई इस पर आपत्ति करे. और गर कोई आपत्ति करता भी है तो इसके पीछे घर लेने वाले की व्यक्तिगत छवि उसका चालचलन आदि जैसी सामान्य वजह हो सकती हैं. अमूमन अच्छी सोसाइटी में किसी को घर देने से पहले ये सब देखा जाता है. और वैसे भी घर देना न देना सोसाइटी का अपना निजी फैसला है, अगर उन्हें नहीं लगता कि किसी बड़े स्टार का यहां रहना उनके लिए सुविधाजनक होगा तो उन्हें मना करने का पूरा अधिकार है. जिस तरह की भाषा इमरान हाशमी बोल रहे हैं वह अल्पसंख्यक समुदाय के आम लोगों के मुंह से अक्सर सुनते रहते हैं लेकिन बॉलीवुड अभिनेता के मुंह ये सब सुनना थोड़ा अजीब लगता है.
इमरान की तरह कुछ और स्टार भी हैं जो इस तरह के आरोप लगाते रहे हैं, सैफ अली खान ने भी कुछ वक्त पहले कहा था कि मुस्लिम होने की वजह से घर नहीं मिलता, इसीलिए किसी दिक्कत से बचने के लिए मैं सीधा एक मुस्लिम बिल्डर के पास चला गया. सैफ ये भी मानते हैं कि मुंबई में सांप्रदायिक अलगाव एक हकीकत है, और यह समस्या सिर्फ बिल्डिंग सोसायटीज तक ही सीमित नहीं है बल्कि यहां के पूरे समाज में है. यह सभी को पता है कि मुंबई के जुहू और बांद्रा के इलाकों में जमीन और मकान मुसलमानों को नहीं बेचे जाते. मुझे देखकर आश्चर्य होता है कि कुछ लोगों के लिए धर्म कितना मायने रखता है और धर्म को लेकर लोग कितने कट्टर हैं. सच्चाई यह है कि एक गंदी मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है और यही बात इस्लाम पर लागू होती है. सिने अदाकारा एवं समाज सेविका शबाना आजमी ने भी ऐसे ही आरोप लगाए थे, इसके अलावा कई अन्य स्टार भी हैं जो खुद को मुस्लिम होने की वजह से प्रताड़ित महसूस करते हैं. ये बात सही है कि मुंबई के अंधेरी और बांद्रा इलाकों में मुस्लिम कलाकारों को घर खरीदने में हमेशा से दिक्कतें आती रही हैं, कहा जाता है कि सोफी चौधरी को तो मकान खोजने में दो साल लग गए थे, इस दौरान कई बार ऐसा हुआ था कि डील तकरीबन फाइनल हो चुकी थी लेकिन डीलर को जैसे ही पता चला कि सोफी मुस्लिम हैं डील कैंसल हो गई. अरबाज अली खान को बांद्रा के पेरी क्रॉस रोड पर मकान देने से मना कर दिया गया था, इसी तरह से जीनत अमान को जुहू में मकान खरीदने के लिए तकरीबन तीन महीने तक जूझना पड़ा. लेकिन ये भी सही है कि शाहरुख, सलमान जैसे अल्पसंख्य समुदाय से जुड़े कई स्टार बड़े आराम से बिना किसी दिक्कत के साथ मुंबई में रह रहे हैं.
बात थोड़ी चुबने वाली जरूर है पर सच है कि मुस्लिम समुदाय खुद को अपने से अलग समझने की मानसिकता से ग्रस्त है. अगर उनके साथ कुछ गलत होता भी है तो उन्हें यही लगता है कि जाति-धर्म के आधार पर उनके साथ ऐसा हो रहा है, जबकि ऐसा नहीं है. जहां तक घर देने या न देने की बात है तो इस परेशानी से सबको एक न एक दिन दो चार होना पड़ता है, मैं यहां अपनी ही आपबीती का जिक्र करना चाहता हूं, भोपाल जब मैं नौकरी के सिलसिले में गया तो एक अदद कमरा ढूंढने में ही दिन में तारे नजर आ गए. अकेले लड़के को घर देने से यादातर ने साफ मना कर दिया. एक-दो जगह बात बनी भी तो मेरा प्रोफेशन आड़े आ गया. पत्रकारिता से ताल्लुक होने के चलते सबकुछ तय होने के बाद भी गोल-मटोल जवाब देकर चलता कर दिया गया. एक महाश्य से जब मैने फोन पर उनके फ्लैट के संबंध में बात की तो उन्होंने किराया वगैराह सब बता दिया पर जैसे ही उन्हें पता चला कि मैं पत्रकार हूं तो घर की कटी बिजली, टूट-फूट की दुहाई देकर कुछ महीने बाद के लिए मामला लटका दिया. बहरहाल किसी न किसी तरह बाद में घर मिल ही गया, पर सोचने वाली बात है कि मैं मुसलमान तो नहीं था फिर मेरे साथ भी ऐसा क्यों हुआ. जायज सी बात है ये एक आम समस्या है, सबकुछ मकान मालिक पर निर्भर करता है, यदि उसे लगता है कि फिल्म स्टार, पत्रकार आदि के साथ वो तालमेल बिठा लेगा तो कोई दिक्कत नहीं, यहां मुस्लिम होने या ना होने की बात कहां से आ गई. हाशमी साहब और उनके जैसे कलाकारों से मेरा यही निवेदन है कि हर इक बात को जाति-धर्म के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए. और भी लोग हैं, जिन्हें परेशानी होती है पर वो तो कभी इस आधार पर रोना नहीं रोया करते.
Tuesday, July 28, 2009
सिर्फ मुस्लिमों के साथ ही नहीं होती zयादती
बटला हाउस मुठभेड़ का सच सामने आने के बाद भी इस पर उंगली उठाने वालों की आवाज मंद नहीं पड़ी है, उन्हें लगता है कि सरकार और उसका सिस्टम हकीकत पर पर्दा डालने की कोशिश में लगा है. पुलिस मुठभेड़ पर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं और शायद आगे भी उठते रहेंगे क्योंकि उत्तराखंड फर्जी एनकाउंटर जैसी वारदातें उसकी व्यवस्था का अंग बन गई हैं. ऐसे मामलों की लंबी-चौड़ी फेहरिस्त है जिसमें पुलिसवालों ने पदोन्नती या आर्थिक स्वार्थों की पूर्ती के लिए बेगुनाह लोगों को अपराधी बताकर मौत की नींद सुला दिया. मगर इसका मतलब ये कतई नहीं निकाला जाना चाहिए उसकी हर कार्रवाई झूठ पर आधारित होती है. हमारे देश में खासकर मुस्लिम समुदाय को हमेशा से ही शिकायत रही है कि पुलिस उनका उत्पीड़न कर रही है, उसके लोगों को बेवजह आतंकवादी साबित करने में लगी है.
बटला हाउस मुठभेड़ पर हुए बवाल का कारण भी सिर्फ यही है कि वहां मारे गये आतंकी समुदाय विशेष से जुड़े थे, अगर मुठभेड़ में कोई किशोर, घनश्याम या सुधीर नाम वाले लोग मारे जाते तो शायद जांच के बाद भी जांच की मांग नहीं होती. भले ही देश में हिंदुओं की तादाद यादा है मगर मुस्लिम भी कम नहीं. राजनीति से लेकर हर बड़े तबके में उनक प्रतिनिधित्व करने वाले भरे पड़े हैं. इस देश का राष्ट्रपति एक मुस्लिम रह चुका है, उपराष्ट्रपति भी एक मुस्लिम ही हैं. फिर न जाने क्यों ये समुदाय वक्त दर वक्त नाइंसाफी और भेदभाव जैसे शब्द उछालता रहता है, अगर मुस्लिमों के साथ हिंदुस्तान में सौतेला व्यवहार किया जाता तो क्या मुल्क के सर्वोच्च पद पर किसी मुस्लिम का पहुंचना संभव था. भेदभाव-नाइंसाफी और बेफिजुल प्रताडित करने जैसे आरोप सरासर गलत हैं सच तो ये है कि इस समुदाय ने अपने आप को दूसरों के अलग रखने की मानसिकता धारण कर रखी है और वह उससे बाहर निकलना नहीं चाहता. इसलिए उसे अपने कौम वाले के देश विरोधी गतिविधियों में संलिप्त होने के पीछे भी षड़यंत्र दिखाई पड़ता है, उसे लगता है कि उन्हेंबदनाम करने के लिए साजिश रची जा रही है. उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में रहने वाले मुस्लिम तो अपने को सर्वाधिक प्रताड़ित बताते हैं, उन्हें लगता है कि अल्पसंख्यक होने की वजह से ही पुलिस की आतंकवाद से जुड़ी हर कार्रवाई यहीं से शुरू होती है. पर वो भूल जाते हैं कि आजमगढ़ का आतंकवादियों से रिश्ता नया नहीं है, यहां का सरायमीर हमेशा चर्चा में रहा हैं. हाजी मस्तान ने अपनी दो बेटियों की शादी यहां की. दाऊद इब्राहीम के भाई की ससुराल यहीं है और मुबंई के जेल में बंद अबू सलेम का पैतृक गांव भी सरायमीर है. प्रतिबंधित इस्लामी छात्र संगठन सिमी के संस्थापक अध्यक्ष शाहिद बद्र इसी आजमगढ़ जिले के रहने वाले हैं. जामियानगर में पुलिस की मुठभेड़ में मारे गए दोनों संदिग्ध मुस्लिम चरमपंथी सरायमीर के पास ही संजरपुर गांव के रहने वाले थे.
इस मुठभेड़ के बाद पकड़े गए कई और संदिग्ध चरमपंथी भी यहीं आसपास से ताल्लुक रहते हैं. अहमदाबाद और जयपुर बम धमाकों के मास्टर माइंड होने के आरोप में पिछले साल गिरफ्तार मुफ्ती अबुल बशर सरायमीर के करीब बीनापार का रहने वाला है. आजमगढ़ की कुल आबादी 32 लाख के करीब है जिसमें मुसलमानों की हिस्सेदारी सबसे यादा है. आजमगढ़ और इसके आस-पास के इलाके सिमी की कार्यस्थली और शरणस्थली रहे हैं, इस प्रतिबंधित संगठन के कार्यकर्ताओं को पनाह देने वालों की आज भी यहां कोई कमी नहीं है. आजमगढ़ को आतंकवाद की नर्सरी माना जाने लगा है, ऐसे में अगर पुलिस का शक और कार्रवाई यहीं पर केंद्रित होती है तो उसमें गलत क्या है. आमतौर पर भी हम उसी को शक के घेरे में लेकर आते हैं जिसका पिछला रिकॉर्ड सही नहीं रहा, मसलन अगर कोई बच्चा दो बार हमारे घर का शीशा तोड़ चुका है तो तीसरी बार भी हमारा शक उसी पर जाएगा फिर चाहे वह निर्दोष ही क्यों न हो. बटला हाउस मुठभेड़ की जांच में मानवाधिकार आयोग ने यह साफ कर दिया है कि फायरिंग की शुरूआत कमरे के भीतर से हुई और पुलिस दल को आत्मरक्षा में गोलियां चलानी पड़ीं. बटला हाउस के उस कमरे में आतंकी थे या नहीं, और मारे गए लोगों का दिल्ली में हुए बम विस्फोटों में कोई हाथ था या नहीं, इन सवालों पर आयोग ने कोई टिप्पणी नहीं की, उसने अपनी जांच का दायरा सिर्फ यहीं तक सीमित रखा कि पुलिस ने सीधे दरवाजा खुलवाकर बेकसूर लोगों को मार डाला या दोनों तरफ की गोलीबारी में दो युवक मारे गए. इस मुठभेड में दिल्ली पुलिस के इंस्पैक्टर शर्मा भी शहीद हुए थे. जिन लोगों को आयोग की जांच और उसकी विश्वसनीयता पर संदेह हैं उन्हें याद दिलाने की जरूरत है कि वो मानवाधिकार आयोग ही था जिसने गुजरात दंगों की रिपोर्ट में अल्पसंख्यकों के साथ हुई यादतियों को सामने रखा था.
अगर तब उन्हें आयोग, उसकी जांच सही लग रहे थे तो अब वो आयोग पर उंगली कैसे उठा सकते हैं. इसका मतलब तो यही हुआ कि यदि जांच उनकी सोच से इतर है तो उन्हें उसमें खामिया हीं नजर आएंगी. उत्पीड़न जैसे शब्द पुलिस के शब्दकोष में जरूर हैं मगर उनका इस्तेमाल किसी जाति-धर्म विशेष के आधार पर नहीं किया जाता, अमूमन हर समुदाय के लोग कभी न कभी पुलिस की यादतियों से दो-चार होते रहते हैं, देहरादून में फर्जी में मुठभेड़ में मारा गया युवक रणवीर शायद इसका जीता-जागता सुबूत है.
Sunday, July 26, 2009
जांच पर हंगामा कितना उचित
पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम को सुरक्षा जांच से क्या गुजरना पड़ा पूरे मुल्क में बवाल हो गया, धड़ाधड प्रतिक्रियाएं आनें लगी, अमेरिकी एयरलाइंस को दोषी करार दिया जाने लगा. संसद में तो तो कुछ माननीय सांसदों ने एयरलाइंस का लाइंसेंस रद्द करने और तलाशी लेने वाले अमेरिकी को देश से निकालने तक की मांग कर डाली. जबकि जिसकी तलाशी ली गई यानी कलाम साहब की वो पूरी तरह खामोश हैं, उन्होंने न तो जांच के वक्त वीवीआई होने का कोई रुबाव झाड़ा और न ही अब कुछ बोल रहे हैं. वो इस बात से सहमत हैं कि सुरक्षा से समझैता नहीं किया जाना चाहिए.कांटिनेंटल एयरलाइंस को अमेरिका के होमलैंड सिक्योरिटी डिमार्टमेंट के ट्रांसपोर्ट सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन यानी टीएस की तरफ से स्पष्ट निर्देश दिए गये हैं कि विमान में सवार होने वाले प्रत्येक व्यक्ति की जांच की जाए. उन्होंने अति विशिष्ट, विशिष्ट लोगों के लिए के लिए अलग से कोई दिशा निर्देश नहीं बनाए हैं. ऐसे में जांच करने वाले अधिकारी महज अपनी नौकरी कर रहे थे, उन्हें इस बात से कोई लेना-देना नहीं था कि कलाम साहब किस श्रेणी में आते हैं. रुतबे-रुबाब के आगे नियम-कायदे ताक पर रखने की परंपरा सिर्फ हमारे देश में है, दुबई जैसी खाड़ी मुल्क में भी अति विशिष्ट, विशिष्ट माननीयों को हवाई अड्डे पर सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ता है, बस फर्क सिर्फ इतना होता है कि उन्हें आम लोगों की तरह लाइन में नहीं लगना होता.
उनके लिए अलग से व्यवस्था की जाती है. यह बात सही है कि पूर्व राष्ट्रपति होने के नाते अब्दुल कलाम को जांच से छूट मिली है और उनकी जांच नागरिक उड्डयन ब्यूरों के सर्कुलर का सरासर उल्लघंन है. लेकिन कांटिनेंटल एयरलाइंस जिस मुल्क से ताल्लुक रखती है उसके भी अपने कुछ नियम हैं, कहने वाले बिल्कुल ये कह सकते हैं कि भारत में आने के बाद वह यहां के नियम-कानून मानने के लिए बाध्य है. पर जनाब गौर करने वाली बात ये है कि एयरलाइंस सुरक्षा के अपने मानकों के ऊपर किसी भी देश के नियमों को हावी नहीं होने देती. इतना सब हो जाने के बाद भी कांटिनेंटल की तरफ से हेद जताया गया है, उसने ये कतई नहीं कहा कि फिर ऐसा नहीं होगा, मतलब सुरक्षा सर्वोपरि है. 11 सितंबर 2001 के बाद अमेरिका ने सुरक्षा संबंधि बहुत से कदम उठाए हैं और इसतरह की जांच उसी का एक हिस्सा मात्र हैं, लिहाजा इस पर बेफिजुल का हो-हल्ला करना तर्कहीन ही लगता है. हमारे देश में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, रायपाल, पूर्व राष्ट्रपति, पूर्व उपराष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस, लोकसभा अध्यक्ष समेत 32 श्रेणियों में आने वाले अतिविशिष्ट लोगों को एयरपोर्ट पर सुरक्षा जांच में छूट मिली हुई है. छूट के दायरे में लोकसभा के स्पीकर, केंद्रीय कैबिनेट मंत्री, रायों के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, लोकसभा व रायसभा में विपक्ष के नेता, भारत रत्न से सम्मानित हस्तियां, सुप्रीम कोर्ट के जज, मुख्य निर्वाचन आयुक्चत और धर्मगुरु दलाई लामा भी आते हैं. कुछ वक्त पहले तीनों सेनाओं के प्रमुखों को भी इस श्रेणी में शामिल किया गया था, यानी उन्हें भी सुरक्षा जांच के लिए नहीं रोका जा सकता, सरकार ने ये फैसला उस वक्त लिया था जब प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वॉड्रा थलसेना अध्यक्ष के ऊपर रखने पर हंगामा मचा था. रॉबर्ट किसी संवैधानिक पद पर न होते हुए भी अति विशिष्टजनों को मिलने वाली छूट का लाभ इसलिए उठा रहे हैं क्योंकि वो कांग्रेसाध्यक्ष के दामाद हैं.
वीवीआईपी, वीआईपी तो दूर की बात हैं, हमारे देश में तो थोड़ी सी ऊंचाई पाने वाला हर व्यक्ति अपने आप को राजा समझने लगता है, मसलन प्रेस का तमगा लगने के बाद पत्रकार पुलिस वालों को कुछ नहीं समझते. सामान्य चेकिंग के दौरान अपने आप को रोका जाना उनकी शान में गुस्ताखी करने जैसा होता है. वो अपने आप को आमजन से ऊपर समझते हैं और चाहते हैं कि उनके साथ वैसा ही व्यवहार किया जाए. जो लोग वैश्ो देवी अक्सर जाते रहते हैं उन्होंने गौर किया होगा कि वहां आने वाले आर्मी के जवान सुरक्षा जांच चौकियों पर तैनात पुलिसकर्मियों से अमूमन उलझते रहते हैं, उन्हें यह गंवारा नहीं होता कि कोई पुलिसवाला उनकी तलाशी ले. पुलिसवाले खुद नियम-कायदों की धाियां उड़ाने से पीछे नहीं रहते, उन्हें लगता है कि उनका कोई क्या बिगाड़ सकता है. महज कुछ लोग नहीं बल्कि पूरे मुल्क की मानसिकता ही ऐसी हो गई है कि हम हमेशा अपने आप को निर्धारित नियमों से ऊपर रखना चाहते हैं. अब्दुल कलाम ने जांच में सहयोग करके और बेवजह मामले को तूल न देकर एक उदाहरण पेश किया है, उन्होंने इस संबंध में कोई शिकायत तक नहीं की. वह विदेश यात्रा के दौरान सुरक्षा घेरों का हमेशा पालन करते हैं, दरअसल इस मामले को इतना ऊछालने वाले इस बात को लेकर आशंकित हैं कि कहीं कल उनके साथ ऐसा कुछ हो गया तो सारा रुबाब घरा का घरा रह जाएगा, इसलिए वो चाहते हैं कि अमेरिकी एयरलाइंस को सुरक्षा से समझौता न करने का सबक सिखाए जाए. एयरलाइंस के खिलाफ जांच के आदेश दे दिए गये हैउसे ये सिखाने की पूरी कोशिश की जाएगी कि भारत में वीवीआईपी देश उसकी सुरक्षा और हर लिहाज से सबसे ऊपर होते हैं, इसलिए अगर उसे भारत में काम करना है तो अपनी प्राथमिकताओं की सूची में सुरक्षा को दूसरा स्थान देना होगा क्योंकि पहले स्थान पर सिर्फ और सिर्फ वीवीआईपी ही आ सकते हैं.
Wednesday, July 22, 2009
हिलेरी के दौरे से हमें क्या मिला
भारत की छवि विश्व में किस तरह की है यह ओबामा प्रशासन को बताने की जरूरत नहीं, अनाधिकृत और अनुचित जैसे शब्दों का प्रयोग करते वक्त हिलेरी शायद भूल गई कि वो इस्लामाबाद में नहीं नई दिल्ली में खड़ी हैं. हिलेरी क्लिंटन ने इस मुद्दे पर भारत की सलाह मांगकर उसे और उलझाने की कोशिश की है, विदेशमंत्री एमएम कृष्णा और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के एनपीटी व सीटीबीटी पर राजी न होने पर हिलेरी ने यह पत्ता फेंका. उन्हें पता है कि भारत की तरफ से दी जाने वाली कोई भी सलाह अमेरिकी प्रशासन के दिमाग में चढ़ने वाली नहीं है, और ये बात भारत भी बखूबी जानता है. अमेरिकी विदेश मंत्री के ताजा बयान से यह तय है कि आने वाले दिनों में अमेरिका इस बाबत दबाव बनाएगा कि या तो भारत परमाणु ऊर्जा के दुरुपयोग को रोकने के बारे में कोई सार्थक उपाए सुझाए या फिर उसके कहे रास्ते पर आगे बढ़े. हाल ही में जी-8 देशों के गैरएनपीटी मुल्कों को संवेदनशील तकनीक ईएनआर मुहैया नहीं करवाने के फैसले के पीछे अमेरिका का बहुत बड़ा हाथ है. ओबामा ये कतई नहीं चाहते कि भारत इन संधियों पर हस्ताक्षर किए बिना मिलने वाली छूट कालाभ उठाए. हिलेरी की भारत यात्रा में जिन समझौतों पर बात बनी उसमें रक्षा,परमाणु सहयोग और अंतरिक्ष कार्यक्रम शामिल हैं. एंड यूजर समझौते पर सहमति बनने के बाद अब अमेरिकी कंपनियां संवेदनशील सैन्य साजो सामान और तकनीक भारत को बेच सकेंगी, इस एग्रीमेंट में पहले जो पेंच फंसा था वो इस बात को लेकर था कि अमेरिकी खेमा सालाना निरीक्षण की जिद पर अड़ा था और भारत इसका विरोध कर रहा था. इस समझौत के अमल में आने के बाद अमेरिकी प्रतिरक्षा कंपनियों के लिए करोड़ों के कारोबार के दरवाजे खुल गए हैं. जाहिर है जिस काम में अमेरिका को दोनों हाथों से पैसे बटोरने का मौका मिला उसकी राह में आने वाली बाधाएं वो सबसे पहले हटाएगा. क्या इन चंद समझौतों को कामयाबी या ऐतिहासिक करार दिया जाता है.
जिस परमाणु समझौते की बात की जा रही है उसपर अमेरिका उस पर अमेरिका की तिरछी नजरें हमेशा कायम रहेंगी. परमाणु ऊर्जा सहयोग संधि के दुरुपयोग की बात करके वो कभी अपने हाथ खींच सकता है. रक्षा समझौता उसके फायदे के लिए है, अगर हिलेरी न भी आतीं तो भी उसपर सहमति बन ही जाती. आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान के खिलाफ ठोस रुख अख्तियार करने के बजाए हिलेरी ने गोल-मोल बयान देकर महज हमसे हमदर्दी जताने का ही प्रयास किया. भारत आने से पहले ही वो पाक को आश्वस्त कर आई थीं कि उसे चिंतित होने की जरूरत नहीं है. अमेरिका मौजूदा दौर में भारत के लिए अपने महत्वत्ता को भली-भांति समझता है, उसे पता है कि अगर भारत पर थोड़ा सा दबाव बनाए जाए तो वो उसके बताए मार्ग पर ही चलेगा. पाकिस्तान से वार्ता शुरू करने के मसले को इसके परिणाम के रूप में देखा जा सकता है. रूस में मनमोहन जरदारी मुलाकात भी अमेरिका के कहने पर ही हुई थी और शर्म अल शेख में मनमोहन सिंह और गिलानी का संयुक्त वक्तव्य भी वाशिंगटन की दखल का नतीजा था. जिसे प्रधानमंत्री को देश में बवाल मचने के बाद सुधारना पड़ा. अब भी भारत की तरफ से रह-रहकर पाकिस्तान से दोस्ती जैसे बयानात आते रहते हैं. बराक हुसैन ओबामा ने हिलेरी क्लिंटन को जिस उद्देश्य से भेजा था उसमें वो पूरी तरह सफल हुई हैं, भारत पर दबाव बनाने की दिशा में उन्होंने महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ाया है जिसे साल के अंत तक मनमोहन सिंह के अमेरिकी दौरे में अंतिम चरण में पहुंचा दिया जाएगा. लिहाजा हिलेरी की यात्रा और अमेरिका के साथ हुए समझौतों पर मुस्कुराने के बजाए बेहतर ये होगा कि इस बात आकलन किया जाए कि इस दौरे से हमें क्या हासिल हुआ.
Sunday, July 19, 2009
उन सवालों के जवाब आज भी मिलना बाकी हैं
ऐसे ही अखबार पढ़ते-पढ़ते एक बहुत पुराना किस्सा याद आ गया. जो दर्दनाक तो था ही, अपने पीछे कुछ ऐसे सवालातक भी छोड़ गया था जिनके जवाब मिलना अभी बाकी हैं. बात सर्दियों के दिनों की है, हाड़कंपा देने वाली ठंड में जब कोहरे की चादर शाम से ही छाने लगती थी तो लोग जल्द ही अपने घरों में कैद हो जाया करते थे, उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ, हमारे घर से तीन-चार घर छोड़कर एक परिवार रहा करता था, जिसमें तीन बच्चे भी थे, वो बच्चे कभी-कभीर हमारे साथ क्रिकेट खेलने आ जाया करते थे. हमारे देश में क्रिकेट और शराब दो ही ऐसी चीज हैं जो अंजानों को भी दोस्त बना देती हैं. इस संबंध में तो हरिवंश राय बच्चन ने लिखा भी है कि मंदिर-मस्जिद बैर कराते, मेल कराती मधुशाला.
कुछ दिनों से वो बच्चे न तो हमारे साथ खेलने आए और न ही दिखाई दिए, हमने सोचा कि शायद कहीं बाहर गये होंगे. उनके घर वालों से इतनी अच्छी जान पहचान थी नहीं सो जाकर पता करना मुनासिब नहीं समझा. इन दिनों कई बार उनके घर कुछ हट्टे-कट्टे लोगों को आते और उनके पिताजी को गिड़गिड़ाते देखा, एक-आद बार तो उनके आस-पड़ोसी भी बीच-बचाव करते दिखाई दिए. मामला पूरी तरह तो समझ में नहीं आया लेकिन इतना जरूर पता चल गया कि कुछ गड़बड़ तो जरूर है. कुछ दिन ऐसे ही निकल गये, पढ़ाई को लेकर घरवालों की डांट के चक्कर में क्रिकेट से भी थोड़े दिनों तक नाता तोड़ना पड़ा, उस वक्त हमें लगता था कि ऐसा हमारे साथ ही क्यों होता है, बाद में पता चला कि अमूमन हर बच्चे की यही कहानी है. पढ़ने-लिखने में शुरू से ही कुछ खास मन नहीं लगता था, हां इतना अवश्य पढ़ लिया करते थे कि फेल होने की नौबत न आए. फर्स्ट क्लास या टॉप मारने के सपने हमारे घर वालों ने भले ही देखें हो मगर हमने कभी उस ओर गौर भी नहीं किया. क्रिकेट खेलते-खेलते सुबह जल्दी उठने की आदत लग चुकी थी इसलिए घरवालों ने वो समय पढ़ाई के लिए निर्धारित कर दिया. उनका मानना था कि सुबह-सुबह का याद किया दिमाग से नहीं निकला. कुछ हद तक शायद वो सही भी थे, सुबह-सुबह जितना क्रिकेट खेला वो दिमाग में इस कदर रच-बस गया था कि पढ़ते-पढ़ते भी स्ट्रोक खेलने की प्रैक्टिस कर लिया करते थे. शाम को दोस्तों की चौपाल हुआ करती थी जिसमें सभी अपना-अपना दुखड़ा रोया करते थे, दरअसल सुबह-सुबह क्रिकेट खेलने का जो मजा था वो किसी और वक्त नहीं मिल सकता था, घूप खिलने के बाद रजाईयों में दुबके बैठे लोग पार्क में धूप सेंकने को आ जाया करते थे, जिनमें अधिकतर बुजुर्ग होते थे और उन्हें समझाना अपने आप में एक बहुत बड़ी बात होती है.
गेंद अगर पास से निकल भी जाए तो हंगामा खड़ा कर दिया करते हैं. और घर के बाहर यानी सड़क पर अंटियों का जमघट, स्वेटर बुनते-बुनते दूसरों की बुराई करना और हमें धमकाते रहना कि गेंद इधर आई तो खैर नहीं. इन सब के बीच क्रिकेट खेला भी जाता तो कैसे, हमारे ठीक पड़ोस में एक अम्मी जी रहा करती थीं जिनकी आदतों से उनके घर के बच्चे भी आजिज आ चुके थे, शायद इसीलिए बच्चा पार्टी ने उनका नाम छिपकली रखा था. उन्हें हमारा अपने ही घर में खेलना भी पसंद नहीं था, उनके विरोध को दरकिनार करके अगर हम खेलने की कोशिश भी करते तो उनकी रनिंग कमेंट्री शुरू हो जाया करती थी. हमारी बॉल के दिवार फंलागने का उन्हें बेसर्बी से इंतजार रहता था ताकिबॉल रखकर वो हमारा खेल बंद करवां सकतीं. उन दिनों जैसे-तैसे पैसे मिलाकर बॉल खरीदकर लाया करते थे और अम्मीजी थी उन्हें दबाकर हमें आर्थिक रूप से कंगाल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ती थीं. इतने सालों बाद आज भी वो बिल्कुल वैसी ही तंदरुस्त रखी हैं, उनकी जुबान की धार अब भी कायम है, हां ये बात अलग है कि अब उन्हें इतना चीखने और बॉल हथियाने का मौका नहीं मिलता क्योंकि बच्चे आजकल टीवी या इंटरनेट से ही चिपके रहते हैं. खैर हमारी चौपाल में यह फैसला हुआ कि सब अपने-अपने घरवालों को पढ़ाई का समय थोड़ा खिसकाने को कहेंगे और अगर बात नहीं बनी तो, अपने गुस्से का थोड़ा-थोड़ा इजहार करेंगे. अब पता नहीं हमारे फैसले की खबर घरवालों तक पहुंच गई या उन्हें हमारे हाल पर तरस आ गया कि उन्होंने हमें सुबह क्रिकेट खेलने की इजाजत दे दी. जिन एक-दो दोस्तों के घरवाले नहीं माने थे उन्हें हमने हाथ-पैर जोड़कर मना ही लिया.
हम अपने बच्चों को यूं दर-दर की ठोकरें खाने के लिए नहीं छोड़ सकते इसलिए उन्हें भी साथ ले जा रहे हैं. उस वक्त हमें लगा कि अगर हम कल थोड़ी हिम्मत दिखा देते तो शायद ये नौबत ही नहीं आती. उस दिन के बाद कुछ दिनों तक हमने क्रिकेट नहीं खेला, शायद हम सदमे में थे. फिर पता चला कि उन बच्चों के पिताजी जो जिंदा बच गये थे को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. उन पर मुकदमा चलाया जाएगा और हो सकता है कि उन्हें जेल भी जाना पड़ा. सुनकर बहुत ही अजीत लगा, जो व्यक्ति पहले से ही इतना दुखी हो उसको और दुख देना कहां का कानून है. उन्होंने जिस स्थिति में वो कदम उठाया वो सब जानते हैं, उन्होंने खुद भी जहर खाया था पर वो बच गये, उन्हें अपने आप में कैसे महसूस हो रहा होगा ये शायद कोई और नहीं समझ सकता.
मन में कई तरह के सवाल और गुस्सा लिए हम घर के सामने ही रहने वाले एक अंकल के पास गये, वो पहले पुलिस में ही थे. उन्होंने हमारे गुस्से को शांत करने की बहुत कोशिश की. उन्होंने बताया कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 309 के तहत आत्महत्या की कोशिश करने वाले व्यक्ति को दंडित करने का प्रावधान है. कानून में ऐसा करने वाले व्यक्ति को गुनाहगार माना जाता है, उसे अधिकतम एक साल तक की सजा भुगतनी पड़ सकती है और जुर्माना भी हो सकता है. हम उनके जवाबों से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं थे या कहें कि हम जानते-बूझते भी संतुष्ट होना नहीं चाहते थे क्योंकि हम ये स्वीकार नहीं पा रहे थे कि आखिर मौत की दहलीज पर जाकर लौटने वाले को हमारे देश का कानून सबकुछ जानते हुए भी कैसे सजा सुना सकता है. वो सवाल तो बचपन में उठे थे वो आज भी वैसे ही सामने खड़े हैं. आत्महत्या जैसा फैसला कोई भी इंसान अपनी खुशी से नहीं उठता, वो इस स्थिति तक तब पहुंचता है जब बाकी सारे दरवाजे उसके लिए बंद हो चुके होते हैं. वो इतना टूट चुका होता है कि जिंदा रहना उसके लिए मौत से भी बदतर बन जाता है. जीवन से पराजित ऐसे अभागे व्यक्ति को सहानुभूति सलाह मशविरे और उचित उपचार की जरूरत है या जेल की. कम से कम अब तो इस सवाल का जवाब खोजा जाना चाहिए. जो व्यक्ति आत्महत्या का प्रयासकरने के कारण पीड़ा और अपमान झेल चुका है उसे कानून के जरिए दंड़ित करना क्रूरता से यादा कुछ नहीं.