Saturday, July 5, 2008

ऐसे न सताओ निरीह को



गाहे-बगाहे यह आवाज उठती रहती है कि आवारा कुत्तों को सिपुर्र्द-ए-खाक कर देना चाहिए, ठीक उसी तरह से जैसे मुर्गियों को बर्ड-फ्लू के डर से किया गया. कुत्ते रैबीज फैलाते हैं, नींद में खलल डालते हैं इसलिए उन्हें जीने का कोई हक नहीं. दलीलें तो यहां तक दी जाती हैं कि गली-मोहल्लों में घूमते आवारा कुत्तों से डर लगता है. अत: उन्हें सजा-ए-मौत दी जानी चाहिए. पर ऐसी सजा की दरयाफ्त करने वालों ने कभी चश्मा उतारकर एक-एक निवाले को तरसते कुत्तों को गौर से देखा है. भुखमरी के शिकार बेचारे किसी कोने में चुपचाप पड़े रहते हैं. पास आओ तो भाग खड़े होते हैं. वो खुद इतने डरे होते हैं कि कभी-कभी तो अपने अक्स से भी घबरा जाते हैं. फिर भला ये निरीह किसी को क्या डराएंगे. जो खुद डरा हुआ हो वो किसी को डरा भी कैसे सकता है.
कुत्ते सदियों से ही वफादारी की परंपरा को निभाते आए हैं. वो बात अलग है कि मनुष्य जानकर भी अंजान बना रहता है. बेचारे लात खाते हैं, गाली खाते हैं मगर सोते उसी चौखट पर हैं जहां उन्हें कभी आसरा मिला था. मनुष्य भले ही विलासिता के समुंदर में मानवता की गठरी बहाकर क्रूर और निर्दयी बन बैठा हो मगर ये बेजुबान आज भी प्यार का अथाह सागर अपने छोटे से दिल में समाए बैठे हैं. प्यार के बदले प्यार कैसे किया जाता है, यह इनसे बेहतर भला कौन समझा सकता है. मनुष्य हमेशा से ही अपनी जरूरतों के मुताबिक रिश्तों की उधेड़बुन करता रहा है. जिन उंगलियों के सहारे वह चलना सीखता है वक्त निकल जाने के बाद उन्हें झटकने में एक पल की भी देर नहीं करता. जिन कंधों पर बैठकर वह दुनिया देखता है उन कंधों को कंधा देना भी अपना धर्म नहीं समझता. मनुष्य सिर्फ ढोंग करता है. बचपन में सच्चा बनने का और जवानी में अच्छा बनने का, लेकिन बेजुबान, वे बेचारे न तो ढोंग का मतलब जानते हैं और न ही छल-कपट उन्हें आता है. उन्हें आता है तो बस प्यार करना. लाख मारो, लाख सताओ फिर भी एक पुचकार पर उसी स्नेहभाव और आदर के साथ आपका सम्मान करेंगे जैसा हमेशा करते रहे हैं.
रंग बदलने की प्रवृत्ति न तो उनमें कभी थी और न ही कभी होगी. यह काम तो मनुष्य का है. कुत्तों को इंसान का दोस्त समझा जाता है मगर चकाचौंध और ऐशोआराम से भरी मनुष्य की जिंदगी में इस बेजुबान दोस्त के लिए कोई जगह नहीं. गली-मोहल्लों में किसी तरह अपना गुजर-बसर करने वाले आवारा कुत्ते भी अब उसकी आंखों में खटकने लगे हैं. अभी कुछ वक्त पहले बेंगलुरु और उसके बाद जम्मू-कश्मीर में जिस निर्दयता से आवारा कुत्तों को मौत के घाट उतारा गया, ऐसा काम तो सिर्फ इंसान ही कर सकता है. गले में रस्सी बांधकर बड़ी निर्ममता के साथ उन्हें घसीटकर ऐसे गाड़ी में फेंका गया, जैसे वो कोई कूड़े की गठरी हों. बेचारे चीखते रहे, चिल्लाते रहे, अपनी जिंदगी की भीख मांगते रहे, मगर किसी को दया नहीं आई. इन बेजुबानों का कसूर सिर्फ इतना था कि वो शहर के सौंदर्यीकरण में फिट नहीं बैठ रहे थे.
मनुष्य शक्तिशाली है, उसे किसी भी बेजुबान को मारने का हक है, पर उसे ये हक किसने दिया? शायद भगवान ने तो नहीं. सृष्टि की रचना के वक्त ईश्वर ने अन्न बांटने से पूर्व सबसे पहले कुत्तों को बुलाकर कहा, पृथ्वी का सारा अन्न मैं तुम्हें देता हूं, पर कुत्तों ने निवेदन किया कि इतने अन्न का हम क्या करेंगे? अन्न आप मनुष्य को दे दीजिए. वो खाने के बाद जो कुछ भी बचाएगा हम उससे गुजारा कर लेंगे. बद्किस्मती से मनुष्य खाता तो खूब है मगर कुत्तों के लिए बचाता बिल्कुल नहीं. खाने की हर दुकान के सामने बेचारे टकटकी लगाए इस उम्मीद में बैठे रहते हैं कि शायद मनुष्य को उनके हाल पर दया आ जाए, पर अमूमन ऐसा होता नहीं. टिन के पिचके हुए डब्बे की माफिक पतला-सा पेट, आंखों में डर और खामोशी लिए बेचारे एक-एक दाने के लिए यहां-वहां भटकते रहते हैं. कुछ रुखा-सूखा मिल गया तो ठीक वरना भूखे ही सो जाते हैं, पर वफादारी और प्यार के जज्बे पर कभी भूख को हावी नहीं होने देते. ऐसे निरीह को बेतुकी दलीलों और शहर के सौंदर्यीकरण की खातिर मौत की नींद सुला देना क्या हम इंसानों को शोभा देता है?

नीरज नैयर

ऐसे क्रि के टर किस काम के


नीरज नैयर
अभी हाल ही में एक खबरिया चैनल के टॉक शो में इस बात पर बहस चल रही थी कि क्या सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न से नवाजा जाना चाहिए. जाहिर है क्रिकेट को धर्म और क्रिकेटरों को देवता समझने वालों केमुंह से न कैसे निकल सकता है. सो अधिकतर लोगों के हाथ हां में ही खड़े हुए. खेल जगत में अगर सचिन की उपलब्धियों को सहेज कर देखा जाए तो उनके कद के आगे हर पुरस्कार छोटा है.
अपने चौकों-छक्कों से क्रिकेट की किताब में भारत की जो तस्वीर उन्होंने उकेरी है वह अतुल्य है. खेल की दुनिया केबड़े से बड़े सम्मान पर बेशक सिर्फ और सिर्फ उनका ही नाम हो सकता है लेकिन जहां तक भारत रत्न का सवाल है कोई क्रिकेटर इसका हकदार नहीं दिखाई देता. भारत रत्न किसी ऐसे व्यक्ति को दिया जाना चाहिए जिसने हर पहलू में देश के लिए अनुकरणीय योगदान दिया हो. सचिन ने खेल दुनिया में बहुत कुछ किया पर समाज के लिए उनके या किसी भी अन्य क्रिकेटर ने कभी कुछ किया हो ऐसा याद नहीं आता. क्रिकेट अन्य देशों के लिए भले ही एक खेल से ज्यादा कुछ न हो मगर भारत में यह किसी धर्म से कम नहीं. क्रिकेट के प्रति समर्पण और उन्माद का जो नजारा भारत में देखने को मिलता है वह कहीं और नहीं मिल सकता. क्रिकेट अगर यहां धर्म है तो क्रिकेटर भी किसी अवतार से कम नहीं. उन्हें यहां भगवान की तरह पूजा जाता है, उनकी मंगलकामना के लिए व्रत रखे जाते हैं, हवन किए जाते हैं. हां, उनके खिलाफ कभी-कभार नाराजगी जरूर झलक पड़ती है मगर वो भी क्षणिक भर से ज्यादा नहीं. ठीक वैसे ही जैसे कोई भक्त मनोकामना पूरी न होने पर थोड़ी देर के लिए तो मुंह फुला सकता है मगर हमेशा के लिए अपने भगवान से रूठे नहीं रह सकता. विश्वकप जैसे अहम् मुकाबलों में हारने के बाद भले ही उनके घरों पर पत्थर फेंके जाते हों मगर बांग्लादेश जैसी दोयम दर्जे की टीम को हराने के बाद कंधें पर भी उन्हें ही बिठाया जाता है. सही मायनों में कहें तो क्रिकेट शहर से लेकर गांव तक बच्चों से लेकर बूढ़ों तक देश को धर्म की भांति एक सूत्र में पिरोने का काम करता है. क्रिकेट और क्रिकेटरों का देश में एकक्षत्र राज है उनके आगे किसी दूसरे को तवाो दी गई हो ऐसा शायद ही कभी देखने-सुनने में आया हो. भले ही इस उपमहाद्वीप पर क्रिकेट में आए पैसे की बात सबसे अधिक होती है लेकिन सही मायने में देखा जाए तो केवल भारत ही कुबेर है.
पिछली भारत-पाक सीरीज के वक्त पाकिस्तानी खिलाडी यह गुजारिश करते फिर रहे थे कि किसी भारतीय कंपनी के साथ करार करवा दो. उनकी कमाई का अंदाजा तो इससे ही लगाया जा सकता है कि साक्षात्कार चाहने वाले पत्रकारों से वह 100-200 डॉलर मांगने में भी गुरेज नहीं करते. पिछले दस सालों के दौरान क्रिकेट में इतना पैसा आया है कि इससे जुड़े लोगों से संभाले नहीं संभलरहा है. सिर्फ सचिन, सौरव और गांगुली ही नहीं धोनी-युवराज जैसे खिलाड़ियों की युवा ब्रिगेड भी करोड़ों में खेल रही है. कॉरपोरेट जगत के तकरीबन 60 फीसदी विज्ञापनों पर क्रिकेटरों का कब्जा है, इसके अलावा बोर्ड द्वारा दी जाने वाली रिटेनरशिप फीस से लाखों के वारे-न्यारे अलग हो जाते हैं.
धोनी एक फीता काटने के 20 लाख लेते हैं तो युवराज रैंप पर चलने को 40. क्रिकेट ने इन लोगों को इतना दिया है कि दोनों हाथों से लुटाने पर भी जेब खाली नहीं होने वाली. पर अफसोस कि दोनों हाथ से लुटाना तो दूर इनकी जेब से एक धेला तक नहीं निकलता. दुनिया के हर धर्म में परोपकार और सामाजिक दायित्व का तत्व विद्यमान होता है मगर जब बात हमारे क्रिकेटरों और क्रिकेट की आती है तो इसका साया तक उन पर नहीं दिखाई देता. देश की जनता से क्रिकेटरों को जो शानो-शौकत मिली है उसके बदले में वह कभी कुछ लौटाते नजर नहीं आते. पड़ोस में पाकिस्तान की ही अगर बात करें तो इमरान खान ने अपने सेलेब्रिटी स्टेटस की बदौलत ही कैंसर का एक बड़ा सा अस्पताल खड़ा कर डाला. आस्ट्रेलिया के स्टीव वॉ वर्षो से बच्चों के कल्याण के लिए कुछ न कुछ करते रहे हैं. ऐसे ही न्यूजीलैंड के क्रिस कैंस से लेकर टेनिस स्टार रोजर फेडरर तक हर कोई समाज के प्रति अपनी भूमिका पर खरा उतरा है. मगर लगता है हमारे क्रिकेटरों को इस बात से कोई सरोकार नहीं, उन्हें सरोकार है तो बस इस बात से कि कैसे कम से कम वक्त में ज्यादा से ज्यादा पैसे बटोरे जाएं. हमारे देश में सचिन तेंदुलकर भले ही एक-आध बार कैंसर पीड़ित बच्चों में खुशियां बांटते नजर आए हों पर बाकि खिलाड़ियों के पास तो शायद इतना भी वक्त नहीं. कहने का मतलब यह हरजिग नहीं है कि क्रिकेटर सबकुछ छोड़कर समाज सेवक बन जाएं, किसी सेलिब्रिटी के समाज कल्याण के कार्यो से जुड़ना उसके उद्देश्यों की प्राप्ति में प्रेरक होता है.
बड़े नामों के साथ आने से न केवल मुद्दे सुर्खियों में रहते हैं बल्कि उन्हें आर्थिक सहायता का सहारा भी मिल जाता है. बॉलीवुड का ही अगर उदाहरण लें तो उसने समाजिक दायित्व का निर्वाहन करने में हमेशा मिसाले पेश की हैं. सुनील दत्त और नर्गिस का युद्ध के दिनों में सैनिकों का हौसला बढाना भला कौन भूल सकता है. सूनामी जैसी आपदाओं के वक्त भी क्रिकेटरों के हाथ भले ही न खुले हाें मगर बॉलीवुड कलाकार दिल खोलकर मदद के लिए तैयार रहे हैं. हालांकि यह बात अलग है कि उनकी कोशिशों पर रह-रहकर सवाल भी उठते रहे हैं. कोई इसे पर्सिनलसिटी स्ंटट कहता हैं तो कोई कुछ और. पर हमारे क्रिकेटर तो कभी भी कुछ ऐसा करने की जहमत नहीं उठाते जिससे वे इन सवालों में घिरें.
यह सिर्फ अकेले खिलाड़ियों की ही बात नहीं है, घर का बड़ा ही अगर नालायक हो तो फिर बच्चों के क्या कहने. दुनिया के सबसे अमीर बोर्ड का दर्जा पाने वाले बीसीसीआई का भी सामाजिक दायित्व से दूर का नाता नहीं है. भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का सालाना कारोबार करोड़ों रुपए का है, वर्ल्ड कप के दौरान महज टीवी करार से ही उसने 1200 करोड़ से अधिक की कमाई की थी. मगर आज तक शायद ही कभी कोई ऐसी खबर सुनने में आई हो जब बोर्ड ने खुद आगे बढ़कर समाज के लिए कुछ किया हो. सिवाए बरसो-बरस आयोजित होने वाले एक-दो चैरिटी मैचों के. अक्सर सुनने में आता है कि फंला खिलाड़ी ने आर्थिक तंगी के चलते मौत को गले लगा लिया, इसका सबसे ताजा उदाहरण उत्तर प्रदेश का है, जहां आर्थिक बदहाली ने एक होनहार रणजी खिलाड़ी को जान देने पर मजबूर कर दिया. क्या बीसीसीआई का ऐसे खिलाड़ियों के प्रति कोई दायित्व नहीं . बोर्ड कतई चैरिटी न करे मगर इतना तो कर सकता है कि क्रिकेट मैच के टिकट ब्रिकी से होने वाली आय में से एक रुपया ऐसे खिलाड़ियों के कल्याण में लगा दे. देश के लिए कुछ करना तो बहुत दूर की बात है अपनी खिलाड़ी बिरादरी के लिए तो बोर्ड कुछ कर ही सकता है. क्या इतना बड़ा कारोबार और क्रिकेटरों की चमक-धमक महज मनोरंजन तक ही सीमित है. क्या बोर्ड और खिलाड़ियों का जेब भरने के अलावा कोई सामजिक दायित्व नहीं है, और अगर नहीं है तो फिर ऐसा क्रिकेट और क्रिकेटर किस काम के.
नीरज नैयर

Wednesday, July 2, 2008

जबरदस्ती नहीं जग सकता जज्बा



नैयर
दुश्मनों को हर मोर्चे पर मात देने वाली भारतीय सेना आजकल खुद एक नये मोर्चे पर जूझ रही है. अफसरों की कमी और सशस्त्र सेनाओं की तरफ युवाओं के घटते रुझान ने उसके समक्ष कई सवाल खड़े कर दिए हैं. गौरवशाली इतिहास की गाथाएं समेटे भारतीय सेना अपने भविष्य को लेकर चिंतित है. समस्या कितनी गंभीर है इस बात का अंदाज इससे लगाया जा सकता है कि मौजूदा वक्त में भारतीय सेना में करीब 120,000 अधिकारियों की कमी है. पिछले डेढ साल में मेजर और कर्नल रैंक के कोई तीन हजार अधिकारी अपनी मर्जी से सेना को अलविदा कह चुके हैं और करीब 4000 इस कतार में खड़े हैं. दूसरी तरफ सेना में भर्ती की स्थिति भी कतई अच्छी नहीं है. सेना में सबसे ज्यादा कैडेट्स इंडियन मिलिट्री अकादमी के रास्ते आते हैं. अकादमी अपने 250 कैडेट्स भर्ती कर सकती है लेकिन आलम यह है कि यहां मात्र 86 प्रशिक्षु ही हैं. एनडीए का हाल भी कुछ ऐसा ही है. हर पाठयक्रम में यहां 300 कैडेट्स की जगह होती है लेकिन केवल 92 ही भर्ती हुए हैं. और इससे भी ज्यादा चिंता की बात तो यह है कि बहुतों ने चयन के बाद भी सेना से किनारा कर लिया है. ऐसे में थलसेनाध्यक्ष दीपक कपूर के उस बयान पर गौर किया जा सकता है जिसमें उन्होंने सैन्य सेवा को अनिवार्य करने की बात कही थी. मगर सवाल यह उठता है कि क्या देश सेवा का जज्बा जबरदस्ती जगाया जा सकता है? क्या मातरे वतन पर जान लुटाने वालों की फौज जबरदस्ती तैयार की जा सकती है?
इस बात में कोई दो राय नहीं कि समस्या बहुत विकराल है और अगर जल्द ही कुछ नहीं किया गया तो आने वाले वक्त में सेना को जवानों के लिए तरसना पड़ सकता है. मगर इसका मतलब यह नहीं है कि उन कंधों पर भी जबरन जिम्मेदारी डाली जाए जो इसे उठाने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं है. यह जरूरी नहीं कि आईएएस और आईपीएस भी फौज के लिए फिट हो सके. सेना केवल एक नौकरी नहीं अनुशासन की शपथ और देश सेवा का संकल्प भी है. सेना की अपनी पूरी एक संस्कृति है और इसमें ढलना हर किसी के बस की बात नहीं. यहां यह कहना गलत होगा कि लोग सेना में भर्ती नहीं होना चाहते. वॉलेंटियर्स की अब भी देश में कमी नहीं है. संघ लोकसेवा आयोग के माध्यम से जब सैन्य अधिकारियों का विज्ञापन निकलता है तो बढ़ चढ़ कर आवेदन किए जाते हैं. लेकिन चयन प्रक्रिया से गुजारने के बाद जब आईएमए में पाठयक्रम के लिए उन्हें आमंत्रित किया जाता है, तो नवयुवक आवेदन पत्र लेते ही सेना में आने से बचने लगते हैं. वे निजी संस्थानों में नौकरी के लिए चले जाते हैं. निजी क्षेत्र भी इन्हें वरीयता देता है, क्योंकि सेना के मानदंडों पर ये नौजवान खरे उतरे होते हैं. इसलिए इस बात की गारंटी होती है कि गुणवत्ता, आचरण, व्यवहार और मनोदशा के मामले में यह उत्तम है. यह प्रचलन तेजी से बढ़ा है. यही वजह है कि आएमए आदि में सीटें रिक्त रह जा रही हैं. इसलिए यह मान लेना कि सेना में जाने वाले लोगों की कमी है, ऐसी बात नहीं है. वैसे भारत अकेला नहीं है जो फौज की नौकरी के प्रति बेरुखी से दो चार हो रहा है. कई बड़े देशों को इस समस्या से जूझना पड़ा है.
पश्चिमी देशों में तो लोग सेना की नौकरी के लिए आवेदन ही नहीं करते. अमेरिका, यूरोप, ब्रिटेन, रूस जैसे देशों में सेना की नौकरी के लिए प्रोत्साहित करने पर हजार डॉलर की प्रोत्साहन राशि तक दी जाती है. गनीमत है कि हमारे देश में अभी यह स्थिति नहीं है. हमारी सेना में जूनियर लेवल यानि लेफ्टिनेंट, कर्नल आदि पदों पर अधिकारियों की सबसे ज्यादा कमी है, जबकि ब्रिगेडियर, फुल कर्नल लेवल पर कोई खास कमी नहीं है. एक अनुमान के मुताबिक, जूनियर लेवल पर 30 फीसदी अधिकारी कम हैं. जबकि, सेना की सबसे ज्यादा जरूरत जूनियर लेवल पर ही है, क्योंकि यही अधिकारी मेन कार्य से जुड़े होते हैं. साथ ही, पेट्रोलिंग और बॉर्डर पर पोस्टिंग इन्हीं अधिकारियों की होती है. नई पीढ़ी में सेना के प्रति बेरुखी की कई वजहें हैं. कम तनख्वाह, कठिन कार्यशैली और अनिश्चित भविष्य. आज का मध्यवर्गीय युवा मोटी तनख्वाह वाली ऐसी नौकरी चाहता है, जिसमें उसे शहर और परिवार से ज्यादा दूर न जाना पड़े. जंगलों, पर्वतों और रेगिस्तानों में जाकर नौकरी करने के बारे में तो कम ही लोग सोचते हैं. युवाओं के सामने आज कई विकल्प और अवसर मौजूद हैं, जो सुरक्षित तो हैं ही, ज्यादा आकर्षक भी हैं. इन नौकरियों में शुरुआती दौर में ही तनख्वाह पांच अंकों में मिलती है. ऐसी नौकरियों में ग्लैमर भी है, लेकिन सेना में न तो ग्लैमर है और न खास तनख्वाह. जबकि इसमें जान जोखिम में बनी रहती है. अधिकारियों की पोस्टिंग शुरुआत में जम्मू-कश्मीर और नॉर्थ ईस्ट में होती है, जहां हर पल जान का खतरा बना रहता है. यही नहीं, फौज में टैलेंट के बावजूद स्लो प्रमोशन की हकीकत तेज रफ्तार युवा पीढ़ी के माफिक नहीं बैठती. ऊपर से लंबे समय तक परिवार से दूरियां भी युवाओं को इस पेशे में आने से रोक रही हैं.
इसके साथ-साथ बीते कुछ समय में खुदकुशी के बढ़ते मामलों ने भी सेना की छवि को खराब किया है. समय अब बदल रहा है, जब युवाओं को आसान नौकरी और ज्यादा धन मिल रहा है, तो उनकी प्राथामिकता भी बदल रही हैं. अनिवार्य सैन्य सेवा समस्या का महज एक विकल्प हो सकता है. लेकिन जरूरत इस बात की है कि सैनिकों को पूरा सम्मान दिलाया जाए. उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत किया जाए, ताकि वे अपने परिवार के बारे में चिंता छोड़ दें. आज एक सैन्य अधिकारी अपने साथ पढ़ने वाले सहयोगी को दूसरी नौकरी में कई तरक्कियां कर धनवान होते हुआ देखता है, तो वह अपने बच्चों को सेना में जाने के लिए भला क्यों प्रेरित करेगा? समाज सैनिक को सम्मान नहीं देता. प्रशासन उनकी गैर मौजूदगी में परिवार की देखभाल नहीं करता. सैनिक सीमा पर लड़ाई करता है, तो गांव में उसकी जमीन पर कोई और कब्जा कर लेता है. ऐसे में कैसे उम्मीद की जा सकती है कि लोग एशोआराम से लबरेज जिंदगी त्याग कर सेना की कठिन नौकरी में जाना पसंद करेंगे. इसलिए सेना में अनिवार्य सेवा के बजाय रचनात्मक उपायों की तरफ सोचना ज्यादा बेहतर होगा. टफ कार्यशैली के बीच वो चार्म बनाना होगा जिससे युवा अपने आप खिंचे चले आएं. अमूमन शॉट टर्म में जाने वाले युवा अपने भविष्य को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं होते, उन्हें पता नहीं होता कि सेना छोड़ने के बाद उनकों कौन सी नौकरी मिलेगी. इस बारे में भी योजना होनी चाहिए कि पांच साल बाद नौकरी छोड़ने पर अधिकारी को कौन-सी सुविधाएं दी जाएंगी. उन्हें पेंशन दिए जाने चाहिए. चाइनीज वॉर के बाद कई क्षेत्रों में रिजर्वेशन की व्यवस्था थी. लेकिन अब ऐसा नहीं है.
सैन्य अधिकारियों के समक्ष उनके भविष्य का एक स्पष्ट खाका होना चाहिए. अनिवार्यता किसी भी समस्या का हल नहीं हो सकती. जबरदस्ती काम तो कराया जा सकता है मगर देश सेवा का भाव नहीं जगाया जा सकता. लिहाजा मौजूदा समस्या से निपटने के लिए अनिवार्यता की नहीं जरूरत है रास्ते की बाधाओं को निकाल फेंकने की
नीरज नैयर

Saturday, June 21, 2008

पाकिस्तान के हालात पर आंसू क्यों बहाएं

नीरज नैयर
पाकिस्तान इस वक्त राजनीतिक अस्थिरता और उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है. जम्हूरियत की एक आखिरी उम्मीद भी बेनजीर की सांसें थमने के साथ ही खत्म हो गई है. पूरब की बेटी के गम में पाकिस्तान मातम में डूबा है तो भारत सदमे में है. भुट्टो को मिल रहे चौतरफा समर्थन से उनका प्रधानमंत्री बनना तय माना जा रहा था. लिहाजा भारत को आस थी कि बेनजीर के रूप में नई सरकार के साथ दोनों देशों के रिश्तों को मजबूत करने की दिशा में कोई सार्थक पहल हो सकती थी. हालांकि पाकिस्तान की विदेश नीति तो उसकी सेना और राष्ट्रपति मुशर्रफ द्वारा ही संचालित होती लेकि न एक जनतांत्रिक सरकार की स्थापना के बाद पाक के साथ चलने वाली शांति प्रक्रिया को विश्वनीयता जरूर मिलती. भारत सरकार का सोचना था कि अकेले बेनजीर ही भारत-पाक विवाद को निपटाने का माद्दा रखती थीं. खैर सरकार का काम सोचने का है, वह कुछ भी सोच सकती है. पर हकीकत यह है कि बेनजीर भुट्टो के सत्तारुढ होने के बाद भी भारत के लिए अनुकूल माहौल शायद ही बनता और अगर बनता भी तो दोनों देशों के विवाद तुरंत हल होने लगते इस बात की कोई उम्मीद नहीं थी.
सत्ता में लौटने को बेकरार बेनजीर ने वतन वापसी के वक्त भारत के साथ मधुर संबंधों की जो बड़ी-बड़ी बातें कहीं थी, सत्ता में आने के बाद वह उन्हें भुला भी देतीं तो कोई आश्चर्य नहीं होता. यह तो भुट्टो परिवार की फितरत में रहा है. पाकिस्तान टूटने के बाद जब बेनजीर के अब्बा जान जुल्फिकार अली भुट्टो के हाथ में सत्ता आई तो उनकी पहली प्राथमिकता थी, करीब एक लाख युद्धबंदियों की पाक वापसी और लगभग 10 हजार वर्ग किलोमीटर पाकिस्तानी भूमि की भारत के कब्जे से मुक्ति. याहया खान से सत्त संभालने के बाद भुट्टो ने पाकिस्तानी रेडियो से करीब एक घंटे का राष्ट्र के नाम जो संदेश दिया, उसमें उन्होंने कहा, इंशा अल्लाह, हम भारत से बदला लेंगे, हम एशिया की सबसे बेहतरीन फौज खड़ी करेंगे. हम बदला लेकर ही रहेंगे. हमने एक मोर्चा हारा है पूरी जंग नहीं. जुल्फी जब विदेशमंत्री थे तब भी वह अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षाओं के चलते भारत को ललकारने और उससे तकरार बढ़ाने की रणनीति पर काम करते रहे. इससे उन्हें भारत के शत्रु चीन के साथ पाकिस्तान के संबंध सुधारने में भी सफलता मिली. अपने दुस्साहस के चलते 1971 में मुंह की खाने के बाद भुट्टो जब अपनी बेटी बेनजीर के साथ शिमला पहुंचे तो शुरूआती दो दिन बात नहीं बन पाई. जुल्फी खाली हाथ ही लौट रहे थे कि इंदिरा गांधी से मुलाकात तय हो गई. तब भुट्टो ने भर्राये गले से कहा था इंदिराजी प्लीज सेव मी. बस यहीं से शिमला समझौते की शुरूआत हुई. युद्धबंदियों और अधिकृत जमीन की वापसी इस शर्त पर हुई कि भुट्टो कश्मीर में नियंत्रण रेखा को अंतरराष्ट्रीय रेखा बनाने के लिए काम करेंगे. मगर पाकिस्तान पहुंचते ही जुल्फी अपना वादा भूल गये और एटम बम बनाने में जुट गये. भुट्टो ने तब अपना रंग दिखाते हुए कहा था कि हम घास खाकर रहेंगे लेकिन बम जरूर बनाएंगे. भारत और भुट्टो परिवार के रिश्तों में यह बात भी उल्लेखनीय है कि जनरल जिया ने मार्च 1979 में जब जुल्फिकार को फांसी की सजा दी, उस वक्त प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और विदेशमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे. देसाई या वाजपेयी ने जनरल जिया से भुट्टो को माफी देने की अपील नहीं की. शायद कहीं न कहीं वह भुट्टो को करनी की सजा मिलते देख खुश थे.
भारत उन चंद देशों में से एक था जो चुप्पी साधे बैठा रहा. इसके बाद बेनजीर ने जब सत्ता संभाली उस वक्त भारत की डोर भी राजीव गांधी के युवा हाथों में थी. दोनों को युवा आर्दशवादी कहा गया, कहा गया कि दोनों के बीच पर्सनल केमिस्ट्री अच्छी है. यह भी चर्चा हुई कि सिख आतंकवाद के पाकिस्तान से कनेक्शन काटने या कमजोर करने में बेनजीर ने अहम् भूमिका निभाई जबकि सर्वविदित सच यह है कि बेनजीर के शासन में ही तालिबानीक शुरू हुआ. बेनजीर ने भी सियासी दलदल में खुद को जमाने के लिए उन्हीं कंधों का सहारा लिया जिनका मुशर्रफ ले रहे हैं. अफसोस की बेनजीर की सांसें उन्होंने ही रोकी जिन्हे खुद बेनजीर ने ही जन्म दिया था. पिछले दशक के दौरान अफगानिस्तान में अपना प्रभाव बनाने के इरादे से तालिबान को पैदा करने, इसे पनपने देने और पांव जमाने की रणनीति बेनजीर ने ही तैयार की थी. नब्बे के दशक के शुरू में भुट्टो ने अफगानिस्तान पर तालिबानी शासन स्थापित करने में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया.जब तालिबान अस्तित्व में आया तो दूसरे शासकों ने इसको जीवित रखने की पूरी कोशिश की और अमेरिका समझता रहा कि तालिबान उसके लिए कभी खतरा नहीं हो सकता. लेकिन जब पाकिस्तान द्वारा बोया गया, अमेरिका द्वारा सींचा गया तालिबान अमेरिका के लिए खतरा बना तो उसकी आंखें खुलीं. जिस तालिबान के सफाए के लिए अमेरिका ने पाक को 5 अरब डॉलर की सैन्य सहायता दी पाक ने उसका इस्तेमाल भारत के खिलाफ अपनी ताकत मजबूत करने में लगाया. 1988 में जब पहली बार बेनजीर भुट्टो प्रधानमंत्री बनीं तभी से आईएसआई की इस नीति को समर्थन प्रदान किया गया कि अफगानिस्तान में पाक समर्थक तालिबानियों को सत्ता में बिठाया जाए. अमेरिका की भी उस वक्त यही चाहत थी. बेनजीर भुट्टो की मौत पर दुख जाहिर करते हुए विदेशमंत्री प्रणव मुखर्जी ने कहा था, बेनजीर का भारत-पाक रिश्ते बेहतर बनाने में अहम् योगदान था, वह इस उपमहद्वीप की सर्वश्रेष्ठ महिला नेता थीं. मुखर्जी किस महत्वपूर्ण योगदान की बात कर रहे हैं यह बात तो सिर्फ और सिर्फ वही बता सकते हैं. लेकिन जो लोग भुट्टो परिवार की रग-रग से वाकिफ हैं वह इस बात को भली-भांति जानते हैं कि उनकी कथनी और करनी में कितना अंतर है. सच तो यह है कि पाक में सिंहासन पर चाहे कोई भी बैठे भारत के प्रति उसका रवैया एक जैसा ही रहता है. फिर चाहे बात जिया उल हक की हो या जुल्फिकार अली की या फिर बेनजीर भुट्टो की सबकी प्राथमिकता एक ही रही है, भारत को कमजोर बनाना.
जहां तक दोनों देशों के संबंधों का सवाल है, वे बहुत आशाजनक नहीं हैं. दोनों के बीच समस्याएं केवल बची ही नहीं हैं, उनकी फेहरिस्त और लंबी होती जा रही है. पाकिस्तान कश्मीर का विवाद अपनी इच्छानुसार अंतरराष्ट्रीय सभा-सम्मेलनों में उठाता रहा है. भारत में आतंकवादी गतिविधियों को संचालित करने से भी वह अब तक बाज नहीं आया है. पाकिस्तान आज जिस दोराहे पर खड़ा है वह रास्ता खुद उसी का बनाया हुआ है, लिहाजा उसके हाल पर बेवजाह आंसू बहाकर वक्त बर्बाद करने से बेहतर होगा कि हम अपना घर दुरुस्त करने में लगें.
नीरज नैयर

गिरावट से सबक सीखने का वक्त

नीरज
सेंसेक्स एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार अपनी ऊंचाइयों को लेकर नहीं बल्कि बीते दिनों आई जबरदस्त गिरावट को लेकर। 21 व 22 जनवरी को सेंसेक्स की सूनामी में करोड़ों बहने से पूर्व जो निवेशक टाटा की लखटकिया में सुहाने सफर के सपने संजो रहे थे, वो अब दुपहिया खरीदने तक की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं. कारण साफ है, जेब खाली है, और बैंक पहले ही खाली कर चुके हैं. जिन निवेशक ने थोड़े ही वक्त में ज्यादा कमाने के इरादे से सेंसेक्स की सीड़ी पर पैर जमाने का प्रयास किया था उनके पास अब आंसू बहाकर पांव सहलाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है. दरअसल सेंसेक्स की रफ्तार जितनी तेजी से ऊपर जा रही थी उससे कहीं न कहीं यह दशा (अंदेशा) तो था कि यह लुढक सकता है, मगर इतनी तेजी से लुढकेगा यह किसी ने नहीं सोचा था. इस गिरावट ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि सेंसेक्स हमेशा ऊपर की तरफ ही नहीं जाता, बाजार में नीचे गिरने का रास्ता भी मौजूद होता है. वैसे भी शेयर बाजार में तीव्र तेजी का दौर ज्यादा लंबे समय तक नहीं टिक सकता. बाजार में छाई मंदी और उसके कारणों की गहराई में उतरने से पहले यह समझना बेहतर होगा कि शेयर और शेयर बाजार आखिर होता क्या है.
शेयर बाजार वास्तव में वह जगह या बाजार होता है जहां प्रतिभूतियों के खरीददार एजेंटो के माध्यम से शेयर का लेन-देन करते हैं. शेयर धारक को कंपनी के स्वामित्व में उसके द्वारा खरीदे गये शेयरों के अनुपात में भागीदारी प्राप्त होती है. किसी भी बाजार में गिरावट का सीधा सा एक ही कारण होता है, खरीददारों की कमी और बेचने वालों की अधिकता. 21 व 22 को भी कुछ ऐसा ही हुआ. भारतीय बाजारों में विदेशी निवेश बड़ी मात्रा में है. सेंसेक्स की 30 महत्वपूर्ण कंपनियों में तो विदेशी संस्थागत निवेशकों की भागीदारी जबरदस्त है. ऐसे में अमेरिकी अर्थव्यवस्था चरमराने से घबराए विदेशी निवेशक चौतरफा बिकवाली कर रहे हैं, जिसकी वजह से सेंसेक्स का यह हाल हो रहा है. अमेरिका में यह हालात ऐसे समय पैदा हुए हैं जब सालों से अच्छा कर रही अर्थव्यवस्था को देखते हुए अमेरिकी बैंकों ने ऐसे लोगों को भी मकान खरीदने के लिए कर्ज दे डाले जो लौटाने की हैसियत नहीं रखते थे. कुछ वक्त बाद जब बैंकों को इस बात का इल्म हुआ कि उनके भंडार में उतना पैसा नहीं जितना वो सोच कर चल रहे थे तो घबराए बैंकों ने कर्ज देना बंद कर दिया. यहां तक कि सहायक बैंकों तक को पैसा देने से इंकार कर दिया और बाजार में पैसे की किल्लत हो गई. जिसके चलते पूरी की पूरी अर्थव्यवस्था डगमगा गई और यूरोप से लेकर एशिया तक के शेयर बाजार औंधे मुंह गिर पड़े. बाद में जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने राहत पैकेज की घोषणा की तब कहीं जाकर बाजार ने सांसे लेना शुरू किया. यह सांसे अब कब तक चलेंगी यह कहना अभी जरा मुश्किल हैं. वैसे शेयर बाजार में गिरावट का यह सिर्फ एक पहलू है, इसकी दूसरी वजह है बाजार में तेजी से पैर फैलाते शॉट टर्म सट्टेबाज. एक समय था जब शेयर कारोबार में गिने -चुने लोग ही उतरा करते थे. मगर अब तो जैसे बाढ़ सी आ गई है. हर दूसरा व्यक्ति शेयर के खेल में अपनी किस्मत आजमाने में लगा हुआ है. यहां तक कि लोग उधार उठा-उठाकर बाजार में पैसा फंसाए बैठे हैं. इस उम्मीद में कि दुगना रिटर्न मिलेगा. हालिया गिरावट को अगर छोड़ दिया जाए तो बाजार ने पिछले कुछ वक्त में ऊंचाई का जो मुकाम हासिल किया है. उससे लोगों को यह लगने लगा है कि यहां निवेश करके एक ही रात में लखपति बना जा सकता है. जबकि तारीख़ गवाह है कि जिसने भी बाजार में लंबा टिकने का साहस दिखाया है, मुनाफा भी उसी ने कमाया है. अक्सर छोटे निवेशक मंदी के दौर में डूबने के डर से बाजार से निकलने की जल्दबाजी में धड़ाधड़ बिकवाली करके बाजार का बैंड बजा देते हैं. बाजार में मौजूदा उथल-पुथल का जो दौर चल रहा है उसके लिए हर कोई अमेरिका को कठघरे में खड़ा कर रहा है, मगर जब बाजार बेलगाम घोड़े की तरह ऊपर की तरफ भागा जा रहा था, क्या तब किसी ने सोचा था कि इसका क्रेडिट किसे दिया जाए?. सरकार अपनी पीठ थपथपाए नहीं थक रही थी कि हमारी अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है. वित्तमंत्री तो अब भी यही दिलासा दिलाए जा रहे हैं कि घबराने की कोई जरूरत नहीं है. पर क्या अपनी गाढ़ी कमाई को डूबते देख भला कोई मुस्कुरा सकता है? सच तो यह है कि बाजार अभी कितने गोते और लगाएगा, इस बात का अंदाजा तो खुद वित्तमंत्री को भी नहीं होगा. असल बात तो यह है कि विदेशी पूंजी का शेयर बाजार में जब तक प्रवाह बना रहा, सेंसेक्स आसमान छूता रहा और जैसे ही यह प्रवाह रुका आसमान से जमीन पर आने में ज्यादा वक्त नहीं लगा. यह गिरावट एक तरह से सरकार के लिए सबक है, क्योंकि भारतीय बाजार में विदेशी निवेश को लेकर हमारे यहां कोई गाइडलाइन निर्धारित नहीं है. विदेशी निवेशक अपनी मनमर्जी के मालिक होते हैं. उनका जब दिल चाहेगा, जितना चाहेगा लगाएंगे और जब मुनाफा नहीं दिखेगा हाथ खड़े करके निकल जाएंगे. समय-समय पर कई वित्तीय संस्थान और प्रख्यात उद्योगपति राहुल बजाज भी विदेशी निवेश पर नियंत्रण की बात कहते रहे हैं.
लिहाजा इस दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है. इसके साथ ही मौजूदा हालात से इतर शेयर बाजार में निवेश को लेकर जो अंदेशे रह-रहकर जताए जाते रहे हैं, उन पर गंभीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है. आतंकवादियों द्वारा निवेश के लेकर खुद वित्तमंत्री भी चिंता जाहिर कर चुके हैं. ऐसे में, सेबी और दूसरी नियामक संस्थाओं को अधिक से अधिक जिम्मेदार बनाने के रास्ते ढूंढे जाने का सही समय आ गया है. यह ठीक है कि उदारीकरण के लाभ के साथ ही हम उसके जोखिम से बच नहीं सकते. लेकिन जिस रफ्तार से शेयर बाजार ऊपर बढ़ रहा था, उसकी परिणति का ठीक-ठीक आकलन अगर हुआ होता, तो लगातार दूसरे दिन कारोबार को एक घंटे के लिए बंद करने की नौबत नहीं आती. शेयर बाजार से आम आदमी का भले ही सीधा संबंध नहीं हो, लेकिन कहीं न कहीं उसके हितों पर असर तो पड़ता ही है. आखिर देश के कई सरकारी-अर्ध्द सरकारी वित्तीय संस्थान पूंजी बाजार में निवेश करते हैं. यदि इस गिरावट का उनकी आर्थिक सेहत पर असर पड़ता है, तो स्वाभाविक रूप से उनके ग्राहक और उपभोक्ता भी प्रभावित होंगे. शेयर का खेल हमेशा से ही जोखिम भरा रहा है. मगर जितना जोखिम आज हो गया है इतना पहले कभी न था. कारण साफ है, मुनाफा कमाने की जितनी संभावनाएं बढ़ेंगी, जोखिम का स्तर भी उतना ही बढ़ेगा. पहले बाजार में ऊछाल कछुआ गति से होता था मगर अब एक-दो सालों में ही दो गुने-तीन गुने तक पहुंच रहा है. ऐसे में खतरा बढ़ना लाजमी है.
दरअसल पहले विदेशी संस्थागत निवेशकों की बाजार में भूमिका इतनी बढ़ी नहीं थी जितनी आज है. विदेशी निवेशक मुनाफा कमाने के इरादे से धड़ाधड़ पैसा लगाते हैं तो बाजार बल्ले-बल्ले करता है. और जब वही धड़ाधड़ बिकवाली करते हैं तो मातम छा जाता है. शेयर बाजार में गिरावट के लिए कुछ हद तक रिलायंस पावर को भी दोषी करार दिया जा सकता है. कुछ दिन पहले ही रिलायंस पावर लिमिटेड के आइपीओ की रिकॉर्ड बिक्री हुई थी. उस बिक्री का एक दिलचस्प पहलू यह था कि शेयर होल्डरों ने अपने शेयर बेचकर आरपीएल के शेयरों की खरीद की. बाद में विदेशी संस्थागत निवेशक भी इस शुरूआत का हिस्सा बने जिसके चलते बाजार डगमगा गया. बाजार के स्वभाव के बारे में वैसे तो कुछ भी कठिन है मगर इतना तो कहा ही जा सकता है कि जिस तरह ऊंचाई की उड़ान लंबे समय तक नहीं रही, उसी तरह मंदी का अंधियारा भी ज्यादा देर तक नहीं टिक सकता. लेकिन फिर भी जानकारों का मानना है कि शेयर बाजार अभी एक और गोता लगा सकता है. लिहाजा निवेशकों को काफी सोच समझकर इस खेल में अपने हाथ आजमाना चाहिए. ऐसे मूल्य वाले शेयरों के मामले में खासी सतर्कता बरतने की जरूरत है जिनके दाम में अचानक तेजी आई है. फिलहाल अच्छे शेयरों को होल्ड कर सुधार की स्थिति तक इंतजार करना बेहतर होगा.
नीरज नैयर

भारत के लिए सिरदर्द बनेगा नेपाल

नीरज नैयर
संविधान सभा के चुनाव के बाद नेपाल में जो राजनीतिक परिदृश्य उभरकर सामने आया है उससे हर कोई अचंभित है. किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि माओवादी इतने शक्तिशाली रूप में सामने आएंगे. हालांकि फिर भी ऐसे लोगों की जमात कहीं ज्यादा है जो पड़ोस में लोकतंत्र को अच्छा संकेत मान रहे हैं जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है. दरअसल जो लोग माओवादियों के आने पर प्रसन्नता जाहिर कर रहे हैं, या तो उन्हें नेपाल के हालात की अंदरूनी समझ नहीं है या फिर वो मुगालते में ही रहना पसंद करते हैं. नेपाल के साथ हमारे रिश्ते सैंकड़ों साल पुराने हैं. दोनों देशों की सीमाएं एक-दूसरे के लिए हमेशा से खुली रही हैं. असम से होते हुए धुलावड़ी के रास्ते नेपाल में प्रवेश करते वक्त कभी भी इस बात का एहसास नहीं होता कि हम दूसरे मुल्क की सरहद में दाखिल हो रहे हैं, पर नेपाल की राजनीति में मौजूदा बदलाव के बाद शायद रिश्तों की डोर अब उतनी लचीली नहीं रहने वाली. 575 में से 220 सीटें जीत कर आए माओवादी नेता प्रचंड भारत के साथ 1950 में की गई मैत्री संधि को खत्म कर नये सिरे से निर्धारण की बात करके अपने इरादे पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं. हालांकि उन्होंने भारत और चीन से समांतर दूरी बनाकर चलने की बात कही है मगर माओवादियों का चीनी प्रेम जगजाहिर है. सब जानते हैं कि नेपाल में सत्ता संघर्ष के वक्त माओवादियों को पिछले दरवाजे से आर्थिक मदद चीन मुहैया करवा रहा था. दरअसल चीन भारत पर घेरा कसने में लगा हुआ है!
श्रीलंका, म्यामांर और पाकिस्तान आदि देशों में पहुंच बढ़ाकर वह पहले ही हम पर दबाव बना चुका है और अब नेपाल के रास्ते सीधे तौर पर चुनौती देने की कोशिश में है. चीन इस बात को भलि-भांती जानता था कि नेपाल में माओवादियों की सरकार बनवाए बिना वो अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो सकता, इसलिए उसने पर्दे के पीछे से ठीक वैसा ही खेल खेला जैसा एक निर्देशक अपने फिल्म को हिट करवाने के लिए खेलता है. चीन ने तिब्बत के रास्ते नेपाल तक रेल लाइन बिछाने का ऐलान कर दिया है, उसने यह कहकर भारतीय नीति-निर्माताओं के होश उड़ा दिए हैं कि नेपाल ने इसके लिए हरी झंड़ी दिखा दी है. चीन के बारे में मशहूर है कि वो जिस क्षेत्र को कब्जा लेता है उसे कभी हाथ से जाने नहीं देता. चीन के इस ऐलान को अगर 1950 के परिदृश्य में रखकर देखें तो उसकी मंशा स्पष्ट हो जाती है. वह नेपाल के साथ भी वैसा ही कुछ करने की जुगत में लगता है जैसा उसने तिब्बत के साथ किया था. वह रेल लाइन के माध्यम से नेपाल पर अपनी पकड़ और मजबूत करना चाहता है. हालांकि विश्व अब 1950 वाले दौर से बहुत आगे निकल आया है और ड्रैगन का नेपाल सरीखे देश को निगलना उतना आसान नहीं होगा, मगर फिर भी वो नेपाल को अपने अड्डे के रूप में विकसित करके भारत विरोधी गतिविधियों का संचालन अब बड़ी आसानी से कर सकेगा.
माओवादियों के नेपाल की सत्ता पर काबिज होने से भारत के सामने अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर नई चुनौतियां खड़ी होने वाली हैं. भारत में सक्रिय नक्सलवादियों की नेपाल माओवादियों से सांठ-गांठ किसी से छिपी नहीं है. नक्सलवादी न सिर्फ वहां प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं बल्कि वहां से चीन के रास्ते आने वाले अत्याधुनिक हथियारों को भी भारत के खिलाफ प्रयोग कर रहे हैं. वैसे भी नक्सलवाद भारत में सबसे बड़ी समस्या के रूप में उभर चुका है, खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस पर कई बार चिंता जता चुके हैं. ऐसे में पड़ोस में लाल सलाम का नारा बुलंद होने से नक्सलवादियों के हौसले बुलंद होना लाजमी है. नक्सलवादियों को अब लगने लगेगा कि उनका संघर्ष भी एक दिन उन्हें माओवादियों की तरह सत्ता के रास्ते तक ले जा सकता है. खुफिया सूत्रों की अगर मानें तो नक्सलवादी नेपाल के राजनीतिक माहौल को लेकर खासे उत्साहित हैं. प्रचंड की जीत भले ही नेपाल में हुई है मगर उसका जश्न छत्तीसगढ़ के नक्सलवादी बहुल इलाकों में मन रहा है. अगर इन बातों में सच्चाई है तो यह निश्चित ही भारत के लिए खतरें के संकेत हैं. वैसे ये कहना गलत नहीं होगा कि नेपाल पर हमारी विदेश नीति पूरी तरह से असफल रही. पड़ोस में जब उथल-पुथल मची थी उस वक्त सरकार यही मानकर चल रही थी कि वहां अधिकतर प्रतिनिधि नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल यानी एमाले के ही होंगे क्योंकि नेपाली जनता माओवादियों के खूनी खेल से तंग आ चुकी है!
लेकिन चुनाव के नतीजों ने ऐसी सभी आशाओं को हवा में उड़ा दिया. यहां तक की जिन मधेसी नेताओं पर भारतीय दूतावास और खुफिया एजेंसी रॉ का हाथ था वो भी मैदान में चारों-खाने चित्त हो गये. ऐसा नहीं है कि नेपाल में माओवादियों की सत्ता को लेकर सिर्फ भारत ही चिंतित है अमेरिका भी पूरे मसले पर गहरी नजर रखे हुए है. वह भी असमंजस में है कि नेपाल की सत्ता में शामिल माओवादियों को कैसे पचाया जाए. चूंकि अमेरिका ने माओवादियों को आतंकवादी संगठनों की सूची में शामिल किया हुआ है लिहाजा वो इस मामले पर गहन मंथन में लगा है. बहरहाल भारत सरकार भी इस मसले पर चुप्पी साधे हुए है और संभावित खतरों का आकलन करने में जुटी है. जबकि कम्युनिस्ट नेता देश पर आने वाली विपदाओं से किनारा करके नेपाल में प्रचंड को ऐसे बधाई दिए जा रहे हैं जैसे उन्होंने नेपाल के नहीं भारत के चुनाव में जीत हासिल की है!क्या करे भारत
वैसे तो नेपाल में माओवादियों की सरकार बनने से भारत का नेपाल पर बचा-कुचा प्रभुत्व भी समाप्त होने वाला है मगर भारत प्रचंड को उन्हीं के लहजे में जवाब देकर उनकी हेकड़ी को कुछ कम जरूर कर सकता है. प्रचंड चाहते हैं कि 1950 में की गई भारत-नेपाल मैत्री संधि का पुन: निर्धारण किया जाए. मतलब पुरानी संधि को खत्म करके मौजूदा हालात के मद्देनजर नई संधि बने. भारत को चाहिए कि वो नेपाल को यह स्पष्ट करे कि ऐसी स्थिति में उस दौर की व्यापार आदि सारी संधियों का पुन: निर्धारण किया जाएगा. प्रचंड समानता की बात करते हैं जबकि सच ये है कि नेपाल पूरी तरह से भारत पर निर्भर है अगर भारत ने पूर्व में अपने हाथ खींच लिए होते तो नेपाल का क्या होता प्रचंड अच्छी तरह जानते हैं, ऐसे में वो ये कतई नहीं चाहेंगे कि नेपाल को भारत से मिलने वाली सहायता में कोई कटौती आए!
कौन हैं मधेशी नेपाल की कुल आबादी का करीब 40 प्रतिशत तराई क्षेत्र है. इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों को मधेशी कहा जाता है. जिसका मतलब है मध्यक्षेत्र में रहने वाले लोग. ये मधेशी मुख्यत: भारतीय मूल के हैं, जो सैंकड़ों साल पहले रोजीरोटी की तलाश में यहां आकर बस गये. नेपाल में माओवादियों की सरकार बनने से इनके ऊपर सबसे ज्यादा खतरा मंडरा रहा है. क्योंकि माओवादी मधेशियों को नेपाल से भगाना चाहते हैं!

चाल चलने में लगा चीन

नीरज नैयर
अभी हाल ही में खबर सुनने में आई थी कि चीन ने दो भारतीय चौकियों को ध्वस्त कर दिया. चीनी सैनिको ने जो चौकियां धवस्त की वो तोरशानाला के पास ट्राइजक्क्षन क्षेत्र में थीं. जहां भारत-भूटान और चीन की सीमाएं जुड़ती हैं. चीन इसे अपना बताता रहता है और भारत-भूटान अपना. भूटान और भारत की सहमति से इस क्षेत्र की निगरानी भारतीय सेना करती रही है. इसकी वजह यह है कि यह इलाका पूर्वी भारत में प्रवेश के मुहाने पर है. इसलिए भारत के लिए सामरिक दृष्टि से यह महत्वपूर्ण है. हालांकि हमारे रक्षामंत्री कह रहे हैं कि सीमा पर शांति है. शायद वह चीन से किसी बड़े धमाके की उम्मीद पाले हुए हैं. जबकि हकीकत यह है कि चीन धीरे-धीरे अपनी चाल चलने में लगा है. हम भले ही चीन से संबंध सुधारने की बड़ी-बड़ी बातें करें पर सच्चाई यह है कि अब भी ऐसे अनेक मसले हैं जिन पर चीन सीधे मुंह बात तक करने का तैयार नहीं है. चीन के साथ युद्ध को भले ही 45 साल गुजर चुके हैं पर शायद भारत हार को अब तक नहीं भूला पाया है. तभी तो चीन के बंकरण ध्वस्त करने की खबर पर कदम उठाने के बजाय सरकार पर्दा डालने पर तुली है. दुनिया में केवल चीन ही एक मात्र ऐसा देश है जो सीमा विस्तार के जरिए कई देशों की सिहरन बढ़ा रहा है. भूटान के एक बड़े भाग पर कब्जा कर चुके चीन ने दो सालों के दरम्यान लगभग 300 बार भारतीय क्षेत्र पर कब्जे का प्रयास किया है. अरुणाचल प्रदेश में तो चीनी घुसपैठ की खबर आम हो चली है, अब सिक्किम की राजधानी गंगटोक से भी ऐसी खबरें आ रही हैं. चीन अरुणाचल प्रदेश के 90 हजार वर्ग किलोमीटर और भारत-चीन सीमा के 200 वर्ग किमी क्षेत्र पर अपना दावा बताता रहा है. इसके अलावा जम्मू-कश्मीर के 38 हजार वर्ग किमी क्षेत्र पर उसका कब्जा है. पाकिस्तान ने भी 5180 वर्ग किमी पाक अधिकृत क्षेत्र के भारतीय हिस्सों को चीन को सौंप दिया है. वैसे 1962 के बाद चीन ने सीधे तौर पर तो हमें कभी आंख नहीं दिखाई मगर कभी चैन से बैठने भी नहीं दिया. पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार जैसे देशों को संसाधन उपलब्ध कराकर वह हमेशा हमारी आंख में किरकिरी बना रहा है. चीन बढ़ी तेजी से घेरा कसने में लगा है. ल्हासा तथा अन्य क्षेत्रों में चार एयरपोर्ट, सड़कों का जाल तथा रेल नेटवर्क विकसित कर चुका है. जबकि भारतीय सेना को एक पहाड़ी चौकी से दूसरी चौकी पर जाने के लिए अब भी 60 से 80 किमी तक दूरी तय करनी पड़ती है. इतना ही नहीं सिक्किम से लगी सीमा के अंतिम छोर तक पहुंचने के लिह हमारे केवल पास एक ही राजमार्ग है. चीन न सिर्फ जमीनी तौर पर हमारे लिए खतरा है बल्कि समुद्र के रास्ते भी हमें घेरने की कोशिश में लगा है. पाकिस्तान के लिए ग्वाहर में सी पोर्ट विकसित कर दिया है. वहीं सिंगापुर के सेतुवे, श्रीलंका के हंबन टोटा, बांग्लादेश के चटगांव में ऐसा करने की योजना पर काम कर रहा है. उसके पास परमाणु ईंधन से चलने वाली पंडुब्बियां हैं, जो समुद्र में न सिर्फ लंबे समय तक बल्कि गहराई तक जा सकती हैं. भारतीय नौसेना का बड़ा हिस्सा पाक के मुकाबले के लिए मोर्च पर है. ऐसे में चीन का तेजी से अपनी ताकत में इजाफा करना निश्चित ही चिंता का विषय है. चीन महज रक्षा समीकरण के लिहाज से ही नहीं बल्कि भौगोलिक दृष्टि में भी हमेशा कई गुना ज्यादा फायदे में है. वह तिब्बत से हम पर हमला कर सकता है, वैसे स्थिति में केवल 500 मीटर की दूरी होगी और बीजिंग दिल्ली के दरवाजे खटखटा रहा होगा. वह 1000 किमी. रेंज वाली अपनी मिसाइल से उत्तर भारत के किसी भी बड़े शहर को निशाना बना सकता है. जबकि भारत के को ऐसा भौगोलिक लाभ नहीं मिल सकता. कुटनीति के जानकार भी मानते हैं कि चीन की कोशिश हमेशा भारत को दबाने की रही है. और इसके लिए वह पाकिस्तान का सहारा लेता रहा है. खुफिया एजेंसी रॉ के शीर्ष अधिकारी भी स्वीकारते रहे हैं कि चीन का पाकिस्तान को आंख मूदकर सामरिक साझीदार बनाने का कदम चौंकाने वाला है. उसे उद्धपोत, मिसाइल, हथियार और जियान-10 जैसे एयरक्राफ्ट देना उसकी मंशा पर शक करने के लिए काफी है. वैसे चीन का यह रुख कोई नया नहीं है. वह शुरू से ही भारत विरोधी मुहिम की अगुवाई करता रहा है. उसने भारत के परमाणु परिक्षण की दिल खोलकर आलोचना की मगर चुपके से पाकिस्तान को यह तकनीक उपलब्ध करा दी. उसने सुरक्षा परिषद में हमारी दावेदारी का भी पुरजोर विरोध किया और अब भारत-अमेरिकी परमाणु करार पर नाक-मुहं सिकोड़ रहा है. हालांकि एशिया में भारत के तेजी से बड़ते कद और अमेरिका से गहरी होती दोस्ती ने उसे कुछ हद तक चुप रहने को मजबूर जरूर कर दिया है. लेकिन फिर भी अंदर ही अंदर वो हमारी जड़े खोदने में लगा हुआ है. हालांकि वह 1962 जैसा व्यवहार दोहराने की हिमाकत कतई नहीं करेगा मगर फिर भी उसकी छोटी-छोटी चालों को नजरअंदाज करके यूं खामोश बैठना समझदारी नहीं.तिब्बत-भारत और चीन चीन के कब्जे से पहले तिब्बत स्वतंत्र था. 25 लाख वर्ग किलोमीटर वाला यह देश चीन तथा भारत के मध्य बसा एशिया के बीचों-बीच स्थित है. तिब्बत और भारत संबंध बड़े धनिष्ट रहे थे. विशेषकर 7 वीं शताब्दी से जब भारत से बौद्ध धर्म का तिब्बत में आगमन हुआ था. जब तिब्बत स्वतंत्र था तो तिब्बती सीमाओं पर भारत के केवल 1500 सैनिक रहते थे और अब अनुमान है कि भारत उन्हीं सीमाओं की सुरक्षा के लिए प्रतिदिन 55 से 65 करोड़ रुपए खर्च कर रहा है. 1950 के दौरान चीन ने तिब्बत के आंतरिक मामलों में दखल देना शुरू किया. चीन से लाखों की संख्या में चीनी तिब्बत में लाकर बसाए गये. जिससे तिब्बती अपने ही देश में अल्पसंख्यक हो जाएं और आगे जाकर तिब्बत चीन का अभिन्न अंग बन जाए. 1959 में जब तिब्बती जनता ने चीनी शासन के विरुद्ध विद्रोह किया तो चीन ने उसे पूरी शक्ति से कुचल दिया. दलाईलामा को प्राणरक्षा के लिए भारत आना पड़ा. इसके बाद तिब्बत की सरकार भंग कर दी गई और वहां सीधे चीन का शासन लागू कर दिया गया.