Monday, July 13, 2009

ऐसा गलत क्या कहा जयराम ने

नीरज नैयर
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने प्लास्टिक पर प्रतिबंध के खिलाफ बयान देकर मधुमक्खी के छत्थे में हाथ डाल दिया है, उनके खिलाफ पर्यावरणविदों ने तो मोर्चा खोला ही है दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भी आवाज बुलंद कर दी है. जयराम रमेश की दलील है कि अगर निर्धारित मानदंडों और तरीकों से प्लास्टिक की रीसाइक्लिंग की जाए तो पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचेगा. लेकिन अगर उसकी जगह कागज की थैलियों के प्रचलन ने जोर पकड़ा तो इसके लिए बड़े पैमाने पर पेड़ काटे जाएंगे जो पर्यावरण के लिए कहीं यादा घातक होगा, उनका यह भी तर्क है कि पूरी दुनिया में केवल भारत और बांग्लादेश में ही इसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा हुआ है. जबकि उनका विरोध करने वालों की अपनी दलीलें हैं, उनका कहना है कि प्लास्टिक में मौजूद पीवीसी भारी नुकसानदेह होता है, देश में ऐसी उन्नत प्रणाली भी नहीं है जो बेकार प्लास्टिक थैलियों को नियंत्रित कर सके. बेकार थैलियों ने शहरी जीवन को कई स्तरों पर प्रभावित किया है. यही नहीं, इसी के कारण यमुना का बुरा हाल हो गया है. रीसाइक्लिंग के लिए भी जरूरी संसाधन की कमी है एवं पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित कर्मचारी भी नहीं हैं, आदि, आदि.

इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि प्लास्टिक के दुष्प्रभाव गंभीर रूप में सामने आ रहे हैं. हिमालय की बर्फ से ढकीं चोटियां पर्वतरोहियों द्वारा छोड़े गये मलबों से पट रही हैं, गंगा-यमुना की हालात हमारे सामने है, यमुना ने तो तकरीबन दमतोड़ ही दिया और बाकि कुछ-एक दम तोड़ने के कगार पर हैं. हर साल न जाने कितने जानवर पॉलिथिन खाने से मारे जाते हैं. लेकिन सवाल से उठता है कि क्या हर समस्या का समाधान महज प्रतिबंध लगाना ही है. गौर करने वाली बात ये है कि अगर तमाम कोशिशों के बाद भी इस पर पूर्ण रूप से रोक नहीं लगाई जा सकी है तो सिर्फ और सिर्फ इसलिए कि इसका संबंध लोगों की सुविधा से है और शायद वो अपनी सुविधाओं मे कटौती नहीं करना चाहते. बिना सोचे-विचारे किसी समस्या को यह कहकर की उसे खत्म नहीं किया जा सकता उसके कारक को ही खत्म कर देना कहां की बुध्दिमानी है. प्लास्टिक के अगर दुष्प्रभाव हैं तो उसके फायदे भी हैं, जिनको इसकी मुखालफत करने वाले भी झुठला नहीं सकते. सवाल प्लास्टिक या इसके इस्तेमाल को खत्म करने का नहीं बल्कि इसके वाजिब प्रयोग का है. अगर पर्यावरणमंत्री का तर्क लोगों को समझ नहीं आ रहा है तो यह तर्क कहां से समझने लायक है कि संसाधनों की कमी है इसलिए प्रतिबंध लगा दो. अगर संसाधन की कमी है तो उसे दूर करने के प्रयासों के बारे में आवाज बुलंद करने की जरूरत है ना कि प्लास्टिक पर रोक की.
कुछ साल पूर्व पर्यावरण मंत्रालय ने प्लास्टिक के कचरे को ठिकाने लगाने के उपाए सुझाने के लिए एक समिति घटित की थी जिसने अपने रिपोर्ट में इस बात पर बल दिया था कि प्लास्टिक की मोटाई 20 की जगह 100 माइक्रोन तय की जानी चाहिए, ताकि ज्यादा से ज्यादा प्लास्टिक को रीसाइकिल किया जा सके. मतलब समिति का भी यही मत था कि रीसाइक्लिंग पर जोर दिया जाए. रीसाइक्लिंग से समस्या काफी हद तक सुलझ सकती है इसमें कोई दोराए नहीं. प्लास्टिक का विरोध भले ही चरम पर क्यों न पहुंच गया हो मगर सही मायनाें में देखा जाए तो इसके बिना सुविधाजनक जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती. प्लास्टिक किसी भी अन्य विकल्प जैसे धातु, कांच या कागज आदि की तुलना में कहीं ज्यादा मुफीद है. आज साबुन, तेल,दूध आदि वस्तुओं की प्लास्टिज् पैकिंग की बदौलत ही इन्हें लाना-ले-जाना इतना आसान हो पाया है. प्लास्टिज् पैकिंग कार्बन डाई आक्साइड और ऑक्सीजन के अनुपात को संतुलित रखती है जिसकी वजह से लंबा सफर तय करने के बाद भी खाने-पीने की वस्तुएं ताजी और पौष्टिक बनी रहती हैं. किसी अन्य पैकिंग के साथ ऐसा मुमकिन नहीं हो सकता. इसके साथ ही वाहन उद्योग, हवाई जहाज, नौका, खेल, सिंचाई, खेती और चिकित्सा के उपकरण आदि जीवन के हर क्षेत्र में प्लास्टिकका ही बोलबाला है. भवन निर्माण से लेकर साज-साा तक प्लास्टिक का कोई सामी नहीं. प्लास्टिक के फायदों को नजरअंदाज कर इसके दुष्प्रभावों को सामने रखने वालों के लिए यहां इंडियन पेट्रोकेमिकल इंडस्ट्री के एक शोध का उल्लेख करना बेहद जरूरी है, बिजली की बचत में प्लास्टिक की भूमिका को दर्शाने के लिए किए गये इस शोध में कांच की बोतलोें के स्थान पर प्लास्टिक की बोतल के प्रयोग से 4 हजार मेगावाट बिजली की बचत हुई. जैसा की पर्यावरणवादी दलीलें देते रहे हैं, अगर प्लास्टिकपर पूर्णरूप प्रतिबंध लगा दिया जाए तो इसका सबसे विपरीत प्रभाव पर्यावरण पर ही पड़ेगा. पैकेजिंग उद्योग में लगभग 52 फीसदी इस्तेमाल प्लास्टिक का ही होता है. ऐसे में प्लास्टिकके बजाए अगर कागज का प्रयोग किया जाने लगे तो दस साल में बढ़े हुए तकरीबन 2 करोड़ पेड़ों को काटना होगा. वृक्षों की हमारे जीवन में क्या अहमियत है यह बताने की शायद जरूरत नहीं. वृक्ष न सिर्फ तापमान को नियंत्रित रखते हैं बल्कि वातावरण को स्वच्छ बनाने में भी अहम् किरदार निभाते हैं. पेड़ों द्वारा अधिक मात्रा में कार्बनडाई आक्साइड के अवशोषण और नमी बढ़ाने से वातावरण में शीतलता आती है. अब ऐसे में वृक्षों को काटने का परिणाम कितना भयानक होगा इसका अंदाजा खुद-ब-खुद लगाया जा सकता है. साथ ही कागज की पैकिंग प्लास्टिक के मुकाबले कई गुना महंगी साबित होगी और इसमें खाद्य पदार्थों के सड़ने आदि का खतरा भी बढ़ जाएगा. ऐसे ही लोगों तक पेयजल मुहैया कराने में प्लास्टिकका महत्वूर्ण योगदान है, जरा सोचें कि अगर पीवीसी पाइप ही न हो तो पानी कहां से आएगा. जूट की जगह प्लास्टिकके बोरों के उपयोग से 12000 करोड़ रुपए की बचत होती है. अब इतना जब जानने-समझने के बाद भी प्लास्टिक की उपयोगिता पर आंखें मूंदकर यह कहना कि यह कहना की यह जीवन के लिए घातक है तो, समझदारी नहीं नासमझी ही कहा जाएगा.
वैसे सही मायने में देखा जाए तो इस समस्या के विस्तार का सबसे प्रमुख और अहम् कारण हमारी सरकार का ढुलमुल रवैया है, पर्यावरणवादी भी मानते हैं कि सरकार को विदेशों से सबक लेना चाहिए, जहां निर्माता को ही उसके उत्पाद के तमाम पहलुओं केलिए जिम्मेदार माना जाता है. इसे निर्माता की जिम्मेदारी नाम दिया गया है. उत्पाद के कचरे को वापस लेकर रीसाइक्लिंग करने तक की पूरी जिम्मेदारी निर्माता की ही होती है. एकरिपोर्ट के मुताबिक कुल उत्पादित प्लास्टिक में से 45 फीसदी कचरा बन जाती है और महज 45 फीसदी ही रिसाइकिल हो पाती है. मतलब साफ है, हमारे देश में रीसाइक्लिंग का ग्राफ काफी नीचे है. प्लास्टिकको अगर अधिक से अधिक रीसाइक्लिंग योग्य बनाया जाए तो कचरे की समस्या अपने आप ही समाप्त हो जाएगी. लिहाजा जयराम रमेश ने जो कहा है उस पर हो-हल्ला करने के बजाए उसकी गहराई को समझने का प्रयास करना चाहिए.

Wednesday, July 8, 2009

फ्लॉप शो साबित हुआ आम बजट

नीरज नैयर
इस आम बजट को आमजन की अपेक्षाओं के अनुरूप तो नहीं कहा जा सकता लेकिन सरकार की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के इसमे सारे गुण मौजूद हैं. वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने भविष्य में राजनीतिक लाभ से संबंधित योजनाओं को अत्याधिक प्रमुखता दी है. बजट में टैक्सों की हेराफेरी और थोड़ी बहुत छूट प्रदान करके लोकलुभावन बनाने की कोशिश की है लेकिन वो भी कारगर होती नजर नहीं आती. बजट में आयकर छूट सीमा जो पहले 1,50,000 तक थी उसे अब 1,60,000 कर दिया गया है, ऐसे ही महिलाओं के लिए इसे 1,80,000 से बढ़ाकर 1,90,000 किया गया है, हालांकि वरिष्ठ नागरिक इस मामले कुछ यादा फायदे में रहे हैं उनके लिए छूट सीमा पहले के 2,25,000 से बढ़ाकर 2,40,000 कर दी गई है. यानी वरिष्ठ नागरिकों को छोडक़र अधिकतम रियायत दी गई महज 10,000. बजट में जीवन रक्षक दवाएं, बड़ी कारें, एलसीडी, मोबाइल फोन, सीएफएल,वाटर प्यूरीफायर, खेल का सामान आदि सस्ता किया गया है. जबकि डॉक्टर-वकील की सलाह, सोना-चांदी, कपड़े आदि के लिए अब यादा दाम चुकाने होंगे.
नफे -नुकसान के गुणा-भाग में उतरने से पहले बजट के बाकी हिस्सा पर भी प्रकाश डालाना बेहतर रहेगा, प्रणव मुखर्जी ने किसानों का खास ख्याल रखने की बात कही है, उन्हें अब सस्ते दर से कर्ज दिया जाएगा. खाद सब्सिडी अब उनके हाथ तक पहुंचाई जाएगी. 2014-15 तक गरीबी उन्नमूलन की दिशा में उल्लेखनीय काम करने का प्रावधान बजट में है, इसके अलावा अल्पसंख्यकों पर दरियादिली की बरसात की गई है, एससी-एसटी और ओबीसी में आने वाले बच्चों की शिक्षा पर अत्याधिक ध्यान केंद्रित किया गया है. अब बात शुरू करते हैं आयकर छूट से जिसको सरकार की तरफ से बहुत बड़ा कदम बताया जा रहा है, अगर दो हफ्ते पहले ये बजट आता और ये प्रावधान किया गया होता तो कुछ हद तक इसे बड़ा कदम करार दिया जा सकता था लेकिन मौजूदा वक्त में ऐसी कोई गुंजाइश नहीं. बजट से ठीक पहले सरकार पेट्रोल पर चार और डीजल पर दो रुपए बढ़ा चुकी, उस लिहाज से इस छूट को ऊंट के मुंह में जीरा समान कहा जा सकता है. छूट की सच्चाई को विस्तार से समझने के लिए हम इसको ऐसे देख सकते हैं, अगर आपकी सालाना कमाई 500,000 से 9,90,000 के आसपास है तो आपकी सालाना बचत हुई करीब 1030, अगर 10,00,000 है तो 21530, 20,00,000 पर 51530, और 50,00,000 पर तकरीबन 1,41,530 के आसपास. पहले वाली श्रेणी यानी 500,000 से 9,90,000 को लेकर आगे चलते हैं, इतनी कमाई पर बचत का आंकड़ा सालाना हजार रुपए से थोड़ा सा यादा है और महीने की बात की जाए तो यह पहुंचता है करीब 85.83 के इर्द-गिर्द. अब जरा सोचें की मेट्रो सीटी में रहने वाला एक व्यक्ति जो प्रति माह 100 लीटर के आस-पास पेट्रोल खर्च करता है, उसे तेल की कीमत में मौजूदा वृध्दि के बाद चार रुपए यादा चुकाने होंगे यानी पहले अगर वो 42 रुपए देता था तो अब उसे 46 देने पड़ेंगे. इस हिसाब से 100 गुणा चार मतलब कुल भार बढ़ा 400 और बचत हुई महज 85.83. यानी अगर सही मायनों में देखा जाए तो सरकार ने जितना दिया नहीं उससे यादा वसूल कर लिया. छूट के रूप में सरकार ने केवल एक झुनझुना पकड़ाया है जिसे देखकर बच्चा तो मुस्कुरा सकता है लेकिन पेशेवर व्यक्ति नहीं. अब यह तो केवल प्रणव मुखर्जी और मनमोहन सिंह की आर्थिक विशेषज्ञों की टीम ही बता सकती है कि इस बजट में उदारता जैसे शब्द कहां हैं. बजट में राष्ट्रीय ग्रामीण जैसी योजनाओं पर पैसे की बरसात की गई है जबकि यह कई बार उजागर हो चुका है कि यह योजना भ्रष्टाचार की गिरफ्त में है.
कहीं-कहीं तो काम करने के बाद भी मजदूरों को उनका मेहनताना नहीं मिलता. ऐसे में यादा जरूरत इस तरह की योजनाओं के व्यापक क्रियान्वयन की थी ताकि जिनके लिए योजनाएं बनाई गई हैं उन तक लाभ पहुंच सके. जहां तक बात अल्पसंख्यकों और पिछड़ी जातियों को लुभाने की है तो ये पूरा वोट बैंक को रिझाने वाला स्टंट है. अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के बजट में 74 प्रतिशत का इजाफा किया गया है. इतना ही नहीं, अल्पसंख्यक बहुल जिलों में पानी, बिजली, सड़क, शिक्षा, बैंक आदि की व्यवस्था पर भी सरकार ने नजरें इनायत की हैं. यह धनराशि खास तौर से नौ योजनाओं पर खर्च की जाएगी. यादा ध्यान 20 प्रतिशत से अधिक अल्पसंख्यक आबादी वाले जिलों में मल्टी सेक्टोरल योजना के कार्यों पर दिया जाएगा. अल्पसंख्यक छात्रों की तालीम के मद्देनजर पूर्व मैट्रिक छात्रवृत्ति, मैट्रिकोत्तर छात्रवृत्ति के साथ ही उच्च स्तर पर व्यावसायिक व तकनीकी शिक्षा हासिल करने वाले छात्रों के लिए योग्यता सह-युक्ति छात्रवृत्ति को भी प्राथमिकता में शामिल किया गया है. इसके साथ ही पश्चिम बंगाल व केरल में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कैंपस खोले जाने के लिए 25-25 करोड़ की योजना अलग से है. बजट में अनुसूचित जाति के छात्रों को मैट्रिकोत्तर छात्रवृत्ति के मद में ही करीब 750 करोड़ खर्च करने का एलान किया गया है, इसके अतिरिक्त अनुसूचित जाति एवं पिछड़े वर्ग को विशेष केंद्रिय सहायता में 450 करोड़ अगल रखें गये हैं. पिछड़े वर्ग के छात्रों की मैट्रिकोत्तर छात्रवृत्ति योजना के लिए 135 करोड़ा का प्रावधान है, जबकि इस
समुदाय के मैट्रिक पूर्व छात्रवृत्ति के लिए 30 करोड़ और रखे गये हैं. सरकार का मानना है कि इससे करीब 11 लाख पिछड़े विधार्थियों का भला होगा. ठीक ही है, इतनी रकम से किसी का भी भला हो सकता है. यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि सामान्य वर्ग की झोली में क्या डाला गया. क्या सामान्य जाति के बच्चों को छात्रवृत्ति की खास जरूरत नहीं पड़ती, क्या गंदगी और अव्यवस्थाओं का आलम केवल अल्पसंख्यक बहुल जिलों में ही होता है.
बजट में सामान्य वर्ग की जरूरतों पर कोई ध्यान केंद्रित नहीं किया गया. माना जा रहा था कि सरकार बजट में महंगाई से राहत दिलाने के लिए कुछ कदम उठा सकती है, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. उल्टा तेल मूल्यों के लिए एक टास्क फोर्स यानी स्टडी ग्रुप बनाने की बात कही गई है. पिछले एक साल में देश में 65 फीसदी परिवारों का जीवन स्तर पहले के मुकाबले खराब हुआ है. इसकी वजह खाद्य और अन्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ना है. हालांकि यह बात अलग है कि मुद्रास्फीति की दर दिसंबर 2008 से ही 3 फीसदी से नीचे बनी हुई है. कुल मिलाकर कहा जाए तो यह आम बजट पूरी तरह फ्लॉप शो साबित हुआ है और इससे ये संकेत मिलते हैं कि आने वाले दिनों में आयकर में दी गई नाममात्र छूट के एवज में सरकार और कुछ और भार बढ़ा सकती है.

Tuesday, July 7, 2009

बेनजीर के कातिल कहीं जरदारी तो नहीं

नीरज नैयर
बेनजीर भुट्टो की हत्या से जुड़े कुछ सवालात आज भी अनसुलझे हैं. जैसे उनकी हत्या की साजिश के पीछे कौन था, क्या उन्हें गोली मारी गई थी, क्या उनकी सुरक्षा में जानबूझकर लापरवाही बरती गई, आदि, आदि. इतना लंबा अर्सा गुजर जाने के बाद भी पाक सरकार इन सवालातों के उत्तर नहीं खोज पाई है जबकि भुट्टो के पति आसिफ अली जरदारी मुल्क की सर्वोच्च कुर्सी पर विराजमान है. सरकार बैत्तुल्लाह महसूद को कातिल करार दे चुकी है, पर महसूद इससे इंकार करता रहा है. इन सब के बीच संयुक्त राष्ट्र से भी जांच कराने की बातें कही जाती रहीं लेकिन दिसंबर 2007 से अब जाकर यूएन काम शुरू करने जा रहा है. संयुक्त राष्ट्र में चिली के राजदूत हेराल्डो मुनोज के नेतृत्व में इंडोनेशिया के एक पूर्व एटॉर्नी जनरल और आयरलैंड के एक पूर्व पुलिस अधिकारी को जांच का जिम्मा सौंपा गया है. यह जांच छह महीने चलेगी और ये पता लगाने की कोशिश की जाएगी की भुट्टो की हत्या के मामले में तथ्य क्या है और किन परिस्थितियों में उनकी हत्या हुई. यहां ये काबिले गौर है कि अगर तालिबानी लीडर बैतुल्ला महसूद बेनजीर की हत्या में शामिल था, जैसा की सरकार कहती रही है तो फिर उसे पकड़ने की वाजिब कोशिशें क्यों नहीं की गईं. जरदारी साहब अगर चाहते तो सबकुछ मुमकिन था, वह बेनजीर के पति और राष्ट्रपति होने के नाते उनके कातिलों को बेनकाब करने के लिए कई उच्च स्तरीय जांच कमेटियां गठित कर सकते थे, हालांकि उन्होंने यूएन से 30 मिलियन डॉलर की
महंगी जांच कराने का फैसला ारूर लिया मगर इन सब में इतना वक्त निकल गया कि अब शायद अंतरराष्ट्रीय जांच एजेंसी भी कुछ खास हासिल न कर पाए. जरदारी साहब भुट्टो के सुरक्षा प्रमुख और एकमात्र चश्मदीद गवाह खालिद को भी नहीं बचा सके, कुछ अज्ञात हमलावरों ने उनकी गोली मारकर हत्या कर डाली.

खालिद को संयुक्त राष्ट्र की जांच टीम के सामने भी गवाही देने थी, जिसे काफी अहम माना जा रहा था. मुंबई हमले के बाद चौतरफा दबाव के बीच जिस तरह से पाक सरकार ने चंद हफ्तो में ही व्यापक कार्रवाई को अंजाम दिया उसे लेकर मुल्क में यह बातें कही जाने लगी कि जब इस मामले में गजब की तत्परता बरती जा सकती है तो बेनजीर हत्या कांड में सुस्त रवैया क्यों अपनाया जा रहा है. मतलब पाक का आवाम भी यह स्वीकार करता है कि सरकार भुट्टो प्रकरण में ईमानदारी नहीं बरत रही है. अब यह सवाल उठना जायज है कि आखिर ऐसा क्यों, अगर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) सत्ता से बेदखल होती या जरदारी दरकिनार कर दिए होते तो ऐसी स्थिति स्वीकारयोग्य हो सकती थी मगर पीपीपी के सत्ता में और जरदारी के राष्ट्रपति होने के बावजूद भुट्टो हत्या कांड को गंभीरता से न लेना उनकी मंशा पर शक जाहिर करता है. बेनजीर की हत्या के बाद पहले उनकी वसीयत को लेकर और बाद में उनके खासमखास से तकरार को लेकर भी जरदारी की भूमिका को संदेह घेरे में आ चुकी है. हस्तलिखित वसीयत में भुट्टो ने कहा था, मैं चाहूंगी कि मेरे पति आसिफ अली जरदारी तब तक अंतरिम तौर पर आपका नेतृत्व करें जब तक कि आप और वे तय नहीं कर लेते कि पार्टी के लिए सबसे अच्छा क्या है. मैं ऐसा इसलिए कह रही हूँ क्योंकि वे एक साहसी और आदरणीय आदमी हैं. उन्होंने साढ़े ग्यारह साल जेल में बिताए लेकिन तमाम यातनाओं के बावजूद झुके नहीं. उनका राजनीतिक कद इतना बड़ा है कि वे पार्टी को एकजुट रख सकें. एक पन्ने की इस वसीयत पर 16 अक्टूबर की तारीख दर्ज थी. बेनजीर उसके दो दिन बाद ही आठ साल के निर्वासन के बाद पाकिस्तान लौटी थीं. यानी उनके पाक जाने से पहले ही ये साफ हो गया था कि अगर उन्हें कुछ होता है सारी विरासत कौन संभालेगा. भुट्टो की मौत को लेकर पीपीपी ने उस वक्त राष्ट्रपति रहे मुशर्रफ को भी दोषी ठहराया, इसका आधार उन पत्रों को बनाया गया जिसमें भुट्टो ने पर्याप्त सुरक्षा न मिलने की बातें कहीं. दरअसल मुशर्रफ को बेनजीर से शिकस्त का खौफ था इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन ऐसे वक्त में जब सब उनके खिलाफ जा रहा हो वो भुट्टो को मरवाकर सहानभूति की लहर पीपीपी के पक्ष में मोड़ने की भूल शायद नहीं करते.

बेनजीर की हत्या से उन्हें सिर्फ और सिर्फ नुकसान की उठाना पड़ा और उन्होंने उठाया भी. जहां तक बात रही अलकायदा या तालिबान की तो वो किसी महिला पर इस तरह के हमले से इंकार करते हैं और उनका रिकॉर्ड भी इसकी गवाही देता है. यानी कोई ऐसा शक्स जिसे भुट्टो के जाने का सबसे यादा फायदा होता वो इस हत्याकांड को अंजाम देने के बारे में सोच सकता था, यहां से अगर सोचें तो जरदारी के अलावा ऐसा कोई दूर-दूर तक नजर नहीं आता. जरदारी का जिस तरह का ट्रैक रिकॉर्ड रहा है उस पर गौर फरमाया जाए तो इस बात से इंकार करना थोड़ा और मुश्किल हो जाएगा. जरदारी साहब रईस घराने से रहे हैं, शादी से पहले उनकी अख्याशियों के किस्से किसी से छिपे नहीं है. बेनजीर के साथ उनकी शादी घरवालों की रजामंदी से हुई थी, शादी के बाद उनके आशियाना शौक में भले ही थोड़ी कमी आई हो मगर अपराधिक प्रवृत्ति की रफ्तार तेजी होती चली
गई. उन पर एक ब्रिटिश डेवलेपर की हत्या की कोशिश का इल्जाम लगा, जिसे जरदारी और उनके साथियों ने मौत की दहलीज तक पहुंचा दिया था, उन पर भुट्टो के भाई की हत्या का भी आरोप लगा, हालांकि वो इससे इंकार करते रहे. जब बेनजीर भुट्टो सत्ता में आई तो उनके लिए नए पद का सजृन किया गया, उन्हें इनवेस्टमेंट मिनिस्टर बनाया गया. जरदारी साहब ने इस पद पर रहते हुए खूब धन बटोरा, उन्हें पाकिस्तान में मिस्टर 10 पसर्ेंट के नाम से जाना जाने लगा.
वे कई बार गबन, भ्रष्टाचार के मामलों में अंदर-बाहर होते रहे. मुल्क के साथ-साथ पार्टी में भी उनकी पहचान महज बेनजीर के पति तक ही सीमित हो गई. जरदारी को इस बात का निश्चित ही इल्म होगा कि अगर लंबे अर्से के बाद पाक लौट रहीं बेनजीर को कुछ हो जाता है तो उसका सीधा फायदा उन्हें ही मिलेगा, सहानभूति की लहर उनकी पुरानी पहचान मिटा देगी और उन्हें महज बेनजीर के पति ही हैसीयत से आगे निकलने का मौका मिल जाएगा. इस बात से खुद जरदारी भी इंकार नहीं कर सकते कि अगर बेनजीर जिंदा रहती तो उन्हें कभी इतने ऊपर आने का मौका नहीं मिलता क्योंकि पार्टी में ही उन्हें नापसंद करने वालों की अच्छी खासी तादाद है. सत्ता में आने से पहले तक भुट्टो हत्याकांड की जांच को जोर-शोर से उठाने वाले जरदारी की सत्ता पर काबिज होने के बाद खामोशी उनके खिलाफ पैदा धारणा को और बलवती बनाती है.

Sunday, July 5, 2009

पोर्नोग्राफी का फैलता कारोबार

नीरज नैयर
इंटरनेट पर अशीलता परोसने वाली सैंकड़ों वेबसाइटों मौजूद हैं और इन वेबसाइट्स का ट्रैफिक दिन ब दिन बढ़ता जा रहा है. सरकार ने सविताभाभी नामक वेबसाइट को बैन करके इस चेन में से एक कड़ी को कम करने की कोशिश की है. मार्च 2008 में लांच की गई इस वेबसाइट को ढेरों शिकायतें मिलने के बाद साइबर कानून के तहत बैन किया गया है सविता भाभी दरअसल अपनी सेक्स लाइफ से हताश एक महिला का कार्टून कैरक्टर है. साइट पर इसे कॉमिक के तौर पर अंग्रेजी और दूसरी भारतीय भाषाओं में परोसा जा रहा था. महज आठ महीनों में इस साइट पर 30 हजार से अधिक लोग रजिस्टर कर चुके हैं. एलेक्सा.कॉम के मुताबिक यह वेबसाइट दुनिया की 82वीं सबसे यादा देखी जानेवाली वेवसाइट बन गई है. हालांकि यह कवायद समुंदर के पानी से एक बूंद चुराने जैसी है लेकिन फिर भी इस तरह के कदम सामाजिक वातावरण की स्वच्छता बनाए रखने के लिए नितांत जरूरी हैं.

बीते कुछ वर्षों में ही इस तरह की वेबसाइटों में खासी बढ़ोत्तरी हुई है, एक अनुमान के मुताबिक तकरीबन 4.2 मिलियन साइट पोनोग्राफी को बढ़ावा दे रही हैं. प्रति सेकेंड करीब 28,258 लोग ऐसी वेबाइट्स को देखकर अपनी काम जिज्ञासाओं को शांत करने की कोशिश करते हैं, हर सेकेंड 3,075.64 अमेरिकी डॉलर पार्न साइटों पर खर्च किए जाते हैं. प्रति सेकेंड इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले लोगों में से 372 यूजर्स मौजूद विभिन्न सर्च इंजन्स में अडल्ट सर्च करते हैं, और हर दिन करीब 68 मिलियन यानी कुल सर्चिंग का 25 प्रतिशत.अमेरिका में 39 मिनट में एक नया वीडियो क्लिप बनकर तैयार हो जाता है. अशीलता के कारोबार में हमेशा से बहुत पैसा रहा है चाहे फिर कैसेट, सीडी क़े माध्यम से हो या फिर किसी और से. लेकिन इंटरनेट के चलन में तेजी आने के बाद ऑनलाइन सेक्स कारोबार ने सबको पछाड़ दिया है. आलम ये है कि आज पोर्नोग्राफी उद्योग को होने वाली आय के सामने गूगल, माइक्रोसाफ्ट, याहू, ईबे, एप्पल, एमाजोन जैसी नामी-गिरामी कंपनियों की सालाना आय कहीं नहीं ठहरती. इंटरनेट पर इस तरह की वेबसाइट तक पहुंचने के ढ़ेरों तरीके मौजूद हैं, गूगल जैसे सर्च इंजन के आने से ये काम और भी आसान हो गया है. बस संबंधित शब्द लिखकर सर्च करने भर से पोर्नवेबसाइट्स का पूरी दुनिया चंद सेकेंड़ में मॉनीटर स्क्रीन पर आ जाती है. कुछ वेबसाइट इसके लिए बाकायदा फीस वसूलती हैं जबकि कुछ फ्री में पोर्न साहित्य और तस्वीरे उपलब्ध कराती हैं. भारत, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, इजिप्ट, ईरान,वियतनाम, तुक्री आदि देशों में इस तरह की साइट ढूंढने वाले यादातर सेक्स शब्द का प्रयोग करते हैं. जबकि दक्षिण अफ्रीका, आइरलैंड, न्यूजीलैंड, यूनाइटिड़ किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, नॉरवे और कनाड़ा आदि में पोर्न. पोर्नोग्राफी का सबसे अधिक कारोबार अमेरिका, ब्राजील, नीदरलैंड, स्पेन, रूस, जापान, जर्मनी, यूके, कनाड़ा, ऑस्ट्रेलिया में है. अमेरिकी प्रत्रिका प्लेबॉय तो विश्वभर में जाना पहचाना नाम है, अमेरिका के लॉस एंजिल्स, लॉस वेगास, मियामी, पोटलैंड, शिकागो, सेनफ्रांसिस्को आदि शहर इस तरह के कामों के लिए काफी प्रचलित है.

इंटरनेट पर अमेरिका के करीब 244,661,990, जर्मनी के 10,030,200, यूके के करीब 8,506,800, ऑस्ट्रेलिया के 5,655,800, जापान के 2,700,800, रूस के 1,080,600, पोलैंड के 1,049,600 और स्पेन के तकरीबन 852,800 पन्ने पोर्नोग्राफी परोस रहे हैं. अमेरिका की कुल आय में इस उद्योग की हिस्सेदारी लगातार बढ़ती जा रही है, इसकी बिक्री 1992 में 1.60 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2006 में 3.62 बिलियन डॉलर तक पहुंच गई है. भारत में भी यह बाजार चोरी-छिपे पैर पसारता जा रहा है, इस तरह की वेबसाइटों के माध्यम से वेश्यावृत्ति को भी बढ़ावा दिया जाता है. बहुत सी वेबसाइट्स पर डेटिंग के नाम पर बाकायदा मेटिंग करवाई जाती है. सविता भाभी जैसी वेबसाइट को लेकर सबसे बड़ी दिक्कत ये आती है कि ऐसी साइटों का कोई असल माई-बाप सामने नहीं आता, वो पर्दे के पीछे से बैठकर सारा खेल खेलता रहता है. इसलिए उन तक पहुंच पाना असंभव हो जाता है. सविता भाभी को देशमुख के छद्म नाम से चलाया जा रहा है और इसकी मालिक इंडियन पॉर्न स्टार एम्पायर नाम की कंपनी है. इस वेबसाइट का प्रभाव किस कदर बढ़ गया था इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बेंगलुरु में पांचवीं में पढ़ने वाले एक बच्चे ने तो इस पात्र को देखकर अपनी टीचर का अश्लील एमएमएस तक कर डाला. बच्चे की उम्र महज 11 साल होने के कारण पुलिस उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकी.

इस तरह की साइट न केवल विकृत मानसिकता को बढ़ावा देती हैं बल्कि बच्चों के स्वस्थ मानसिक विकास के लिए काफी घातक सिध्द होती हैं. यूटियूब जैसी बहुचिर्चित वेबसाइट पर भी कुछ वक्त पहते तक ऐसी सामग्री आसानी से उपलब्ध हो जाया करती थी पर अब शायद उसे थोड़ा बहुत नियंत्रित किया गया है, मगर मेटाकैफे अब उसकी जगह भरने के लिए मौजूद है. कहने का मतलब है कि एक के बाद एक साइट अस्तित्व में आती जा रही हैं और इंटरनेट पर अपने को स्थापित करने के लिए वो सब उपलब्ध करा रही हैं जो शायद आज यादातर लोग देखना चाहते हैं. अगर इस कड़ी में नवभारत डॉट कॉम को भी जोड़ा जाए तो कोई गलत नहीं होगा.

Wednesday, July 1, 2009

क्योंकि प्यार में सब जायज है

नीरज नैयर
प्यार का बुखार आजकल तेजी से फैल रहा है, जहां भी नजर घुमाओं लवेरिया से पीड़ित एक दो जोड़े दिखाई दे ही जाते हैं. आलम ये है कि 40-50 डिग्री टैम्परेचर में भी पार्क के किसी कोने में इनका प्यार परवान चढ़ रहा होता है. दिल्ली तो वैसे भी प्यार में डूबे पंक्षियों की शरणस्थली रहा है, यहां के पार्कों में बढ़ी ही तल्लीनता से इश्क फरमाया जाता है. हर डाली के पीछे एक दो फूल माली की परवाह किए बिना आलिंगनबध्द होकर सुखद अनुभव की प्राप्ती में लीन रहते हैं. यह नजारा आंखें सेकने वालों के लिए भी स्वर्णिम साबित होता है, क्योंकि बिना टिकट खरीदे ही वो फिल्मी सीन के साक्षात दर्शन कर लेते हैं. कुछ वक्त पहले तक खाकी वर्दी वाले भी ऐसे सीन की तलाश में पिलर टू पोस्ट करते नजर आ जाते थे ताकि प्यार पर टैक्स वसूल किया जा सके. लेकिन अदालत के फरमान के बाद बेचारे मन मारने को मजबूर हैं. खैर जो कुछ भी हो आजाद ख्यालात वाली दिल्ली में सबकुछ खुले तौर पर तो होता है, लेकिन एक दूसरी राजधानी यानी भोपाल की बात करें तो यहां सब गोलमाल है.

चेहरा ढ़कने का चलन यहां इतने जोरों पर है कि एक बारगी तो लगता है कि हम पाकिस्तान या अफगानिस्तान के किसी शहर में आ पहुंचे हों. जिसे देखो वो नकाब लगाए फुर्र हुए जा रही हैं. सूरमा भोपाली की नगरी में युवतियों का नकाब प्रेम इस कदर बढ़ गया है कि शायद रात के अंधेरे में भी उन्हें चेहरा दिखाने से परहेज हो. वैसे जनाब नकाब के फायदे ही इतने हैं कि बालाएं चाहकर भी उसे नहीं उतार सकतीं. वो प्रेमी के हाथ में हाथ डालकर घूम सकती हैं, बाइक पर ऐसे चिपककर बैठ सकती हैं कि हवा भी पास न हो, किसी से नजरें चुराए बिना रेस्तरां में बैठकर डेटिंग कर सकती हैं, तो सिर्फ और सिर्फ नकाब की बदौलत. यानी आप चेहरे से तो किसी को पहचान ही नहीं सकते, हां अगर गणित में माहिर हैं तो फिगर से अंदाजा लगाने का प्रयास जरूर कर सकते हैं, वैसे ये काम भी आसान नहीं, क्योंकि फिगर भी आजकल टाईप-टाईप के हो गये हैं. यहां उनका विवरण देना सेंसर बोर्ड को कैंची चलाने का न्यौता देना होगा लिहाजा उसे पढ़ने वाले के विवक पर ही छोड़ देते हैं. वैसे अगर देखा जाए तो उन तालिबानी कमांडरों के लिए जो महिलाओं को ढ़कने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं भोपाली बालाएं एक मिसाल हो सकती हैं, वो बिना किसी फरमान के गैर मर्दों की नजर अपने चेहरे पर नहीं पड़ने देतीं.

बहरहाल जब उनके घर वालों को परेशानी नहीं तो हमें क्या, हमने कौनसा समाज सुधारक बनने का ठेका उठा रहा है. पर इस टॉपिक से साइड लेने से पहले एक दो-चार बातें मराठा नगरी यानी नागपुर की भी कर लेते हैं, वहां की बालाओं पर भी नकाब प्रेम चढ़ गया था मगर पुलिसिया सनक ने प्यार को परवान नहीं चढ़ने दिया. धकाधक इतने चालान काटे कि चेहरा ढ़कने का ख्वाब हकीकत में नहीं बदल पाया. यहां तक तो सब ठीक था पर आजकल प्यार नए-नए रूप भी सामने आने लगा है. पाकिस्तान के सिंघ जिले के बदीन में खाकी वर्दी धारी माफ कीजिएगा खाकी वर्दी तो वहां होती नहीं, नीली-पीली जो भी हो वर्दी पहने मौलवीनुमा पुलिस वालों ने प्यार के दीवाने को पिंजरे में कैद कर लिया. हालांकि उसका प्यार जमाने से थोड़ा हटकर था लेकिन प्यार तो प्यार ही होता है फिर चाहे वह खूबसूरत बला से हो किसी किन्नर से. ये महाशय अल्लाह बचायो किन्नर सरवत फकीर को अपना बनाने जा रहे थे, इसके लिए बाकायदा हाथों में महंगी लागाई गई, दावत रखी गई थी, कुछ खासमखास दोस्त भी बुलाए गये मगर काफिर पुलिस ने उसकी हसरत पूरी नहीं होने दी. इस मामले से कुछ हटकर समलैंगिक प्यार के तराने भी इन दिनो खासे सुनाई पड़ रहे हैं. एक जैसी शारीरिक बनावट वाले लोगों के दिल में एक-दूसरे के लिए प्यार का वो तूफान उमड़ रहा है कि इसकी मुखालफत करने वाले भी खुद को अकेला समझने लगे हैं. सात समुंदर पार तो ऐसे दिलों का मिलना आम बात है, लेकिन अब तो राधा-किशन की धरती यानी भारत में भी प्रेम का यह रूप दर्शन देने लगा है. बात इतनी पुरानी भी नहीं है इसलिए अब तक याद है, पश्चिम बंगाल में दो समलैंगिक युवतियों के विवाह को उनके घरवालों ने मंज़ूरी दे दी थी. हावड़ा जिले की दो युवितियों रिंकू मंडल और तनुश्री मान्ना ने घर से भाग कर शादी कर ली थी.
दुर्गापूजा की धूमधाम के बीच नवमी को दोनों जयपुर से लौटकर हावड़ा पहुंचीं और पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. दोनों के घरवालों ने उनकी इस शादी पर न सिर्फ अपनी मुहर लगा दी, बल्कि उनमें से एक युवती के घरवालों ने तो भविष्य में उनके लिए एक बच्चा गोद लेने का भी फैसला तक कर डाला, आश्चर्यजनक किंतु सत्य. खैर यादों के जहाज पर सवार होकर भारत की सीमा के पार चलें तो ऐसे भी मामले मिलेंगे जो अनोखे प्यार की कहानी बयां करते हैं. अमेरिका के टेक्सस के डैलस शहर में समलैंगिकों के लिए बना सबसे बड़ा चर्च पिछले तीस सालों से भी यादा समय से मौजूद है, यहां हर उम्र के गे, लेस्बियन जोड़े, अपने बच्चों के साथ, यादातर ऐसे बच्चे जिन्हें उन्होंने गोद लिया है या फिर जिन्होंने टेस्ट टयूब बेबी पैदा किए और उन्हें पालपोस कर बड़ा किया है, उतने ही मन से जीसस को याद करते हुए दिखेंगे जैसे दूसरे चर्चों में दिखता है. इस पूरी रामयाण की मोरल ऑफ द स्टोर ये है कि न सिर्फ प्यार की परिभाषा बदल रही है बल्कि प्यार करने के मानक भी बदल रहे हैं, वैसे कहने वाले कहते हैं कि प्यार के कोई मानक नहीं होते. प्यार कभी भी, कहीं भी, किसी से भी हो सकता है. प्यार के लिए नकाब लगाया भी जा सकता है और उठाया भी क्योंकि प्यार में सब जायज है.

Friday, June 19, 2009

ड्रेस कोड लागू करना गुनाह तो नहीं

नीरज नैयर
हाल ही में मैंने अमर उजाला में प्रकाशित एक समाज सेविका का लेख पड़ा जिसमें उन्होंने पुरुषों के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए ड्रैस कोड की जमकर मुखालफत की. उनकीनजर में कॉलेजों में पढ़ने वाली लड़कियों के लिए ड्रेस कोड लागू करना समाज का तालिबानिकरण करने जैसा है. मोहतरमा उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के चार कॉलेजों में छात्राओं को जींस-टॉप पहनने पर लगाई गई पाबंदी से काफी आहत थीं, कॉलेज प्रशासन ने महिला शिक्षकों को भी स्लीवलेस परिधान न पहनकर आने को कहा है. एक महिला होने के नाते उनके इस तरह के तेवर लाजमी हैं.

तमाम अधिकारों के बावजूद आज भी महिलाएं खुद को वंचित तबके का समझती हैं उन्हें लगता है कि उन्हें वैसी स्वतंत्रता नहीं मिल पाई है जैसी किसी पुरुष के पास होती है, जबकि हकीकत इससे कहीं जुदा है. थोड़ा पीछे नजरें घुमाकर देखने से ही ज्ञात हो जाएगा कि कल की और आज की नारी में, उसके रहन-सहन में और उसकी आजादी में कितना बदलाव आया है. आज महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं, हर क्षेत्र में उन्हें पुरुषों के समान अवसर दिए जा रहे हैं. ऐसे में ड्रैस कोड जैसे फैसलों को तालिबानी मानसिकता कैसे करार दिया जा सकता है. बल्कि ये तो वो फैसले हैं जो अमीरी-गरीबी के कारण उपजने वालीर् ईष्या, कुंठा की भावना को दूर करते हैं. अगर सब एक जैसी पोशाक पहनकर आएंगे तो सस्ती-महंगी, अच्छी-बुरी का फर्क ही नहीं रह जाएगा. जब टॉप मोस्ट बिजनिस स्कूल्स ड्रेस कोड लागू कर सकते हैं तो फिर कॉलेज स्तर पर इसे लागू करने में इतना हंगामा क्यों मचाया जाता है. बेंगलुरु स्थित प्रख्यात क्राइस्ट यूनिवर्सटी में पढ़ने वाली छात्राओं को तो हॉस्टल से भी जींस-टीशर्ट या स्पीवलेस पहनकर बाहर निकलने की इजाजत नहीं है. कॉलेज में लड़कियों को सिर्फ सलवार-सूट पहनना पड़ता है, ऐसा ही सूरते हाल देश के अन्य प्रोफेश्ल कॉलेजों का भी है. वहां पढ़ने वाले छात्र-छत्राओं ने तो कभी इसके खिलाफ आवाज बुलंद नहीं की, क्योंकि वो वहां केवल शिक्षा अर्जित करने के लिए गये हैं. कोई माने या न माने मगर सच यही है कि आज कॉलेज शिक्षा के केंद्र की जगह फैशन का अखाड़ा बन गये हैं, दिल्ली विश्वविद्यालय इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं. यहां पढ़ने आनी वाली युवतियां ऐसी-ऐसी पोशाकें पहनकर आती हैं कि एक बारगी तो बॉलीवुड में काम करने वाली बालाएं भी असल जिंदगी में उन्हें देखकर शर्मसार हो जाएं.

स्कूल-कॉलेजों की बात तो छोड़िए आम जीवन में ही मॉर्डन बनने के नाम पर जो पहनावा अपनाया जा रहा है वो शालीनता की परिभाषा के इर्द-गिर्द भी नहीं ठहरता. चुस्त जींस, चुस्त टीशर्ट और उनके बीच में से झलकता पेट आज का फैशन सिंबल है. कमर से करीब दो-तीन उंगल नीचे जींस बांधना यौवन में निखार का पैमाना माना जाता है. यह बात सही है कि सबको अपनी तरह से जिंदगी जीने की स्वतंत्रता है, हमारा संविधान इसकी पूरी इजाजत देता है लेकिन फैशन के नाम पर फूखड़ता और अंगप्रदर्शन कहां तक जायज है. जो लोग कहते हैं कि बलात्कार जैसे मामलों को पहनावे से जोड़कर नहीं देखना चाहिए वो बिल्कुल ठीक हैं, बलात्कार जैसे विचार केवल घृणित दिमाग की उपज ही हो सकते हैं लेकिन कहीं न कहीं भड़काऊ परिधानों की उस उपज को उग्रता में परिवर्तित करने की भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता. ऐसे लोग टीवी पर जो कुछ देखते हैं उसका सजीव चित्रण उन्हें अपने आस-पास ही हो जाता है, जो कुंठा उनके मन में काफी वक्त से कुंचाले मार रही थी उसका प्रभाव तेज हो जाता है और वो किसी ऐसे काम को अंजाम दे बैठते हैं जिसके लिए उन्हें फांसी पर भी लटकाया जाए तो कम है. कहने का मतलब यह कतई नहीं कि महिलाएं पसंदीदा परिधान पहनना ही छोड़ दें, बिल्कुल पहनें लेकिन अगर उसमें शालीनता और सभ्यता दिखाई दे तो बुराई क्या है.

णड्रेस कोड लागू करनाा या महिलाओं को संजीगदी भरे पहनावे की नसीहत देना तालिबानिकरण नहीं हो सकता, तालिबान के राज में महिलाओं को ऐसी जिंदगी जीनी पड़ती थी जिसकी कल्पना भी हमारा समाज नहीं कर सकता. आज भी अफगानिस्तान में तालिबान के डर से महिलाएं किसी पुरुष का हाथ थामकर अपने प्यार का इजहार नहीं कर सकती, अपनी पसंद की पोशाक नहीं पहन सकती, खुलकर अपनी बात नहीं कह सकतीं. पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की स्वात घाटी से भी तालिबान की महिलाओं पर बंदिशें लगाने की खबरें अक्सर आती रहती हैं. ईरान में तो कपड़े पहनने की तरीके को लेकर कानून इतने सख्त हैं कि उनका उल्लघंन करने वाली महिलाओं को जुर्माना अदा करना पड़ता है. कुछ वक्त पहले वहां पुलिस ने यह सुनिश्चित करने के लिए अभियान चलाया था कि महिलाएं हिजाब ठीक तरह से पहने.ईरान की राजधानी तेहरान की सड़कों पर इस अभियान को लागू कराने के लिए करीब 200 अतिरिक्त पुलिस अधिकारी लगाए गये. जो महिला छोटे जैकेट, पतले हिजाब या फिर ऐसे पोशाक पहनते देखी गईं जिनमें उनका पैर दिखता हो, उन पर 55 डॉलर तक का जुर्माना लगाया गया. इसके उलट भारत में महिलाओं को अपने निर्णय खुद लेने की आजादी है, सिर उठाकर चलने का अधिकार है, क्या यह समाज के तालिबानिकरण में बदलाव के संकेत हैं, शायद नहीं. जो लोग अब भी ढिंढोरा पीट रहे हैं कि महिलाओं के साथ अन्याय हो रहा है, उन्हें आगे बढ़ने का मौका नहीं दिया जा रहा है उन्हें चंद मिनट शांति से बैठकर पुर्नविचार करने की जरूरत है. ड्रैस कोड लागू करना या न करना यह कॉलेज प्रशासन का अपना निजी फैसला है, और जो सही मायनों में वहां पढ़ने जाते हैं वो कभी इसका विरोध नहीं करेंगे. यह वक्त इस तरह के फैसलों पर सवालात करने के बजाए गौर फरमाने का है कि आखिर ऐसी नौबत आई ही क्यों. खूबसूरती हमेशा सादगी में ही होती है, अगर युवतियों को यह बात समझ में आ जाए तो इतना बखेड़ा खड़ा ही क्यों हो.

Tuesday, June 16, 2009

कश्मीर पर यह नासमझी क्यों

नीरज नैयर
अमेरिकी नेतृत्व की पाक पसंदगी का पैमाना इस कदर भर गया है कि उसके राजनेता-अधिकारी अब हमारे पड़ोसी मुल्क के नुमाइंदों की तरह यादा पेश आने लगे हैं, अमेरिकी विदेश उप मंत्री विलियम बर्न्स के बयान से तो यही प्रतीत होता है. बर्न्स ने अपनी भारत यात्रा के दौरानबहुत कुछ ऐसा कहा जिसकी उम्मीद नई दिल्ली ने भी नहीं की होगी. अमेरिकी मंत्री ने भारत को पाक के साथ बिना शर्त बातचीत की समझाइश तो दी ही साथ ही कश्मीर पर यह कहते हुए नया शिगूफा छोड़ दिया कि समस्या के समाधान के लिए कश्मीरियों की इच्छा का भी ध्यान रखा जाना चाहिए. कश्मीर भले ही भारत-पाक का आपसी मसला हो मगर उसमें अमेरिका की दखलंदाजी हमेशा से ही रही है, इसका एक कारणदोनों देशों का बार-बार अमेरिका पर निर्भरता जाहिर करना भी है. पाकिस्तान शुरू से अमेरिका के सहारे कश्मीर फतेह की नापाक कोशिशों को अंजाम देता रहा है और भारत महज जुबानजमाखर्ची के वाशिंगटन को अब तक कोई सख्त संदेश देने में नाकाम रहा है. बर्न्स के मौजूदा बयान पर भी भारतीय नेतृत्व ने कोई ऐसी प्रतिक्रिया नहीं दी जिससे अमेरिका को भविष्य के लिए सबक मिल सके. बराक हुसैन ओबामा के सत्ता संभालने से पहले ही यह स्पष्ट हो गया था कि कश्मीर पर उनका रुख पाक के पक्ष में ही जाएगा, ओबामा ने चुनाव प्रचार के दौरान ही कश्मीर के समाधान के लिए एक विशेष दूत नियुक्त करने की बात कही थी और वो अब इसी दिशा में बढ़ते दिखाई
दे रहे हैं.

कश्मीर को लेकर पाक की पैंतरेबाजी को ऐसे कथित बुध्दिजीवियों के कथनों से भी बल मिला है जो घाटी को आजाद रूप में देखने की हसरत रखते हैं. प्रख्यात लेखिका अरुन्धति राय भी ऐसे ही बुध्दिजीवियों की जमात में शामिल हैं. कुछ वक्त पूर्व जब कश्मीर में आजादी की मांग को लेकर प्रदर्शन चल रहे थे उस वक्त आउटलुक में उनका एक लेख प्रकाशित हुआ था जिसमें उन्होंने कश्मीर को स्वतंत्र करने पर बल दिया था. उनका मानना था कि घाटी में जो आक्रोश व्याप्त है वो केवल अलगाववादियों की ही देन नहीं बल्कि आम कश्मीरियों का वो गुस्सा है जो कई वर्षों से भारतीय प्रशासन के खिलाफ पनप रहा है. उनके मुताबिक कश्मीरियों में अब यह धारणा घर कर चुकी है कि उनका हित भारत से अलग होने में ही है. अरुन्धति राय ने महज बुजुर्गों-नौजवानों और महिलाओं की भीड़ से निकलकर आ रहे भारत विरोधी नारों से यह अंदाजा लगा लिया कि घाटी का आवाम 1947 की तरह ही स्वतंत्रता के लिए आंदोलित है. पर वो शायद भूल गईं कि भीड़ में शामिल होने वाले हर शख्स का उद्देश्य उसकी अगुवाई करने वाले से मेल खाए ऐसा जरूरी नहीं होता. राम मंदिर आंदोलन के वक्त सैंकड़ों लोग भीड़ का हिस्सा बने पर क्या सभी मस्जिद तोड़ना चाहते थे, अगर ऐसा होता तो शायद एक भी मस्जिद आज सुरक्षित नहीं बचती. राजनेताओं की रैलियों में हजारों लोग बढ़-चढ़कर सम्मलित होते हैं तो यह मान लिया जाए कि सब एक ही विचारधारा से हैं, अगर ऐसा होता तो भीड़ ही जीत का आधार मानी जाती. भीड़ का हिस्सा बनना महज क्षणिक भर का जोश मात्र भी हो सकता है, जिसका नशा पलभर में ही काफुर हो जाता है. लिहाजा प्रदर्शन करने वालों की तादाद देखकर यह समझ लेना कि पूरी की पूरी जमात ही इसमें शामिल है, सरासर ग़लत है. लालचौक से लेकर सोनमर्ग-गुलमर्ग तक पत्रकार और आम पर्यटक की तरह जब मैने लोगों के दिलों को टटोलने की कोशिश की तो मुझे कहीं से भी उनके भीतर दबे हुए उस गुस्से का अहसास नहीं हुआ जिसका जिक्र अरुन्धति राय ने किया था. जहां तक बात रही थोड़ी बहुत शिकन की तो वह मुल्क के हर नागरिक के चेहरे पर किसी न किसी बात को लेकर दिखाई पड़ ही जाती है. कश्मीर को विशेष राय का दर्जा मिला हुआ है, केंद्र में आने वाली हर सरकार के एजेंडे में कश्मीर सबसे ऊपर होता है. हर साल एक मोटी रकम घाटी के विकास के लिए स्वीकृत की जाती है.

इतने सब के बाद भी अलग होने की भावना कैसे जागृत हो सकती है, दरअसल पाक की जुबान बोलने वाले हुर्रियत जैसे संगठन कश्मीरियों को लंबे वक्त से बरगलाने में लगे हैं, वह उन्हें सुनहरे सपने दिखाकर अपनी तरफ करने की कोशिश करते हैं, मगर आम कश्मीरियों को शायद इस बात का इल्म है कि अगर भारत से अलग हुए तो उनका हाल भी पाक अधिकृत कश्मीर में रहने वाले उनके भाई-बंधुओं की माफिक हो जाएगा. यही वजह है कि आजादी की मांग वाले प्रदर्शन यदा-कदा ही होते हैं, अगर ऐसा नहीं होता तो घाटी हर रोज शोर में डूबी रहती. इस लिहाज से देखा जाए तो न तो अमेरिका और न ही कथित बुध्दजीवियों के लिए यह तर्कसंगत है कि वो कश्मीर पर भारत के रुख को कमजोर करने की कोशिश करें, खासकर अमेरिका के लिए तो बिल्कुल नहीं. ओबामा खुद को बड़ा साबित करने की चाह में उसी स्टैंड पर कायम हैं जिसपर पूर्ववर्ती अमेरिकी शासक चलते रहे हैं. 1947-48 में भारत और पाकिस्तान के बीच जम्मू कश्मीर मुद्दे पर पहला युध्द हुआ था जिसके बाद संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में युध्दविराम समझौता हुआ. इसके तहत एक युध्दविराम सीमा रेखा तय हुई, जिसके मुताबिक जम्मू कश्मीर का लगभग एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान के पास रहा जिसे पाकिस्तान आज़ाद कश्मीर कहते हैं. और लगभग दो तिहाई हिस्सा भारत के पास है जिसमें जम्मू, कश्मीर घाटी और लद्दाख शामिल हैं. 1972 के युध्द के बाद हुए शिमला समझौते के तहत युध्दविराम रेखा को नियंत्रण रेखा का नाम दिया गया. हालाकि भारत पूरे जम्मू कश्मीर को अपना हिस्सा बताता है, लेकिन कुछ पर्यवेक्षक यह भी कहते हैं कि वह कुछ बदलावों के साथ नियंत्रण रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में स्वीकार करने के पक्ष में है. अमेरिका और ब्रिटेन भी नियंत्रण रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा बनाने के हिमायती रहे. पर पाकिस्तान इसका विरोध करता है क्योंकि नियंत्रण रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा बनाने से मुस्लिम-बहुल कश्मीर घाटी भी भारत के ही पास रह जाएगी.

अमेरिका ने कश्मीर में पूर्णरूप से 1950 के दौरान ही दिलचस्पी लेना शुरू कर दिया था, और 1990 तक आते-आते उसमें पाक की हिमायती का पक्ष साफ-साफ दिखाई देने लगा. अमेरिका कहीं न कहीं ये चाहता है कि कश्मीर को स्वतंत्र घोषित कर दिया जाए ताकि वो अफगानिस्तान और इराक की तरह अपनी सेना को वहां बैठाकर एशिया में मौजूदगी दर्ज करवा सके, शायद इसी लिए उसके दिल में कश्मीरियों के प्रति दर्द उमड़ रहा है. अमेरिका के इस तरह के हिमायत भरे कदम पाकिस्तान और कश्मीर में बैठे उसके खिदमतगारों के लिए पावर बूस्टर का काम करते हैं. इसलिए भारत सरकार को अमेरिकी दबाव में आकर नासमझ व्यवहार करने की बजाए बर्न्स के बयानों की गंभीरता को भांपते हुए माकूल जवाब देने की दिशा में कदम उठाना चाहिए.